scientific attitude in hindi meaning वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसे कहते हैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना

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वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना आवश्यकता बढ़ावा कैसे दिया जाए वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसे कहते हैं ? scientific attitude in hindi meaning ?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आपका क्या तात्पर्य है ? वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने में रसायन विज्ञान कैसे सहायक है ?
What do you mean by Scientific Attitude ?k~ How chemistry helps in developing scientific attitude?
उत्तर- रसायन शिक्षण के अनेक उद्देश्य होते हैं। इनमें से प्रमुख है कि छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करें। छात्र जो भी करें, सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास न करें वरन् प्रयोगों से व तथ्यों पर आधारित बातों पर ही विश्वास करे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है कि बालकों में इस प्रकार के गुणों का समावेश हो कि पे संकीर्णता, अन्धविश्वास, पक्षपात आदि अवगुणों से मुक्त होकर शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति करें। उनकी मनोवृत्ति उदार हो, उनमें बौद्धिक ईमानदारी के गुण विकसित हों।
सन् 1971 में राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा एक कार्यशाला (Workshop) का आयोजन चण्डीगढ़ में किया गया जिसके अन्तर्गत विचारगोष्ठी में विद्यार्थियों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर विचार किया गया था और एक सम्पन्न विद्यार्थी के कुछ लक्षण बताये थे ये निम्न हैं-
1. जिस विद्यार्थी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है, वह अपने कथनों और क्रियाओं में स्पष्ट तथा निश्चित होता है।
2. उसका दृष्टिकोण सदैव विषय प्रधान होता है और वह कभी भी पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं अपनाता।
3. वह कभी भी अपने निर्णयों पर पुनःविचार करने को तैयार रहता है।
4. वह सदैव नए आविष्कार करने को तत्पर रहता है तथा प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर अपने निर्णयों को आधारित करता है।
5. वह सदैव वैज्ञानिक सामग्री का संकलन करता है तथा उनका व्यवस्थित रिकार्ड रखता है।
6. वह सदैव मानव कल्याण के लिए किए गए विज्ञान के प्रयोगों का समर्थन करता है।
नेशनल सोसाइटी ऑफ स्टडी ऑफ एजुकेशन (National Society of the stud of education) के अनुसार-सहज जिज्ञासा, उदार मनोवत्ति सत्य के प्रति निष्ठा, अपना कार्य पद्धति में पूर्ण विश्वास और अपने परिणाम अथवा अन्तिम विचारों की सत्यता व प्रभावित करना आदि गुण वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अन्तर्गत आते हैं।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्तियों में निम्न गुण दिखाई देते हैं-
1. व्यापक दृष्टिकोण (Wide Attitude)- रसायन विज्ञान का अध्ययन छात्रों में व्यापक दृष्टिकोण विकसित करता है । वे वस्तुओं की परख वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करते हैं और उसी के आधार पर उनके गुण और अवगुणों की जांच करते हैं। वे पुस्तकालय का
उपयोग करना सीखते हैं।
2. अन्धविश्वासों से विमुखता (Aversion to Superstitions)- भारतीय समाज रीति-रिवाजों और अन्धविश्वासों से भरा है और जनता में अन्धविश्वासों की भावनाएं इतनी गहरी हैं कि इनके विपरीत कोई बात समाज गृहण ही नहीं कर सकता।
