उदारीकरण किसे कहते है | उदारीकरण की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब liberalization in hindi meaning

By   February 26, 2021

liberalization in hindi meaning definition उदारीकरण किसे कहते है | उदारीकरण की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब ?

उदारीकरण और विनियमों में ढील : एक प्रक्रिया जो निवेश, उत्पादन, मूल्यों, ब्याज दरों, ऋण, विदेशी मुद्रा पर से नियंत्रण को समाप्त कर देता है अथवा हटा देता है और बाजार की शक्तियों के अनुरूप भागीदारों को प्रवेश की छूट देता है।

शब्दावली
मूल वस्तुएँ ः यह औद्योगिक उत्पादन में प्रमुख अथवा मूल आदान हैं जैसे उर्वरक और भारी रसायन, सीमेंट, मूल धातु, विद्युत और खनन ।
अर्धनिर्मित वस्तुएँ ः यह ऐसे कच्चे माल/आदान हैं जिनका उत्पादन की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के बीच में प्रयोग किया जाता है जैसे लकड़ी और कॉर्क, अखबारी कागज (न्यूजप्रिण्ट), चमड़ा, रबर उत्पाद, पेट्रोलियम उत्पाद, स्टोरेज बैटरी, बोल्ट, नट, कील इत्यादि।
पूँजीगत वस्तुएँ ः इसमें मुख्य रूप से मशीनें और उपकरण और भारी व्यावसायिक वाहन सम्मिलित हैं।
टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ ः इसमें व्हाइट गुड्स, सवारी कार, फर्नीचर और फिक्सचर्स (जुड़नार) इत्यादि हैं जिनका उपभोक्ता सीधे उपयोग करते हैं तथा ये टिकाऊ होते हैं।
गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ ः इसमें भी खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ (बीवरेज), जूते-चप्पल, दवाइयाँ, काँच के उत्पाद, कॉस्मेटिक इत्यादि जिनका उपभोक्ता सीधे उपयोग करते हैं। किंतु अपेक्षाकृत कम टिकाऊ होते हैं।
निवेश ः निवेश व्यय का मूल संरचनात्मक संघटक होता है क्योंकि यह भावी उत्पादन का आधार तैयार करता है। इसमें कारखाना, मशीनों, उपकरणों, आवासों और कच्चे माल के भण्डार सम्मिलित होते हैं।
उत्पादकता ः उत्पादकता, घटक आदानों (मुख्यतः भूमि, श्रमिक और पूँजी) की दी गई मात्रा से उत्पादित उत्पादन की मात्रा का पैमाना है।

उद्देश्य
खंड 6 की इस इकाई में, हम भारतीय उद्योगों में निवेश और उत्पादकता वृद्धि की प्रक्रिया को समझने के लिए ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ की अवधारणा और घटना का विश्लेषण करेंगे। यह अवधारणा आर्थिक सिद्धांत एवं व्यवहारिक विश्लेषण में एक अहम भूमिका अदा करती है, इस इकाई के अध्ययन के उपरांत आप:

ऽ औद्योगिक क्षेत्र के लिए कार्य निष्पादन सूचक के रूप में क्षमता (अथवा संभावित उत्पादन) और ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ जैसी अवधारणाओं की प्रासंगिकता समझ सकेंगे;
ऽ ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ के उपलब्ध माप के संबंध में जान सकेंगे;
ऽ भारतीय उद्योगों में क्षमता के निम्न उपयोग की समस्या की प्रकृति समझ सकेंगे;
ऽ भारतीय उद्योगों में ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ दर पर हाल के औद्योगिक सुधारों का प्रभाव समझ पाएँगे; और
ऽ भारतीय उद्योगों में क्षमता के निम्न उपयोग की समस्या के समाधान के लिए सुझाई गई नीतियों को समझ सकेंगे।

