बहुदलीय व्यवस्था क्या है | भारत में बहुदलीय शासन व्यवस्था क्या है गुण प्रमुख विशेषता अंतर multiple parties system in india in hindi

By   November 6, 2020

multiple parties system in india in hindi बहुदलीय व्यवस्था क्या है | भारत में बहुदलीय शासन व्यवस्था क्या है गुण प्रमुख विशेषता अंतर की परिभाषा किसे कहते है ?

बहु-दलीय व्यवस्था
बहु-दलीय व्यवस्था में तीन या उससे भी अधिक प्रमुख राजनीतिक या स्पष्ट दल होते हैं, जिनमें सत्ता के लिए संघर्ष चलता है, परन्त किसी भी एक दल को प्रायः पूर्ण (ंइेवसनजम) बहुमत नहीं मिल पाता। यह प्रणाली, स्थानीय विशिष्टताओं के साथ, भारत, फ्रांस, स्विट्जरलैण्ड, जर्मनी, इटली इत्यादि अनेक देशों में पाई जाती है।

सरकार के स्थायित्व की दृष्टि से बहु-दलीय व्यवस्था के दो वर्ग हो सकते हैं। (क) अस्थायित्व वाली बहु-दलीय प्रणाली (नदेजंइसम उनसजप-चंतजल ेलेजमउ) तथा (ख) कार्यकारी बहु-दलीय प्रणाली (ॅवतापदह ज्ूव-च्ंतजलैलेजमउ)। जैसा कि नाम से 8 स्पष्ट है, प्रथम वर्ग की व्यवस्था स्थायित्व प्रदान नहीं कर पाती है। भारत की वर्तमान स्थिति, जिसमें बार-बार त्रिशंकु लोक सभा (भ्नदह च्ंतसपंउमदज) चुनी जा रही है, प्रथम वर्ग का अच्छा उदाहरण है। भारत पि 1996-99 की अवधि में तीन प्रधानमन्त्रियों के नेतृत्त्व में चार सरकारों की स्थापना हुई। तीसरे और चौथे गणतंत्र की अवधि में फ्रांस में निरंतर सरकारें बनती और गिरती रहीं। इटली भी बहु-दलीय व्यवस्था का एक अन्य उदाहरण है जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किसी भी एक दल को संसद में बहुमत नहीं मिला है।

दूसरी ओर, कार्यकारी (ॅवतापदह) बहु-दलीय व्यवस्था में भी अनेक दल होते हैं, परन्तु उनके गठबंधन प्रायः दो विकल्प प्रस्तुत करते हैं, इसमें सरकार को स्थायित्व भी प्राप्त होता है। भूतपूर्व जर्मनी में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के सरकारी पार्टी बनने से पूर्व वि-दलीय प्रणाली में तीन पार्टियों में से दो पार्टी मिलकर हमेशा सरकार बनाती थी और सोशल डेमोक्रेट्स हमेशा विपक्ष में रहते थे। जर्मनी के दो गठबंधन काफी स्थायी सरकारें दे सके हैं। इसी प्रकार नॉर्वे, स्वीडन, बेल्जियम तथा इजराइल में भी बहु-दलीय प्रणाली में अधिक अस्थिरता नहीं पाई जाती।

दो-दलीय बनाम बहुदलीय व्यवस्थाएँ
लोकतन्त्र उतना ही सफलतापूर्वक बहु-दलीय प्रणाली में कार्य करता है जितनी द्वि-दलीय प्रणाली में। फिर भी प्रत्येक प्रणाली के कुछ गुण-अवगुण तो होते ही हैं। बहु-दलीय व्यवस्था के समर्थकों के तर्क है किः (क) भारत जैसे बहुल समाज में जनमत की भिन्नताओं को अधिक भली-भान्ति केवल बहु-दलीय व्यवस्था में अभिव्यक्त किया जा सकता हैय (ख) यह विविध हित समूहों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व और उनकी संतुष्टि करती हैय (ग) इस व्यवस्था में, दो-दलीय व्यवस्था की अपेक्षा, मतदाताओं के समक्ष उम्मीदवारों तथा दलों के रूप में अधिक विकल्प होते हैंय (घ) इसमें बहुमत की मनमानी करने की सम्भावना बहुत कम हो जाती हैय तथा (च) यह व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक लचीली है क्योंकि इसमें समूहों का संगठन, उनका एकीकरण तथा पृथकीकरण… समयानुसार अधिक आसानी से हो सकता है।

सैद्धान्तिक रूप से भले ही बहु-दलीय व्यवस्था के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है, फिर भी वास्तविकता कुछ और ही है। जैसा कि हमने स्वयं भारत में ही देखा, किसी भी दल को संसद में बहुमत न मिलने के कारण मिली-जुली (साझी) सरकारों का बार-बार गठन करना पड़ा। मन्त्रिपरिषद् के सदस्य, प्रधानमन्त्री से निर्देश लेने की अपेक्षा अपने दलीय नेताओं से दिशा-निर्देश माँगते हैं। यही नहीं, छोटी-छोटी बात पर छोटे (एक सदस्य वाले दल तक) दल, सरकार से समर्थन वापस ले लेने की धमकी देते रहते हैं। आश्चर्य नहीं कि, सरकार को शासन चलाने के लिए समय नहीं मिल पाता क्योंकि सहयोगी दलों को प्रसन्न रखना ही एक मुख्य कार्य बन जाता है। यह कार्य बहुधा राष्ट्रीय हित की अनदेखी करके करना पड़ता है। साझी सरकार का नेतृत्त्व करने वाला बड़ा दल प्रायः इस बात के लिए विवश हो जाता है कि वह बहुमत जुटाने के लिए अपने कार्यक्रमों में परिवर्तन तथा अपनी नीतियों के साथ समझौता करे। इस तरह की सरकार की नीतियाँ विभिन्न दलों की नीतियों की खिचड़ी होती है, जिसके कारण मतदाताओं और सरकार के बीच खाई उत्पन्न हो जाती है।

