पंडित भीमसेन जोशी लाइफ हिस्ट्री क्या है ? पंडित भीमसेन जोशी का शास्त्रीय गायन pt. bhimsen joshi in hindi

By   July 30, 2021

pt. bhimsen joshi in hindi पंडित भीमसेन जोशी लाइफ हिस्ट्री क्या है ? पंडित भीमसेन जोशी का शास्त्रीय गायन ?

भारत के प्रसिद्ध व्यक्तित्व

भारतीय नागरिकों के द्वारा पल्लवित सांस्कृतिक खोजों के अभाव न होने के कारण कई व्यक्तियों द्वारा अपनी अभिरुचि के क्षेत्रों में राष्ट्रीय या वैश्विक प्रसिद्धि प्राप्त करना अत्यंत सहज रहा। नीचे दिए गए कई व्यक्तियों को सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रतिभा प्रदर्शित करने के कारण राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।

संगीत

पंडित भीमसेन जोशी
आधानिक काल के सर्वाधिक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों में से एक थे। उन्हें न केवल रागों में महारथ प्राप्त थी, बल्कि में उन्होंने न केवल कुलीन श्रेणी अपितु सामान्य जन-समूह के बीच भी लोकप्रियता दिलाई। वे किराना घराना से संबंध रखते थे तथा ख्याल गायन में सिर्द्धहस्त थे। उन्होंने सवाई गन्धर्व विद्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। यद्यपि वे ठूमरी तथा भजनों में निष्णात थे, उनके लोकप्रिय गीतों में ‘पिया मिलन की आस‘ तथा ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा‘ सम्मिलित हैं। वह इतने निपुण थे कि उन्होंने कलाश्री तथा ललित भटियार रागों का सृजन भी किया। उन्हें पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी जैसे कई सम्मान प्रदान किए गए।

अमीर खुसरो
ऐतिहासिक रूप से यदि देखें तो बहुत-सी हस्तियाँ संगीत से जुडी रही हैं, किन्तु उनमे अमीर खुसरो का नाम उनके काल निरपेक्ष संगीत के कारण अलग ही दिखता है। आज भी उनके दोहे पूरे देश में कई दरगाहों में गाए जाते हैं। कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध दोहों में से है ‘चाप तिलक मोसे छीनी तोसे नैना लड़ाई के‘। वह अलाउद्दीन खिलजी के समकालीन थे। वे, सामान्यतः, फारसी तथा आरंभिक उर्दू (फारसी में हिन्दवी/ब्रज भाषा के तत्वों को मिला कर) में कविता लिखते थे। खुसरो के नाम कई रचनाओं का श्रेय है जो विभिन्न रूपों, यथा-गजल, ख्याल और तराना, में रचित हैं। उन्हें ‘‘कव्वाली के पिता‘‘ की संज्ञा दी जाती है। कहा जाता है कि उन्होंने सितार का आविष्कार भी किया। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाओं में ‘नुह सिफिर‘, मसनवी दुवाल तथा रानी खिज्र खान का नाम आता है।

बेगम अख्तर
वह अपने वास्तविक नाम की तुलना में मल्लिका-ए-गजल या ‘गजल की रानी‘ के नाम से अधिक विख्यात थीं। उनका वास्तविक नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था। वे भारत के सर्वाधिक ख्याति प्राप्त गजल गायकों में से एक थीं। उन्होंने शास्त्रीय के साथ-साथ फिल्मी संगीत भी गाया है।
जब वे आकाशवाणी से जुडी थीं तो उन्हें गायकी का मशहूर सितारा समझा जाता था। उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए थे, जैसे-गायन के लिए संगीत नाटक अकादमी सम्मान। उन्हें पद्म श्री तथा मरणोपरांत पद्म भूषण भी प्रदान किया गया। उनकी कुछ प्रसिद्ध कृतियों में ‘हमारी अटरिया‘, ‘पिया काहे रूठा‘, इत्यादि सम्मिलित हैं।

 