रसायन विज्ञान अध्ययन छात्रों को सिखाता है कि प्रत्येक घटना का कारण होता है कोई दैवीय प्रकोप या मान्यता नहीं। तथ्यों व प्रयोगों की कसौटी पर जो बात खरी उतरे वही सत्य है। अतः छात्र अन्धविश्वासों से मुक्त होते हैं।
3. सुस्पष्टता (Precision)- रसायन विज्ञान एक नपा-तुला विषय है। इसमें जो भी बात कही जाती है वह सूत्रों, अभिक्रियाओं और सीमित शब्दों में कही जाती है। इसमें अलंकारयक्त शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता है। अतः इसके अध्ययन से छात्रों में सस्पष्टता का गुण आता है।
4. जिज्ञासा (Curiosity) – रसायन विज्ञान का छात्र सदैव जिज्ञासु रहता है। उसमें सदैव नवीन ज्ञान को गृहण करने की प्रवृत्ति रहती है और इसी कारण वह सदैव चिन्तनशील प्रक्रिया में रहता है।
5. सत्य के प्रति निष्ठा (Loyalty to Truth)- रसायन विज्ञान का छात्र बिना सत्य के प्रति निष्ठा रखे इसके अध्ययन में सफल नहीं हो सकता, क्योंकि इस विषय की प्रकृति ही सत्य पर आधारित है।
6. विनम्रता (Humility)- एक विज्ञान के छात्र में विनम्रता का गुण होना अति आवश्यक है। एक विनम्र व्यक्ति ही दूसरे के विचारों व उसकी खोजों को अपना सकता है। अहंकारयुक्त व्यक्ति कभी भी दूसरे के द्वारा किए गए प्रयोगों की सफलता को स्वीकार नहीं कर सकता। अतः रसायन विज्ञान का सफले छात्र सदैव विनम्र होता है।
7. उदारमति (Open mindedness)- रसायन विज्ञान के प्रयोगों से व्यक्ति में ऐसे गुणों का विकास होता है कि वह अपने खुले मस्तिष्क द्वारा किसी भी बात के पक्ष व विपक्ष में सदैव सुनने को तैयार रहता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कभी भी अन्तिम सत्य को मानकर नहीं चलता। यह प्रक्रिया नवीन खोजों, विचारों एवं प्रयोगों के साथ बदलती रहती है।
8. समस्याओं का क्रमबद्ध निदान (Logical solution to the problems)- रसायन विज्ञान के अध्ययन से छात्र में समस्याओं का क्रमबद्ध निदान करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
9. ईमानदारी (Honesty) वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति में अपने विषय के प्रति, अपने अध्ययन के प्रति ईमानदारी होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उपाय-
1. नवीन शिक्षण विधियों का प्रयोग- रसायन विज्ञान का शिक्षण परम्परागत शिक्षण प्रणालियों द्वारा न कराकर नवीन शिक्षण विधियों के आधार पर करवाना चाहिए। इससे शिक्षण प्रभावी, क्रमबद्ध एवं सत्य पर आधारित होगा। छात्रों को अधिक से अधिक तथ्य प्रयोग या प्रदर्शन से समझाने चाहिए एवं छात्रों को भी यथा सम्भव निरीक्षण, प्रयोग आदि करने के अवसर देने चाहिए।
2. छात्रों द्वारा पुस्तकालय का उपयोग- छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए उन्हें रसायन विज्ञान से सम्बन्धित साहित्य पुस्तकालय में बैठकर पढ़ने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए। इससे छात्रों में विषय के प्रति रुचि बढ़ेगी। रसायन विज्ञान के अध्यापक को भी पुस्तकालय में विषय से सम्बन्धित महान वैज्ञानिकों की जीवनियां, उनके आविष्कारों की कहानियां आदि से सम्बन्धित पुस्तकें मंगानी चाहिए।
3. छात्रों की जिज्ञासाओं को शान्त करना-वैज्ञानिक अभिवृत्ति वाले छात्र में सदैव विज्ञान की दैनिक घटनाओं के सन्दर्भ में अनेक प्रश्न उठते रहते हैं। वे उनके समाधान व अधिक से अधिक जानने को उत्सुक रहते हैं। अध्यापकों को चाहिए कि वे इनका उत्तर छात्रों को वैज्ञानिक ढंग से सविस्तार दें।
4. अध्यापक का व्यक्तित्व-उपर्युक्त सभी कार्यों की पूर्ति अध्यापक द्वारा ही हो सकती है। अतः छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में अध्यापक की प्रमुख भूमिका होती है । एक अध्यापक तभी छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है जब उसका स्वयं का दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो। वह सत्यप्रिय हो, अन्धविश्वासों से मुक्त हो, विनम्र हो, अध्ययनशील हो तथा विषय का ज्ञाता हो।
