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regional cinema in hindi प्रादेशिक सिनेमा किसे कहते हैं ,असमिया , बंगाली , भोजपुरी , गुजराती , कन्नड़ क्या है परिभाषा ?

प्रादेशिक सिनेमा
भारत एक विशाल देश है जहां विभिन्न क्षेत्रों में कई भाषाएं बोली जाती हैं। जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय फिल्म उद्योग पनपा। तमिल फिल्म उद्योग (कोलीवुउद्ध, तेलुगू फिल्म उद्योग, बंगाली फिल्म उद्योग (टाॅलीगुंग), कन्नड़ फिल्म उद्योग और मराठी फिल्म उद्योग प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में क्षेत्रीय फिल्में बनाते हैं।
प्रादेशिक सिनेमा ने कुछ प्रभावशाली एवं दिल को छू जागे वाली फिल्में बनाई हैं। बंगाल में, तपन सिन्हा की काबुली वाला, तरुण मजूमदार की गणदेवता, और बुद्धदेव दास गुप्ता की दूरातवा भारतीय सिनेमा को उल्लेखनीय योगदान है। मलयालम निर्देशकों ने लीक से हटकर फिल्में बनाकर असामान्य प्रतिभा का परिचय दिया है। इनमें रामू करियत की चेम्मीन (1965); अडूर गोपालाकृष्णन की स्वयंवरम् (1972), कोडियट्टम, एलियाथयम एवं मुखामुखम; जी अरविंदम् की उत्तरायणम एवं थेम्प; वासुदेवन नायर की निरमलायम; एवं शाजी करुण की पिरावी प्रमुख हैं। कन्नड़ में, उल्लेखनीय निदेशकों में पट्टाभि रामा रेड्डी (समसकरा), बी.बी. कारनाथ (चोम्मना डूडी), गिरीश कर्नाड (काडू) एवं गिरीश कसरावल्ली (कटश्रद्धा) शामिल हैं।
प्रादेशिक फिल्म उद्योग का विस्तृत विवेचन इस प्रकार है।
असमिया सिनेमा
असमिया सिनेमा की शुरुआत 1935 में चित्रलेखा मूवीटोन बैनर के तहत् रूपकोनवर ज्योति प्रसाद द्वारा निर्मित जाॅयमिति से की जा सकती है। उस समय पर, असमिया सिनेमा ने भाबेन्द्र नाथ सेकिया और जाहनू बरुआ जैसे प्रमुख फिल्म निर्माताओं के होते हुए बेहद धीमी गति एवं संवेदनशील शैली से विकसित हुआ। असमिया सिनेमा, इन विगत् वर्षों में, ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बावजूद कभी बेहद लोकप्रिय नहीं हो पाया। वर्ष 2000 में, बाॅलीवुड किस्म की असमिया फिल्में ही मुख्य रूप से बनाई गईं।
यहां तक कि यद्यपि प्रथम असमिया फिल्म बुरी तरह से असफल रही, रूपकोनवर ज्योति प्रसाद अग्रवाल की दूसरी फिल्म, इंद्रमालती 1937 और 1938 के बीच बनाई गई और 1939 में प्रदर्शित हुई।
भूपेन हजारिका, असम के सुप्रसिद्ध संगीता और गायक, ने फिल्म में बेहद अच्छी भूमिका निभाई। मनोमती, एक ऐतिहासिक फिल्म, 1941 में रोहिणी कुमार बरुआ द्वारा बनाई गई। इसके बाद पार्वती प्रसाद बरुआ की रूपही (1946), कमल नारायण चैधरी की बदन बरफुकन (1947), फणी शर्मा की सिराज, असित सेन की बिपलाबी, प्रबीन फूकन की प्रघात और सुरेश गोस्वामी की रुनुमी प्रदर्शित हुईं।
