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Senescence and Biological Clock in hindi , जीर्णता एवं जैविक घड़ी क्या है , प्रकार , कारक प्रभावित करने वाले

पढ़िए Senescence and Biological Clock in hindi , जीर्णता एवं जैविक घड़ी क्या है , प्रकार , कारक प्रभावित करने वाले ?

जीर्णता एवं जैविक घड़ी (Senescence and Biological Clock)

परिचय (Introduction)

जीर्णता (Senescence)

सभी जीवित प्राणियों में एक सुनिश्चित जीवन चक्र का पालन होता है जिसके अंतर्गत उनकी उत्पत्ति होती है, उनकी वृद्धि एवं परिवर्धन होता है व धीरे-धीरे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। पौधों में भी यही निश्चित क्रम होता है। बीज से नवोद्भिद का बनना, उसकी वृद्धि एवं परिवर्धन तथा पूर्ण विकसित होने के बाद धीरे-धीरे वे भी मृत्यु की ओर अग्रसर होते हैं।

मृत्यु से पूर्व पादपों में सुनियोजित तरीके से परिवर्धन होता है जिसमें निश्चित क्रम में होने वाले अपक्षयी (deteriorative) परिवर्तन जो प्राकृतिक रूप से प्रकार्यात्मक जीवन (functional life) का समापन करते हैं, जीर्णता कहलाते हैं। जीर्णता कालप्रभावन (aging) का परिणाम व परिवर्धन की अंतिम अवस्था है जो जीनों से नियंत्रित होती है।

सामान्यतः पादपों में सभी अंगों व ऊतकों में जीर्णता एक साथ नहीं होती। विभिन्न ऊतकों व भागों का जीवनकाल व समय भिन्न-भिन्न हो सकता है। उदाहरण के तौर पर जायलम ऊतक में मृदूतकी कोशिकाएँ लम्बे समय तक जीवित रहती हैं जबकि इसी में वाहिकाएँ, वाहिनिकाएँ व तंतु विभेदन (differentiation) के दौरान ही मृत चक्रों के सदस्य बाह्यदल (sepal), दल (petals) एवं पुंकेसर (anthers) का जीवनकाल बहुत छोटा होता है जबकि अंडाशय जाते हैं। पुष्पों में सहायक परिवर्धित होकर फल बनाता है। सदाहरित पादपों (evergreen plants) में पत्तियों का जीवनकाल पर्णपाती (deciduous ) वृक्षों की अपेक्षा अधिक होता है।

तालिका-1: कालप्रभावन, जीर्णता एवं मृत्यु में तुलना (Comparison between aging, senescence and death)

क्र.सं.काल प्रभावन (Aging)

जीर्णता (Senescence)मृत्यु (Death)
1.

2.

काल प्रभावन में किसी पादप अथवा उसके अंग में समय के साथ होने वाले सभी प्रकार के रासायनिक एवं संरचनात्मक परिवर्तन शामिल किये जाते हैं।

यह पादप अथवा पादप अंग के कुल परिवर्तनों को निरूपित करता है तथा जीवित प्राणियों का स्थायी लक्षण है ।

जीर्णता काल प्रभावन की प्रक्रिया का एक भाग है जिसमें अपचयी (catabolic) क्रियाएँ होती हैं जो अनुत्क्रमणीय (irreversible) हो जाती हैं तथा अंततः मृत्यु में समाप्त होती हैं।

इसमें केवल अपक्षय ( deterioration ) एवं ऊतकों व अंगों के हास ( degeneration) संबंधी परिवर्तन शामिल किये जाते हैं। यह कालप्रभावन का परिणाम है तथा इसकी परिणीति मृत्यु में होती है।

किसी भी पादप अथवा पादप अंग के विभिन्न प्रक्रियाओं की अंतिम परिणति है ।

यह सभी जीवित प्राणियों का स्थायी व अंतिम लक्षण अथवा परिणीती है जिससे पहले जीर्णता देखी जाती है।

विभिन्न प्रकार की जीर्णता (Various types of senescence)

उच्च पादप बीज से उगते हैं। उनमें वृद्धि एवं परिवर्धन होता है, पादप व पादप अंग परिपक्व होते हैं तथा एक निश्चित अवधि के बाद उनमें व पादप अंगों में अपघटन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। यह प्रक्रिया विभिन्न पादपों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। पादप की प्रकृति यथा एकवर्षी, बहुवर्षी पादप, पर्णपाती अथवा सदाबहार वृक्ष इत्यादि के अनुसार जीर्णता भी विभिन्न प्रकार की पाई जाती है। जीर्णता को दो मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है-

  1. संपूर्ण पादप जीर्णता अथवा एक फलन जीर्णता (Monocarpic senescence or whole plant senescence)

