सरसों क्या है , सरसो का सामान्य नाम , वनस्पति नाम , उपयोग , कुल , पादपों का आर्थिक महत्व mustard in hindi

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पादपों का आर्थिक महत्व : पादपो के द्वारा मानव उपयोगी कई प्रकार के उत्पाद उत्पन्न किये जाते है , उनमे से कुछ प्रमुख निम्न प्रकार से है –

1.  तेल उत्पन्न करने वाले पादप : तेल सामान्यत: दो प्रकार का होता है –

(i) सुगंध/वाष्पशील तेल :

  • इस प्रकार का तेल अनिवार्य तेल भी कहलाता है।
  • इस प्रकार का तेल वाष्पशील होता है।
  • इस प्रकार के तेल को आसानी से आसवन के द्वारा पृथक किया जा सकता है।
  • इस प्रकार का तेल सामान्यतया चमेली , मोगरा तथा खसखस से उत्पन्न होता है।

(ii) अवाष्पशील तेल :

  • इसे अ अनिवार्य तेल के नाम से भी जाना जाता है या यह अस्थिर तेल कहलाता है।
  • इस प्रकार के तेल को आसवन के द्वारा पृथक नहीं किया जा सकता है।
  • सामान्यतया सरसों , मूंगफली , सोयाबीन , सूरजमुखी आदि का तेल अअनिवार्य तेल कहलाता है।

नोट : अअनिवार्य तेल वसीय अम्ल तथा ट्राई ग्लिसरोल या एस्टर युक्त होते है।

वायु के साथ अभिक्रिया के आधार पर वसीय तेल सामान्यतया निम्न प्रकार के होते है –

(1) शुष्कन तेल (dry oil) : ऐसा तेल जो वायु के साथ संपर्क में आने पर एक लचीली परत का निर्माण करता है , शुष्कन तेल कहलाता है।

उदाहरण : अलसी , कुसूम तथा सोयाबीन का तेल उपरोक्त प्रकार का तेल होता है।

(2) अर्द्धशुष्कन प्रकार का तेल (semi dry oil) : इस प्रकार के तेल के द्वारा वायु के सम्पर्क में लम्बे समय तक रहने के कारण एक परत का निर्माण होता है।

उदाहरण : तिल , बिनौला तथा सूरजमुखी का तेल अर्द्धशुष्क प्रकार का तेल होता है।

(3) अशुष्कन तेल (non dry oil) : इस प्रकार के तेल के द्वारा वायु के संपर्क में आने पर किसी प्रकार की परत का निर्माण नहीं किया जाता है।

उदाहरण : सरसों तथा मूंगफली का तेल अशुष्कन प्रकार का तेल होता है।

(4) चर्बी या वसा युक्त तेल : (i) सामान्य तापमान पर अर्द्ध ठोस या ठोस अवस्था में पाया जाने वाला तेल , वसा या चर्बी युक्त तेल कहलाता है। (ii)नारियल तथा पाम का तेल वसा या चर्बी युक्त होता है।

सरसों

सामान्य नाम : पिली सरसो

वनस्पति नाम : brassica napus variety glauca

अन्य नाम : brassica campestris

कुल : क्रुसीफेरी / ब्रेसीकेसी कुल का पादप

उपरोक्त कूल के कुछ अन्य पादप –

काली सरसों , राई , सफ़ेद राई , काली राइ।

तेल के लिए उपयोगी भाग : बीज में उपस्थित बीजपत्र।

उत्पत्ति तथा उत्पादन क्षेत्र :

(i) सरसों का प्राचीन समय में मसालों के रूप में अत्यधिक महत्व देखा गया है।

(ii) सामान्यतया सरसों की उत्पत्ति Asia minor जैसे ईरान क्षेत्र तथा मध्य एशिया से हुई है।  इसके अतिरिक्त इसकी उत्पत्ति हिमालयी क्षेत्र तथा भू-मध्य सागरीय क्षेत्र से ही हुई है।

(iii) अत: सरसों की उत्पत्ति उपरोक्त तीन क्षेत्रों से मानी जाती है।

(iv) भारत में सरसों सामान्यतया उत्तर प्रदेश , पंजाब , बिहार , मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में उगाई जाती है।

(v) सरसों राजस्थान में मुख्यतः भरतपुर , अलवर , सवाईमाधोपुर , करोली आदि में अत्यधिक मात्रा में उगाई जाती है।

(vi) सम्पूर्ण विश्व में भारत के द्वारा सर्वाधिक मात्रा में सरसों उत्पन्न की जाती है।

