राजनीतिक दलों के कार्य क्या है | राजनीतिक दलों के कार्यों की व्याख्या कीजिए political party work in hindi

By   November 6, 2020

political party work in hindi राजनीतिक दलों के कार्य क्या है | राजनीतिक दलों के कार्यों की व्याख्या कीजिए ?

राजनीतिक दलों के कार्य
पार्टियाँ, राजनीतिक व्यवस्था के लिए जो कार्य करती हैं उनके माध्यम से वे लोकतान्त्रिक सरकार में योगदान करती हैं। इन कार्यों को मोटे तौर पर छह श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, राजनीतिक दल वर्गीय (ेमबजपवदंस) हितों का समन्वय करते हैं, भौगोलिक विभिन्नताओं पर सेतुबंध का कार्य करते हैं, तथा समरूपता एवं एकता लाने का प्रयास करते हैं। अन्य शब्दों में, पार्टियों के माध्यम से विभिन्न हितों का समीकरण किया जाता है। इसके द्वारा समाज और राजनीति व्यवस्थित रहती है।

दूसरे, राजनीतिक दल चुनावों के लिए उम्मीदवारों का नामांकन करके लोकतान्त्रिक सरकार को योगदान देते हैं। दलों के अभाव में, मतदाताओं के समक्ष प्रतिबद्धता-विहीन अनेक उम्मीदवारों का समूह उपस्थित हो जायगा और तब प्रत्येक उम्मीदवार अपने व्यक्तिगत सम्बन्धों और अपनी उपलब्धियों के आधार पर मत प्राप्त करने की चेष्टा करेगा। यह भंयकर स्थिति हो सकती है। राजनीतिक दल विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े कर इस खतरे को टाल सकते हैं। वे चुनाव जीतने के लिए अभियान चलाते हैं। यदि कोई प्रत्याशी गरीब हो तो राजनीतिक दल चुनाव लड़ने पर होने वाले खर्च का वहन भी करते हैं।

तीसरे, राजनीतिक दल चुनाव के लिए उम्मीदवारों की संख्या को कम रखकर, उनकी विजय की सम्भावना को अधिक व्यावहारिक बनाकर एक अन्य प्रकार से भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सहयोग देते हैं। जिन दलों को पिछले चुनावों में अधिक मत मिले होंगे, वे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि अगली बार भी अच्छी संख्या में मत प्राप्त कर जीत सकेंगे। इससे निर्दलीय तथा अन्य गैर-गम्भीर उम्मीदवारों को हतोत्साहित किया जा सकता है। इस प्रकार, चुनावों का केन्द्र सुसंगठित राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों तक सीमित हो जाता है। परिणामस्वरूप मतदाताओं के समक्ष चयन करने के लिए व्यावहारिक परिस्थिति होती है और वे तार्किक एवं विवेकपूर्ण निर्णय कर सकते हैं।

चौथे, राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणा-पत्रों के माध्यम से विभिन्न वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत करके मतदाताओं द्वारा प्रतिनिधियों को चुनने का कार्य सरल कर देते हैं। किसी भी चुनाव अभियान में प्रत्येक उम्मीदवार द्वारा पेश किए गए कार्यक्रमों में थोड़ी-बहुत भिन्नता तो होती ही है। विभिन्न चुनावों में भी ऐसा ही होता है, क्योंकि प्रत्येक निर्वाचन के समय परिस्थितियाँ और मुद्दे अलग हो सकते हैं। फिर भी, सामान्यतया विभिन्न दलों के उम्मीदवारों द्वारा उठाए गए नीतिगत प्रश्न एवं मुद्दे अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों से भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों —- डेमोक्रेटिक तथा रिपब्लिकन पार्टियों — के न तो नाम किन्हीं अलग विचारधाराओं की ओर संकेत करते हैं, और न ही वास्तव में उनकी नीतियों में मूलभूत भेद हैं। फिर भी वे दोनों दल, प्रत्येक चुनाव में निरंतर एक-दूसरे से भिन्न कार्यक्रम और मुद्दे पेश करके अधिकाधिक मत प्राप्त करने के प्रयास करते हैं।

इनके अतिरिक्त, पार्टियाँ सार्वजनिक अधिकारियों के कार्यों में समन्वय स्थापित करने में भी सहयोग देती हैं। अमेरिका की सरकार, जो कि शक्तियों के पथक्करण पर आधारित है. सार्वजनिक नीति के सम्बन्ध में उत्तरदायित्वों का विभाजन करती है। वहाँ यह आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रपति तथा प्रतिनिधि सदन और सीनेट के नेतागण सदा एक-दूसरे से सहयोग करें। शक्ति-पृथक्करण द्वारा बन गई खाई को भरने, समन्वित नीतियाँ तैयार करवाने. और देश के शासन को अधिक प्रभावी बनाने के कार्य केवल राजनीतिक दलों के सक्रिय योगदान के द्वारा ही सम्भव हो सकते हैं। व्यक्तिगत तौर पर, राष्ट्रपति जिस दल का नेता होता है, कांग्रेस के दोनों सदनों में उस दल के नेताओं के साथ उसके सहयोग की सम्भावना अधिक होती है। उधर, इंगलैण्ड एवं भारत जैसे संसदीय लोकतन्त्र व्यवस्था वाले देशों में मन्त्रिपरिषद्, अर्थात् वास्तविक कार्यपालिका की स्थापना, उसका गठन एवं स्थायित्व इस बात पर निर्भर करता है कि संसद में उसे बहुमत का समर्थन मिलता रहे। सरकार को निर्बाध समर्थन प्रदान करते रहने के लिए सम्बद्ध राजनीतिक दल अपने सांसदों को अनुशासन में रखकर मन्त्रिमंडल को स्थायी और प्रभावी बनाए रखते हैं। वस्तुतः राजनीतिक दलों की भूमिका इतनी अधिक प्रभावी हो गई है कि लोकतन्त्र में प्रायः उन्हें (बहुमत को) सरकार का पर्याय मान लिया जाता है, क्योंकि विधायिका की अधिकांश शक्तियों को राजनीतिक दलों ने अपने प्रभाव में ले लिया है।

