क्षमता के उपयोग की अवधारणा क्या है | Capacity utilization in hindi rate fatctor क्षमता उपयोग दर

By   February 26, 2021

Capacity utilization in hindi rate fatctor use क्षमता के उपयोग की अवधारणा क्या है क्षमता उपयोग दर किसे कहते है ?

महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं की परिभाषाएँ

1) क्षमता अथवा क्षमता निर्गत: क्षमता एक ऐसी अवधारणा है जो अनिश्चित है और इसका माप कठिन है। यह समय के साथ और आर्थिक दशाओं के अनुरूप बदलती रहती है। लागत और उत्पादन का आर्थिक सिद्धान्त क्षमता निर्गत की परिभाषा, निर्गत जिस पर अल्पकालीन और दीर्घकालीन औसत कुल लागत वक्र एक दूसरे का स्पर्श करते हैं, के रूप में करता हैं। दीर्घकालीन समानुपातिक प्रतिलाभ की दशाओं के अंतर्गत क्षमता निर्गत अल्पकालीन औसत कुल लागत वक्र की न्यूनतम बिन्दु पर निर्गत के समान होता है। जोहान्सन (1968) क्षमता निर्गत की परिभाषा इस प्रकार करते हैं ‘‘ ……………………. विद्यमान संयंत्र और उपकरण से समय की प्रति इकाई उत्पादित की जा सकने वाली अधिकतम मात्रा, बशर्ते कि उत्पादन के चर कारक (जैसे कच्चा माल अथवा श्रम इत्यादि) की उपलब्धता प्रतिबन्धित नहीं हो।‘‘

2) ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘: किसी भी अस्तित्व (चाहे यह एक फर्म हो अथवा एक उद्योग हो अथवा एक अर्थव्यवस्था हो) के लिए ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ दर की परिभाषा सतत् अधिकतम निर्गत (अथवा क्षमता निर्गत) द्वारा विभाजित वास्तविक निर्गत के रूप में किया जा सकता है। ‘‘क्षमता की उपयोग‘‘ दर, जब इसकी माप एक-एक फर्म अथवा उद्योग के लिए की जाती हैं तो यह शत प्रतिशत से अधिक हो सकती है और बहुधा ऐसा होता भी है क्योंकि कभी-कभी सतत् अधिकतम निर्गत अस्थायी रूप से प्राप्य चरम उत्पादन से कम है। तथापि, समस्त अर्थव्यवस्था के लिए, ‘‘क्षमता का उपयोग‘‘ शत-प्रतिशत तक नहीं पहुँचता है क्योंकि अलग-अलग फर्म आर्थिक चक्र के अलग अलग चरणों में अपने चरम पर पहुँचते हैं। एक उद्योग में संकट से आपूर्ति बाधित होती है और परिणामस्वरूप दूसरे में उत्पादन बाधित हो जाता है। उदाहरण के लिए; बड़े चक्रीय चरम चरणों के दौरान (अर्थात् आर्थिक क्रिया कलाप में तेजी) इस्पात की कमी से कतिपय उपभोक्ता वस्तुओं अथवा व्यापारिक मशीनों का उत्पादन सीमित हो सकता है और यह उन उद्योगों में ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ को बाधित कर सकता है।

 क्षमता के उपयोग की अवधारणा का महत्त्व
विद्यमान क्षमता का जिस सीमा तक उपयोग किया जा रहा है उसमें अंतर इस बात का द्योतक है कि विशेष फर्म, उद्योग अथवा अर्थव्यवस्था का आपूर्ति पक्ष अपनी माँग पक्ष के सापेक्षिक किस तरह से विकास कर रहा है।

भारत जैसे विकासशील देशों (जहाँ पूँजी की कमी की विकट समस्या रहती है) के लिए, यह माप विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि विद्यमान क्षमता के बेहतर उपयोग से अतिरिक्त पूँजी अथवा श्रम के निवेश के बिना ही विकास संभव हो जाता है। स्वयं सिद्ध अध्ययनों से पुष्ट होता है कि उत्पादन के कारकों (जैसे पूँजी अथवा श्रम) में वृद्धि को उत्पादन में आधे से भी कम वृद्धि के लिए जिम्मेदार कहा जा सकता है और उच्च उत्पादकता को अन्य कारणों के संदर्भ में समझा जा सकता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ उत्पादकता के सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारकों में से एक है क्योंकि विद्यमान क्षमता के बढ़े हुए उपयोग से उत्पादन लागत में कमी होती है (निर्गत को न्यूनतम अल्पकालीन औसत कुल लागत के बिन्दु के निकट लाने से) और लाभप्रदता बढ़ती है तथा आंतरिक संसाधनों का सृजन होता है।

‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ के माप कई आधुनिक व्यापार चक्र सिद्धान्तों विशेषकर वे जो त्वरण सिद्धान्त पर आधारित हैं में प्रमुख परिवर्ती हैं।

