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मध्यजीवी काल किसे कहते हैं मध्यजीवी महाकल्प क्या है नाम लिखिए | mesozoic era in hindi names ?

मध्यजीवी महाकल्प – भू-गर्भिक समय मापनी में मध्यजीवी महाकल्प का समय 245 मिालयन वर्ष पहले से 66.4 मिलियन वर्ष पहले तक मानी गई है। पहले स्तनधारी व पक्षी इसी महाकल्प में उत्पन्न हुए। इस महाकल्प में जलवायु इतनी सूखी हो गई थी कि अण्टार्कटिका की बर्फ पिघलने लगी थी। बड़े-बड़े पशुओं का आगमन हुआ इस युग को भी तीन भागों में बांटा जाता है।
(प) टायसिक कालः– जर्मनी के तीन वलित पर्वतों के नाम पर इसका नामकरण किया गया है इसका प्रारंभ 245 मिलियन वर्ष पहले व अन्त 208 मिलियन वर्ष पहले माना गया है यहीं से मध्सजीवों महाकल्प का शुरू होता है। इस काल में सायकाड. फर्न व नकीली पत्तियों वाले शकु वनों में वृद्धि हुई। डायनासोर की उत्पत्ति इसी युग में हुई व प्रथम स्तनधारी जीव का भी आगमन हुआ। पेड़-पौधों के अभाव के कारण वायुमण्डल में ऑक्सीजन की कमी रही जिस कारण अन्य जीवों का विकास नही हो पाया। प्रायः तितली व दीमक का भी इसी काल में आगमन हुआ।
(पप) जुरासिक काल: इस कल्प की अवधि आर.एल. आर्मस्टौंग के अनुसार 6 करोड 50 लाख वर्ष है तथा यह कल्प 21 करोड वर्ष पूर्व आरंभ होकर 14 करोड़ 50 लाख वर्ष पूर्व समाप्त हुआ था। इस कल्प में पंखदार पक्षियों का विकास जो आकाश में उड़ सकती थी और डायनासोर जैसे जन्तओं का विकास अपने चरम सीमा पर था इनका शरीर वर्तमान हाथी अथवा गैंडे आदि से कई गुना बड़ा था इनमें से कुछ उरंग तो 25-30 मीटर लंबे और 10 मीटर ऊँचे थे जिनका भार 40-50 टन के लगभग हो गया था। ये रेंग कर सरकने वाले भीमकाय जीव थे।
इस कल्प की सर्वाधिक भौगोलिक महत्ता इस तथ्य में निहित है कि इस कल्प में वर्तमान लिथोस्कीयरी प्लेटो की उत्पत्ति आरंभ हुई तथा उनका सचरण आरंभ हुआ। तीन आँख वाली सफेनोडर छिपकली का भी इसी युग में आगमन हुआ। इस युग में सबसे अधिक प्रभाव डायनासोर का रहा, जो सम्पा काल में प्रभावी रहे।
(पप) किटेशियस कालः– ग्रीक शब्द क्रेटा के नाम पर इसका नामकरण हुआ जिसका अर्थ है- खड़िया। इसकी समयावधि 144 मिलियन वर्ष पहले मानी गई है। इस काल में स्थल भाग पर सागरीय आक्रमण हुआ व ब्रिटेन से रूस तक का भू-भाग पानी में डूब गया था। जलमान होने की वजह से यहाँ चुने की परतें जमा हो गई थी. नदियाँ धीमी गति से प्रवाहित होने लगी व विशाल डेल्टाओं का निर्माण हुआ। लेनेमाइड भू-हलचल हुई व अमेरिका का कार्डिलेरा पर्वत बना। जलवायु लगातार मृदु होती रही जिस वजह से वनस्पति वा आ। पैजिया का विघटन आरम्भ हुआ व अफ्रीका एवं अमेरिका के बीच समुद्र का उदगम हुआ। मोटवाना भखण्ड छोटे-छोटे भागों में विभक्त होना शुरू हो गया था। टेथीज सागर के उत्तर में स्थित लारेशिया में चिलोनिया तथा थिरप्सिडा जन्तुओं का विकास हुआ जलवाय शुष्क एवं नमी होने पर पतइट वनों का विकास हुआ, जिनमें अंजीर, मैग्नोलिया, पॉपलर मुख्य वृक्ष हैं।