(vii) सरसों को सामान्यत: अक्टूबर , नवम्बर में उगाया जाता है , यह फसल फरवरी -मार्च तक तैयार हो जाती है तथा इसी समय इसकी कटाई की जाती है।

(viii) सरसो की फसल प्रमुख रबी की फसल है , सरसों सामान्यत: असिंचित भूमि में उगाई जाती है अर्थात बारानी भूमी में उगाई जाती है , परन्तु कुछ स्थानों पर सरसों की खेती सिंचित क्षेत्र में ही की जाती है।

पादप की प्रकृति

(i) सरसों का पादप मुख्यतः एक वर्षीय , लम्बा , दुर्बल और अल्पशाखित होता है।

(ii) सरसों की मूल मूसला मूल प्रकार की होती है।

(iii) सरसों का तना सामान्यत: हरा , अरोमिल , शाखित , दुर्बल तथा लम्बा होता है , तने की लम्बाई प्रमुखत: 3 से 5 मीटर होती है।

(iv) सरसों की पत्तियां आकार में बड़ी सरल , रोमिल , विणाकार तथा तीव्र गंध युक्त होती है।  तीव्र गंध सल्फर युक्त यौगिको की उपस्थिति के कारण होती है।

(v) सरसों का पुष्पक्रम प्रारूपिक असीमाक्ष होता है।  [सरसों के पुष्प एकान्तर क्रम में तथा संवृन्ति पाए जाते है। ]

(vi) सरसों में पुष्पों की संख्या अत्यधिक होती है तथा पुष्प पीले रंग के चमकदार होते है।

(vii) सरसों का पुष्प चर्तुतयी होता है।

(viii) सरसो में सिलिकुआ प्रकार का फल पाया जाता है।

(ix) सरसों का बिज सामान्यत: हलके पीले रंग का अभ्रुणपोषी तथा तेल युक्त होता है।

(x) सामान्य परिस्थितियों में प्रति हेक्टेर 10-12 क्विंटल सरसों उत्पन्न होती है।

(xi) सरसों के बिज में 30-48% तेल पाया जाता है जिसका निष्कर्षण परंपरागत घानियो के द्वारा या तेल की मिलो के द्वारा किया जाता है।

(xii) सरसों का तेल सामान्यतया भारी तथा सुनहरे पीले रंग का पाया जाता है।

(xiv) सरसों का तेल सामान्यत: तीव्र गंध युक्त होता है जो सल्फर युक्त यौगिक की उपस्थिति के कारण होता है।

सरसों के तेल में पाया जाने वाला प्रमुख यौगिक allyl iso thio cynate कहलाता है।

(xv) सरसों के तेल में सामान्यतया इरुसिक वसीय अम्ल पाया जाता है।  सरसों के तेल में उपस्थित अन्य वसीय अम्ल ओलिक अम्ल तथा palmatic अम्ल कहलाते है।

(xvi) राजस्थान में मुख्यतः उगाई जाने वाली सरसों की उन्नत किस्मे निम्न प्रकार है –

  • पुसाकल्याणी : इसे लौटनी सरसों के नाम से भी जाना जाता है।
  • वरुणा
  • दुर्गामणी
  • RH-30
  • TM-11
नोट : सरसों की उपरोक्त उन्नत किस्मे सामान्य किस्मो से अधिक सरसों उन्पन्न करती है।

सरसों का महत्व

(i) सामान्यतया सरसो के बीजो से प्राप्त तेल खाद्य तेल के रूप में उपयोग किया जाता है।
(ii) सरसों का तेल मालिश हेतु , दीपक जलाने के लिए तथा केश तेल के रूप में उपयोग किया जाता है।
(iii) सरसो का तेल प्राप्त करने के पश्चात् बचे हुए अवशेष खल के रूप में पशुओ हेतु पोषक पदार्थ के रूप में उपयोग किये जाते है।
(iv) साबुन तथा रबर सम्बन्धित उद्योगों में सरसों के तेल का उपयोग किया जाता है।
इन उद्योगों में इस तेल को प्रमुखत: :- प्रतिस्थापक के रूप में उपयोग किया जाता है।
(v) विभिन्न प्रकार की मशीनों में सरसों का तेल स्नेहक के रूप में उपयोग किया जाता है।
(vi) सरसों के बीजो को सामान्यत: मसालों तथा अचार के निर्माण हेतु भी उपयोग किया जाता है।
(vii) सरसों का तेल चमड़े उद्योग में चमड़े को मुलायम करने हेतु उपयोग किया जाता है।