1950 में, पियाली फूकन प्रदर्शित हुई जिसे रूप ज्योति प्राॅडक्शन के बैनर तले गामा प्रसाद अगरवाला ने निर्मित किया और फणी शर्मा द्वारा निर्देशित किया गया। इस फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया। यह फिल्म तकनीकी रूप से बेहद उन्नत थी। यह फिल्म स्वतंत्रता सेनानी पियाली फूकन के जीवन पर आधारित थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और उसे राजद्रोह के आरोप में फांसी दी गई। 1955 में, निर्देशक निप बरुआ ने स्मृति परास फिल्म से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने बाद में मक आरू मोरम तथा रंग पुलिस जैसी फिल्में बनाईं जिसने राज्य पुरस्कार एवं राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान हासिल किया। 1950 में भूपेन हजारिका ने अपने पहली ईरा बटोर सुर बनाई और निर्देशित की। प्रभात मुखर्जी की फिल्म पुबेरून (1959), जो मातृत्व के विषय पर आधारित थी, को बर्लिन फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित किया गया।
1960 के दशक में, सर्वेश्वर चक्रवर्ती की फिल्म लचित बोरफुकन, भूपेन हजारिका की फिल्म शंकुतला, जिसने प्रेसीडेंट सिल्वर मेडल जीता, निप बरुआ की नराकसुर, अनिल चैधरी की मैत्री स्वग्र, ब्रोजेन बरुआ की इतु सितु बहुतो और मुक्ता एवं अनवर हुसैन की तेजीमाला उल्लेखनीय फिल्में थीं।
1970-82 की समयावधि के दौरान, 57 असमिया फिल्में बनाईं गईं। नये निर्देशक उदित हुए। 1970 के दशक के प्रमुख फिल्म निर्माता समेन्द्र नारायण देब (1970 में अर.या), कमल चैधरी (1972 में भेती, असम की पहली रंगीन फिल्म), मनोरंजन सुर (1973 में उत्तरन), प्रबीन बोरा (1974 में परिणाम), देउती बरुआ (1974 में ब्रिस्टी ), पुलोक गोगोई (1974 में खोज ), पदुम बरुआ (1976 में गोंगा सिलोनिर पाखी), भवेन्द्रनाथ सेकी (1977 में संध्या राग ) एवं अतुल बोरदोलोई (1978 में कोलोल) थे।
1980 और उसके बाद, जागू बरुआ, जिन्होंने अपरूपा, पपोरी, हलोधिया चोरा, बाओधान खाई, बोनानी, फिरिंगोटी एवं झागो-रोलोई बोहू दूर का निर्देशन किया; संजीव हजारिका, जिन्होंने हलाधर और मीमांक्क्षा बनाई; और भवेन्द्रनाथ सेकैया जिन्होंने संध्या राग, अनिश्बान, अग्निसनान, सरोथी; कोलाहल, अबर्तन, इतिहास एवं काल संध्या बनाई, जैसे उल्लेखनीय निर्देशकों का दौर रहा। सांत्वना
बोरदोलोई अदज्या और विद्युत चक्रवर्ती राग बिराग के लिए जागे जाते हैं, जिसने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए।
बंगाली सिनेमा
बंगाली सिनेमा ने अपने लिए न केवल घरेलू सिनेमा के संदर्भ में जगह बनाई अपितु अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भी स्थान हासिल किया। बंगाल ने हीरालाल सेन, सत्यजीत रे, मृणाल सेन,गौतम घोष एवं अन्य जैसे भारतीय सिनेमा में फिल्म मेकिंग के सुप्रसिद्ध नाम दिए। यहां तक कि अभिनय में उत्पल दत्त, उत्तम कुमार, दिलीप राॅय, दीपांकर डे, कल्याणी मोंडल, तनुश्री शंकर और रितुपर्णों सेनगुप्ता जैसी प्रसिद्ध कलाकार बंगाल से ही हैं।
जमाई शस्थी 11 अप्रैल, 1931 को मदन थियेटर द्वारा रिलीज प्रथम बंगाली फिल्म थी। इसके बाद 1931 में बी.एन. सिरकर की देना पाओना प्रदर्शित हुई। ध्वनि के आने से थियेटर में गुणवत्तापरक फिल्में आईं। न्यू थियेटर की चंददिदा ने भारतीय फिल्म में पहली बार बैक ग्राउंड संगीत का इस्तेमाल किया। 1930 के दशक के अन्य महत्वपूर्ण कार्य नितिन बोस की भाग्य चक्र जिसमें नितिन बोस ने क्रांतिकारी तकनीकों का इस्तेमाल किया; पी.सी. बरुआ की गृहदाह (1936) और देवकी बोस की सोनार संसार और अन्य दीदी, मुक्ति, विद्यापति, साथी एवं स्ट्रीट सिंगर शामिल हैं।
