पादप की वृद्धि का मापन क्या है , measurement of growth in plants in hindi , सीधी विधि (Direct method)

पढ़िए पादप की वृद्धि का मापन क्या है , measurement of growth in plants in hindi , सीधी विधि (Direct method) ?

वृद्धि का मापन (Measurement of growth)

वृद्धि को अनेक रूपों में मापा जा सकता है। विभिन्न अंगों के अनुसार इसे लंबाई, चौड़ाई, क्षेत्रफल, आयतन अथवा शुष्क भार में बढ़त के रूप में मापा जा सकता है। मूल एवं प्ररोह की प्राथमिक वृद्धि को लंबाई में बढ़त के रूप में मापा जा सकता है। पत्तियों में वृद्धि मापने के लिए पृष्ठ क्षेत्रफल लेना बेहतर होता है। कुछ परिस्थितियों (जैसे कैलस) में आयतन अथवा भार में परिवर्तन को देखा जा सकता है।

वृद्धि = V2-V1      V2 = t समय के बाद आयतन

V1 = प्रारंभिक आयतन

वृद्धि दर = V2 –V1      W2 = t समय के बाद वर्तमान भार

वृद्धि दर = W2 – W1    W1 = प्रारंभिक भार

पत्तियों के लिए

वृद्धि दर = S2-S1/t  S2 = t समय के बाद पृष्ठ क्षेत्रफल

S1  = प्रारंभिक पृष्ठ क्षेत्रफल

प्राथमिक मूल व तने में वृद्धि के लिए

वृद्धि दर = L2-L1/t   L2 = t समय के बाद लम्बाई

L1 = प्रारंभिक लम्बार्ड

भार में परिवर्तन के रूप में भी वृद्धि को मापा जाता है तथा काफी हद तक सही होता है। सामान्यतः शुष्क भार में बढ़त ही मापी जाती है परन्तु कभी-कभी इसमें समस्या भी होती है। बीजों के अंकुरण के समय वृद्धि के बिना ही बीजों के ताजा भार में जल अवशोषण के कारण बढ़त होती है तथा नवोद्भिद बनने के समय बीज में निहित संचित भोजन के उपयोग के कारण भार में कम बढ़त होती है परन्तु नवोद्भिद की लम्बाई में काफी बढ़त होती है ।

पादपों में वृद्धि यदि केवल ताजा भार (fresh weight) के रूप में मापी जावे तो यह भ्रामक होगा चूंकि पादप में जल की मात्रा (water content वातावरणीय परिस्थितियों में परिवर्तन से तेजी से परिवर्तित होती रहती है। इसी प्रकार केवल लम्बाई मापकर भी वृद्धि को नहीं आंका जा सकता है। सामान्यतः प्राथमिक वृद्धि को पादप लम्बाई में बढ़त के रूप में मापा जाता है।

पादप की लम्बाई के मापन के लिए निम्न विधियाँ प्रयुक्त की जाती है:-

(1) सीधी विधि (Direct method)

पादप अथवा पादप अंग जैसे स्तम्भ एवं मूल की लम्बाई सीधे ही स्केल के द्वारा एक विशेष अन्तराल में नाप कर ज्ञात की जा सकती है ।

  1. क्षैतिज सूक्ष्मदर्शी (Horizontal microscope)

पादप की लम्बाई में वृद्धि नापने के लिए क्षैतिज सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग किया जाता है। एक क्षैतिज सूक्ष्मदर्शी को बढ़ते हुए पादप के सामने लगा दिया जाता है। इस सूक्ष्मदर्शी को पादप के शीर्ष पर किसी बिन्दु पर केन्द्रित कर दिया जाता है। अब कुछ समय बाद सूक्ष्मदर्शी को ऊपर की ओर खिसका कर फिर से उस बिन्दु को केन्द्रित किया जाता है। सूक्ष्मदर्शी द्वारा ऊपर की ओर तय की गयी दूरी ही पादप की लम्बाई में वास्तविक वृद्धि होती है।

  1. वृद्धिमापी (Auxanometers)

वृद्धि नापने वाले उपकरण को वृद्धिमापी (auxanometers) कहते हैं। पादप वृद्धि नापने के लिए विभिन्न प्रकार के वृद्धिमापियों का निर्माण किया गया है।

