फोनोन्स की परिभाषा क्या है Phonons in hindi

(Phonons in hindi) फोनोन्स की परिभाषा क्या है : जिस प्रकार क्वांटम यांत्रिकी में उर्जा के क्वांटम फोटोन कहा जाता है उसी प्रकार lattice के क्वाण्टम को फोनोन कहते है , जो ध्वनिक क्षेत्र में होता है।

phonons की कम्पन्न आवृति लगभग 104 से 1013 Hz होती है।
अर्थात फोनोन्स IR region (ध्वनिक क्षेत्र ) में आता है।

Properties of Phonons

फोनोन्स की ऊर्जा E = hV है जहाँ V कम्पन्न आवृति है।
फोनोंस का वेग प्रकाश के वेग से गतिशील फोटोन की तरह फोनोंस भी lattice में ध्वनि के वेग से गति करती है।  (383 m/sec)
फोनोन्स का संवेग : वास्तव में phonons का कोई संवेग नहीं होता परन्तु फोनोंस का संचरण नियतांक k होता है अत: phonons का संवेग hK है।  इसे lattice momentum भी कहते है।

फोनोन की स्पिन (spin)

फोटोन्स के समान ही फोनोन्स की spin होती है।
अतः फोनोन्स की spin integer होती है।
प्रत्येक ताप पर क्रिस्टल phonon गैस के रूप में माना जा सकता है यदि ताप में वृद्धि की जाती है तो phonons की संख्या भी बढ़ जाती है।
क्रिस्टल की thermal energy का मुख्य भाग phonons की कुल उर्जा के रूप में होती है।

फोनोन्स का अवशोषण व उत्सर्जन

1. normal process : जब x rays फोटोन का किसी क्रिस्टल द्वारा प्रत्यास्थ प्रकीर्णन होता है तो आपतित फोटोन का momentum व परिक्षिप्त क्रिस्टल का संवेग का योग scattered फोटोन के momentum के बराबर होता है।
माना आपतित फोटोन का संचरण नियतांक k प्रकिर्णित फोटोन का संचरण नियतांक k’ तथा क्रिस्टल का व्युत्क्रम जालक सदिश G हो तो संवेग संरक्षण के सिद्धांत से
hk + hG = hk’
यदि आपतित फोटोन की आवृति change नहीं होती तो इस प्रक्रिया को हम सामान्य प्रक्रम कहते है।
अर्थात न तो अवशोषण होता है और न ही उत्सर्जन होता है।
2. Umklapp process : यह process अप्रत्यास्थ प्रकीर्णन के रूप में होता है।  इसमें आपतित फोटोन की आवृति change हो जाती है अर्थात एक नया फोटोन phonon के उत्सर्जन या अवशोषण के साथ उत्सर्जित होता है।

phonons के अस्तित्व के प्रमाण

1. अप्रत्यास्थ प्रकीर्णन में एक या एक से अधिक phonons के अवशोषण या emmition द्वारा आपतित photons की उर्जा व संवेग परिवर्तन होता है।
2. यदि ठोस में lattice vibration के क्वांटिकरण का सिद्धांत मान लिया जाए तो ठोसों में फोनोन्स का existence माना जा सकता है।
3. फोनोन्स का अस्तित्व विशिष्ट ऊष्मा द्वारा ही दिया जाता है।  (ठोसों की विशिष्ट ऊष्मा )

ठोसों की विशिष्ट ऊष्मा

किसी पदार्थ का ताप 1 डिग्री सेंटीग्रेट बढ़ाने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है , उसे हम पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा कहते है।
जब किसी पदार्थ को गर्म किया जाता है तो पदार्थ को heat दी जाती है।
दी गयी heat में से कुछ ऊष्मा आन्तरिक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है , शेष ऊष्मा द्वारा काम करते है।

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