1940 के दशक में बिमल राॅय की उड्यर पाथे की सफलता ने वास्तविकता या यथार्थवाद के नवीन मानक स्थापित किए। सथयन बोस की परिवर्तन और नेमई घोष की चिन्नामुल ने इस प्रवृत्ति को प्रकट किया।
1950 के दशक में, सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पंचाली (1955) के साथ, बंगाली सिनेमा ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। इस फिल्म ने 1956 में सर्वोत्तम मानवीय दस्तावेज के लिए केन्स पुरस्कार प्राप्त किया। सत्यजीत रे ने ग्रामीण,शहरी एवं ऐतिहासिक विषयों पर 30 फिल्में और पांच डाॅक्यूमेंटरी बनाईं। उनकी फिल्मों ने अत्यधिक वास्तविकता एवं विचित्र मानव स्वभाव को प्रकट किया। सत्यजीत रे ने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय दोनों पुरस्कार हासिल किए। उन्हें मार्च 1992 में ‘लाइफटाइम एचीवमेंट’ के लिए ‘स्पेशल आॅस्कर’ भी प्रदान किया गया। उन्होंने विश्व के सभी अग्रणी फिल्म समारोहों में अपनी फिल्मों का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी फिल्मों को स्वयं संगीतबद्ध किया। सत्यजीत रे की सफलता ने ऋत्विक घटक जैसे फिल्म निर्माताओं को प्रेरित किया जिन्होंने अपनी फिल्मों में वंचित शरणार्थियों के दुःख को प्रस्तुत किया (1953 में नागरिक, 1958 में अजनत्रिक, 1959 में बारी थेके पालयी, 1960 में मेघ टाका तारा, 1961 में कमल गंधार, 1965 में सुवर्ण रेखाए 1972 में तितश एक्ती नादिर नाम और 1974 में जुक्ती ताको और गापोद्ध।
1960 आरै 1970 के दशक के दो उल्लेखनीय निर्देशक तपन सिन्हा (काबुलीवाला, आरोही, अतिथि, हैती बाजारे, खुदी तपसम, सफेद हाथी, बंचारमेर बगान, आदमी और औरत, आज का राॅबिनहुड और एक डाॅक्टर की मौत) और मृणाल सेन थे जिन्होंने रात भोर (1956), नील आकाशेर नीचे (1959) और बाइसे श्रवण (1960) जैसी फिल्में बनाईं। उनकी 1969 में भुवन शोम फिल्म की अद्वितीय कृति के तौर पर प्रशंसा हुई।
1980 के दशक से, बंगाली सिनेमा में गौतम घोष (मां भूमि, दखल, पार, अंर्तजलि, यात्रा, पद्मा नादिर माझी, देखा, अबार अरानये); नबयेन्दु चटर्जी (रनुर प्रथम भाग, चाॅपर, सरीसृप, परासरूम कुथास, अत्मजा, सौदा); बुद्धदेव दासगुप्ता (दूरतवा, नीम अन्नापूर्णा,गृहजुदा, अंधी गली, फेरा, बाघ बहादुर, तहादेर कथा, चराचर, लाल दर्जा, उत्तरा, और मेंडो मेयर उपारबान) जैसे प्रमुख फिल्म निर्माताओं का उदय हुआ।
बंगाली फिल्म निर्माण में नई पीढ़ी के फिल्म-निर्माताओं में संदीप रे (फाटिक चंद उत्तोरन), रितोपुर्णों घोष (उनिश अप्रैल, दहन, बड़ी बाली, चोकर बाली, रेनकोट), अशोक विश्वनाथन (सुनया टेके सुरू), मलय भट्टाचार्य (कहिनी), अनूप सिंह (एकती नादर नाम),शेखर दास,गौतम हलधर (भोलो थेको) और उरणी चक्रवर्ती (हेमंतर पारवी) शामिल हैं।
1980 के दशक के अंत तक, कोलकाता में थियेटर सहित एक फिल्म केंद्र ‘नंदन’ उदित हुआ। इसकी स्थापना राज्य सरकार द्वारा की गई। यह नियमित रूप से ‘कोलकाता अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव’ का आयोजन करता है।
भोजपुरी सिनेमा