 नवजीवी महाकल्प– पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास का यह अंतिम महाकल्प है। इस महाकल्य की अवधि 6 करोड 50 लाख वर्ष है अर्थात् यह महाकल्प 6 करोड़ 50 लाख वर्ष पूर्व आरंभ हुआ और अभी तक चल रहा है। पृथ्वी के धरातल पर जितनी भी भू-आकृतियाँ उपलब्ध है, उनमें से अधिकांश अर्थात् 90-95ः का जन्म एवं विकास इसी महाकल्प की देन है। पृथ्वी के भू-गर्भिक इतिहास में यह ऐसा काल है जब विभिन्न महासागरों व महाद्वीपों का विकास हुआ। विभिन्न पर्वतों जैसे हिमालय, राकीज, एंडोज, आल्पस, एलटस आदि का पूर्ण विकास भी इसी महाकल्प में हुआ तथा वर्तमान लिथौस्फियरी प्लेटों का भी पूर्ण विकास हुआ।
भू-आकृति विशेषज्ञता हेतु भू-गर्भ का ज्ञान आवश्यक
. भू-गर्भ ज्ञान प्राप्त करने की मनुष्य जिज्ञासा बहुत प्राचीन है, किन्तु भू-गर्भ का ज्ञान वर्तमान काल की देन है जिसमें, भू-भौतिकीविदों का महत्वपूर्ण योगदान है। भू-भौतिकी में भू-गर्भ संरचना, इसके भौतिक तथा रासायनिक गुणों व इसके तापमान आदि का अध्ययन किया जाता है। इतना होते हुए भी भू-आकृतिविज्ञानी व भूगोलशास्त्री भी इसके अध्ययन में पर्याप्त रुचि रखते हैं। क्यों? इसकी वजह से यह है कि भूगाल एक ऐसा शास्त्र है जो मनुष्य व उसके पर्यावरण के आपसी संबंधों (पदजमततमसंजपवेीपच इमजूममद दंद ंदक मदअपतवदउमदज) का अध्ययन करता है। वायुमण्डल, स्थलमण्डल, जलमंडल व जेवमण्डल मिलकर पथावरण विशेष का निर्माण करते हैं, इसीलिए इनका अलग-अलग अध्ययन भूगोलशास्त्र के अंतर्गत आता है। इस तरह स्थलमंडल जो पर्यावरण का अभिन्न अंग है, का अध्ययन भूगोलशास्त्री के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा जरूरी है स्थलमंडल पर तीन विभिन्न श्रेणियों की भू-आकृतियाँ विद्यमान हैं। महाद्वीप व महासागर प्रथम श्रेणी की भू-आकृतियाँ हैं। पठार, पर्वत व ग्रेबन आदि द्वितीय श्रेणी की भू-आकृतियाँ है व नदी घाटियाँ, नदी विसर्प, पानी प्रपात, समुद्री मेहराब, प्राकृतिक तटबंध, संयोजी भित्तियाँ, बालू टिब्बे, निलंबी घाटी आदि तृतीय श्रेणी की भू-आकृतियाँ हैं।
इतना ही नहीं, भूगोलशास्त्री को समस्थिति सिद्धान्त, ज्वालामुखी, भूकंप आदि विषयों का सविस्तार अध्ययन करना पड़ता है, क्योंकि ये भू-आकृति विज्ञान का अभिन्न अंग है। समस्थिति सिद्धान्त को समझने हेतु भी भू-गर्भ का समुचित ज्ञान होना जरूरी है। भूकंपों व ज्वालामुखियों की उत्पत्ति का कारण गर्भ में होने वाली हलचलें व विभिन्न तरह की उथल-पुथल हैं, इसलिए भूकप व ज्वालामुखी-कि समुचित अध्ययन भी भू-गर्भ ज्ञान के बिना नहीं हो सकता। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का अध्ययन व भी भू-गर्भ के ज्ञान के बिना नहीं हो सकती। इसी दृष्टिकोण से भू-गर्भ ज्ञान को भू-आकृति विज्ञान क अंग समझा जाता है, अभी तक किसी ऐसे कैमरे का आविष्कार नहीं हुआ जो भू-गर्भ का ठीक-ठी हमारे सामने प्रस्तुत कर सके।