हालांकि लोकतान्त्रिक चुनावों में विजय प्राप्त करना और अधिक से अधिक सीटों पर कब्जा करना प्रत्येक राजनीतिक दल का मूल उद्देश्य होता है, किंतु फिर भी चुनाव में पराजय का अर्थ कभी यह नहीं होता कि पराजित दल समाप्त ही हो गया। ऐसी स्थिति में, अल्पसंख्या में स्थान प्राप्त करने वाला दल, शासन-तन्त्र के दोष उजागर करके सरकार की नीतियों की चौकसी करने का महत्वपूर्ण कार्य करता रहता है। इस प्रकार, सत्ता में या विपक्ष में बने रहकर राजनीतिक दल लोकतन्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक ओर वे लोकतान्त्रिक मूल्यों और प्रतिमानों को सशक्त बनाए रखते हैंय तो दूसरी ओर वे सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए समाज में जागृति लाने और उसे सक्रिय रूप देने का कार्य भी करते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल, राजनीतिक तथा आर्थिक-सामाजिक विकास दोनों को ही दिशा और गति प्रदान करते हैं।

राजनीतिक दलीय व्यवस्थाएँ
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
दलीय व्यवस्था की उत्पत्ति
मानव प्रकृति सिद्धान्त
परिवेश सम्बन्धी स्पष्टीकरण
हित सिद्धान्त
अर्थ और प्रकृति
राजनीतिक दलों के कार्य
दलीय व्यवस्थाओं के प्रमुख प्रकार
एक-दलीय व्यवस्था
दो-दलीय व्यवस्था
बहु-दलीय व्यवस्था
दो-दलीय बनाम बहु-दलीय व्यवस्थाएँ
दलीय व्यवस्था की आलोचना
क्या दल-रहित लोकतन्त्र सम्भव है?
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई का अध्ययन करने के पश्चात्, आप :
ऽ दलीय व्यवस्थाओं की उत्पत्ति का पुनः स्मरण कर सकेंगे,
ऽ राजनीतिक दलों के अर्थ एवं प्रकृति का वर्णन कर सकेंगे,
ऽ राजनीतिक दलों के कार्यों की व्याख्या कर सकेंगे,
ऽ विभिन्न प्रकार की दलीय प्रणालियों का उल्लेख कर सकेंगे,
ऽ विभिन्न प्रकार की दलीय प्रणालियों के गुण-दोष का मूल्यांकन कर सकेंगे, तथा
ऽ लोकतन्त्र में दलीय प्रणाली की कमियों और उसकी अनिवार्यता का वर्णन कर सकेंगे।

प्रस्तावना
राजनीतिशास्त्री एवं राजनीतिज्ञ, दोनों ही लोकतान्त्रिक राजव्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका के महत्व से भली-भान्ति परिचित हैं। जैसा कि फाईनर का कहना है, ‘‘लोकतन्त्र की आशाएँ तथा शंकाएँ दलीय प्रणाली पर ही आधारित हैं।‘‘ वास्तव में, लोकतन्त्र विभिन्न परस्पर विरोधी विचारों को स्वतन्त्र रूप से अभिव्यक्त करने का पूरा अवसर प्रदान करता है, जिसे ‘‘बहुलविचारों का परस्पर विरोध‘‘ भी कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में, राजनीतिक दल विचारों की अभिव्यक्ति का मुख्य साधन होते हैं। अतः दल-व्यवस्था लोकतन्त्र की अनिवार्यता है। दलों के अभाव में, मतदाता न केवल भ्रमित रहेंगे वरन छोटे-छोटे अणु जैसे टुकड़ों में विभक्त हो जायंगे। ऐसे में विभिन्न विचारों को क्रमिक रूप ही नहीं दिया जा सकेगा। इसलिए, दल-व्यवस्था आवश्यक है ताकि जनमत को स्पष्ट किया जा सकेगा और उस पर शासन का ध्यान केन्द्रित किया जा सके। राजनीतिक दल ही वे मुद्दे तैयार करते हैं जिन्हें जनता के समक्ष रखकर जनादेश प्राप्त किया जा सके। अतः, तुलनात्मक राजनीति के विद्यार्थियों के लिए यह बहुत उपयोगी और रोचक है कि वे दल-व्यवस्था की उत्पत्ति, अर्थ, प्रकार तथा गुण-अवगुणों का ज्ञान प्राप्त करें।