व्यापार चक्र लक्षण विकास के दौर में आर्थिक कार्यकलाप में लगभग नियमित रूप से बारी-बारी से आने वाला विस्तार (तेजी) और संकुचन (मंदी) है। विस्तार (अथवा तेजी) के दौरान उत्पादन के कारकों का नियोजन बढ़ जाता है (जो विद्यमान क्षमता के उच्चतर उपयोग का सूचक है) जिससे आय में वृद्धि होती है, माँग का सृजन होता है, परिणाम स्वरूप विद्यमान क्षमताओं का और अधिक उपयोग होता है और इसी तरह से प्रक्रिया आगे बढ़ती रहती है। इसे ‘‘गुणक‘‘ प्रभाव के नाम से जाना जाता है। तथापि, शीघ्र ही उत्पादकों को क्षमता संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। यदि वे इस बात के लिए आश्वस्त रहते हैं कि माँग में तेजी रहेगी (सकारात्मक प्रत्याशा), तो के नए संयंत्र और मशीनों में अधिक निवेश करते हैं (अर्थात् अधिक क्षमता का सृजन), जिससे और अधिक माँग पैदा होती है। इसे त्वरक प्रभाव कहते हैं।

यह उध्र्वगामी गतिशीलता अनंतकाल तक जारी नहीं रह सकती है। अंततः उत्पादन विभिन्न बाधाओं और आपूर्ति कठिनाइयों के कारण उच्चतम सीमा तक पहुँच जाता हैं। निवेश निधियों की माँग से ब्याज दर उस बिन्दु तक जा पहुँचती है जहाँ नया निवेश करना लाभप्रद नहीं रह जाए। इससे निवेश माँग घटेगी। उपभोक्ताओं द्वारा निरन्तर माँग के बावजूद भी, निवेश माँग में गिरावट से कुल उत्पादन के स्तर में गिरावट आती है। निवेश माँग में गिरावट आने के साथ, पूँजीगत मालों का उत्पादक, श्रमिकों की संख्या में कटौती शुरू कर देते हैं। बढ़ती हुई बेरोजगारी से उपभोक्ता माँग घटती है। गुणक, प्रत्याशा और त्वरक सिद्धान्त प्रतिकूल दिशा में काम करने लगते हैं तथा आर्थिक संकुचन की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

उत्पादन में गिरावट अनंतकाल तक जारी नहीं रहता। यह किसी न किसी न्यूनतम स्तर तक पहुँच कर रुक जाता है, क्योंकि जो कर्मचारी, सरकार के अधीन अथवा ऐसे उद्योगों में जो आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करते हैं में स्थायी रूप से नियोजित होते हैं, का रोजगार सुरक्षित रहता है और परिणामस्वरूप उनकी खर्च करने की क्षमता भी बनी रहती है। निवेश निधियों की कम माँग के फलस्वरूप ब्याज दरों में कमी आ सकती है जिससे नया और स्थानापन्न निवेश अधिक आकर्षक बन सकता है। उपभोक्ताओं की निरंतर माँग बनी रहने से, यह निवेश माँग ही है (जो नई क्षमताओं के सृजन को प्रेरित करता है), जो अर्थव्यवस्था को फिर से ऊपर उठाता है।

‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ की अवधारणा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपयोग यह है कि इससे स्फीतिकारक दबाव का पता चलता है। उदाहरण के लिए, क्षमता के उच्च उपयोग के साथ तेज आर्थिक वृद्धि से स्फीतिकारक दबाव के संकेत मिलते हैं। यदि किसी अर्थव्यवस्था की क्षमता का उपयोग दर कुल मिलाकर अपने अधिकतम स्तर के करीब है तो माँग में थोड़ी भी वृद्धि को पूरा करने के लिए उत्पादन में तब तक वृद्धि नहीं की जा सकती जब तक कि विनिर्माता अतिरिक्त निवेश नहीं करता है। इस स्थिति में, उच्चतर माँग का सीधा प्रभाव मूल्यों पर पड़ता है क्योंकि उत्पादन की आपूर्ति पहले ही अधिकतम सीमा तक पहुँच चुकी है।

यद्यपि कि ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ दरों में उतार-चढ़ाव के कारणों के बारे में सर्वसम्मति नहीं है, फिर भी इसपर नियत निवेश और स्टॉक चक्र, बाह्य प्रभाव तथा सरकार की समष्टि आर्थिक नीतियों का मुख्य रूप से प्रभाव पड़ता है।

 क्षमता के उपयोग के उपलब्ध माप
इस भाग का उद्देश्य ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ का व्यावहारिक वैकल्पिक माप प्रस्तुत करना है। संख्यात्मक ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ मापों के अभिकलन के विभिन्न साधनों का व्यापक सर्वेक्षण इस पाठ्यक्रम के क्षेत्र से बाहर है। तथापि, यहाँ तीन सर्वाधिक प्रचलित पद्धतियों की उनके अंतर्निहित महत्त्व के संदर्भ में संक्षेप में समीक्षा की गई है।