उपर्युक्त सभी तथ्यों ने भू-गर्भ की जानकारी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, किन्तु भूंकपी तरंगों का भू-गर्भ की झांकी प्रस्तुत करने में अन्य साधनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण स्थान है।
भूकम्प से निकली तरंगें
जब किसी तालाब में पत्थर फेंकते हैं तो जहाँ पत्थर गिरता है, वहाँ तालाब के पानी में हलचल उत्पन्न हो जाती है व तरंगे उत्पन्न हो जाती हैं। ये तरंगे तालाब के किनारे की ओर से यात्रा करती है और किनारे पर आकर खत्म हो जाती हैं। इसी तरह भू-गर्भ में शैलों पर प्रतिबल पड़ने पर जब ये टूटती-फूटती हैं तो ऊर्जा मोचन के साथ भूकंप का उद्भव होता है जहाँ से उद्गम होता है वह भूकंप केन्द्र कहलाता है। उदगम केन्द्र के ठीक ऊपर भतल पर जो बिन्दु होता है, उसे अधिकेन्द्र कहते हैं। भूकंपी तरंगें भी से यात्रा करता है और भूकंप मापी इनको अंकित करता है।
स्वेस के अनुसार भूगर्भ का वर्णन
भूपटल का ऊपरी भाग अवसाद (sedimemts) से निर्मित परतदार शैलों का बना है, जिसकी गहराई तथा घनत्व बहुत कम है। यह परत रवेदार शैल खासकर सिलिकेट पदार्थों की बनी है, जिसमें फेल्सपार तथा अभ्रक आदि खनिजों की बहुतायत होती है। इस परत के भी दो भाग किये गये हैं। प्रथम परत हलके सिलीकेट पदार्थों की बनी है। इस परत के नीचे स्वेस ने तीन परतों की स्थिति मानी हैरू
1. सियाल (sial) – इस परत की रचना सिलिका व एल्यूमिनियत से हुई है इसी के आधार पर इसे सियाल कहते हैं। इस परत का औसत घनत्व 2.9 है तथा इसी औसत गहराई 50 से 300 किलोमीटर है।
2. सीमा (sima) – सियाल के नीचे दूसरी परत सीमा की है। इसकी रचना बेसाल्ट आग्नेय शैलों से हुई है। यहीं से ज्वालामुखी के उदगार के समय गर्म एवं तरल लावा बाहर आता है। रासायनिक बनावट के दृष्टिकोण से इनमें सिलिका तथा मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। इसी कारण इस परत की सीमा कहते है। इसका औसत घनत्व 2.9 से 4.7 है तथा इसकी गइराई 1000 से 2000 किलोमीटर तक है।
3. निफे (nife)- पृथ्वी का वह अंतिम परत जिसकी रचना निकल और फेरियम से हुई है निफे कहलाती है। इसका घनत्व अधिक (11) है। इसका नामकरण निकल के प्रथम दो अक्षम (ni) तथा फेरियम के प्रथम दो अक्षम (fe) को लेकर श्निफेश् किया गया है। इसकी व्यास 4300 मील (6880 किलोमीटर) के लगभग है।
भू-गर्भीय ताप की स्थिति