उपर्युक्त गुणों वाला अध्यापक ही छात्रों में इस प्रकार के गुणों को विकसित कर सकेगा।
5. पुस्तकों में दिए गए अभ्यासों का प्रयोग- विज्ञान के क्षेत्र में तरह-तरह की ज्ञानवर्द्धक पत्रिकाएं प्रकाशित होती रहती हैं। उनमें तरह-तरह के छोटे-छोटे अभ्यास व प्रयोग भी दिए होते हैं। इनके अभ्यास से छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास किया जा सकता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि प्रतिदिन ऐसे पत्र-पत्रिकाओं की कटिंग को नोटिस बोर्ड पर लगवाने की व्यवस्था करें जिससे अधिक से अधिक छात्र उनका लाभ उठा सकें।
6. पाठ्य सहगामी क्रियाएँ-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक रोचक कार्य जैसे-विज्ञान क्लब, विज्ञान मेले, वैज्ञानिक दर्शनीय भ्रमण आदि विज्ञान के क्षेत्र में बालकों की रुचि बढ़ा सकते हैं। विज्ञान के व्याख्यान, वाद-विवाद आदि कार्यक्रमों से बालकों के ज्ञान में वृद्धि के साथ साथ रुचि भी विकसित होगी। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दिवसों को मनाना, वैज्ञानिकों के जन्मदिवस मनाना आदि कार्यों से छात्रों में व्यापक वैज्ञानिक दृष्टिकोण।
7. प्रशिक्षण प्रणालियों में सुधार- (1) वैज्ञानिक अभिवृत्ति के मूल्यांकन व मापन हेतु अभिवृत्ति मापनी (Attitude Scale) का उपयोग किया जाना चाहिए। (2) आन्तरिक मूल्यांकन योजना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी मापन किया जाना चाहिए।
8. शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में उचित प्रशिक्षण-शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रशिक्षण का आयोजन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
9. शिक्षकों व शिक्षाधिकारियों का कर्तव्य-रसायन विज्ञान शिक्षक व पर्यवेक्षक का कार्य शिक्षकों व अधिकारियों को जिम्मेदारी के साथ सोचना चाहिए जिससे छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हो सके।
उपर्युक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि रसायन विज्ञान द्वारा छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।
ज्ञानोपयोग-
1. छात्र आसवन विधि द्वारा आसुत जल प्राप्त करने में प्राप्त ज्ञान का उपयोग कर सकेंगे।
कौशल-
1. छात्रों में आसवन विधि द्वारा पृथक्करण संबंधी प्रयोग करने का कौशल विकसित कर सकेंगे।
अभिरूचि-
1. छात्र आसवन विधि से संबंधित विषयवस्तु को पढ़ने में रूचि रख सकेंगे।
अभिवृत्ति-
1. छात्र पृथक्करण की आसवन विधि के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण रख सकेंगे।
सहायक सामग्री-आसवन विधि को दर्शाता हुआ चार्टध् आवश्यक उपकरण
पूर्व ज्ञान-छात्र वाष्पीकरण की सामान्य जानकारी रखते है।
प्रस्तावना-
क्र.सं. छात्राध्यापक क्रियाएँ छात्र क्रियाएँ
1. 1. पदार्थ की कितनी अवस्थायें होती हैं ? पदार्थ की तीन अवस्थायें होती है।
2. तीनों अवस्थाओं के नाम बताओ। ठोस, द्रव, गैस।
3. पानी को जब गर्म करते है तो क्या होता हैं ?
पानी को गर्म करने पर वह उबलने लगता व उसकी वाष्प बनने लगती है।
4. वाष्प को पुनः ठण्डा करने पर वह किसमें बदल जाती है। वाष्प ठण्डा करने पर पुनः पानी बन जाती है।
5. इस प्रकार पुनः जल प्राप्त होता है, इस क्रियाविधि को क्या कहते हैं ? समस्यात्मक प्रश्न
उद्देश्य कथन-आज हम पदार्थों के पृथक्करण की विधियों के अन्तर्गत आसवन विधि का अध्ययन करेंगे।
प्रस्तुतीकरण-
शिक्षण बिन्दु व विषयवस्तु विश्लेषण छात्राध्यापक क्रियाएँ छात्र क्रियाएँ श्यामपट्ट सार
आसवन
विधि का
परिचय