(i) आर्क वृद्धिमापी अथवा आर्क सूचक (Arc auxanometer or arc indicator)

आर्क वृद्धिमापी में रेशम के धागे के एक सिरे को पादप स्तम्भ के शीर्ष पर बाँध दिया जाता है। इस धागे को घिरीं पर भार द्वारा लटका दिया जाता है। इससे यह धागा खिंचा रहता है। घिर्री का सम्बन्ध एक संकेतक से होता है जो अंशांकित आर्क पर खिसकता है। पादप की लम्बाई बढ़ने से धागे पर लगा भार उसे नीचे खींचता है। इससे घिरी में चलन होता है तथा संकेतक भी अंशांकित आर्क पर घूमता है। संकेतक का चलन स्केल द्वारा पढ़ा जा सकता है। पादप की वास्तविक लम्बाई निम्न प्रकार नापी जा सकती है।

लम्बाई में वास्तविक वृद्धि  = संकेतक द्वारा तय की गयी दूरी x घिरी का व्यास घिरी के मध्य से संकेतक की लम्बाई

(ii) फेफर का वृद्धिमापी ( Pfeffer’s auxanometer)- इस उपकरण में दो घिरीं अथवा पहिये होते हैं। एक छोटा एवं एक बड़ा । छोटा पहिया बड़े पहिये के मध्य अक्ष पर एक तरफ जुड़ा रहता है। रेशम की डोर के एक सिरे से उस पादप के शीर्ष को बांध देते हैं जिसकी वृद्धि नापनी होती है। अब इस धागे को छोटे पहिये पर लटका कर इसमें एक भार लटका दिया जाता है। जिससे कि यह खिंचा रहता है। इसी प्रकार बड़े पहिये पर भी धागे को लटका कर उसके दोनों सिरों पर भार लटका दिया जाता है। परिक्रामी ढोल (revolving drum) पर लगे धूम पत्र (smoked paper) को छूते हुए एक संकेतक बड़े पहिए पर लगे धागे से जोड़ दिया जाता है। एक घड़ी के द्वारा पराक्रमी, ढोल का घूर्णन (एक घूर्णन प्रति घण्टा ) कराया जाता है।

पादप की लम्बाई में वृद्धि होने पर दोनों पहियों का चलन नीचे की ओर होता है। संकेतक ऊपर की ओर इस प्रकार गति करता है कि घूम पत्र पर सर्पिल (spiral) रेखाएँ बनती जाती हैं। दो पास की रेखाओं के मध्य लम्बवत् दूरी प्रति घन्टे पादप में वृद्धि को दर्शाती है।

पादप वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting the growth of plants)

पादप वृद्धि अनेक बाह्य एवं आंतरिक कारकों से प्रभावित होती है। इन कारकों का वर्णन निम्नलिखित है।

  1. बाह्य कारक (External factors)
  2. प्रकाश (Light)

प्रकाश वृद्धि को चार प्रकार से प्रभावित करता है:-

(i) प्रकाश तीव्रता (Light intensity):- उच्च प्रकाश तीव्रता से पादप वृद्धि मन्द हो जाती है। पर्व बौने, पत्तियाँ छोटी एवं अधिचर्म पर रोम विकसित हो जाते हैं। क्लोरोफिल का बनना भी प्रकाश पर निर्भर करता है। बहुत कम तीव्रता में भी वृद्धि कम हो जाता है।

(ii) प्रकाश गुणवत्ता (Light quality):- पराबैंगनी प्रकाश से एवं सुदूर लाल प्रकाश से लम्बी तरंगदैर्ध्य का पादप पर प्रतिकूल प्रभाव होता है। बैंगनी प्रकाश से पर्व की लम्बाई बढ़ जाती है। लाल प्रकाश वृद्धि को बढ़ाता है जबकि हरा प्रकाश पत्तियों की वृद्धि को संदमित करता है। पादपों में उपस्थित वर्णक एक निश्चित तरंगदैर्ध्य को ही अवशोषित करते हैं।

(ii) प्रकाश काल (Light duration):- प्रकाश काल पादपों की जनन प्रावस्था अथवा पुष्पन को प्रभावित करता है। इसे दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। गार्नर एवं एलार्ड (Garner and Allard 1920) ने दीप्तिकालिता शब्द का सर्वप्रथम प्रतिपादन किया। उनके अनुसार पादप तीन प्रकार के होते हैं।