एक प्रजनन चक्र (reproductive cycle) के पश्चात् संपूर्ण पादप की जीर्णता एक अंडपी / फलन जीर्णता कहलाती है। इसमें पादप पर एक बार ही पुष्पन व फलन होता है। उसके बाद पादप की वृद्धि के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल होते हुए भी संपूर्ण पादप में धीरे-धीरे जीर्णता आ जाती है व पूरा पादप मृत हो जाता है। इसमें सभी प्रकार के एकवर्षी पादप (यथा गेहूँ, मक्का, सोयाबीन), कुछ द्विवर्षी पादप (यथा मूली) एवं कुछ बहुवर्षी पादप (यथा अगेव) शामिल किये जाते हैं। फल बनने व बीज के परिपक्व होने के पश्चात् ये पादप अचानक पीले पड़ने लगते हैं व मर जाते हैं।

  1. अंग जीर्णता अथवा बहुफलन जीर्णता (Organ senescence or polycarpic senescence)

अधिकांश बहुवर्षी पादपों में बार-बार पुष्पन एवं फलन होता है तथा पादप की मृत्यु पुष्पन व फलन से संबंधित नहीं होती है। इन पादपों में पुष्प, फल अथवा पत्तियों एवं कभी-कभी पूरे वायवीय भाग में उपयुक्त समय पर जीर्णता आती है व उनकी मृत्यु हो जाती है। यह तीन प्रकार हो सकती है-

(i) प्ररोह जीर्णता (Shoot senescence ) – कुछ शाकीय बहुवर्षी पादपों में पुष्पन व फलन के पश्चात वायवीय भाग अर्थात् प्ररोह में जीर्णता आ जाती है तथा इस भाग की मृत्यु हो जाती है । परन्तु चिरकालिक संरचना (perennating structure) को कुछ नहीं होता, उदाहरण रूमेक्स ( Rumex) एवं अर्टिका ( Urtica).

(ii) युगपत् एवं समकालिक जीर्णता (Simultaneous and synchronous senescence ) – इस प्रकार की जीर्णता शीतोष्ण (temperate) पर्णपाती (deciduous) काष्ठीय ( woody) वृक्षों में पाई जाती है। इन वृक्षों की अधिकांश पत्तियाँ व अन्य अंग विशेष मौसम में झड़ जाते हैं।

(iii) अनुक्रमिक जीर्णता ( Sequential senescence ) – इस प्रकार की जीर्णता में पादप अंग अर्थात् पत्तियाँ, फल बीजपत्र व पुष्पीय अंग इत्यादि एक निश्चित आयु प्राप्त करने के बाद जीर्ण होकर झड़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त रोम (trichomes), वाहिका एवं वाहिनिका में भी कुछ समय पश्चात जीर्णता प्रारंभ हो जाती है तथा मृत हो जाते हैं।

जब पादप में वृद्धि के साथ नई पत्तियाँ व पुष्प इत्यादि बनते हैं तब निचली प्रौढ़ पत्तियों में तथा परागण के पश्चात पुष्प के सहायक चक्रों में जीर्णता प्रारंभ हो जाती है। संभवतः ऐसा पोषक तत्वों व उपापचयजों के लिए स्पर्धा (competition) के कारण होता है ।

विभिन्न प्रकार की जीर्णता के लिए प्रेरक कारक भिन्न-भिन्न होते हैं तथा आंतरिक एवं बाहरी, दोनों प्रकार के हो सकते हैं। संपूर्ण पादप जीर्णता के लिए प्रेरक तत्व आंतरिक होते हैं जबकि युगपत अथवा समकालिक जीर्णता से संबंधित प्रेरक तत्व बाहरी होते हैं। तापमान तथा दीप्तिकाल (photoperiod) मुख्यतः पतझड़ का समय नियंत्रित करते हैं।

जीर्णता को प्रभावित व प्रेरित करने वाले विभिन्न कारक (Various factors inducing and affecting senescence)

जीर्णता पादप अथवा पादप अंगों की मृत्यु की ओर अग्रसर करने वाली सामान्य क्रिया नहीं है बल्कि पादप जीनों द्वारा नियंत्रित एवं समन्वयित प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत निश्चित दिशा में कुछ निश्चित परिवर्तन होते हैं ।

