भक्ति के मार्ग बताइए क्या है | भक्ति मार्ग के बारे में बताओ से आप क्या समझते हैं paths of bhakti in hindi

By   January 31, 2021

paths of bhakti in hindi भक्ति के मार्ग बताइए क्या है | भक्ति मार्ग के बारे में बताओ से आप क्या समझते हैं ?

भक्ति के मार्ग एवं स्तंभ (Paths and Pillars of Bhakti)
आधुनिक ऐतिहासिक नजरिये से भक्ति का विकास प्राचीन भारत के तीन प्रमुख धार्मिक परंपराओं में मौजूद पूर्व के अवतारवादी रूझानों का व्यापक रूप से एक साथ मिल जाना है जो हैंः

प) आर्य आक्रमणकारियों के बलिदान संबंधी पंथों तथा ब्राह्मण पुजारियों के श्लोक जो कि वेदों का आधार बने,
पप) शारीरिक इच्छाओं का दमन करके तपस्या करने की पद्धति तथा श्रमण (ैतंउंदंे) कहलाने वाले समूहों द्वारा पूर्व भारतवासियों की परंपराओं को जारी रखा जाना किन्तु शीघ्र ही कुछ आर्यों द्वारा उनके रूपान्तरण तथा
पपप) आर्यों से पूर्व आत्माओं तथा गाँव की देवियों में विश्वास की मान्यता, जो कि पेड़ों तथा चट्टानों पर निवास करती थीं और कुछ विशेष व्यक्तियों अथवा समूहों को सुरक्षा प्रदान करती थीं।

वे लोग जो कि विष्णु को सर्वोच्च देवता मानकर पूजते हैं, वैष्णव कहलाते हैं, इसी तरह जो लोग शिव को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं, शैव कहलाते हैं, तथा वे लोग जो कि शक्ति की देवी के भक्त हैं, साकत (ेंाजंे) कहलाते है । प्रत्येक पंथ पुनः शिक्षकों व शिक्षाओं के क्रमों में विभाजित है। भक्ति के प्रमुख स्वरूप भक्तों के विभिन्न मनोदशाओं के अनुरूप विभाजित हैं। आम भावना अथवा भाव को लीला के अंतर्गत एक परिष्कृत मनोदशा अथवा रस में रूपान्तरित किया जाता है अथवा रस की प्रत्येक श्रृंखला किसी खास मानवीय रिश्ते का प्रयोग करती है अथवा भक्ति के उदाहरणों जैसे सेवकों की स्वामी के प्रति अथवा बच्चे की माता-पिता के प्रति अथवा मित्र के प्रति, माता-पिता की बच्चे के प्रति तथा प्रेमिका की प्रेमी के प्रति आसक्ति को इस्तेमाल करती है। जहाँ भक्ति भाव विभोर लगाव पर बल देती है यह योग से बिल्कुल भिन्न है जोकि अलगाव पर बल देते है। फिर भी भक्ति के अनेक रूप ऐसे भी हैं, जो कि अलगाव की बात करते हैं, जैसा कि भागवत् गीता में उपदेश दिया गया है। धार्मिक तौर पर भक्ति-आन्दोलन अति वैराग्य के मार्ग तथा लोकप्रिय हिन्दू धार्मिकता के बीच में खड़ा है। भक्ति आम तौर पर मोक्ष अर्थात सीमित अस्तित्व से छुटकारा तथा अतीन्नद्रीय परमानन्द में लीन हो जाने की बैरागी संबद्वताओ से सहमति रखती है। बुनियादी चीज है ईश्वर के साथ संवाद ।

कुछ भक्तगण अपना पूरा समय व शैली हिन्दू संन्यासियों की तरह पूरे दिन, अपने ईश्वर की प्रार्थना में भजन और कीर्तन करते हुए समर्पित करके रहते हैं । भक्ति लोकप्रिय हिन्दू धर्म की भाँति ही पूजा के मूल अनुष्ठान को अपनाती है जिसमें देवता की आराधना मूर्ति के रूप में फल-फूल व वनस्पति चढ़ाकर की जाती है और जिन्हें पूजा के बाद प्रसाद के रूप में लौटा दिया जाता है जो कि ईश्वर की मर्यादा से भरपूर भौतिक पदार्थ है। इस तरह की पूजा किसी घरेलू पूजास्थल या स्थानीय मंदिर में की जा सकती है। पूजा किसी भी आध्यात्मिक तथा मुंडन संबंधी मकसद के लिये की जा सकती है। भक्ति के विशिष्ट अनुष्ठान भी हैं जैसे भजनों व जापों का सामूहिक गायन, ड्रामा, नृत्य तथा जाप तथा विष्णु की शौर्य गाथाओं का उच्चारण।

भक्ति के ये तीन मार्ग नीचे दिये जा रहे हैं, जिनका प्रस्तावना भगवान कृष्ण ने अर्जुन को किया था:
प) ज्ञान मार्ग:
पप) कर्म मार्ग, तथा
पपप) भक्ति मार्ग