इन सब प्रयासों के बावजूद, साझी (बवंसपजपवद) सरकारें बड़ी आसानी से गिर जाती हैं, क्योंकि . इनमें शामिल विभिन्न दल कुछ न कुछ माँग करते ही रहते हैं, और छोटी-सी बात पर समर्थन वापस ले लेते हैं। भारत में 1997 में काँग्रेस (आई) के समर्थन वापस लेने पर पहले देवेगौडा सरकार और फिर गुजराल सरकार गिर गई। वाजपेयी सरकार को 1999 में अन्ना द्रमुक द्वारा समर्थन वापस ले लेने पर पराजय का मुँह देखना पड़ा। ऐसी परिस्थितियों में बार-बार चुनाव करवाना देश पर भीषण बोझ डालता है। ऐसा भी होता है कि बहु-दलीय व्यवस्था में संगठित विपक्ष का अभाव हो जाता है और यह अनुमान नहीं लगाया जा पाता कि सरकार गिरने के बाद कौन-कौन से दल मिलकर सरकार बनाएँगे। एक और दोष यह भी है कि मतदाताओं के लिए यह निश्चय करना कठिन हो जाता है कि वे किसके पक्ष में मतदान करें। आम नागरिक पार्टियों की भीड़ से घबरा जाता है। अतः लास्की ने बहु-दलीय व्यवस्था को सरकार के लिए घातक (िंजंस) कहा था।

दूसरी ओर, दो-दलीय व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि इसमें मतदाता परेशान नहीं होते, क्योंकि उनके समक्ष दो ही विकल्प होते हैं जिनमें से किसी एक के पक्ष में मत देकर वे स्थायी सरकार की स्थापना में सहयोग देते हैं। दूसरे, सत्तारूढ़ (बहुमत प्राप्त) दल को किसी की दया पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इसलिए वह अपनी नीतियों को दृढ़तापूर्वक लागू कर सकता है। इससे सरकार प्रभावी होती है। तीसरे, चूंकि दोनों दल जानते हैं कि उन्हें अप्रतिबद्ध (दवद-बवउउपजजमक) मतदाताओं के मत प्राप्त करने के प्रयास करने के लिए दूसरे दल के कुछ समर्थकों को भी अपनी ओर आकर्षित करना होता है इसलिए दोनों ही दल एक-दूसरे को अंकुश में रखते हैं, और दोनों में से कोई भी अतिवादी नहीं हो पाता। चौथे, लोकतन्त्र में जनमत का विशेष महत्व होता है, और दो ही दलों की उपस्थिति से सभी मुद्दों पर विवाद और विचार-विमर्श के लिए आदर्श स्थिति उपलब्ध होती है। जैसा कि लास्की का विचार है लोकतन्त्र की सफलता के लिए ‘‘दो बड़े दलों के परस्पर-विरोधी विचारों की अभिव्यक्ति से राजनीतिक व्यवस्था अधिक सक्षम होती है।‘‘

परन्तु, दो-दलीय व्यवस्था को स्थायित्व का कुछ मूल्य अवश्य चुकाना पड़ता है। इस प्रणाली का आधार है कि देश में केवल दो ही विचारधाराएँ हैं। वास्तव में किसी भी जागरूक समाज में अनेक विचार और मत होते हैं जोकि राजनीतिक विचार और चर्चा में उभर कर सामने आते हैं। यह दोदलीय व्यवस्था में सम्भव नहीं है। इस व्यवस्था में कुछ बनावटीपन दिखाई देता है। जनमत की। अभिव्यक्ति में निहित स्वार्थ उभर कर सामने आ जाते हैं। अमेरिकी लूट पद्धति (ेचवपसे ेलेजमउे) इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, दो-दलीय व्यवस्था में विधायिका की शक्तियों का ह््रास होता है, तथा मन्त्रिमण्डल की तानाशाही स्थापित हो जाती है। संसद में विशाल बहुमत से समर्थित सरकार प्रायः मनमानी करने लगती है।

बहु-दलीय एवं दो-दलीय दोनों व्यवस्थाओं के गुण-दोष का मूल्यांकन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी देशों के लिए किसी एक ही व्यवस्था की सिफारिश करना बुद्धिमत्ता नहीं होगी। प्रत्येक देश के ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ही यह निश्चय किया जा सकता है कि किस देश के लिए कौन सी व्यवस्था उपयुक्त होगी। समस्त विश्व को ब्रिटिश या अमरीकी व्यवस्था पर आधारित नहीं किया जा सकता है। किसी देश की राजनीतिक संस्कृति का विशेष महत्व होता. है। स्कैन्डिनेवियन देशों में बहु-दलीय व्यवस्थाएँ राजनीतिक संस्कृति का अंश होने के कारण सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं।