ग्रहाणु परिकल्पना क्या है , किसने दी , चैंबर्लिन तथा मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना Planetesimal Hypothesis of Chamberlin and Moulton

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Planetesimal Hypothesis of Chamberlin and Moulton in hindi ग्रहाणु परिकल्पना क्या है , किसने दी , चैंबर्लिन तथा मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना ? मोल्टन व लाप्लास की पृथ्वी उत्पत्ति संबंधी परिकल्पना का सविस्तार वर्णन किजिये।

पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी प्रमुख सिद्धान्त
(Important Theories of origin of the Earth)
हमारी पृथ्वी सौरमण्डल की एक सदस्य है, जिसका केन्द्र सूर्य है। इस सौरमण्डल में नौ ग्रह है जिनमें पृथ्वी तीसरे स्थान पर है। ग्रहों के उपग्रह हैं और सभी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सौरमण्डल का व्यास 1173 करोड कि.मी. है। सूर्य एक मध्यम आकार का तारा है जो उष्मा व ऊर्जा का स्रोत है। ब्रह्माण्ड में फैले असंख्य पिण्डों में कुछ स्वतः प्रकाशित रहते हैं वो तारे कहलाते हैं। तारों के विशाल पुंज को आकाश गंगा कहते हैं (डपसाल ूंल हंसंगल)। ब्रह्माण्ड में लगभग 10,000 मिलियन आकाशगंगा स्थित हैं। हमारी पृथ्वी व उसका सौरमण्डल एरावत पथ नामक आकाशगंगा में स्थित है। सूर्य मुख्यतः हाइड्रोजन (71%), हीलियम (26.5%) से बना है तथा इसकी सतह पर 6000° से.ग्रे. तापक्रम पाया जाता है। सभी ग्रह इसी से प्रकाश व ऊर्जा प्राप्त करते हैं। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 45.5 सेकेण्ड में करती है तथा अपनी धुरी पर एक चक्कर 23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकेण्ड में पूरा करती है। पृथ्वी एकमात्र ग्रह है जिस पर वायुमण्डल व जीवन पाया जाता है।
हाल ही में वैज्ञानिकों ने सौरमंडल के दसवें ग्रह को खोजने का दावा किया है।
सौरमण्डल एवं पृथ्वी की उत्पत्ति के गूढ़ रहस्य को जानने के प्रयास प्राचीन काल से निरन्तर होते रहे हैं। कई परिकल्पनाएँ व विचार विभिन्न विद्वानों ने प्रस्तुत किये परन्तु कोई भी सर्वमान्य नहीं है। यह सभी विद्वान मानते हैं कि सभी ग्रहों का जन्म एक साथ हुआ है।
पृथ्वी की उत्पत्ति के संदर्भ में सौरमण्डल एवं पृथ्वी के कुछ तथ्यों पर ध्यान रखना आवश्यक है –
(1) सौरमण्डल के सभी ग्रह वृत्ताकार कक्ष पर सूर्य की परिक्रमा (Revolution) पश्चिम से पूर्व दिशा में करते हैं। शुक्र व वरुण इसके अपवाद हैं।
(2) सभी ग्रहों की परिभ्रमण (Rotation) की दिशा भी पश्चिम से पूर्व है।
(3) ग्रहों एवं उपग्रह के आकार व संरचना में पर्याप्त विविधतायें हैं अतः ग्रहों को दो भागों में बाँटा जाता है- बाह्य एवं आन्तरिक।
(4) सूर्य का द्रव्यमान कुल सौर परिवार का 99% से अधिक है परन्तु कोणीय संवेग (Angular Momentum)। कुल सौर परिवार का 2ः से भी कम है।
(5) सौरमण्डल के ग्रहों के आकार में एक क्रम पाया जाता है। सूर्य के निकट एवं दूरस्थ ग्रह आकार में छोटे हैं व मध्य में बड़े आकार के ग्रह हैं जो एक सिगार जैसी आकृति बनाते हैं।