संस्कृत भाषा के शब्द ‘‘भक्ति‘‘ का अनुवाद अक्सर समर्पण के रूप में तथा भक्ति मार्ग शब्द का अनुवाद “समर्पण मार्ग‘‘ के रूप में किया गया है। भक्ति देवी-देवताओं व मनुष्य के बीच का वह रिश्ता है, जिसे मानव पक्ष द्वारा अनुभव किया गया है। भक्ति के कम से कम तीन प्रमुख प्रचलित रूप हैं, वैष्णव, शैव तथा महाशक्ति के उपास। इनमें से प्रत्येक पंथ अनेकों उप-पंथों में विभाजित है। भक्ति लोकप्रिय धर्म तथा वैराग्य के बीच की स्थिति है। भक्ति मोक्ष की चिन्ता से संबद्ध है जो कि पृथ्वी पर जन्म लेने के बंधनों से छुटकारा दिलाता है। फिर भी ईश्वर के साथ संवाद पर और अधिक बल दिया गया है। पूजा का अनुष्ठान बहुत महत्व रखता है। अन्य तरह के अनुष्ठान भी मौजूद हैंय जैसे भजनों व मंत्रों का सामूहिक जाप, महाकाव्यों का पाठ, पवित्र माला फेरना।

भक्ति का यह आखिरी मार्ग ही है जो कि एक धार्मिक परंपरा का आधार बना हुआ है, जो कि आज दुनिया भर में बरकरार तथा फल-फूल रहा है। इस पंरपरा की मौलिक शिक्षा यह थी कि अपनी आत्मा की मुक्ति के एक मार्ग के रूप में अपने बारे में कुछ भी सोचे बिना अर्थात स्वयं को भूलकर किसी एक ही ईश्वर की छवि पर ध्यान केन्द्रित करते हुए ‘‘प्रेममय समर्पण‘‘ का भाव ग्रहण कर लिया जाए। किसी व्यक्ति की भक्ति का केन्द्र-बिन्दु कोई भी माना जाता था। इस ईश्वर को इसलिये उस व्यक्ति का निजी अथवा ‘‘इष्ट देव‘‘ माना जाता था । इष्ट देवता, वह दैवीय शक्ति है, जिसका चुनाव भक्त अपने एक देवता के रूप में करता है और उसी पर व्यक्तिगत आसक्ति का भाव उड़ेल देता है, भक्ति के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय ईश्वर कृष्ण ही रहा है और भक्ति की अधिकांश परंपरा का विकास उसी के इर्द-गिर्द हुआ है। खासतौर पर विष्णु के अवतार के रूप में उसका चरित्र तथा गोपियों विशेष रूप से राधा के साथ उसका रिश्ता ही केन्द्रीय महत्व रखता है। गोपियों का नाम उनको दिया गया है जो कृष्ण की पूजा करती थीं और जिनके साथ उन्होंने अपनी अलौकिक क्रीड़ाएँ (लीलाएँ) की थीं। दरअसल, उस प्रेम को ही, जो कि गोपीयाँ कृष्ण से करती थीं, ईश्वर के प्रति व्यक्ति की आस्था का सबसे अच्छा उदाहरण माना गया है। ‘‘स्वयं का परित्याग कर देने अथवा अपने ईश्वर की मौजूदगी में सब कुछ भूल जाने का विचार भी भक्त अथवा ईश्वर के प्रति भक्त की आस्था का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

ईश्वर तथा भक्त के बीच के संबंध की इस विशेष अवस्था को विरह भक्ति कहा गया है। विरह भक्ति श्री कृष्ण के प्रति एक खास निजी आस्था को दिया गया एक नाम है, जिसके तहत भक्त पूर्व देवता से बिछड़ जाने अथवा दूर हो जाने की भावना का अहसास करता है। कृष्ण की भक्ति तथा उसके इर्द-गिर्द पैदा हुआ भक्ति संप्रदाय आठवीं सदी के आसपास दक्षिण भारत में काफी लोकप्रिय हो गया। अब हम भक्ति के स्तंभों पर चर्चा करेंगे। ये हैं,

भक्ति परंपरा के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं ‘‘प्रेम‘‘ तथा ‘‘मनन करना” प्रेम, ईश्वर के साथ एक ऐसी भाव-प्रवणता अथवा निकटता का द्योतक है जोकि कोई अपने प्रेमी के साथ अनुभव करता है। यहाँ जिस विचार की प्रस्तुति की है वह ईश्वर के प्रेम में उसी तरह से खो जाना है, जैसे कि वहं कोई प्रेमी हो। इसके साथ ही यहाँ पर उत्पन्न होने वाला संबंध ईश्वर पर निर्भरता का भी हो सकता है। दूसरी तरफ जहाँ तक ‘‘मनन करने‘‘ के पहलू का संबंध है, भक्ति में दो प्रकार के मनन मौजूद हैं, ये हैं:

प) सगुण भक्ति (Saguna Bhakti) जिसके तहत व्यक्ति, अनुशासित व्यवहार के जरिए ईश्वर का मनन, एक अलग अस्तित्व के रूप में करता है,

पप) निर्गुण भक्ति (Nirguna Bhakti) जिसके तहत ईश्वर तथा स्वयं व्यक्ति का आपस में