(a) दीर्घ दिवसीय पादप (Long day plants) :- इन पादपों में पुष्पन को प्रेरित करने के लिए क्रांतिक काल (critical period) से अधिक 2 – 14 घण्टे के दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है। उदाहरण- बाजरा, मूली, पालक इत्यादि । (b) लघु दिवसीय पादप (Short day plants):- इन पादपों में पुष्पन को प्रेरित करने के लिए क्रांतिक काल से कम सामान्यतः 8-10 घन्टे के दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है। उदाहरण- जैन्थियम (Xanthiumn), क्राइसेन्थिमम Chrysanthemum)। इन पादपों में सतत अन्धकार काल की आवश्यकता होती है। अन्धकार काल में सूक्ष्म प्रकाश ही किरण ही पुष्पन में व्यवधान डाल सकती है।

(c) दिवस उदासीन पादप (Day neutral plants) :- इन पादपों में दीप्तिकाल का कोई प्रभाव नहीं होता है। इनमें वर्ष होता है। उदाहरण- कैथरेन्थस रोजियस (Catharanthus roseus), टमाटर, कपास इत्यादि ।

पूर्ण अन्धकार काल में पादप वृद्धि रूक जाती है तथा पर्णहरित निर्माण के संदमन से पत्तियाँ पीली, स्तम्भ लम्बा, पतला एवं दुर्बल हो जाता है। इस प्रकार के पादपों को पांडुरित पादप (etiolated plants) कहते हैं तथा इस क्रिया को पांडुरिता (etiolation) कहते हैं।

(iv) प्रकाश की दिशा (Light direction) :- पादप अंग प्रकाश की दिशा / कोण के अनुसार अभिविन्यासित (oriented) होते हैं तथा वक्रण दर्शाते हैं। इस क्रिया को प्रकाश अनुवर्तन वक्रण (phototropic curvature) कहते हैं ।

  1. तापमान (Temperature)

विभिन्न क्षेत्रों में पाये जाने वाले पादपों को वृद्धि के लिए भिन्न-भिन्न तापमान की आवश्यकता होती है। तापमान का वृद्धि पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। अनुकूलतम तापमान 28 से 35°C पर अधिकतम वृद्धि होती है। उच्च ताप पर ऊष्मा के प्रभाव से एवं 0°C से कम ताप पर जल के हिमकरण से पादप कोशिकाओं की मृत्यु हो जाती है। परन्तु कुछ पादपों में | पुष्पन के लिए पर्याप्त दीप्तिकाल के अलावा भी निम्न ताप की आवश्यकता होती है। इन पादपों के प्रारम्भिक जीवन काल में निम्न ताप उपचार के फलस्वरूप पुष्पन होता है। पादपों में इस क्रिया को बसन्तीकरण ( vernalisation) कहते हैं। उदाहरण- गेहूँ, राई (rye), चावल इत्यादि ।

  1. मृदा की प्रकृति (Nature of soil)

मृदा की प्रकृति में मृदा कणों का आकार, वातन, मृदा में उपस्थिति लवणों की मात्रा एवं प्रकृति तथा मृदा का pH शामिल है। मृदा अधिक अम्लीय अथवा क्षारीय नहीं होनी चाहिये। उपयुक्त pH पर पादप वृद्धि अच्छी होती है। मृदा वातन पादप की जड़ों की वृद्धि तथा लवणों के अवशोषण को प्रभावित करता है इससे वृद्धि प्रभावित होती है। मृदा कणों का आकार वातन तथा मृदा में जल की उपलब्धता को प्रभावित करता है। रेतीली मृदा में वातन अधिक होता है परन्तु जल की उपलब्धता कम हो जाती है। मृदा में कार्बनिक पदार्थ ह्यूमस (humus) से जल उपलब्धता बढ़ जाती है। पादपों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक लवण भी यदि अधिक मात्रा में हो तो पादप के लिए हानिकारक होते हैं। इसके अतिरिक्त मृदा में हानिकारक भारी धातु यथा कापर, लेड, पारा इत्यादि पादप के लिए आविषकारी (toxic) होती हैं।

मृदा में विभिन्न सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति पादप वृद्धि को प्रभावित करती है। कुछ सूक्ष्म जीव मृदा से लवणों के अवशोषण में सहायक होते हैं तथा कुछ पादपों में रोग अथवा नुकसान पहुँचाते हैं जैसे सूत्र कृमि (nematodes), कवक, जीवाणु इत्यादि ।