लता मंगेशकर
‘भारत की सुर साम्राज्ञी‘ के नाम से विख्यात, लता मंगेशकर भारत के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायकों में से एक हैं। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में गाना आरम्भ किया, तथा अभी भी गा रही हैं (भले ही यदा कदा)। उन्होंने इतने प्रकार के गीत गाए हैं कि विभिन्न भाषाओं में 30, 000 गीत गाने के बाद उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्लड रिकॉर्ड्स में सर्वाधिक गीत गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज किया गया। उन्होंने मुगल-ए-आजम, संगम, दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे, इत्यादि फिल्मों के गीत गाए हैं। उनके कंठ-स्वर उनकी प्रसिद्धि और उनकी विनम्रता को ध्यान में रखते हुऐं उन्हें पद्म श्री और दादा साहब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया गया है। उनके लोकप्रिय हिंदी फिल्मों के गीतों के लिए उन्हें कई बार फिल्मफेयर सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।

उस्ताद अमजद अली खा
अमजद अली खां संगीत वंश-परम्परा के सेनिया बंगाश स्कूल के सरोद वादकों की लम्बी श्रृंखला (छः पीढियों) से संबंध रखते हैं। यह घराना रबाब (ईरानी लोक वाद्य-यंत्र) को विकसित करने के लिए जाना जाता है, जिसे आज सरोद के रूप में पहचान मिली हुई है। कहा जाता है कि उनका परिवार मियाँ तानसेन के वंशजों से सम्बन्धित है। तानसेन मुगल काल के दरबारी संगीतकार थे।
उन्होंने कई राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संगीत समारोहों, तथा कार्नेगी हॉल (संयुक्त राज्य अमेरिका), रॉयल अलर्ट हॉल (लंदन), मोजार्ट हॉल (फ्रैंकफर्ट) आदि में अपनी कला का प्रदर्शन किया है। उन्हें कई सम्मान, यथा वर्ष 1975 में पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्म भूषण, पद्म विभूषण आदि प्रदान किए गए हैं।
उनकी विद्वता के कारण उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय, इंग्लैण्ड, न्यूयॉर्क तथा शान्ति निकेतन के विश्वविद्यालयों द्वारा मान सेवी उपाधियाँ प्रदान की गयी हैं।

एम. एस. सुब्बालक्ष्मी
कर्नाटक सगीत की अत्युत्कृष्ट गायिका, मदुरई शन्मुखावादिव (एम.एस.) सुब्बालक्ष्मी, संगीत प्रतिभाओं की लम्बी श्रृंखला की कड़ी हैं। वे अपने स्वर के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित रखने के लिए तम्बूरा नामक एक वाद्य-यंत्र बजाती थीं। उन्होंने हिन्दुस्तानी संगीत भी सीखा तथा अपने रंग-पटल में ‘गजलों‘ तथा ‘ठुमरी‘ को भी सम्मिलित किया। वर्ष 1998 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न‘ प्राप्त करने वाली वे प्रथम संगीतकार थीं। उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण, रैमन मैग्सेसे सम्मान तथा अंतर्राष्ट्रीय संगीत एजेंसियों से कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
उन्हें शहनाई (एक प्रकार का वायु आधारित वाद्य) को अमरता प्रदान करने तथा इसे शास्त्रीय देवालयों में लाने के लिए जाना जाता है। वे संगीतकारों की उस लम्बी श्रृंखला से संबंध रखते हैं जिन्होंने बिहार के डुमरांव दरबार में वादन किया था। उन्होंने ठुमरी, कजरी, सावनी, चैती, इत्यादि बजाने की कला में महारथ हासिल की। आकाशवाणी के लिए वादन आरम्भ करने पर वे लोकप्रिय होते चले गए। उन्हें भारत के प्रथम स्वतन्त्रता दिवस पर लाल किले से वादन करने का सम्मान प्राप्त है।
उन्हें वर्ष 2001 में भारत रत्न, तथा तीनों पद्म सम्मान जैसे कई सम्मान प्रदान किए गए। उन्हें मध्य प्रदेश सरकार द्वारा तानसेन सम्मान भी प्रदान किया गया। उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिष्ठित लिंकन सेंटर हॉल की संगीत गोष्ठी में वादन करने वाले प्रथम भारतीय होने का गौरव प्राप्त हुआ।

ए.आर. रहमान
हालांकि उनका मूल नाम दिलीप कुमार था, उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर अपना नाम अल्ला रख्खा रहमान (ए.आर. रहमान) किया । उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी संगीत महाविद्यालय से पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत की औपचारिक प्रशिक्षण ली है। उन्हें प्रथम मुख्य अवसर मणिरत्नम की फिल्म ‘रोजा‘ से मिला। उन्होंने कई फिल्मों के लिए संगीत दिए हैं तथा विश्व भर में उनके अलबमों की 4 करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। स्लमडॉग मिलियनेयर के लिए संगीत दे कर वे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उभरे जिसके लिए उन्हें ओरिजनल स्कोर के लिए एकेडमी अवार्ड या ऑस्कर प्राप्त हुआ। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें कई राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2000 में पदम् श्री सम्मान प्रदान किया था।