(6) सूर्य तथा ग्रहों के निर्माण करने वाले पदार्थों में अन्तर पाया जाता है।
लाप्लास की नीहारिका परिकल्पना
(Nebular Hypothesis of Laplace)
संकल्पना के आधार
फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास (Laplace) ने 1796 में अपनी पुस्तक ‘Exposition of the world System’ में नीहारिका द्वारा पृथ्वी का सौरमण्डल की उत्पत्ति का विवरण दिया। वस्तुतः यह परिकल्पना जर्मन दार्शनिक काण्ट (1755) की वायव्य-राशि संकल्पना पर आधारित है। लाप्लास ने काण्ट की परिकल्पना के मुख्य दोषों का निराकरण करते हुए अपनी परिकल्पना इस बिन्दु से प्रारंभ की कि सौर परिवार की उत्पति के पूर्व ब्रह्माण्ड में एक तप्त गतिशील-वायव्य महापिण्ड विद्यमान था। इस वायव्य महापिण्ड को ही नौहरि कहा गया है।
संकल्पना
लाप्लास के अनुसार अतीतकाल में ब्रह्माण्ड में एक तप्त, विशाल, वायव्य महापिण्ड (नीहारिका) तेजी से अपनी धुरी पर घूम रहा था। इस नीहारिका का व्यास सौर परिवार के कुल विस्तार जितना था। तीव्रगति से घूर्णन के कारण विकिरण द्वारा उसकी उष्मा का ह्यस होने लगा, फलत इसका बाह्म भाग शीतल होने लगा। नीहारिका के निरन्तर शीतल होते रहने के कारण उसमें संकुचन होता गया। फलतः नीहारिका के आयतन तथा आकार में भी कमी आने लगी. जिससे उसकी परिभ्रमण (घूर्णन) की गति में वृद्धि होती गई परिभ्रमण गति में निरंतर वृद्धि के कारण अपकेन्द्रीय बल (Centripetal force) में भी वृद्धि होने लगी। इससे नीहारिका का पदार्थ मध्यवर्ती भाग में उभार के रूप् में एकत्रित होता गया। कालान्तर में अपकेन्द्रीय बल तथा अभिकेन्द्रीय बल (Centripetal force)के मध्य संतुलन स्थापित हो गया, जिसके फलस्वरूप् नीहारिका के भूमध्य रेखा के निकट एकत्रित पदार्थ भारहीन हो गया। बाद में यही भारहीन पदार्थ क्लावआकार छल्ले के रूप् में नीहारिका से अलग हो गया और नीहारिका के चारों ओर चक्कर लगाने लगा। लाप्लास के अनुसार नीहारिका से केवल एक ही वलय समूह बाहर निकला। कालान्तर में इस क्लय समूह के ही नौ भाग हो गये। इनके मध्य में शीतलता और संकुचन के कारण रिक्त स्थान बढ़ता गया और प्रत्येक छल्ला एक-दूसरे से दूर हटता गया। इन समस्त छल्लों का सम्पूर्ण पदार्थ अलग-अलग रूप में एक स्थान पर गांठ के रूप् में एकत्रित होकर गर्म वायव्य ग्रन्थि (Hot gaseous agglomeration) का रूप धारण कर लेता है। ये वायव्य ग्रंथियाँ ठण्डी और ठोस होकर नौ ग्रहों के रूप में परिणित हो गयी। नौद्यारिका का अवशेष भाग सूर्य है। जिस प्रक्रिया से नीहारिका से ग्रहों का आविर्भाव हुआ ठीक उसी प्रक्रिया की पुनरावृति द्वारा ग्रहों से उपग्रहों की उत्पत्ति हुई।
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रांसीसी विद्वान रोशे (Roche)ने लाप्लास को परिकल्पना में यह संशोधन प्रस्तुत किया कि नीहारिका से केवल एक छल्ले के विदीर्ण होने से हो 9 ग्रहों की रचना नहीं हुई, वरम् नीहारिका के क्रमशः संकुचित होते जाने से उसमें से एक-एक करके 9 वलय निकले, जो कालान्तर में उण्डे होकर ग्रहों के रूप में घनीभूत हो गए। पृथ्वी भी उन्हीं में से एक ग्रह है। इसी प्रक्रिया द्वारा ग्रहों के विषुवत । रेखीय भागों के भारहीन होने से उपग्रह बने।