विभिन्न कारक जीर्णता को प्रेरित व प्रभावित करते हैं-

  1. जीन (Genes) पत्तियों में कोशिकाओं का परिवर्धन केन्द्रकीय जीनोम तथा हरितलवक में उपस्थित जीनों की समन्वयित प्रक्रिया होती है। हरितलवक का DNA पत्तियों के प्रारंभिक परिवर्धन काल में हरितलवक अवयवों के लिए कोडित करता है परन्तु पत्तियों के पूर्ण विकास (expansion) के बाद यह लगभग निष्क्रिय हो जाता है एवं संभवतः निष्क्रियता के फलस्वरूप हरितलवक का विघटन प्रारंभ हो जाता है तथा जीर्णता का प्रेरण होता है। अब यह केन्द्रकी जीनों के नियंत्रण में आ जाता है।
  2. पर्यावरण (Environment)- पर्यावरण के विभिन्न कारक व परिस्थितियाँ जीर्णता को प्रभावित करती हैं।

(i) कुछ पादपों जैसे फेसिओलस (Phaseolus) में जीर्णता की गति को धीमी करने व प्रकाश तीव्रता (light intensity) में संबंध होता है। संभवतः प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ने से जीर्णता धीमी हो जाती है।

(ii) ` दीप्तिकालिता (day length) भी जीर्णता पर प्रभाव डालती है। सेब में प्रकाशिक काल कम (14 से 12 घंटे तक प्रकाश) होने पर प्रोटीन, शर्करान्यूक्लिक अम्लों में कमी, क्लोरोफिल नष्ट होना इत्यादि जीर्णता संबंधी प्रक्रियाएँ प्रारंभ हो जाती हैं।

(iii) पादप की वृद्धि के प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों से भी जीर्णता प्रेरित (stimulate) होती है। उदाहरणतया सूखे की स्थिति, खनिजों की कमी, अत्यधिक उच्च व निम्न तापमान- ये सभी जीर्णता को बढ़ावा देते हैं।

(ix) कुछ रोगकारकों की उपस्थिति से भी जीर्णता प्रभावित होती है।

  1. हार्मोन (Hormones) – विभिन्न हार्मोन प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जीर्णता को प्रभावित करते हैं परन्तु तीन हार्मोन, ता से सीधे जुड़े हुए पाये गये हैं। एबसिसिक अम्ल (Abscisic acid) व इथीलिन (ethylene) जीर्णता को बढ़ाते हैं व उद्दीपित (stimulate) करते हैं। सायटोकाइनिन जीर्णता को विलम्बित (delay) कर देते हैं। संभवतः काइनेटिन RNA व प्रोटीन संश्लेषण को बढ़ा देते हैं तथा अपघटनी प्रक्रियाओं को कम कर देते हैं।
  2. सहसंबंधी कारक (Correlated factors)- पादपों की वृद्धि एवं परिवर्धन के साथ विभिन्न पोषक तत्वों, हार्मोन की कमी, प्रकाश व स्थान की कमी के कारण उनके लिए प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप जीर्णता का प्रारंभन हो सकता है।

(i) वृद्धि के साथ पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। नई तरुण पत्तियाँ, फल एवं बीजों के विकास व परिवर्धन के लिए अत्यधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, इसलिए प्रौढ़ पत्तियों इत्यादि में इन तत्वों की कमी महसूस होने लगती है।

(ii) वृक्षों व पादपों में शीर्ष व शाखाओं पर नये पत्ते, पुष्प इत्यादि विकसित होने पर निचली पत्तियों को पर्याप्त मात्रा में प्रकाश व शाखाओं के विकास के कारण स्थान उपलब्ध नहीं हो पाता, फलस्वरूप प्रौढ निचली पत्तियों में जीर्णता आरंभ हो जाती है ।

(iii) अनेक वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न विकरों की सक्रियता में परिवर्तन के कारण जीर्णता होती है। जीर्णता व मंड, प्रोटीन, क्लोरोफिल इत्यादि के जल अपघटन से संबंधित विकरों की सक्रियता आपस में संबंधित हैं। (iv) ऐसा माना जाता है कि पादपों में प्रजनन अंग संभवतः कुछ संदमक अथवा वृद्धि नियामकों का उत्पादन करते हैं जो कायिक अंगों में स्थानांतरण के बाद उनमें जीर्णता प्रेरित करते हैं।

जीर्णता के दौरान संरचनात्मक एवं कार्यिकी परिवर्तन (Structural and physiological changes during senescence)

पादप अंगों में जीर्णता के दौरान कोशिकाओं में विभिन्न संरचनात्मक एवं जैव रासायनिक परिवर्तन होते हैं। इनमें से कुछ मुख्य परिवर्तन निम्नलिखित हैं-