भू-गर्भ में गहराई के साथ तापमान में बढ़ोत्तरी होती जाती है जो भूतापीय प्रवणता कहलाती है भू-विज्ञानियों के अनुसार भूतापीय प्रवणता सर्वत्र एकसमान नहीं हैं। हकीकत में भूतापीय प्रवणता 15° से 75° से प्रति कि.मी. तक रहती है। साधारणतः महासागरीय भू-पृष्ठ के नीचे भूतापीय प्रवणता महाद्वीपीय भू-पृष्ठ से अधिक है। पृथ्वी के क्रोड में 5000° से. या इससे ज्यादा तापमान का अनुमान लगाया गया है। संसार के ज्वालामुखी प्रदेशों में भू-गर्भ में कम गहराई पर भी पर्याप्त उच्च तापमान मिलता है जिसका कारण भू-गर्भ में ऊपर उठा हुआ तप्त मैग्मा है। इसीलिए ऐसे क्षेत्रों में भू-गर्भ के ऊष्मा का प्रयोग करना अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पर्याप्त आसान है। यही वजह है कि आइसलैंड, इटली व संयुक्त राज्य के पश्चिमी राज्यों में जहाँ ज्वालामुखी उद्गार के कारण भूतल के निकट ही पर्याप्त ऊष्मा मिलती है, जिसका प्रयोग बिजली बनाने में किया जाता है, जिससे विभिन्न उद्योग चलाए जाते हैं।
पथ्वी के आंतरिक भाग की तापीय स्थिति निम्नलिखित रूप में पायी जाती है।
(प) 48 किमी की गहराई पर लगभग 1100° सेल्सियस मिलता है।
(पप) 400 तथा 700 किमी की गहराई पर क्रमशः लगभग 1500° सेल्सियस तथा 1900° सेल्सियस तापमान पाया जाता है।
(पपप) मेटल द्रवित तथा अंतरतम भाग के मध्यवर्ती भाग में लगभग 2900 किमी की गहराई पर लगभग 4700° सेल्सियस तापमान पाया जाता है।
(पअ) बाहरी द्रवित भूक्रोड तथा आंतरिक क्रोड में लगभग 434700° सेल्सियस तापमान मिलता है।
महत्वपूर्ण प्रश्न
दीर्घउत्तरीय प्रश्न
1. पृथ्वी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विवरण देते हुए भूकम्पीय तरंगों की जानकारी दीजिए
2. पृथ्वी के भू-गर्भिक समय के अंतराल हुई विभिन्न खोज का वर्णन कीजिए।
लघुउत्तरीय प्रश्न
1. पृथ्वी के आयु निर्धारण कि विभिन्न प्रमाण बताईए।
2. प्राकेम्ब्रियन महाकल्प से क्या तात्पर्य है?
3. पुराजीवी महाकल्प पर टिप्पणी लिखिए।
4. केम्ब्रियन काल पर टिप्पणी लिखिए।
5. कार्बोनीफेरस काल पर टिप्पणी लिखिए।
6. क्रिटेशियस काल पर टिप्पणी लिखिए।
7. भूकंपीय तरंगों से क्या तात्पर्य है?
8. भू-गर्भीय ताप की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1. पृथ्वी और अन्य ग्रहों की रचना के संबंध में आधुनिक सिद्धांत किस पर आधारित है-
(अ) कोपरनिकस (ब) आर्यभट्ट (स) यांगत्से (द) रुजवेल्ट
2. पृथ्वी के अन्दर आंतरिक कोड कितना मोटा है-
(अ) 2000 किमी (ब) 1370 किमी (स) 2020 किमी (द) 2080 किमी
3. यूरेनियम के बाहर आने वाली शक्ति की खोज-
(अ) हेनरी (ब) लासेल (स) पावेल (द) वुडसन
4. पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास का अंतिम महाकल्प
(अ) क्रिटोशियस (ब) पुराजीवी (स) नवजीवी (द) सभी
5. भूपटल का ऊपरी भाग अवसाद से निर्मित किन चट्टानों का बना है-
(अ) आग्नेय (ब) परतदार (स) पुरानी (द) नवीन
उत्तरः 1.(अ), 2 (ब), 3.(अ),4.(स), 5.(ब)