उच्चावच आकारमिति क्या होती है (Morphometry of relief features in hindi) प्रकार परिभाषा definition types

By  

(Morphometry of relief features in hindi) प्रकार परिभाषा definition types उच्चावच आकारमिति क्या होती है ?

स्थलरूपों का आकारमितिक अध्ययन
(Morphometric Study of Landforms)
वर्तमान में स्थलरूपों के विश्लेषण-हेतु गणितीय मापन विषय-वस्तु को अधिक वैज्ञानिक बनाया है। इसके अन्तर्गत क्षेत्रफल, ऊँचाई, ढाल आदि का अध्ययन उच्चतादर्शी वक्र, उच्चता-प्रवणतादर्शी वक्र, तुंगतामिति आवृत्ति वक्र, परिच्छेदिका आदि के द्वारा किया जाता है। डी स्मेट, स्ट्रालर, बालिंग, हार्टन, कोट्स, मोरिसावा, शोर्ले, किंग, श्रीव, ग्रेगरी, ब्रोस्को आदि विद्वानों ने आकारमितिक विश्लेषण को भू-आकृति विज्ञान का महत्वपूर्ण अध्ययन बताया है। प्रारम्भ में इस विधि का विरोध किया गया, परन्तु जब निष्कर्ष सत्यता के निकट पाया गया, तब सभी ने सराहना की। वर्तमान में यही अध्ययन विषय-वस्तु को जटिल बना रहा है। फलतः क्षेत्र पर्यवेक्षण अत्यन्त आवश्यक हो गया है। स्थलरूपों की जटिलता क्षेत्र-पर्यवेक्षण तथा गणितीय परिकलन द्वारा अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। गणितीय परिकलन निष्कर्ष सत्य निकालता है, तो पर्यवेक्षण इसकी पुष्टि करता है।
उच्चावच आकारमिति (Morphometry of relief features)
उच्चावच अकारमिति के अन्तर्गत किसी भी क्षेत्र का चयन करने के बाद, उसके आकार-विस्तार, ऊंचाई तथा ढाल आदि का मापन किया जाता है। क्षेत्र-पर्यवेक्षण के अध्ययन से प्राप्त आँकड़े तथा भूपत्रक (Toposheets) से गणितीय परिकलन करने के बाद इनका (ऊँचाई, ढाल, आकार, विस्तार आदि) गणितीय अध्ययन करते हैं। इनके प्रदर्शन के लिये उच्चता दर्शीवक्र, प्रवणता दर्शीवक्र, तुगंता आवृत्ति वक्र, विभिन्न प्रकार की परिच्छेदिकाओं तथा ऊँचाई-परिसर आरेख (Height-range diagram) आदि खींचकर उस क्षेत्र की प्राचीन सतह, घर्षण की मात्रा, स्थलाकृतियों के रूप, ढाल का स्वभाव या विकास आदि का अध्ययन किया जाता है। आज किसी क्षेत्र-विशेष या किसी प्रवाह बेसिन का अध्ययन मात्रात्मक किया जाने लगा है, परन्तु यदि भू-आकृति विज्ञान के पन्नों को पलटा जाय, तो स्पष्ट होता है कि इसके विकास के पीछे युगों की कहानी छिपी हुई है। समय-समय पर इसका अध्ययन तथा अध्यापन किया जाता रहा, परन्तु इसमंे बारीकियों का समावेश द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ।
1. उच्चतामिति (Hypsometry) – इसमें क्षेत्र-मापन तथा लघुमापक वाले मानचित्रों के आधार पर आँकड़ों को प्राप्त कर तथा इसके आधार पर, क्षेत्र-ऊँचाई वक्र (Area-height curve), उच्चातादर्शी वक्र (Hypsometric/graphiccurve) तथा प्रतिशत उच्चतादर्शी वक्र (The percentage Hypsometriccurve) खींचकर उस क्षेत्र के क्षेत्रफल तथा उसकी ऊँचाई के विभिन्न अनुपातों तथा सह-सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं।
(i) क्षेत्र-ऊँचाई वक्र (Area-heigt Curve) – क्षेत्र ऊंचाई वक्र के अध्ययन के लियें सर्वप्रथम दो क्रमिक समोच्च रेखाओं के मध्य का क्षेत्रफल प्लेनीमीटर की सहायता से ज्ञात कर लिया जाता है। ऊँचाई समोच्च रेखाओं के आधार पर परिकलित कर ली जाती हैं। इस प्रकार क्षेत्रफल तथा के बाद, क्षेत्रफल को क्षैतिज अक्ष के सहारे तथा ऊँचाई को ऊर्ध्वाधर अक्ष के सहारे श्ग्श् चिह्न द्वारा प्रदर्शित कर देते है। सभी आंकड़ों के अंकित हो जाने पर, सभी श्ग्श् चिह्नों को मिला लिया जाता है। कभी समोच्च रेखायें इतनी घूमकर चलती हैं कि प्लेनीमीटर उस पर काम यदि करता है तो गलत आँकड़ों का समावेश हो जाता है। इससे बचने के लिये मिलान अन्तः खण्ड विधि का प्रतिपादन किया। इनके अनुसार – मापक पर एक बराबर दूरी पर समाज खींचकर, दो समोच्च रेखाओं के मध्य अन्तः खण्डों की ऊँचाई संकलित कर उसका योग का कि क्षेत्रफल के समानुपातिक होता है। इसी तरह क्रम से सभी का क्षेत्रफल निकालकर उसका प्रतिशत ज्ञात कर लेते हैं। इसके बाद उपर्युक्त विधि के अनुसार वक्र तैयार कर लेते हैं।
(ii) उच्चतादर्शी वक्र (Hypsometric Curve) – इसमें सर्वप्रथण दो क्रमिक समोच्च रेखाओं के मध्य का क्षेत्रफल प्लेनीमीटर की सहायता से ज्ञात किया जाता है, परन्तु कभी-कभी समोच्च रेखाओं के स्वभाव के अनुसार प्लेनीमीटर से क्षेत्रफल ज्ञात करने में कठिनाई होती है तो इस दशा में मिलर की अन्तर्खण्ड विधि का सहारा लिया जाता है। इसके बाद क्षेत्र विशेष अथवा बेसिन का समस्त क्षेत्रफल सहायता से ज्ञात कर लिया जाता है। ऊँचाई समोच्च रेखाओं से प्राप्त हो जाती है। क्षेत्रफल का संचयी मान (Cumulative Value) ज्ञात कर इसको क्षैतिज रेखा के सहारे तथा ऊँचाई को लम्बवत प्रदर्शित करते हैं। इनका प्रदर्शन श्ग्श् चिह्न के द्वारा करते हैं। बाद में सभी चिह्ना को मिलाकर एक वक्र तैयार कर लिया जाता है। इसका अध्ययन भिन्न-भिन्न समय में भिन्न-भिन्न विद्वानों द्वारा किया गया है। उदाहरणार्थ – लैपरेण्ट (1883), मरे (1888), रिलो (1889), पेंक, कोसिना (1935), आर.लिक (1931-35) आदि प्रमुख हैं। इसका प्रयोग द्वीप, ज्वालामुखी-शंकु, पहाड़ी क्षेत्र आदि के आकारमितिक विश्लेषण करने के लिये किया जाता है।