पंडित हरिप्रसाद चैरसिया
वह अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के भारतीय बांसुरी-वादक हैं, तथा उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनाने के लिए जाना जाता है। पंडित चैरसिया बहुत लम्बे समय तक आकाशवाणी से सम्बद्ध रहे थे। उन्होंने पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का बांसुरी के साथ प्रयोग किया है, तथा पॉप, जैज, रॉक, इत्यादि के साथ बांसुरी के स्वरों को पिरोया है। भारतीय नागरिक होने के बावजूद, वे अपने समय का एक अंश हॉलैंड (नीदरलैण्ड्स) में बिताते हैं। उन्हें भारत सरकार से कई पुरस्कार, यथा ‘पद्म भूषण‘ प्राप्त हो चुके हैं। ओडिशा, महाराष्ट्र तथा उत्तर प्रदेश जैसी कई राज्य सरकारों ने उन्हें सम्मान, यथा क्रमशः ‘कोणार्क सम्मान‘, ‘महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार‘, तथा ‘यश भारती सम्मान‘ प्रदान किए है।

बड़े गुलाम अली खां
वह अपने समय के महानतम शास्त्रीय गायकों में से एक रहे हैं। उन्हें हिन्दुस्तानी संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ था, किन्तु ठुमरी और ख्याल में भी उन्हें महारत हासिल थी। वह पाटियाला घराने से संबंध रखते थे। उन्होंने कई लोकप्रिय गीत, तथा ‘याद पिया की आयी‘, ‘आये न बालम‘, ‘क्या करूं सजनी‘, इत्यादि, गाये है।
उन्हें वर्ष 1962 में पद्म भूषण तथा संगीत नाटक अकादमी सम्मान प्रदान किया गया। बड़े गुलाम अली खां यादगार सभा जैसी कई संस्थाएं हैं जो उनके संगीत की स्मृति में सबरंग उत्सव का आयोजन करती हैं।

उस्ताद जाकिर हुसैन
उनका पूरा नाम जाकिर हुसैन अल्ला रख्खा कुरैशी था तथा वे विश्व के सर्वश्रेष्ठ तबला वादकों में से एक थे। उन्होंने संगीत की हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक दोनों ही शैलियों में प्रशिक्षण प्राप्त किया था, तथा भारतीय और पाश्चात्य संगीत के बीच की खाई को बराबर करने की चेष्टा भी की। उन्होंने वर्ष 1987 में ‘मेकिंग म्युजिक‘ नाम से अपना पहला एकल अल्बम रिकॉर्ड किया था तथा हॉलीवुड की महान हस्तियों, यथा जॉर्ज हैरिसन, वैन मोरिसन, इत्यादि के साथ और भी बहुत से कृत्यों की रचना की। हुसैन को संगीत नाटक अकादमी सम्मान जैसे कई पारितोषिक प्राप्त हुए थे, किन्तु पद्म श्री पाने वाले वह सबसे कम आयु के तबलावादक थे।

मुकेश
उनका पूरा नाम मुकेश चन्द्र माथुर था, किन्तु उन्हें जोरावर चंद के नाम से भी जाना जाता था। उनका जनप्रिय नाम मुकेश ही था। वे के.एल. सहगल की आवाज तथा संगीत से प्रभावित थे। उन्होंने ‘निर्दोष‘ फिल्म से अपने गायन का आरम्भ किया, किन्तु पहली व्यावसायिक सफलता उन्हें ‘दिल जलता है तो जलने दो‘ गीत से अपनी भावपूर्ण आवाज के लिए मिली। उनका कंठ-स्वर राज कपूर का पर्याय बन गया, तथा उन्होंने साथ मिल कर कई महान फिल्में, जैसे ‘आवारा‘, ‘मेरा नाम जोकर‘, इत्यादि की। उन्हें कई फिल्मफेयर सम्मान प्राप्त हुए, साथ ही उन्हें पार्श्वगायन के लिए राष्ट्रीय सम्मान भी प्रदान किया गया।