श्वसन मूल (respiratory or breathing roots in hindi) श्वसन मूल का अनुप्रस्थ काट (t.s of pneumatophore)

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(respiratory or breathing roots in hindi) श्वसन मूल की परिभाषा क्या है , किसे कहते है , भाग प्रकार पार्ट्स श्वसन मूल का अनुप्रस्थ काट (t.s of pneumatophore) |

श्वसन मूल (respiratory or breathing roots) : पौधे के श्वसन अथवा ऑक्सीजन प्राप्ति में सहायक ये रूपान्तरित मूसला जड़ें प्राय: लवणोदभिद पौधों अथवा मेनग्रोव वनस्पति के कुछ पौधों जैसे – सोनेरेशिया , ऐविसीनिया और राइजोफोरा में पायी जाती है। ये पौधे समुद्र तटों के पास खारी दलदलों अथवा छिछले किनारों और छोटे छोटे टापुओं के कीचड़युक्त स्थानों में उगते है और इन पौधों की जड़ों को वृद्धि और श्वसन हेतु मृदा की सतह के नीचे अथवा भूमिगत वातावरण में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं हो पाती।

इनमें प्राथमिक जड़ से उत्पन्न होती हुई अनेक क्षैतिज द्वितीयक जड़ें पायी जाती है। इनसे कुछ ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती उधर्वरूप से वृद्धि करती हुई लम्बी शाखाएँ उत्पन्न होती है , जिनको न्यूमेटाफोर कहते है। इनका कुछ हिस्सा कीचड़ अथवा दलदल में डूबा रहता है जबकि शेष भाग वायवीय और कीचड़ के बाहर होता है। यह वायवीय भाग एक मजबूत काग स्तर से आवतरित होता है और इसके बीच में , बाहर की तरफ असंख्य छिद्र अनियमित रूप से व्यवस्थित पाए जाते है। इन छिद्रों को वातरंध्र अथवा न्यूमेथोड्स कहते है।
बाहरी परिवेश में उपस्थित वायु इन छिद्रों के द्वारा जड़ों में प्रविष्ट होती है और इस प्रकार ऑक्सीजन की कमी को पूरा करती है। ये श्वसन मूल गैसों के विनिमय में भी सहायक होती है इसलिए इनको श्वसन मूल अथवा सांस लेने वाली जड़ें कहा जाता है। इन श्वसन जड़ों के अंतिम सिरों पर जो जल और कीचड़ में डूबे रहते है अनेक छोटी , अवशोषण कार्य को सम्पादित करने वाली सामान्य जड़ें पायी जाती है।

श्वसन मूल का अनुप्रस्थ काट (t.s of pneumatophore)

इस पादप की श्वसन मूल के अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदर्शी की सहायता से अध्ययन करने पर इसकी आंतरिक संरचना में निम्न ऊतक क्षेत्र परिलक्षित होते है –
1. सबसे बाहरी क्षेत्र कॉर्क होता है जो वल्कुट की बाह्यतम परतों से उत्पन्न कॉर्क कैम्बियम से उत्पन्न होती है। कॉर्क कुछ कोशिका पंक्तियों से बनी होती है जिसके बीच बीच में वातरन्ध्र उपस्थित होते है। इन वातरन्ध्रों के माध्यम से गैसों का आदान प्रदान होता है।
2. वल्कुट ऊतक में अनेक वायु गुहाएँ पायी जाती है। बाहरी वल्कुट क्षेत्र हरित मृदुतकी होता है। यांत्रिक शक्ति और सहारा प्रदान करने के लिए वल्कुट क्षेत्र में एकल रूप से अथवा समूहों में अनेक बहुशाखीय स्क्लेरिड्स भी पायी जाती है। इसके अतिरिक्त जड़ के निकटतम सिरे पर वल्कुट में अनेक लिग्नीकृत और किंचित वक्रित स्पीक्यूल्स भी पाए जाते है। ये भी श्वसन मूल को यांत्रिक शक्ति प्रदान करने में सहायक होते है।
3. अन्तश्त्वचा कोशिकाएँ बैरल के आकार की होती है और एक पंक्ति में व्यवस्थित होती है।
4. परिरंभ मृदुतकी कोशिकाओं की एक बाह्य परत और दृढोतकी कोशिकाओं की 2-3 भीतरी परतों से बनी होती है। सोनेरेशिया में यह एकांतर रूप से व्यवस्थित मृदुतक और दृढोतकी कोशिका समूहों से बनी होती है।
5. श्वसन मूल (pneumatophore) के प्राथमिक संवहन बंडल संयुक्त , संपाशर्वीय , वर्धी और अंत: आदिदारुक होते है , जो कि द्विबीजपत्री तने के समान ही एक वलय में उपस्थित पाए जाते है।
6. एधा वलय की सक्रियता के परिणामस्वरूप यहाँ द्वितीयक वृद्धि संपादित होती है।
7. केन्द्रीय भाग में ढीली ढाली कोशिकाओं की मज्जा उपस्थित होती है।

यान्त्रिक कार्यों के लिए रूपान्तरित मूल (root modified for mechanical functions)