पक्ष में प्रमाण
(1) सोर-परिवार के सभी ग्रह एक ही तल और एक ही दिशा में परिभ्रमण करते है। समस्त उपग्रह भी ग्रहों के चारों ओर इसी अनुरूप् घूमते है। लाप्लास ने बताया कि सभी ग्रह एक ही छल्ले से निर्मि है। अतः इनके परिक्रमण में एकरूपता है।
(2) इस परिकल्पना के अनुसार प्रारम्भिक अवस्था में सभी ग्रह वारूवरू अवस्था में थे, कालान्तर में द्रव अवस्था और अन्त में ठोस अवस्था में परिवर्तित हुए। भू-भौतिकी की नवीनतम अवधारणा में भी पृथ्वी की उष्ण तरल अवस्था पर समर्थन किया गया है।
(3) सभी ग्रह नीहारिका से पृथक हुए एक ही वलय से निर्मित है, अतः सभी ग्रहों की रचना में एक जैसे तत्व पाये जाते है।
(4) अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाली अन्य नीहारिकाओं का अध्ययन भी लाप्लास के मत की पुष्टि करता है।
आपत्तियाँ
(1) लाप्लास के अनुसार वायव्य नीहारिका लाखों वर्षो तक उत्ताप रही, किन्तु ब्रिटिश भौतिक वैज्ञानिक लार्ड कैल्विन की आपत्ति है कि एक प्रसूतवाती नीहारिका इतने दीर्घकाल तक धधकती नहीं रह सकती।
(2) यदि नीहारिका के बाह्य भाग में इतना अधिक कोणीय संवेग था तो इस परिस्थिति में संघनन सम्भव नहीं होता। फलतः सौरमण्डल का निर्माण सम्भव नहीं था।
(3) इस परिकल्पना में एक त्रुटि यह है कि कोणीय संवेग का 98 प्रतिशत केवल चार बड़े ग्रहों में वितरित है, यद्यपि सम्पूर्ण पदार्थ का केवल 1, 1/2 प्रतिशत द्रव्यमान इन ग्रहों में मिलता है। यह कोणीय संवेग के सुरक्षा सम्बन्धी नियम (Principle of conservation of angular momentum) के विपरीत है।
(4) परिभ्रमण के बढ़ जाने से कोणीय संवेग में इतना परिवर्तन नहीं आ सकता है, जिससे नीहारिका विदीर्ण हो जायें और गोलाकार पट्टिया अलग हो जाये।
(5) वलयों के घनीभूत होने से गोले कदापि नहीं बन सकते है, जैसे-ग्रह वस्तुतः ऐसी दशा में अपेक्षाकृत छोटे-छोटे एवं अलग-अलग ग्रह बनेंगे। गैसीय पदार्थ घना होकर ग्रह के चारों तरफ बहुत से छोटे-छोटे अणुओं में परिवर्तित हो जायेगा, जैसा शनि ग्रह में दिखायी देता है।
(6) परिभ्रमण के अस्थिरता के कारण बाहर फेंका गया पदार्थ टुकड़े-टुकड़े हो जाना चाहिए था। छोटे-छोटे अणुओं का घूमना इतना तीव्र तथा अनियमित होगा कि उनका ग्रह के रूप में एकत्र होना सम्भव प्रतीत नहीं होता है। अमेरिकी विद्वान मोल्टन का कथन है कि गोलाकार पट्टी के सिकड जाने से ऐसे गोले नहीं बन सकते हैं, जैसे कि ग्रह है। यदि गैस के अन्दर कुछ भी घना पदार्थ है और वह एक-सा नहीं है तो घूमने के फलस्वरूप चक्कर लगाते हुए वलय को बाहर फेंकेगा।
(7) नीहारिका के कणों में पारस्परिक संलग्नता की मात्रा बहुत कम होगी। ऐसी दशा में वलयों का निर्माण लगातार होगा, रुक-रुक कर नहीं होगा, जैसा लाप्लास के परिकल्पना से ग्रहीत है। आज भी वलय की रचना होनी चाहिए, किन्तु अन्य ग्रहों के निर्माण के लिए उभार की अवस्था अप्राप्त है।
