कर्मचारियों की अनिवार्य छँटनी की समस्या से कैसे निपटा जाए ? retrenched employee meaning in hindi

By   January 9, 2021

retrenched employee meaning in hindi कर्मचारियों की अनिवार्य छँटनी की समस्या से कैसे निपटा जाए ?

कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण पर विचार कर रही सरकारों को सबसे पहले कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर फैसला कर लेना चाहिए।

 क्या इकाई की पुनःसंरचना बिक्री से पहले करनी चाहिए अथवा बाद में ?
सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उपक्रमों का लाभप्रद मूल्य नहीं मिलेगा यदि उन्हें उसी स्थिति में बेच दिया जाए जिस स्थिति में वे हैं । ऐतिहासिक कारणों से, कई उपक्रमों में आवश्यकता से अधिक कर्मचारी हैं, उनमें अप्रचलित और पुरानी पड़ चुकी मशीनें तथा प्रौद्योगिकी उपयोग की जा रही हैं और उनका कामकाज बहुधा नौकरशाही तरीके से चल रहा है। इस तरह की पुनःसंरचना नहीं किए गए उपक्रमों को बेचने से उनका काफी कम मूल्य प्राप्त होगा। सरकार के समक्ष एक विकल्प यह है कि वह इन उपक्रमों को बेचने के लिए बाजार में पेश करने से पहले इनकी पुनःसंरचना करे। इसके लिए आवश्यकता से अधिक पाए गए कर्मचारियों की छंटनी करे, उपयुक्त दक्षता प्राप्त नए कर्मचारियों की नियुक्ति करे, अपने अलाभप्रद व्यापारिक इकाइयों को बेच दे एवं प्रचालन का कम्प्यूटरीकरण इत्यादि करे। इसके बाद ये उपक्रम निजी निवेशकों को आकर्षित कर सकेंगे और तब वे उन्हें अधिक मूल्य पर खरीदने को तैयार होंगे। दूसरी ओर, तेजी से निजीकरण करने के प्रतिपादकों का तर्क हैं कि बिक्री से पहले इन उपक्रमों की पुनःसंरचना के प्रयास से विलम्ब होगा और निजीकरण का जो जोर है वह ठण्डा पड़ जाएगा। पुनः, यह भी संदेहास्पद है कि सरकारें पुनःसंरचना करने में सक्षम हैं।

 कर्मचारियों की अनिवार्य छँटनी की समस्या से कैसे निपटा जाए ?

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में आवश्यकता से अधिक संख्या में कर्मचारियों के होने का अर्थ है कि पुनःसंरचना की प्रक्रिया में सामान्यतया श्रमबल की छटनी अवश्य होगी। साधारणतया, नौकरी से अनिवार्य रूप से छँटनी राजनीतिक रूप से अव्यवहार्य है और इससे निजीकरण का विरोध ही बढ़ेगा। इसलिए सरकारें किसी न किसी प्रकार का स्वैच्छिक दृष्टिकोण ही अपनाने का प्रयास करती है। स्वैच्छिक
दृष्टिकोण के घटक जिन्हें लागू करने का प्रयास किया गया है निम्नलिखित हैं:
ऽ मौद्रिक क्षतिपूर्ति (अर्थात् स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना)
ऽ पुनः प्रशिक्षण
ऽ पुनर्नियोजन

कभी-कभी सरकार इस आश्वासन पर, कि नया स्वामी निजीकरण के बाद भी कर्मचारियों की छँटनी नहीं करेगा, कम कीमत पर भी उपक्रम दे देती है। पूर्वी जर्मनी में निजीकरण के कार्यक्रम से संबंधित एक उदाहरण है जिसमें सरकार ने सिर्फ एक ड्युशमार्क के बदले एक उपक्रम को बेच दिया क्योंकि बोली लगाने वाले ने वायदा किया था कि वह सभी कर्मचारियों को रखेगा।

पुनःप्रशिक्षण का अभिप्राय है कि कर्मचारियों को वैसे कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाए जो उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के उसी उपक्रम में उत्पादक सदस्य की भूमिका निभाने में सहायक हो। अथवा इसका लक्ष्य यह भी हो सकता है कि वे निजी क्षेत्र में वैकल्पिक रोजगार के तलाश के योग्य हो जाएँ। पुनर्नियोजन सार्वजनिक क्षेत्र के एक उपक्रम से सरकारी विभाग से दूसरे उपक्रम अथवा विभाग या निजी क्षेत्र में भी हो सकती है।

कर्मचारियों की छंटनी की प्रक्रिया में कई कठिनाइयाँ आती हैं:
क) कर्मचारियों की छँटनी का कुल व्यय इतना अधिक हो सकता है कि यह आर्थिक रूप से खस्ता हाल सरकार के लिए कठिनाई पैदा कर सकती है। यह समस्या कुछ हद तक हल हो गई है क्योंकि अनेक बहुपक्षीय एजेन्सियाँ अब पृथक्करण वेतन पैकेजों के लिए ऋण मुहैय्या कराने को तैयार हैं।

खद्ध उपयुक्त पैकेज का प्राक्कलन करना सरल नहीं है । साधारणतया क्षतिपूर्ति पैकेज के निर्धारण के लिए कुछ प्रयोग सिद्ध अनुभवों का उपयोग किया जाता है जैसे प्रत्येक वर्ष की सेवा के लिए एक वर्ष का वेतन देना । साधारणतया इस बात को जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया है कि दी गई क्षतिपूर्ति पर्याप्त है अथवा नहीं।

