संदर्भ व्यक्ति किसे कहते है ? संदर्भ व्यक्ति की परिभाषा क्या है reference person or people in hindi sociology

By   November 5, 2020

reference person or people in hindi sociology संदर्भ व्यक्ति किसे कहते है ? संदर्भ व्यक्ति की परिभाषा क्या है ?

संदर्भ व्यक्ति
यह ध्यान में रखना जरूरी है कि लोग संदर्भ समूहों का ही नहीं, संदर्भ व्यक्तियों का भी चयन करते हैं क्योंकि कुछ व्यक्ति अपने चमत्कारिक प्रभाव, प्रस्थिति, चमक-दमक आदि से लोगों को अपनी ओर खींच लेते हैं। उदाहरण के लिए, समूह के रूप में सुनील गावस्कर। इस प्रकार, यद्यपि क्रिकेट खिलाड़ी आपके लिए संदर्भ समूह नहीं हैं, जबकि सुनील गवास्कर संदर्भ व्यक्ति बन सकता है।

संदर्भ व्यक्ति को प्रायः भूमिका-आदर्श (तवसम-उवकमस) की तरह माना जाता है। किंतु मर्टन ने इनमें अंतर बताया है। भूमिका आदर्श की अवधारणा का क्षेत्र सीमित होता है क्योंकि इसमें किसी व्यक्ति की एक या दो चुनी हुई भूमिकाओं के मामले में उसे आदर्श माना जाता है। किंतु जिस व्यक्ति ने संदर्भ व्यक्ति के साथ स्वयं को संबद्ध किया है उसे “अनेक भूमिकाओं में उस व्यक्ति के आचरण तथा मूल्यों को आत्मसात् करना अच्छा लगेगा।‘‘

दूसरे शब्दों में यदि आपने सुनील गावस्कर को अपना संदर्भ व्यक्ति स्वीकार किया है तो आपने सुनील गावस्कर की अनेक भूमिकाएं – उसका हंसना-बोलना, वेशभूषा, महिलाओं के साथ व्यवहार, मॉडल के रूप में काम करना, स्वयं में एकाकार करनी चाही होगी। मर्टन का कहना है कि जीवनीकार, प्रशंसकों की पत्रिकाओं के संपादक और प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की झूठी-सच्ची खबरें छापने वाले पत्रकार लोगों को अपना संदर्भ व्यक्ति चुनने को प्रोत्साहित करते
हैं।
चित्र 30.2ः भूमिका आदर्श की अवधारणा

आप किसी पत्रिका को उठाकर देखिए। आपको यह पता चलेगा कि उसमें किसी फिल्मी अभिनेता अथवा अभिनेत्री क्रिकेट खिलाड़ी, संगीतकार आदि की कला के बारे में ही नहीं, उनके ष्प्रेम संबंधों” और “निजी जीवन‘‘ पर भी लिखा जाता है। जब किसी विभूति को संदर्भ व्यक्ति मान लिया जाता है तो उसके हर पहलू – केशसज्जा से लेकर खान-पान की आदतों तक – का अनुकरण किया जाने लगता है।

 सदस्यता समूहों में से संदर्भ समूहों का चयन
हर व्यक्ति अनेक समूहों से जुड़ा है। अपने परिवार से लेकर पडोस के क्लब या फिर जाति समूह राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन से उसका संबंध रहता है। प्रश्न यह है कि क्या वह अपने आचरण का निर्धारण करते हुए या अपनी उपलब्धियों तथा भूमिका निर्वाहन का मूल्यांकन करते हुए इन सभी समूहों को गंभीरता से लेता है? उसे मालूम होता है कि सभी सदस्यता समूह समान रूप से महत्वपूर्ण नहीं होते। उनमें से कुछ का ही संदर्भ समूह के रूप में चयन किया जाता है।

व्यक्ति यह चयन कैसे करे? इस प्रश्न का उत्तर तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक उसे यह न मालुम हो कि सदस्यता समूह कई प्रकार के होते हैं। मर्टन के अनुसार, समूहों का “उपयुक्त वर्गीकरण‘‘ आवश्यक है। इस संदर्भ में मर्टन ने 26 समूह विशेषताओं की अस्थायी सूची तैयार की।