  1. जैविक कारक (Biotic factors)

जैविक कारकों में मृदा में उपस्थित जीव, मनुष्य, जंतु एवं अन्य पादप शामिल किये जाते हैं। मनुष्य अपने क्रियाकलापों पादप वृद्धि को प्रभावित करते हैं। जंतु कुछ पादपों की पत्तियों को भोजन के रूप में चर जाते हैं इससे वृद्धि प्रभावित होती है। पादप के आस-पास उगने वाले पादप पोषक तत्वों के लिए स्पर्धा करते हैं एवं पादप वृद्धि को विपरीत रूप से प्रभावित करते हैं।

  1. प्रदूषक तत्व (Pollutants)

विभिन्न कृषि रसायन जैसे कीटनाशक (insecticide) पीड़कनाशी (pesticides), कवक नाशी (fungicides ) खरपतवार नाशी (weedicides) इत्यादि का छिड़काव कृषि पादपों को इन विभिन्न कारकों से बचाव के लिए किया जाता है। परन्तु ये ही बाद में पादप वृद्धि को विपरीत रूप में प्रभावित करते हैं। विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न विभिन्न प्रदूषक गैसें जैसे CO, NO2 H2S. SO2 N2 O, इत्यादि पादपों को वृद्धि को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। ऑटोमोबाइल वाहनों से निकली गैसे हाइड्रोकार्बन के साथ मिल कर प्रकाश रासायनिक घूम (photochemical smog) का कारक होते हैं जो पादप वृद्धि के लिए हानिकारक हैं। स्वयं पादपों भी कुछ वाष्पशील पदार्थों का स्रवण करते हैं जो अन्य पादपों को हानि पहुँचाते हैं।

  1. आंतरिक कारक (Internal factors)
  2. जीनी संरचना (Genetic makeup)

पादप के केन्द्रक में जीन होते हैं जिनमें पादप की विभिन्न क्रियाओं, वृद्धि एवं परिवर्धन से सम्बन्धित जानकारी कोडित होती है उसी के अनुसार पादप में विभिन्न एन्जाइम व अन्य जैव संश्लेषण अभिक्रियाओं के माध्यम से पादप वृद्धि प्रभावित होती है।

  1. कार्यिकी नियंत्रण (Physiological control)

पादपों में उपस्थित विभिन्न हार्मोन यथा आक्सिन, सायटोकाइनिन, जिबरेलिन एवं इथाइलीन इत्यादि के संतुलन के आ र पर वृद्धि प्रभावित होती है। विभिन्न अंगों में तथा अलग-अलग समय पर हार्मोन की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। विभिन्न एन्जाइम की सक्रियता को प्रभावित करते हैं जिससे वृद्धि प्रभावित होती है। इनके बारे में आगे विस्तार से दिया गया है। विटामिन विभिन्न उपापचयी अभिक्रियाओं में सहकारक के रूप में भाग लेते हैं। उपापचयी एवं वृद्धि संदमक ( inhibitors) की उपस्थिति से उपापचयी क्रियाएं प्रभावित होती हैं तथा वृद्धि दर कम हो जाती है।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न

(Important Questions)

रिक्त स्थान भरो / सत्य या असत्य लिखो / एक शब्द दें (Fill in the Blanks/Write True or False/Give One Word) .

1.पादप की लम्बाई में वृद्धि ………….. वृद्धि होती है।(प्राथमिक / द्वितीयक)

An increase in length of plant is…………………….. growth. (Primary/secondary)

  1. कोशिकाओं में विवर्धन कोशिका भित्ति के……………………… प्रसार के कारण होती है।

Enlargment of cells takes place due to the………………. expansion of cell walls.

  1. कोशिका विवर्धन में ऊर्जा का …………… होता है।.

In cell enlargement energy is…………….

  1. पत्तियों की वृद्धि का मापन ……… के रूप में करते हैं।

The growth of leaves is measured in the form of.

  1. कोशिका विभाजन के लिए कौन सा क्षेत्र विशिष्ट होता है?

Which region is specific for cell division?

  1. पादप वृद्धि का समय के विपरीत ग्राफ कैसा बनता है?.

Which type of graph is formed when growth is plotted against time?