tan ∅ = CI/AW
Where, AW = A/L़L2….. /2 ;Strahler, A.N.);

2. सापेक्षिक ऊँचाई प्रतिशत ज्ञात करने के लिए –
h = दो क्रमिक समोद्य रेखाओं के मध्य की ऊँचाई का औसत,
H = पठार की ऊँचाई,
3. सापेक्षिक क्षेत्रफल प्रतिशत ज्ञात करने के लिए –
a = दो क्रमिक समोच्च रेखाओं के मध्य का क्षेत्रफल,
A = सम्पूर्ण पठार का क्षेत्रफलय तथा
4. क्षेत्रफल प्लेनीमीटर की सहायता से ज्ञात किया गया है।

(iii) प्रतिशत उच्चतादर्शी वक्र (The percentage hypsometricCurve)- इसमें सर्वप्रथम दो समोच्च रेखाओं का प्रतिशत निम्न आधार पर
दो समोच्च रेखाओं के बीच का क्षेत्रफल × 100 / समस्त क्षेत्रफल = a × 100/A
ज्ञात कर लिया जाता है तथा ऊँचाई का प्रतिशत निम्न आधार पर
दो समोच्च रेखाओं के बीच की ऊँचाई × 100 / समस्त ऊँचाई = h × 100/H

ज्ञात करके, क्षैतिज अक्ष के सहारे क्षेत्र-प्रतिशत तथा लम्बवत् अक्ष के सहारे ऊँचाई प्रतिशत श्ग्श् के चिह्नों द्वारा प्रदर्शित करके, बाद में सम्पूर्ण श्ग्श् चिह्नों को मिलाकर वक्र तैयार कर लिया जाता है। इसका प्रयोग किसी क्षेत्र विशेष की अपरदन-सतह का निर्धारण करने के लिये किया जाता है। इसके प्रदर्शन से यह स्पष्ट होता है कि इसके नीचे का कितना भाग अपरदित होने को शेष है तथा ऊपर का कितना भाग अपरदित हो गया है? यदि यह प्रतिशत झ 60 रहता है तो तरुण. 60-30 प्रतिशत प्रौढ़ तथा < 30 प्रतिशत जीर्ण अपरदन की अवस्थायें होती हैं।
(iv) प्रक्षेपित एवं वास्तविक क्षेत्रफल (Projected and Real Area) – दो समोच्च रेखाओं का क्षेत्रफल प्लेनीमीटर की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं जो प्रक्षेपित क्षेत्रफल होता है। इस आधार पर निम्न ढंग से वास्तविक क्षेत्र का परिकलन कर लिया जाता है –
वास्तविक क्षेत्रफल = प्रक्षेपित क्षेत्रफल × औसत ढाल कोण का सीकेण्ट (Sec)
जबकि, औसत ढाल = CI ;in feet)/ AW  (in feet)
वास्तविक क्षेत्रफल के आधार पर घर्षण-सूचकांक निम्न ढंग से तैयार किया जाता है –
= RA – PA/RA × 100
RA = वास्तविक क्षेत्रफल, तथा
PA = प्रक्षेपित क्षेत्रफल