उदाहरण के लिए, मर्टन की मान्यता है कि विभिन्न समूहों में उस अंतर की मात्रा में पर्याप्त भिन्नता है, जिनके आधार पर सदस्यता की परिभाषा की जा सकती है। कछ समूह एकदम अनौपचारिक होते हैं जिनकी कोई सीमा तय करना कठिन होता है, जबकि कुछ समूह एकदम स्पष्ट होते हैं और उनके सदस्य बनने की औपचारिक प्रक्रियाएं होती हैं। इसके अलावा, सदस्य की अपने समूह के प्रति आत्मीयता की मात्रा के आधार पर ही समूहों में अंतर किया जा सकता है। और भी अनेक विशेषताएं हैं जिनके आधार पर समूहों में अंतर किया जा सकता है। ये हैंः समूह की संभावित अवधि, उसका गतिशील होना अथवा उसमें गतिशीलता का अभाव, सामाजिक विभेद की मात्रा और समूह के प्रतिमानों के प्रति संभावित अनुरूपता की मात्रा। गैर-सदस्यता समूह के स्वरूप को समझ लेने पर व्यक्ति स्वयं फैसला करे कि इनमें से कुछ का संदर्भ समूह के रूप में क्यों चयन किया जाये। आपको इस संबंध में कुछ उदाहरण दिए गए हैं। अपने परिवार के सदस्यों के प्रति आपकी आत्मीयता किसी फिल्मी क्लब के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक होती है। अतः इस बात की पूरी संभावना है कि अपने जीवन के प्रमुख निर्णय करने में फिल्म क्लब नहीं, अपितु आपका परिवार आपके लिए संदर्भ समूह के रूप में काम करेगा।

इसी प्रकार, जिस समूह की सदस्यता अधिक समय तक चलने की संभावना नहीं होती (उदाहरण के लिए स्नातक उपाधि के विद्यार्थियों की एक कक्षा केवल तीन वर्ष तक चलेगी) उसे संदर्भ समूह के रूप में अपनाने की संभावनाएं कम होती हैं। किन्तु जो समूह लंबी अवधि तक चलने वाले होते हैं, जैसे कि नातेदारी या जाति समूह, वे अवश्य ही संदर्भ समूह बनते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों के जीवन को दिशा देने में कॉलेज के दिनों के उनके मित्र नहीं (कॉलेज जीवन अस्थायी है) बल्कि नातेदारी या जाति समूह निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

 निरंतर सक्रिय संपर्क वाले उपसमूहों अथवा प्रस्थिति-श्रेणियों में से संदर्भ समूहों का चयन
एक छात्रा की दुविधा की कल्पना कीजिए जिसकी दो अस्मिता हैं। पहली यह कि वह छात्रों की प्रस्थिति श्रेणी की सदस्या है और दूसरी यह कि वह अपने उपसमूह जिसमें उसके मां, बाप, भाई, बहन आदि सभी सदस्य हैं, वह उसकी भी सदस्या है। अब क्या यह मानना हमेशा तर्कपूर्ण होगा कि वह छात्रा अपने उपसमूह के विचारों के विरुद्ध छात्र संघ के प्रभाव में आकर अपनी कक्षा का बहिष्कार करे। परंतु अपने उपसमूह के सदस्यों जैसे मां-बाप, भाई-बहन, मित्र आदि के निरंतर संपर्क में रहने के कारण अंततः वह यह फैसला कर सकती है कि किसी भी स्थिति में कक्षा का बहिष्कार करना उचित नहीं है। दूसरे शब्दों में जहां तक छात्र राजनीति का संबंध है, उसकी प्रस्थिति श्रेणी (छात्राओं का एक अलग समूह) नहीं अपितु उसका उपसमूह संदर्भ समूह बन जाता है।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संदर्भ समूह का चयन करना बहुत जटिल होता है। यही कारण है कि मर्टन ने मतदान संबंधी आचरण की चर्चा करते हुए कहा है कि मजदूर यूनियन जैसे औपचारिक संगठन उस संघ के कुछ सदस्यों के लिए ही सशक्त संदर्भ समूह के रूप में काम करते हैं। जबकि अन्य लोगों के लिए यूनियन में उनके निकट के साथी ही संदर्भ भूमिका निभाते है।

