संप सभा की स्थापना | भगत पंथ की स्थापना कब हुई | सम्प सभा किसने शुरू किया samp sabha ki sthapna kaha hui

By   January 14, 2021

samp sabha ki sthapna kaha hui in hindi संप सभा की स्थापना | भगत पंथ की स्थापना कब हुई | सम्प सभा किसने शुरू किया ?

प्रश्न : सम्प सभा क्या थी ?

उत्तर : मेवाड़ अंचल में भील आदि जनजातियों के सामाजिक और नैतिक उत्थान , जनजागृति और राजनैतिक चेतना उत्पन्न करने के लिए 1883 ईस्वीं में गोविन्द गिरि ने (डूंगरपुर) में सम्प सभा की स्थापना की।

प्रश्न : विद्या प्रचारिणी सभा के बारे में जानकारी बताइए। 

उत्तर : इसकी स्थापना हरिभाई किंकर द्वारा की गयी। इसके द्वारा जनजागृति , कृषक आन्दोलनों के सञ्चालन हेतु और राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने के लिए कार्य किया गया।

प्रश्न : ऊपरमाल पंच बोर्ड क्या है ?

उत्तर : इसकी स्थापना विजयसिंह पथिक ने 1917 में बिजौलिया में की गयी। बिजोलिया कृषक आन्दोलन के संचालन हेतु कृषकों में जागृति लाने हेतु इसने कार्य किया।

प्रश्न : बनवासी सेवा संघ का इतिहास बताइए ?

उत्तर : इसकी स्थापना भोगीलाल पांड्या और भूरेलाल बयां द्वारा बागड़ में की गयी। आदिवासियों में जनजागृति के लिए इस संस्था ने महत्वपूर्ण कार्य किया।

आदिवासियों के उत्थान हेतु सामाजिक संस्थायें : एक नजर में –

 क्रम. संख्या 

 संस्था का नाम 

 स्थापना वर्ष 

 स्थान 

 संस्थापक 

 1. 

 सम्पसभा 

1833 

डूंगरपुर  

 गुरु गोविन्द गिरि 

 2.

 भील सेवा मण्डल 

 1922

 मेवाड़

 अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर (ठक्करबापा)

 3.

खडलाई आश्रम  

1934 

डूंगरपुर 

भोगीलाल पंड्या , गौरी शंकर उपाध्याय  

 4. 

 वागड़ सेवा मन्दिर

 1935

 डूंगरपुर

भोगीलाल पंड्या , गौरी शंकर उपाध्याय  

 5.

 वाल्मीकि संघ और आदिवासी 

 

 बागड़ 

भोगीलाल पंड्या  

 6.

गाँधी आश्रम और गाँधी सेवा संघ  

 

 अजमेर 

 हरिभाऊ उपाध्याय 

 7.

सेवासंघ  

 

 डूंगरपुर

भोगीलाल पंड्या  

 8.

डूंगरपुर सेवा संघ  

 1938

डूंगरपुर 

भोगीलाल पंड्या  

प्रश्न : गोविन्द गिरी कौन थे ?

उत्तर : भीलों और अन्य आदिवासियों में जनजागृति फैलाने वाले अग्रदूत और इन्हें धर्म के दायरे में लाने के लिए भगत पंथ के संस्थापक गोविन्द गिरी डूंगरपुर के एक बनजारे परिवार से थे। दक्षिण अरावली क्षेत्र में भीलों में राजनितिक चेतना , सामाजिक और नैतिक उत्थान के लिए डूंगरपुर में सम्प सभा (1883 ईस्वीं) की स्थापना की। आदिवासियों में कुरीतियों को दूर करने के लिए भारत आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन चलाया। इनके नेतृत्व में 1913 ईस्वीं में मानगढ़ पहाड़ी पर सम्प सभा का विराट सम्मेलन आयोजित हुआ तो सेना द्वारा बरसाई गयी गोलियों से 1500 भील स्त्री – पुरुष घटना स्थल पर ही मारे गए। और उनकी पत्नी को बंदी बनाया गया , जिन्हें 10 वर्ष बाद रिहा किया गया।

प्रश्न : संप सभा तथा भगतपंथ अथवा दसनामी पथ क्या है।  इतिहास लिखिए। 

उत्तर : 1883 ईस्वीं में गोविन्द गिरि ने ‘सम्पसभा’ की स्थापना की और मेवाड़ , डूंगरपुर , गुजरात , मालवा आदि क्षेत्रों के भील और गरासियो को संगठित करने का प्रयास किया। सम्प सभा का अर्थ आपसी एकता , भाईचारा तथा प्रेम भाव रखने वाला संगठन होता है। इस संस्था के दस नियम थे जिनमें मांस खाने का निषेध , शराब पीने का निषेध , चोरी और डकैती करने का निषेध , स्वदेशी का प्रयोग और अन्याय का प्रतिकार आदि सम्मिलित थे। इस सभा के प्रयास से आदिवासी लोगों ने इन बुराइयों को छोड़ने का प्रयास किया। वे अपने आपसी झगड़ों को पंचायत के मध्य ही सुलझाने लगे और बच्चों को पढ़ाने का प्रयास करने लगे। उन्होंने लाग-बाग न देने , बेगार न करने और व्यर्थ के कर न देने की भी शपथ ली।

गुरु को दयानन्द सरस्वती से प्रेरणा मिली। 1881 ईस्वीं में जब दयानंद सरस्वती उदयपुर गए तो गुरु गोविन्द उनसे मिले और उनसे प्रेरणा पाकर गुरु ने आदिवासी सुधार और स्वदेशी आन्दोलन शुरू किया और कुरीतियों को दूर करने के लिए भगत आंदोलन और स्वदेशी आन्दोलन चलाया। उन्होंने जनजातियों में व्याप्त बुराइयों और कुरीतियों को दूर करने के लिए भरसक प्रयास किये और अपने अधिकारों के प्रति भी सजग किया। इस आन्दोलन को भगत आन्दोलन के नाम से ही जाना जाता है।