(8) नीहारिका से अलग होने पर वलय द्रव अवस्था में किसी भी प्रकार एक साथ परिक्रमा नहीं कर सकते थे, क्योंकि द्रव के विभिन्न स्तरों की गति समान नहीं होती है और उनमें आपस में रगड़ होती है जिससे परिभ्रमण में अवरोध उत्पन्न होता है। केवल ठोस पिण्ड ही समान गति से घूम सकता है। साथ ही गैस के अणु गति सिद्धान्त (Kinetic theory of gases) के आधार पर गैसीय वलयों का घनीभूत होकर ग्रह बनना सम्भव नहीं है। वलयों की गैस राशि को अन्तरिक्ष में लोप हो जाना चाहिए था।
(9) बृहस्पति तथा शनि के उपग्रह अपने जन्मदाता ग्रहों की विपरीत दिशा में परिभ्रमण करते हैं। यह तथ्य लाप्लास के विचार के विपरीत है।
(10) यदि सभी ग्रहों का जन्म सर्य से ही हुआ है तो उनके भूमध्यरेखीय अक्ष (Plane) सूर्य के सामान्तर ही होने चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है वरन् इन दोनों की कक्षाओं में 6° का अन्तर पाया गया है।
(11) सूर्य से कवल 9 ही ग्रह क्यों बने? नीहारिका के अवशिष्ट भाग को घूमते-घूमते हजारों वर्ष हो गये है, परन्तु उसके मध्य भाग में अभी तक उभार के कोई संकेत नहीं मिलते है।
(12) यदि सौरमण्डल के सभी ग्रहों का जन्म सूर्य से हुआ है तो सूर्य की परिभ्रमण गति उसकी वर्तमान गति से बहुत अधिक होनी चाहिए। यह कैसे सम्भव हुआ कि सूर्य की गति उसके द्वारा जन्म दिए गए ग्रहों से इतनी कम हो गई।
यद्यपि लाप्लास की परिकल्पना पर्याप्त सरल तथा तार्किक प्रतीत होती है, किन्तु स्पष्ट है कि इसमें बहुत से तथ्यों की व्याख्या नहीं की गई है। तथापित यह तत्कालीन लोकप्रिय संकल्पना रही है। इसने अन्य विचारकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।
चेम्बरलिन तथा मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना
(Planetesimal Hypothesis of Chamberlin and Moulton)
सन्् 1904 में अमेरिका के वैज्ञानिक टी.सी. चेम्बरलिन तथा मोल्टन ने अपनी ग्रहाण सम्बनी प्रस्तुत की। लाप्लास की नीहारिका परिकल्पना के मुख्य दोषों को उन्होंने ध्यान में रखा और उसे का प्रयत्न किया।
संकल्पना के आधार – ग्रहाणु परिकल्पना ने पृथ्वी की उत्पति से जुड़ी परिकल्पनाओं को एक नया मोड़ दिया। आज भी स्पेक्ट्रो होलियोग्राफ (spectro heliograph) नामक यंत्र से सूर्य में दिखाई पड़ने वाले अनेक गैस एवं वाष्प के उद्गार ज्वार की भाँति दिखाई पड़ते हैं। इन उद्गारों की ऊँचाई निश्चित नहीं है। कभी-कभी ये बहुत ऊँचे हो जाते हैं इसी आधार पर चेम्बरलिन ने द्वैतारक सिद्धांत (Binary star theory) से पृथ्वी की उत्पत्ति बताई।
संकल्पना – प्राचीन काल में एक तारा सूर्य के निकट आने लगा। उस समय सूर्य एक सर्पित नीहारिका के रूप में भ्रमण कर रहा था। तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य का ऊपरी भाग विदीर्ण होने लगा क्योंकि सूर्य उस समय विस्फोटक प्रकृति का था। तारा विदीर्ण पदार्थ को सूर्य से दूर अपनी ओर खींच ले गया जिन्हें ‘ग्रहाण‘ (Planetesimal) कहा गया।