प्रस्तावना
औद्योगिक उत्पादकता में तीव्र वृद्धि को इस समय विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विकास और संरचनात्मक रूपांतरण में अनिवार्य तत्व के रूप में स्वीकार किया जाता है। औद्योगिक उत्पादकता औद्योगिक क्षेत्र में अभिनियोजित घटक आदानों (मुख्य रूप से भूमि, श्रम और पूँजी) की दी गई मात्रा से उत्पादन किए गए निर्गत की मात्रा मापता है। हालाँकि उत्पादकता में वृद्धि एक व्यापक अवधारणा है जो स्वयं में अनेक कारकों, जैसे विद्यमान क्षमताओं का बेहतर उपयोग, कार्य करते हुए सीखने, श्रमिक की बढ़ी हुई कार्य कुशलता इत्यादि, के प्रभाव को समेटता है। इस प्रकार, क्षमता के उपयोग उत्पादकता में वृद्धि के सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारकों में से एक है।

यद्यपि भारत ने सामान्यतया यथोचित समष्टि (मैक्रो) आर्थिक नीतियों का अनुसरण किया है, इसके दीर्घकालीन विकास का रिकार्ड अत्यन्त ही असंतोषप्रद रहा है। वर्ष 1960 से इसके प्रति व्यक्ति आय में 2 प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हो रही है। लगभग चार दशकों तक आर्थिक निर्णयों में सरकार के व्यापक हस्तक्षेप, इसके साथ ही अन्तर्मुखी व्यापार और निवेश नीतियों के परिणाम स्वरूप विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक क्षमता का निर्माण हुआ और निवेश पर प्रतिलाभ की दर कम हुई। वर्ष 1950 से 1980 के अंत तक 30 वर्षों की अवधि के दौरान औद्योगिक क्षेत्र के लिए यौगिक वृद्धि-दर मात्र 5.2 प्रतिशत थी।

1980 के दशक के दौरान औद्योगिक उत्पादन और उत्पादकता में कुछ सुधार दिखाई दिया और इस दशक के दौरान औद्योगिक उत्पादन में यौगिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत रही। इस परिवर्तन का मूल कारण नीतियों में परिवर्तन था जिसमें कुछ हद तक नियमों में ढील दी गई थी और बाजारोन्मुखी रूझान बढ़ा था। तथापि, 1991 के बाद से ही भारतीय प्राधिकारियों ने व्यापक सरकारी हस्तक्षेप को कम करके अर्थव्यवस्था को उदार बनाने का सुनियोजित प्रयास किया। उदारीकरण के लिए आरम्भिक प्रेरणा 1990-91 के गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से प्राप्त हुई। इस संकट की संरचनात्मक सुधार शुरू करने के लिए अवसर में बदल दिया गया जिसकी जड़ें भारत की विकास रणनीति के मौलिक पुनर्चिंतन में ही जड़ित थी? संरचनात्मक सुधार प्रारम्भ में औद्योगिक क्षेत्र और व्यापार उदारीकरण पर केन्द्रित रहा। इसका लक्ष्य विशेषकर निवेश और आयात लाइसेंस की जरूरतों को समाप्त कर देना था। उदारीकरण प्रक्रिया ने औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश तथा वृद्धि संबंधी बाधाओं को समाप्त कर और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देकर उनके काम करने के परिवेश में आमूल परिवर्तन कर दिया। प्रतिस्पर्धा और कार्यकुशलता में वृद्धि से यह आशा हुई कि नियोजित विकास के पहले के वर्षों में जो अप्रयुक्त उत्पादन क्षमता सृजित की गई थी वह या तो नहीं रह जाएगी अथवा इसमें भारी कमी होगी।

यद्यपि कि 1990 में शुरू किए गए सुधारों की उपलब्धियाँ काफी रही हैं फिर भी ये सुधार किसी भी तरह से पूर्ण नहीं हैं तथा कई कारक हैं जिनके कारण औद्योगिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश नहीं हुआ और उत्पादक क्षमता का बेहतर उपयोग नहीं हो सका जो कि भारत में सतत् तीव्र विकास के लिए एक पूर्व शर्त है। इस इकाई में, हम भारतीय औद्योगिक क्षेत्र के ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ रिकार्ड तथा कार्य निष्पादन के इस सूचक पर विभिन्न विकास रणनीतियों के प्रभाव की चर्चा इस दृष्टि से करेंगे कि बचे रह गए संरचनात्मक बाधाओं की पहचान कर सकें। तथापि, पहले औद्योगिक क्षेत्र के कार्यनिष्पादन को समझने में इस सूचक के महत्त्व को जानना उपयोगी होगा।