ये जड़ें निम्नलिखित प्रकार की होती है।
1. स्कन्ध मूल (prop roots) : इस प्रकार की जड़ें बरगद में पायी जाती है। खम्भों के समान निर्मित ये अपस्थानिक जड़ें वृक्ष की आड़ी अथवा क्षैतिज शाखाओं से उत्पन्न होती है और प्रारम्भ में रस्सों के समान लम्बवत रूप से नीचे की तरफ लटकते हुए पायी जाती है। ये जड़ें आर्द्रता ग्राही होती है और जब तक वायवीय रूप में होती है तो वातावरण से नमी को अवशोषित करने का कार्य करती है ,क्रमिक रूप से नीचे की तरफ वृद्धि करती हुई जड़ें जमीन तक पहुँचने के बाद मृदा में धँस जाती है और मोटाई में वृद्धि करके और मजबूती प्राप्त कर वृक्ष की शाखाओं को सहारा देने का कार्य करती है। धीरे धीरे इनकी मोटाई मुख्य तने के समान ही हो जाती है। यह भी देखा गया है कि जीर्ण वृक्ष में जो कि अधिक आयु के हो जाते है , उनमें मुख्य तना समाप्त हो जाता है और ये स्कन्ध मूल तने के रूप में कार्य करती है और अधिकाधिक स्कन्ध जड़ों के द्वारा यह वृक्ष लगभग अमर हो जाता है।
2. अवस्तम्भ मूल अथवा सहायक मूल (stilt roots) : इस प्रकार की जड़ें अनेक एकबीजपत्री पौधों जैसे ज्वार , केवडा और गन्ने में पायी जाती है। इन पौधों के तने पतले , कमजोर , लम्बे , अशाखित और संधित होते है। इन तनों की आधारीय पर्वसंधियों से अनेक रेशेदार अपस्थानिक जड़ें उत्पन्न होती है जो तिर्यक रूप से नीचे की तरफ वृद्धि करती हुई मृदा में धँस जाती है और कमजोर तने को बंधी हुई रस्सियों के समान सहारा प्रदान करती है। इनको अवस्तम्भ मूल कहते है।
केवड़ा जैसे छोटे वृक्ष छायादार , दलदली स्थानों में अथवा जलाशयों के किनारों पर पाए जाते है , यहाँ वृक्ष की जड़ों के द्वारा स्थिरीकरण के लिए उपर्युक्त परिस्थितियाँ नही होती। अत: इन पौधों में तने के आधारीय भाग से उत्पन्न और तिर्यक रूप से नीचे की तरफ स्थिर अवस्तम्भ जड़ें तने को सहारा प्रदान करने का कार्य करती है।
3. आरोही मूल अथवा प्रतानी मूल (clinging or climbing roots) : कुछ कमजोर तने वाले आरोही पौधों जैसे – पान , पोथोस आदि में इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें पायी जाती है जो कि पौधों के आधार स्तम्भ के आरोहण में मदद करती है। इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ों की उत्पत्ति , तने में पर्व से जैसे आइवी और फाइकस प्यूमिला में या पर्व संधियों से जैसे पान और पोथोस में हो सकती है। ये आरोही जड़ें आधार जैसे – दीवारों अथवा वृक्ष के तनों में दरारों अथवा उभारों में धंसकर अथवा चिपककर पौधे के कमजोर तने को ऊपर की तरफ चढाने में सहायक होती है। कुछ पौधों , जैसे – फाइकस प्यूमिला में इन आरोही जड़ों से चिपचिपा गोंद जैसा पदार्थ स्त्रावित होता है जो तने के आधार पर स्थिर रखने में मददगार होता है। पान की आरोही जड़ों से चपटी , बिम्ब के समान एक आसंजक संरचना उत्पन्न होती है , जो तने को आधार पर मजबूती से पकड़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका प्रमुख कारण है कि इन डिस्क जैसी संरचनाओं से भी एक चिपचिपा पदार्थ स्त्रावित होता है , यही नहीं पान और पोथोस में तो ये आरोही जड़ें पंजे की उंगलियों के समान फैलकर आधार स्थल के विभिन्न बिन्दुओं पर पकड़ बनाने का काम करती है।
4. वप्रमूल (buttress roots) : उष्णकटिबंधीय प्रदेशों के सघन सदाबहार वनों और शुष्क पर्णपाती वनों में ऐसे अनेक विशालकाय वृक्ष जैसे सेमल आदि पाए जाते है। इनकी ऊंचाई और फैलाव तो बहुत अधिक होता है लेकिन इनकी सामान्य जड़ें इतनी गहराई लिए हुए नहीं होती है कि वे इतने विशालकाय वृक्षों को आसानी से सम्भाल सके अत: यदि ऐसे वृक्षों में केवल ये उथली जड़ें ही पायी जाए तो कभी भी तेज आंधियो के कारण ऐसे पेड़ धराशायी होकर नष्ट हो सकते है। अत: इस खतरे को टालने के लिए इन वृक्षों के तनों के निचले हिस्से से तख्ते के समान मोटी मोटी जड़ें उत्पन्न होती है , जिनका सहारा प्राप्त कर ये विशालकाय वृक्ष मजबूती से जमीन में टिके रहते है। इन विशेष प्रकार की जड़ों को वप्रमुल कहते है।