किंतु छँटनी के परिणामस्वरूप आय में परिवर्तन के वर्तमान मूल्य की समुचित गणना करने के लिए न सिर्फ वेतन को अपितु बोनस और अन्य नकद लाभों को भी हिसाब में अवश्य लेना चाहिए। कई उद्योगों में, उच्च दक्षता प्राप्त कर्मचारियों को छोड़कर सार्वजनिक क्षेत्र में निजी क्षेत्र की अपेक्षा अधिक वेतन है। इतना ही नहीं, नौकरी से हट गए कर्मचारी को वैकल्पिक रोजगार खोजने में काफी समय लग सकता है और इस अन्तराल में उसकी आय नहीं के बराबर हो सकती है। आगे, अधिकांश विकासशील देशों में, सार्वजनिक क्षेत्र स्वास्थ्य सुरक्षा और वृद्धावस्था पेंशन भी उपलब्ध कराता है । सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी की अधिक सुरक्षा इस क्षेत्र में रोजगार को अधिक आकर्षक बना देता है। यदि इन सभी कारकों को ध्यान में रखा जाए तो जो क्षतिपूर्ति दिया जाना चाहिए वह काफी अधिक हो जाता है।

यह भी तर्क दिया जा सकता है कि विकासशील देशों में, जहाँ नौकरी के अवसर अत्यन्त सीमित हैं सार्वजनिक क्षेत्र में नियोजित एक कर्मचारी को परिवार के कई बेरोजगार सदस्यों का भरण-पोषण करना पड़ता है। इसलिए इस एक कर्मचारी की आय का स्रोत बंद हो जाने से इसका प्रभाव कई व्यक्तियों पर पड़ता है।

ग) यहाँ एक अन्य दुर्बोध समस्या भी इससे जुड़ी हुई है। एकबार पृथक्करण पैकेज तैयार कर लेने के बाद सिर्फ उच्च उत्पादकता वाले अथवा श्रेष्ठ कर्मचारी ही पैकेज को स्वीकार कर नौकरी छोड़ सकते हैं क्योंकि उन्हें अन्यत्र नौकरी मिलने का पक्का विश्वास होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में सिर्फ ऐसे कर्मचारी ही रह जाते हैं जिनकी उत्पादकता कम होती है। इसे प्रतिकूल चयन की समस्या कहा जाता है: चूंकि पेश किया गया पैकेज व्यक्ति विशेष की आवश्यकताओं अथवा विशेषताओं को ध्यान में रख कर तैयार नहीं किया जाता है प्रत्येक कर्मचारी के समक्ष विचार करने के लिए एक ही पैकेज होता है। परंतु सिर्फ उच्च उत्पादकता वाले कर्मचारी के लिए ही यह पैकेज आकर्षक प्रतीत होता है तथा वह इसे स्वीकार कर लेता है।

 क्या परिसम्पत्तियाँ दे दी जानी चाहिए अथवा बिक्री कर दी जानी चाहिए ?

जैसा कि हमने पहले नोट किया है, निजीकरण करने का एक तरीका लोगों के समूह को वाउचर देना है जो बाद में इन वाउचरों का उपयोग अपनी पसंद के उपक्रमों के शेयर खरीदने में करेंगे। देश के संभवतः सभी लोगों को वाउचरों का मुफ्त वितरण समानता के लक्ष्य को पूरा करता हुआ प्रतीत होता है और निजीकरण की प्रक्रिया में प्रत्येक व्यक्ति का हित निहित हो जाता है। इससे निजीकरण की प्रक्रिया के विरोध से निपटने में भी सहायता मिलती है । तथापि, बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में इस प्रणाली को कार्यान्वित करना कठिन है। इतना ही नहीं, बिखरा हुआ स्वामित्व कारपोरेट प्रशासन संबंधी समस्याओं को जन्म देता है। इसलिए, अनेक देशों ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को यूँ ही दे देने की अपेक्षा बेचने का विकल्प चुना है। वे लोग जिनके पास धन है अथवा जिन्हें धन सुलभ हो सकता है वे सामान्यतया विदेशी हैं अथवा वैसे लोग हैं जिन्होंने पुरानी व्यवस्था के अंतर्गत धन अर्जित कर लिया है, और इन दो समूहों के लोगों के हाथ इन उपक्रमों की बिक्री का सशक्त राजनीतिक विरोध हो सकता है।

किसी उपक्रम को दे देने का एक आसान तरीका उपक्रम में कार्यरत लोगों अर्थात् प्रबन्धकों और कर्मचारियों को हिस्सेदारी देना है। किंतु इसे आम जनता के प्रति अन्यायपूर्ण माना जाता है क्योंकि उनसे वसूले गए करों की सहायता से ही इन उपक्रमों की स्थापना की जाती है। पुनः , चूँकि सार्वजनिक क्षेत्र के इन उपक्रमों का मूल्य निर्धारण करना अत्यन्त चतुराई पूर्ण कार्य है, यह आरोप रहा है कि उपक्रम के अंदर के लोग बहुधा जानबूझकर बाहरी दुनिया के सामने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की रूग्ण तस्वीर पेश करके और इसकी परिसम्पत्तियों का वास्तविक से कम मूल्य निर्धारण कर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को एकदम सस्ते दाम पर हथियाने में कामयाब हो जाते हैं । यह समाजवाद से पूँजीवाद की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वहाँ भूमि, भवन अथवा अन्य परिसम्पत्तियों का बाजार मूल्य निर्धारित करने का कोई अनुभव नहीं होता है।

बोध प्रश्न 3
1) निजीकरण की कुछ बाधाओं की चर्चा कीजिए? क्या आपके विचार में ये बहुत कठिन हैं ?
2) क्या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की पुनःसंरचना निजीकरण से पहले करना चाहिए अथवा बाद में? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दें।
3) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की पुनःसंरचना से उत्पन्न बेरोजगारी की समस्या से सरकार कैसे निबट सकती है?
4) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ‘‘यूँ ही दे देने‘‘ के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क हैं?