सारांश
भारत में उदारीकारण की प्रक्रिया शुरू हुए एक दशक बीत चुका है और इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए बाजार की शक्तियों पर छोड़ना था। इस प्रक्रिया का सबसे अधिक प्रभाव औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ा था और इन बाजारोन्मुखी सुधारों का बल प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर था ताकि इस क्षेत्र में अप्रयुक्त उत्पादक क्षमता को या तो बिल्कुल समाप्त कर दिया जाए अथवा इसमें भारी कमी की जाए। संरचनात्मक समायोजन के पहले दो वर्षों को छोड़कर, ये सुधार औद्योगिक वृद्धि को पुनः जीवित करने में सफल रहे तथा इसके दायरे में विभिन्न प्रकार के उद्योग सम्मिलित थे। यद्यपि कि औद्योगिक क्षेत्र पर सुधारों का आरम्भिक प्रभाव सकारात्मक था, इस क्षेत्र में वित्त वर्ष 1997-98 से अनेक उतार-चढ़ाव हुए हैं, जिससे सुधार प्रक्रिया की सतत्ता पर गंभीर संदेह पैदा हो जाता है।

वर्ष 1993-97 के पुनरुद्धार चरण के दौरान, क्षमता का काफी निर्माण किया गया और इस विषय पर नवीनतम अनुभवजन्य अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 1997-98 में निजी कारपोरेट क्षेत्र में कुल अधिष्ठापित क्षमता का करीब 22 प्रतिशत अप्रयुक्त था। यद्यपि नियोजित विकास के अनेक दशकों में औद्योगिक क्षेत्र में ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ में क्रमशः सुधार हुआ हैं, जिस सीमा तक क्षमता अप्रयुक्त रहती है वह संसाधनों की उतनी ही अधिक बर्बादी का द्योतक है।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
आहलूवालिया, आई. जे. (1991). प्रोडक्टिविटी एण्ड ग्रोथ इन इंडियन मैन्यूफैक्चरिंग, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली।
आहलूवालिया. आई. जे. और लिटिल, आई.एम.डी. (1998). इण्डियाज इकनॉमिक रिफॉर्मस् एण्ड डेवलपमेंटः एसेज फॉर मनमोहन सिंह, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली।
केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन, राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी, योजना और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सारकार, विभिन्न खंड (टवसनउमे)।
चन्द्रशेखर, एस. (1990). कैपेसिटी यूटिलाइजेशन इन इण्डियन इण्डस्ट्रीज, दया पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली।
इकोनोमिस्ट (1997). गाइड टू इकनॉमिक इंडिकेटर्स: मेकिंग सेंस ऑफ इकनॉमिक्स, तीसरा संस्करण, प्रोफाइल्स बुक लिमिटेड, लंदन
आई.सी.आई.सी.आई. (1994). कैपेसिटी यूटिलाइजेशन इन दि प्राइवेट कारपोरेट सेक्टरः 1991-92 और 1992-93, आई.सी.आई.सी.आई. लिमिटेड
रूपा रीगे निटश्यूर एण्ड मैथ्यू जोसेफ (1999). ‘‘लिबरलाइजेशन एण्ड दि बिहैवियर ऑफ इंडियन इण्डस्ट्रीः ए कारपोरेट सेक्टर एनालिसिस बेस्ड ऑन कैपेसिटी यूटिलाइजेशन‘‘, प्रेजेण्टेड एट 1999 ए.बी.ए.एस. इंटरनेशनल कान्फ्रेंस ऑन ‘‘ग्लोबलाइजेशन एण्ड इमर्जिंग इकनॉमिक्स‘‘ बार्सेलोना, स्पेन में (12-15 जुलाई, 1999 तक)।