आसवन की
परिभाषा

आसवन
विधि द्वारा
आसुत
जल प्राप्त
करने
संबंधी
प्रयोग

उपयोग 1. पानी को जब गर्म किया जाता है तो क्या होता हैं ?
2. यदि इस वाष्प को पुनः ठण्डा कर लिया जाये तो यह कौनसी अवस्था धारण कर लेती है?
3. इस प्रकार प्राप्त द्रव (जल) को क्या कहते है?
अध्यापक कथन-इस प्रकार प्राप्त जल आसुत जल कहलाता है।
जब किसी द्रव को गर्म किया जाता है तो वह एक निश्चित ताप पर उबलता है तथा अधिकतम, गति से वाष्प में परिवर्तित होने लगता है तथा पुनः ठण्डा होकर द्रव अवस्था में आ जाता है, इस क्रिया को आसवन कहते है।
(छात्रों को आसवन विधि का चार्ट दिखाकर प्रश्न पूछते है)
4. फ्लास्क में थिसिल कीप से क्या डालते है?

5. अशुद्ध जल वाला फ्लास्क निकासनली से
किससे जुड़ा हुआ हैं ?
6. अन्य फ्लास्क में क्या दिखाई देता हैं ?
7. यह आसुत जल फ्लास्क में कहाँ से आया?
अध्यापक कथन-जब अशुद्ध जल को गर्म करते हैं, तो वह उबलने लगता है तथा वाष्प बनने लगती है। यह वाष्प निकास नली से दूसरे फ्लास्क में एकत्रित होती है जहाँ उसे ठण्डा कर द्रव रूप में प्राप्त किया जाता है, यही आसुत जल है।
औषधियों के निर्माण व अन्य वैज्ञानिक कार्यों में हम समुद्र अथवा साधारण जल प्रयोग में नहीं ला सकते है। अतः वहाँ आसुत जल का प्रयोग किया जाता है।

पानी निश्चित ताप पर उबलता है तथा वाष्प उठती रहती है।
जल वाष्प ठण्डी होने पर द्रव अवस्था में आ जाती है।

छात्र निरूतर।

थिसिल कीप की सहायता से अशुद्ध जल को फ्लास्क में डालते है।
निकासनली द्वारा एक अन्य फ्लास्क से जुड़ा हुआ है।
आसुत जल।
छात्र निरूतर।
छात्र ध्यानपूर्वक सुनते है एवं अभ्यास पुस्तिका में लिखते है।

जब किसी द्रव को गर्म किया जाता है तथा उत्पन्न वाष्प को ठण्डा कर पुनः द्रव प्राप्त किया जाता है तो इस विधि को आसवन कहते है।
अशुद्ध जल से आसवन विधि द्वारा आसुत जल प्राप्त किया जाता है।

आसुत जल को प्रयोगशाला के कार्यों व औषधि निर्माण में प्रयुक्त करते है।
सावधानी-थिसिल कीप का निचला सिरा फ्लास्क के द्रव में डूबा होना चाहिये अन्यथा वाष्प थिसिल कीप से बाहर निकल जायेगी।

मूल्यांकन-
प्रश्न 1. आसुत जल किस विधि द्वारा प्राप्त किया जाता हैं ?
(अ) ऊर्ध्वपातन (ब) आसवन (स) निथारना (द) छानना।
प्रश्न 2. किसी द्रव को जब ……0000 करते हैं तो वाष्प का निर्माण होता है तथा पुनः ठण्डा करने पर वाष्प …….. में बदल जाती है।
प्रश्न 3. आसवन द्वारा प्राप्त जल को क्या कहते हैं ?
प्रश्न 4. आसवन विधि की परिभाषा दो ?
प्रश्न 5. आसुत जल के उपयोग बताइये ?
गृहकार्य- प्रश्न 1. आसवन विधि किसे कहते हैं विस्तार से वर्णन करते हुए आसत जल प्राप्त करने की विधि समझाइये।
पर्यवेक्षक टिप्पणी-
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