इस कथन की सच्चाई को व्यक्ति अपने जीवन में ही अनुभव कर सकता है। प्रेम विवाह के बारे में उसके अपने परिवार में अलग-अलग राय हो सकती है। माता-पिता संभवः इसके विरूद्ध होंगे, बड़े भाई इसके पक्ष में भी हो सकते हैं और विपक्ष में भी। उसकी बहन इसके पक्ष में हो सकती है। ऐसी स्थिति में इस बात की अधिक संभावना है कि वह अपने परिवार पर निर्भर रहने की बजाय उस राय का समर्थन करना चाहेगा जो उसकी अपनी पीढ़ी यानी उस जैसे युवा लड़कों और लड़कियों की हैं। यह स्थिति पीढ़ीगत अंतर (हमदमतंजपवद हंच) का परिणाम है।

अगली चर्चा शुरू करने से पहले बोध प्रश्न ३ को पूरा करें ताकि अभी तक की गई आपकी प्रगति की जाँच हो जाए।

 अनुरूपता का अभावः संदर्भ समूह आचरण का एक प्रकार
संदर्भ समूह के अध्ययन से संरचना के एक और पहलू की जानकारी मिलती है। वह है, अनुरूपता के अभाव (दवद-बवदवितउपजल) का प्रभाव ।

पहले आपको यह समझना होगा कि अनुरूपता का अभाव है क्या। अपने समूह के प्रतिमानों के प्रति अनुरूपता न होना बाहय समूह के प्रति अनुरूपता के समान है। किंतु मर्टन की मान्यता है कि अनुरूपता न होने की तुलना विचलन से नहीं की जानी चाहिए। इन दोनों में कई भिन्नताएं हैं।

पहला अंतर यह है कि अपराधियों से एकदम भिन्न, अनुरूपता न रखने वाले व्यक्ति अपनी असहमति को प्रकट करते हैं। दूसरा अंतर यह है कि वे अवसरवादी नहीं होते। वे प्रतिमानों तथा अपेक्षाओं की वैधता को चुनौती देते हुए उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। परंतु अपराधी व्यक्ति मूल्यों की वैधता को अस्वीकार करने का साहस नहीं कर पाते। अनुरूपता न रखने वाले यह नहीं मानते

कि चोरी अथवा हत्या करना अच्छी बात है। उन्हें तो बस उन नियमों को तोड़ना या उनकी अवहेलना करना आवश्यक लगता है जिनका वे विरोध करते हैं और उनके मन में समूह के प्रतिमानों को बदलने की इच्छा होती है। इसके विपरीत, अपराधी के पास नैतिकता की ऐसी अंतर्दृष्टि नहीं होती।

गैर-सदस्यता संदर्भ समूहों के संदर्भ में अनुरूपता न रखने वालों के अनुभव का संरचनात्मक प्रभाव सदस्यता समूहों पर भी पड़ने की संभावना रहती है क्योंकि जैसा कि मर्टन ने कहा है कि अनुरूपता न रखने वालों को “शक्तिशाली‘‘ माना जाता है। उन्हें साहसी और बड़े जोखिम उठाने में समर्थ समझा जाता है।

वास्तव में, अनुरूपता न रखने वाले व्यक्ति जब कुछ सम्मान अर्जित करने लगते हैं तो इसका अर्थ है कि सदस्यता समूह में अपने तथा अपने मूल्यों और प्रतिमानों के प्रति अनिश्चितता उभरने लगती है। गैर-सदस्यता समूह के प्रति अनुरूपता एक प्रकार से सदस्यता समूह में द्वंद्व तथा तनाव की शुरूआत करती है। इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि गैर-सदस्यता संदर्भ के प्रति अनुरूपता के साथ अनुरूपता न रखने वाले अपने सदस्यता समूह के भीतर परिवर्तन और संघर्ष की संभावना का रास्ता खोल देते हैं।