पहली भोजपुरी फिल्म वर्ष 1963 में प्रदर्शित हुई। इसका नाम गंगा मैया तोहे प्यारी चदेबो था, जिसे निर्मल पिक्चर के बैनर तले विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी द्वारा निर्मित एवं कुंदन कुमार द्वारा निर्देशित किया गया। इसके बाद केवल एस. एन. त्रिपाठी निर्देशित विदेसिया (1963) और कुंदन कुमार निर्देशित गंगा (1965) जैसी कुछ फिल्में बनाईं गईं।
1980 में, राजकुमार शर्मा द्वारा निर्देशित माई (1989); कल्पतरू द्वारा निर्देशित हमार भौजी (1983); गोविंद मूगिज द्वारा निर्देशित और सचिन एवं साधना सिंह द्वारा अभिगीत हिंदी-भोजपुरी सुपरहिट एवं रिकार्ड तोड़ फिल्म नदिया के पार (1980), जो एक वर्ष तक सिनेमाघरों में हाउसफुल स्थिति में चलती रही, जैसी फिल्में बनीं। लेकिन 1990 तक, यह उदीयमान फिल्म उद्योग पूरी तरह से खत्म होता प्रतीत हुआ। हालांकि, 2000 के दशक में, मोहन प्रसाद द्वारा निर्देशित सिल्वर जुबली हिट फिल्म संय्या हमार ने कुछ हद तक भोजपुरी सिनेमा को इस दयनीय स्थिति से उबारा। मोहन प्रसाद द्वारा निर्देशित पंडितजी बताई ना ब्याह कब होई (2005), और ससुरा बड़ा पैसा वाला (2005) अन्य लोकप्रिय फिल्में हैं। ससुरा बड़ा पैसा वाला ने मनोज तिवारी, सुपरिचित एवं लोकप्रिय लोक गायक, को दर्शकों के सम्मुख उतारा। मनोज तिवारी और रवि किशन भोजपुरी फिल्मों के अग्रणी अभिनेता बन गए। भोजपुरी फिल्म उद्योग अब अपना स्वयं का पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित करता है और व्यापार पत्रिका भोजपुरी सिटी प्रकाशित करता है।
भोजपुरी फिल्म भोले शंकर (2008), जिसमें हिंदी फिल्मों के स्टार अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती ने अभिनय कर इसमें प्रथम पदार्पण किया, अब तक की सर्वाधिक हिट एवं लोकप्रिय भोजपुरी फिल्म मानी जाती है। सिद्धार्थ जैन द्वारा निर्मित 21 मिनट की फिल्म उदीध बन (2008) को बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के वल्र्ड प्रीमियर के लिए चुना गया और इसे सर्वोत्तम लघु फिक्शन फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। फरवरी, 2011 में, पटना में भोजपुरी सिनेमा के 50 वर्षों को मनाने के लिएएक तीन दिवसीय फिल्म एवं सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित किया गया।
गुजराती सिनेमा
गुजराती भाषा सिनेमा में पहली बार कलकत्ता (अब कोलकाता) के मदन थिएटर द्वारा निर्मित मुबई-नी-सेठानी (1932) में सुनाई दी। नरसिंह मेहता (1932) पहली लंबी गुजराती फिल्म थी। इसका निर्माण नानूभाई वकील द्वारा किया गया था। बलवंत भट्ट निर्देशित और विजय भट्ट निर्मित फिल्म संसार लीला (1934), और प्रीमियर फिल्म कंपनी द्वारा निर्मित हास्य फिल्म घर जमाई (1935) भी बेहद सफल रहीं।
1940 के दशक में, विष्णु कुमार व्यास की ऐतिहासिक-लोककथा पर आधारित रनकदेवी (1945) गुण सुंदरी (1947), जो एक सामाजिक फिल्म थी, की तरह जबरदस्त लोकप्रिय हुई। 1948-1951 के वर्षों के रूप छाया बैनर के तले मगहर रशकपूर निर्देशित जोगीदास खुमान, कहयागरो कंठ, एवं कन्यादान निर्मित हुई जिसने मगहर रशकपूर, अरविंद पांड्या और चम्पीक्शी भाई नमादा को बेहद प्रसिद्धि दिलाई। 1950 के दशक में मगहर रशकपूर द्वारा निर्मित दो उल्लेखनीय फिल्म मलेवा जीव और कांडू मकरानी-दिखाई दीं।