  1. लॉग अथवा अधिकतम वृद्धिकाल में वृद्धि किस प्रकार की होती है ?

In which type of growth is found in log or maximum growth period?

  1. बीजांकुरण की प्रारंभिक अवस्थाओं में भार किस कारण बढ़ता है?

Why the weight increases in the initial stages of seed germination?

  1. परिवर्धन के दौरान एक अवस्था को छोड़कर आगे की ओर वृद्धि हो सकती है।

During development, further growth continues without any one stage.    (True/false)

  1. पादपों की लंबाई में सर्वाधिक वृद्धि विभज्योतकी क्षेत्र में होती है।

Maximum increase in the length of plants occurs in the meristematic zone.   (True/flase)

  1. कोशिका परिपक्वन के दौरान भी कोशिका का आकार नहीं बढ़ता है।

There is no increase in size of the cells during cell maturation.     (True/flase)

  1. पादपों की आपस में स्पर्धा का वृद्धि पर कोई प्रभाव नहीं होता ।

These is no effect of competition of plants on growth.       (True/flase)

  1. प्रकाश के प्रति अनुक्रिया में फायटोक्रोम की मुख्य भूमिका होती है।

Phytochrome play an important role in response to light.   (True/flase)

उत्तर (Answer )

  1. प्राथमिक (primary) 2. अनुत्क्रमणीय ( reversible) 3. व्यय (consume) 4. क्षेत्रफल ( area ) 5. विभज्योतकी क्षेत्र (meristematic zone) 6. सिग्मॉइड (sigmoid) 7. चरघातांकी (exponential) 8. जल अवशोषण (water absorption) 9. असत्य (False) 10. सत्य (True) 11. सत्य (True) 12. असत्य (False ) 13. सत्य (True )

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

  1. तने की मोटाई में वृद्धि किस विभज्योतक से होती है ?

Which meristem causes increase in girth of the stem?

  1. वृद्धि की किस प्रावस्था में कोशिकाएँ स्थायी आकृति एवं प्रकार प्राप्त करती हैं ?

In which phase of growth, the cells acquire permanent shapes and forms?

  1. वृद्धि वक्र की परिपक्व प्रावस्था क्या है?

What is maturation phase of growth curve?

  1. पादप वृद्धि मापने में किस यंत्र का प्रयोग होता है?

Which instrument is used to measure plant growth?

  1. तीन वृद्धि नियंत्रकों के नाम लिखो ।

Give the name of three of growth controllers.

  1. सिमाइड वक्र बनाकर इसके चरणों को नामांकित कीजिये ।

Draw sigmoid serve and lebel its steps.

उत्तर (Answers)

  1. पार्श्व विभज्योतक । (Intercalary or lateral meristem)
  2. कोशिका विभेदन। (Cell differentiation)
  3. पादप की परिपक्व प्रावस्था में, कोशिकाओं की शारीरिक प्रक्रियाएँ धीमी हो जाती हैं तथा पादप जीर्णता की ओर बढने लगता है।

The plant reaches maturity, hence, the physiological activity of cells also slows down and plant begins to senesce.

  1. ऑक्सेनोमीटर | (Auxanometer)
  2. ऑक्सिन, जिब्रेलिन, साइटोकाइनिन | (Auxin, Gibberellin)
  3. अध्याय देखें

निबन्धात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

  1. पादपों में वृद्धि प्रावस्थाओं के बारे में लिखें ।

Write about growth phases in plants.

  1. पादपों में वृद्धि किस प्रकार मापी जाती है। इसकी दो विधियों का वर्णन करें।

How the growth of plants can be measured? Describe two methods.

3.पादप वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें ।

Describe the factors affecting the plant growth.

  1. निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये-

Write short notes on following-

(i) आर्क वृद्धिमापी (Arc auxanometer) (ii) फेफर्स वृद्धिमापक (Pfeffers auxanometer)

(iii) वृद्धिमापक (Auxanometer)

(iv) सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid curve)

(v) वृद्धि पर प्रकाश का प्रभाव (Effect of light on growth)

(vi) वृद्धि पर तापमान का प्रभाव (Effect of temperature on growth)

(vii) कोशिका विवर्धन (Cell enlargment)

(viii) वृद्धि पर मृदा की प्रकृति का प्रभाव (Effect of nature of soil on growth)