1) एक रिकार्ड स्तर से दूसरे रिकार्ड स्तर तक माप: यह दृष्टिकोण समय के बीच उत्पादन के प्राप्त स्तर (अर्थात वास्तविक उत्पादन) के खण्ड की जाँच द्वारा सभी आदानों के प्रयोग की मात्रा की माप करने का प्रयास करता है। उत्पादन के एक खण्ड में, सापेक्षिक आवधिक रिकार्ड को सभी संसाधनों के पूर्ण उपयोग के बिन्दु के रूप में लिया जाता है। बाद में इन रिकार्ड स्तर बिन्दुओं को सीधी रेखा से जोड़ दिया जाता है जो क्षमता उत्पादन के पथ को दर्शाने के लिए नवीनतम रिकार्ड स्तर बिन्दु के भी बाहर जा सकते हैं। उसके बाद संख्यात्मक ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ का माप, क्षमता उत्पादन की तुलना में वास्तविक उत्पादन के अनुपात की गणना के रूप में किया जाता है। इस दृष्टिकोण का सबसे पहला लाभ यह है कि यह आदान संबंधी आँकड़ों की बजाए सिर्फ उत्पादन संबंधी आँकड़ों का उपयोग करके क्षमता के उपयोग की गणना करता है। सामान्यतया, आदान संबंधी आँकड़े बहुत धीरे-धीरे आते हैं और इनमें अंतराल भी काफी होता है।

2) सर्वेक्षण आधारित माप: संख्यात्मक ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ अनुपात प्राप्त करने का सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट साधन फर्मों से ही उनके उपलब्ध ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ की सीमा के संबंध में उनके अपने मूल्यांकन के बारे में पूछना है। प्रायः सभी औद्योगिक देश अब व्यापार के मासिक सर्वेक्षण में इस प्रश्न को सम्मिलित करते हैं। भारत में भी, कंपनियों के लिए अपने विभिन्न उत्पादों की अधिष्ठापित क्षमता और वास्तविक उत्पादन के संबंध में जानकारी (माप की वास्तविक इकाइयों में) अपने वार्षिक प्रतिवेदनों की एक अनुसूची में प्रकाशित करना अनिवार्य कर दिया गया है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस समय यह भारत में उपलब्ध ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ का सबसे सुगम और समयोचित सूचक है।

3) उत्पाद फलन दृष्टिकोण: यह दृष्टिकोण उत्पादन के आर्थिक सिद्धान्त को क्षमता के उपयोग का माप निकालने के लिए क्षेत्रगत अथवा उद्योग स्तर पर लागू करने का प्रयास है। उत्पाद फलन उपागम का भी ‘‘एक रिकार्ड स्तर से दूसरे रिकार्ड स्तर तक‘‘ पद्धति की ही भांति सभी उपलब्ध आदानों का पूरी तरह से उपयोग करके उत्पादित किए जा सकने योग्य निर्गत का स्तर मापने का प्रयास है। तथापि, इस उपागम में आदानों (अर्थात् पूँजी और श्रम), प्रौद्योगिकी की स्थिति और निर्गत के बीच किसी प्रकार के कार्यात्मक संबंध का विशेष विवरण तथा अनुमानों का होना आवश्यक है। एक बार जब किसी भी उद्योग अथवा क्षेत्र के लिए उत्पाद फलन का अनुमान कर लिया जाता है (अर्थात् एक समीकरण के रूप में), तब क्षमता निर्गत की गणना उस बिन्दु पर जहाँ सभी संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग किया जा रहा है, इसका आकलन करके की जा सकती है। इस प्रकार के उपागम का एक महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि क्षमता निर्गत में परिवर्तन का इसके अलग-अलग घटकों: पूँजी स्टॉक वृद्धि, प्रौद्योगिकीय प्रगति और संभाव्य श्रम आपूर्ति में वृद्धि में विश्लेषण किया जा सकता है। यह ‘‘एक रिकार्ड स्तर से दूसरे रिकार्ड स्तर तक‘‘ और सर्वेक्षण आधारित मापों से भिन्न है जिसमें इस तरह के विश्लेषण की कोई संभावना नहीं है।

बोध प्रश्न 1
1) संभाव्य क्षमता निर्गत और ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ की अवधारणा की परिभाषा कीजिए।
2) व्यापार-चक्र के विश्लेषण में ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ की अवधारणा का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
3) ‘‘क्षमता के उपयोग‘‘ के वैकल्पिक मापों का वर्णन कीजिए तथा उनकी अलग-अलग विशेषताएँ क्या हैं।