इन ग्रहाणुओं में बड़े आकार के ग्रहाणु केन्द्रक (Nuclei)के रूप में घनीभूत हो गये और उनसे ग्रहों एवं उपग्रहों की रचना हुई। इस संकल्पना के अनुसार सभी ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना लगभग एक ही समय में हुई है। मूल सर्पिल नीहारिका वर्तमान सूर्य है।
इस संकल्पना के अनुसार प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी तथा सभी ग्रह ठंडे ठोस थे, पर उनका भीतरी भाग केन्द्रीय दाब, अणुओं के पुनर्गठन और सम्पीड़न (Compression) के कारण क्रमशःउष्ण होता गया। ज्यों-ज्यों ग्रहाणु भीतरी दबाव के कारण गर्म होते गये, त्यों-त्यों उनमें उपस्थित जलवाष्प और गैसें जो प्रारम्भ से ही उसमें विद्यमान थीं बाहर निकलने लगीं। ज्वालामुखी उद्गारों से भी गैसें निःसृत हुईं, जिनसे कालान्तर में वायुमण्डल का निर्माण हुआ।
पक्ष में प्रमाण
(1) इस परिकल्पना के अनुसार समस्त ग्रहों, उपग्रहों की रचना उस थोड़े से पदार्थ से हुई है, जो अन्य तारे के आकर्षण के कारण सूर्य से अलग हो गया था। वर्तमान गणनाओं के अनुसार सभी ग्रहों का द्रव्यमान सौर-परिवार के कुल द्रव्यमान का 1/700 है, जो इस परिकल्पना के अनुकूल है।
(2) समस्त ग्रहों एवं उपग्रहों का आकार प्रारम्भिक दशा में बहत छोटे ग्रहाणु या केन्द्रक (Nuclel) का था। आकार में वृद्धि बहुत समय तक ग्रहाणुओं के एकत्रीकरण के फलस्वरूप हुई।
(3) पृथ्वी में ताप या ऊष्मा की उत्पत्ति ग्रहाणओं के परस्पर संघर्षण केन्द्रीय भाग पर बढ़ने वाले दबाव तथा अणुओं के पुनर्गठन से हुई।
(4) पृथ्वी पर वायुमण्डल की रचना उस समय प्रारम्भ हुई जब उसका आकार बड़ा हो गया। आकार की वृद्धि से आकर्षण शक्ति में वृद्धि और अन्तरिक्ष में व्याप्त स्वतन्त्र वायुमण्डलीय जलवाष्प, कार्बन डाई-आक्साइड तथा नाइट्रोजन गैसें आन्तरिक उद्गम-स्थल से और ऑक्सीजन ज्वालामुखी उद्गारों से प्राप्त हुई।
(5) वायुमण्डलीय जलवाष्प् के सम्पृक्त होने पर जलवृष्टि के फलस्वरूप् सागरों की रचना प्रारम्भ हुई।
इस प्रकार वायुमण्डल, स्थलमण्डल एवं जलमण्डल आदि की उत्पत्ति की व्याख्या करने में यह सिद्धान्त समर्थ है, परन्तु फिर भी इस पर कई आपत्तियाँ हैः
आपत्तियाँ
(1) जैफ्री के अनुसार दूसरे तारे के आकर्षण से सूर्य से इतना अधिक पदार्थ अलग नहीं हो सकता जिससे नौग्रहों व उपग्रहों का निर्माण हो।
(2) ग्रहाणुओं के परस्पर टकराव से ताप में वृद्धि होगी और वे गैस में परिवर्तित हो जायेगी न कि उनकी मात्रा या संख्या बढ़ेगी। उन्हें नष्ट हो जाना था।
(3) यह परिकल्पना भी ग्रहों में पाये जाने वाले अत्यधिक कोणीय संवेग को स्पष्ट नहीं कर पाती है।
(4) इस परिकल्पना में ग्रहाणूओं का (दवद-मसंेजपबबवससपेपवद) अप्रत्यास्थ संगणन हुआ जो संभव प्रतीत नहीं होता।
(5) अगर सभी ग्रह एक साथ बने हैं, परन्तु रचना स्वतंत्र रूप से हुई तो सबकी परिक्रमा व परिभ्रमण की दिशा एक जैसी क्यों है सिर्फ वरुण व शुक्र को छोड़कर।
(6) दूसरा तारा सूर्य के निकट कैसे आया और कहाँ गया इसका कोई वर्णन नहीं है।