1960 का दशक गुजराती सिनेमा के लिए बेहद अच्छा साबित हुआ। मगहर रशकपूर की सामाजिक विषय पर आधारित फिल्म मेंहदी रंग लगया जबरदस्त हिट हुई जिसने पूर्व के सारे रिकाॅर्ड तोड़ दिए। उन्होंने इसी समय अखण्ड सौभाग्यवती फिल्म भी बनाई। इसमें बाॅलीवुड अदाकारा आशा पारेख ने अभिनय किया। आशा पारेख ने तब से गुजराती टीवी धारावाहिकों को बेहद योगदान दिया। चंद्रकांत संगनानी की फिल्म मारू जाबू पेले पार कुछ हद तक सफल रही। उन्होंने जागेर-वन-अमि और ताना रीरी जैसी फिल्में भी बनाईं। नंदवन (गनपतराव ब्रह्म भट्ट द्वारा निर्मित) और गुणसुंदरिनों घर संसार 1960 के दशक की अन्य महत्वपूर्ण फिल्में थीं।
1970 के दशक में एक नए रूप में गुजराती फिल्म उद्योग सामने आया। कांथीलाल राठौड़ की कांकू फिल्म ने सर्वाधिक बेहतर गुजराती फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया और इसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुआ। इस दशक की उल्लेखनीय फिल्में तन्नारीरी (1975) कशिनो डीक्रो, राजा भृतहरि, सोनबाई नी चुनदादी (1976), होथल पद्मिनी, इत्यादि थीं। राज्य पुरस्कार से सम्मानित फिल्मों में, जालम संग जडेजा, डाकूरानी गंगा (1976-77), मोरी हेल उतारो राजा, सौभाग्य सिंदूर, घेर घेर मतिना चूला, वर्म वसूलात (1977-78), शामिल हैं।
1980 के दशक में, भावनी भवई (1980), जिसे केतन मेहता ने निर्मित किया, फिल्म ने गुणवत्तापरक गुजराती फिल्मों को बढ़ावा दिया। इसमें बेहतरीन अभिनय एवं उम्दा सिनेमेटोग्राफी थी। इसने राष्ट्रीय एकीकरण पर बेहतरीन फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया और साथ ही बेहतरीन आर्ट डायरेक्शन हेतु भी राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया। इसे फ्रांस में नेंट्स महोत्सव में भी पुरस्कार प्राप्त हुए।
विगत् दो दशकों में, गुजराती फिल्म उद्योग में कुछ नया एवं उत्साहजनक नहीं हुआ। 1992 में, संजीव शाह द्वारा निर्देशित फिल्म हुन हंुशी हुंशीलाल ने कुछ ध्यान आकर्षित किया। 2009 में, गुजराती फिल्म उद्योग ने 1932 में मात्र दो फिल्मों के निर्माण की तुलना में सबसे अधिक संख्या में मात्र एक वर्ष में सर्वाधिक फिल्में बनाकर पिछले सभी रिकाॅर्ड तोड़ दिए। जनवरी से दिसंबर 2009, में 62 गुजराती फिल्में बनीं जिसे सेंसर द्वारा पास कर दिया गया। यह आंकड़ा वर्ष 1982 से अधिक है, जब 49 गुजराती फिल्में बनीं थीं। वर्ष 2010 में अधिकांश फिल्में लोकप्रिय हुईं। विक्रम थाकोर जैसे सुपरस्टार का उदय भी एक महत्वपूर्ण कारक रहा।
वर्ष 2007 में, गुजराती फिल्म उद्योग में अपनी डायमण्ड जुबली मनाई। लेकिन उद्योग लगातार कमजोर होता गया। यद्यपि भवनी भवई और हुन हुंशी हुंशीलाल ने प्रायः कुछ चमक बिखेरी, गुजराती सिनेमा में अभी भी जीवन-वेशभूषा एवं ड्रामा की अपेक्षा परम्परागत प्रथाओं का अधिक प्रभुत्व है।
कन्नड़ सिनेमा