  1. जीर्णता के दौरान संबंधित ऊतक की कोशिकाओं में सर्वप्रथम कोशिकाओं की आंतरिक संरचना में परिवर्तन होने लगता है। हरितलवक की बाहरी झिल्लियों में दूरी बढ़ जाती है, फिर आंतरिक झिल्लियों में विघटन होने लगता है। माइटोकोन्ड्रिया के क्रिस्टी (cristae) फूल जाते हैं।
  2. कोशिकाओं की रसधानी (vacuole ) में विभिन्न जलअपघटनी विकरों की सांद्रता बढ़ जाती है, जैसे प्रोटीएज (protease), राइबोन्यूक्लिएज (ribonuclease), ग्लाइकोऑक्सीडेज (glyco oxidase) इत्यादि । ये विकर जीवद्रव्य में आ जाते हैं तथा कोशिकीय पदार्थों के विघटन में मदद करते हैं।

3.RNA ऐज का सक्रियता के कारण कुल RNA की मात्रा बहुत कम हो जाती है। विशेषकर rRNA तथा कुछ mRNA की मात्रा कम हो जाती है। बाद में DNA का भी विघटन हो जाता है।

  1. प्रकाश संश्लेषण कम होने लगता है ।
  2. मंङ की मात्रा कम हो जाती है। क्लोरोफिल विघटन के कारण पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं।
  3. अनेक पादपों में एन्थोसायनिन का संश्लेषण होता है तथा पत्तियां लाल अथवा नारंगी दिखाई देती हैं।
  4. जीर्णता वाले अंगों में कुछ प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है। प्रोटीन का अपघटन बढ़ जाता है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार अमिनो अम्ल का प्रोटीन में समावेशन (incorporation) भी बढ़ जाता है। संभवत अपघटन विकरों के संश्लेषण में अमिनो अम्ल का उपयोग होता है।
  5. अमिनो अम्ल, न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लिओटाइड इत्यादि का चालन (translocation) जीर्णित (senescent) पत्तियों से बाहर की ओर होता है

9.जायलम ऊतक में वाहिका एवं वाहिनिकाओं के परिपक्वन के दौरान भी जीर्णता के समान ही परिवर्तन होते हैं।

जीर्णता की सार्थकता ( Significance of Senescence)

जीर्णता के दौरान पादप के विभिन्न अंगों में निम्नकारी (degradative) परिवर्तन होते हैं तथा अंत में उनकी मृत्यु हो जाती है परन्तु निम्नकारी परिवर्तनों की भी सार्थकता होती है।

जीर्णता के दौरान पत्तियों में क्लोरोफिल, प्रोटीन इत्यादि का अपघटन होता है ।

  1. नयी तरुण पत्तियों की वृद्धि के लिए तथा फलों व बीजों की वृद्धि एवं परिपक्वन के दौरान काफी मात्रा में पोषक पदार्थों की आवश्यकता होती । ऐसे समय में प्रौढ़ व पुरानी पत्तियों के जीर्णन के दौरान उनमें उपस्थित विभिन्न पदार्थों यथा प्रोटीन, क्लोरोफिल एवं अन्य पदार्थों का अपघटन होता है तथा उनके अपघटनी उत्पादों (breakdown products) का स्थानांतरण इन पत्तियों से तरुण परिवर्धनशील ऊतकों की ओर हो जाता है। यहां इनका पुनः उपयोग हो जाता है। इस प्रकार मूल्यवान पोषक पदार्थों का अपव्यय होने से बच जाता है।
  2. उपरोक्त प्रक्रिया के फलस्वरूप पुरानी, नीचे की ओर स्थित पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तथा झड़ जाती हैं। इसी प्रकार अपरागित पुष्प तथा पुष्प के सहायक चक्रों से पोषक पदार्थों के स्थानांतरण के बाद वे भी झड़ जाते हैं। ये मिट्टी में गिर जाते हैं जहां इनका सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटन होने से मृदा में खनिज तत्व व अन्य पोषक पदार्थ मिल जाते हैं। यदि ये भाग पादप से संलग्न रहते तो जल, खनिज तत्वों का व्यर्थ अपव्यय होता रहता ।
  3. अनेक एकवर्षी पादपों में चिरकालिक अंगों के अतिरिक्त पूरे पादप की जीर्णता के माध्यम से वे प्रतिकूल परिस्थितियों से बच निकलते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में चिरकालिक अंगों (perennating parts) से फिर से नये पादप विकसित हो जाते हैं। शीतोष्ण जलवायु में पाये जाने वाले अधिकांश पादपों व वृक्षों में शीत ऋतु में प्रतिकूल तापमान आने से पूर्व ही पत्तियों में जीर्णता व उनके झड़ जाने से पादप प्रतिकूल तापमान से होने वाली क्षति से बच जाते हैं। इसी प्रकार वे अवांछित वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा होने वाली जल हानि को भी रोकने में समर्थ होते हैं ।