गुप्पी वीरन्ना, जो थियेटर से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे, को कन्नड़ में मूक फिल्म बनाने पर पथ प्रदर्शक के तौर पर देखा जाता है यद्यपि उनकी फिल्म कभी पूरी नहीं हो पायी। हरिभाई आर. देसाई द्वारा शुरू सूर्या फिल्म कंपनी और बोगीलाल सी. दवे की शारदा फिल्म कंपनी ने बाॅम्बे में (अब मुम्बई) चार सालों के भीतर (1932 तक) 40 मूक फिल्में बनाईं। 1930 के दशक ने फिल्म कंपनियों के उत्थान को देखा जिसमें कर्नाटक पिक्चर्स काॅर्पोरेशन, सूर्य प्रकाश फिल्म कंपनी, मैसूर पिक्चर्स काॅर्पोरेशन एवं रमेश फिल्म कंपनी शामिल हैं। 1930 के दशक के प्रसिद्ध फिल्मकार कोटा शिवराम कारंथ एवं मोहन भवनानी थे जिन्होंने शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् पर आधारित वंसथसेना फिल्म बनाई। यह एक अपवाद के रूप में सामने आई।
कन्नड़ टाॅकीज का युग 1934 में सती सुलोचना के साथ शुरू हुआ, जिसके बाद भक्त ध्रुव (या ध्रुवकुमार) फिल्म आई। कर्नाटक में पहला स्टूडियो 1937 में वी.आर. थिमैय्या द्वारा मैसूर साउंड स्टूडियो द्वारा शुरू किया गया। नव ज्योति स्टूडियो 1947 में जी.आर. रमैय्या द्वारा स्थापित किया गया, जो 1956 में बंद हो गया, इसने राजसूर्य यज्ञ का निर्माण किया। प्रीमीयर स्टूडियो शुरुआती दौर के मुख्य स्टूडियो में से एक था।
1930 और 1940 के दशक में कन्नड़ फिल्में उनके द्वारा बनाईं गईं जो कन्नड़ भाषी नहीं थे। 1943 तक मात्र 15 फिल्में बनाईं गईं। 1940 के दशक की लोकप्रिय फिल्में थीं जीवन नाटक, वाणी हेमारैड्डी मालम्मा, नाग कणिका और जगन मोहिनी।
1950 में, कुछ 98 फिल्में बनाई गईं। इस समय की बेदारा कनप्पा (1954) बेहद लोकप्रिय एवं प्रभावशाली फिल्म थी जिसने राजकुमार को एक नई शुरुआत दी, जो संभवतः कन्नड़ फिल्मों के बेहद प्रसिद्ध कलाकार हैं। लक्ष्मी नारायण द्वारा निर्मित नांदी (1964), जिसमें राजकुमार ने अभिनय किया, प्रथम कन्नड़ फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई। 1970 की शुरुआत जबरदस्त हुई।
पट्टाभि रामा रेड्डी की समसकरा (1970) फिल्म ने कन्नड़ सिनेमा में एक नए आंदोलन की शुरुआत की और सर्वोच्च फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया। जी.वी. अय्यर निर्मित और गिरीश कर्नाड और बी.वी. कारंथ द्वारा निर्देशित वमशा वृक्ष (1972) बेहद लोकप्रिय हुई। जी.वी. अय्यर ने हमसागीथा (1975) में निर्देशित की और प्रशंसा एवं पुरस्कार प्राप्त किए। 1970 के दशक के बहुचर्चित एवं प्रसिद्ध फिल्म निर्माता गिरीश कर्नाड, बी.वी. कारंथ एवं एमण्एस. सथ्यू थे।
गिरीश कासरवल्ली ने घाटश्रृद्धा (1977) बनाई, और इसके लिए राष्ट्रपति स्वर्ण पदक प्राप्त किया। उन्होंने अकरमान्ना, मूरी दारूगालू, तबराना काथे, बन्नादा वेशा, माने, करयूरया, थाये साहेब और दविया ने सर्वोच्च फिल्म के लिए राष्ट्रपति स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
1990 के दशक में, कन्नड़ सिनेमा ने ऐसी फिल्में नहीं बनाई जैसी पहले बनाई थीं। लेकिन प्रेमा कारंथ (फणीयम्मा), शंकरनाग (एक्सीडेंट और मिनचिना ओटा), काशीनाथ (अनुभव एवं अपरिचित ), सदानंद सुवर्ण (कुबी मट्टू लाया), सुरेश हेबलीकर कादीना बेंकी, कृष्णा मसादी (अवस्थे), एस.वी. राजेन्द्र सिंह (मुटीना हारा, बंधना एवं अंथा) टी.एस. नागरभरना (जन्मज जोड़ी और नागरमंडला) और सुनील कुमार देसाई (बेलाडींगला बाले)। कविथा लंकेश एक जागे-माने फिल्मकार हैं जिन्होंने देवरी, अलेमारी, बिम्बा एवं प्रीति प्रेमा प्रणया फिल्में बनाईं। अन्य फिल्मकारों में पी.आर. रामदास नायडू (मुसगजे) और टी.एन. सीताराम (मतदाना) उभरकर आये।