kinetic energy of rotational motion formula in hindi घूर्णन गतिज ऊर्जा का व्यंजक ज्ञात कीजिए ?

घूर्णन गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy of Rotation) |

जब कोई दृढ़ पिण्ड घूर्णन करता है तो उसके कण भिन्न-भिन्न त्रिज्याओं के वृत्ताकार पथों पर एकसमान कोणीय वेग से गति करते हैं। यदि घूर्णन अक्ष द्रव्यमान केन्द्र से गुजरती है तथा मूल बिन्दु द्रव्यमान केन्द्र पर लें तो किसी क्षण | कण का स्थिति  ri सदिश एवं रेखिक वेगv1  होगा, जहाँ

Vi = ω x ri

iवे कण की घूर्णन गतिज ऊर्जा

E = 1/2 mi v2i

अतः सम्पूर्ण पिण्ड की घूर्णन गतिज ऊर्जा

EI = 1/2 Σ mi vi2

= 1/2 Σ mi (ω x ri)2

सदिश बीजगणित से

(A x B). (A x B) = A. [B x (A x B)]

(ω x ri)2 = (ω x ri).( ω x ri)

= ω [ri x (ω x ri)

= ω (ri x vi)

E = 1/2 Σ mi ω(ri x vi)

= 1/2 Σ ω(ri x mivi)= 1/2 Σ ω (ri x pi)

जहाँ रेखीय संवेग Pi = mi vi तथा कोणीय संवेग Ji = ri x pi अतः

E = 1/2 Σ (ω .JI)

E = 1/2 ω. J

(कोणीय वेग ω नियत है तथा J कुल कोणीय संवेग है, J = Σ Ji)

व्यापक रूप में जब कोणीय संवेग J तथा कोणीय वेग ω एक ही दिशा में नहीं होते हैं तब

E = 1/2 Σ ωu ju = 1/2 Σ Iu ωv ωu

चूंकि Ju = Σ IUV ωV  (खण्ड 6, समीकरण 9 देखिए) m,v का मान x,y व z हो सकता है। अतः उपर्युक्त व्यंजक को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है

E = 1/2 [Ixx ω2x + IYY ωy2 + Izz ω2z + 21xy ωxωy + 21yz ωy ωz + 21xz ωxωz]

अब यदि सममित दृढ पिण्ड अपने द्रव्यमान केन्द्र से पारित X-अक्ष के प्रति घूर्णन कर रही हो तो

Ω = ωx I, ωy = 0, ωz = 0

Ixy = Iyz = 0

इस स्थिति में  E = 1/2 (IXX ωX2)

समीकरण (1) को निम्न प्रकार भी लिखा जा सकता है।

E = 1/2 ω. J = 1/2 ω. (Iω)

जैसा कि हम पिछले अनुच्छेद में अध्ययन कर चुके हैं कि यदि घूर्णन अक्ष, मुख्य-अक्ष हो तो Ixx ,Izz, को केवल IX, IY व IZ, तथा Ixy  = Ixz = Iyz  = 0 लिया जाता है। अतः इस स्थिति में।

उदाहरण-स्वरूप गोले आदि सममित पिण्डों के लिए

IX = IY = IZ = I

IXY = IYZ = IZX = 0

E = 1/2 (ω2X + ωY2 + ω2Z)

= 1/2 Iω2

मुख्य अक्ष (Principal Axes)

व्यापक रूप में किसी भी दृढ़ पिण्ड का जडत्व आघूर्ण एक द्वितीय कोटि के टेन्सर द्वारा परिभाषित होता है। इस टेन्सर में नौ घटक होते हैं तथा यह सममित (symmetrical) टेन्सर होता है। जड़त्व आघूण टेन्सर । के रूप में पिण्ड का कोणीय संवेग

J = Iω

जिससे  JX = IXX ωx + IYY ωy + IXZ ωz

Jy = IYX ωx + IYY ωY + IYZ ωZ

JZ = IZX ωx + Izy ωy + Izz ωz

7 =1 J=|0, +10, +10, J= 1,0+10+120, J=10. +I, +LOT

जहाँ Ixy = IYX, Ixz = IZX  तथा  IYZ = IZY

इसी प्रकार पिण्ड की घूर्णन गतिज ऊर्जा

E = 1/2 (Ixx ωx2 + IYY ωY2 + IZZ ωZ2 +2Ixy ωx ωy + 2IYZ ωy + 2IZX ωz ωx

उपरोक्त सम्बन्धों के लिए एक पिण्ड बद्ध निर्देश तंत्र लिया गया है जिसका मूल बिन्दु द्रव्यमान केन्द्र पर है तथा द्रव्यमान केन्द्र स्थिर माना गया है।

यदि दृढ पिण्ड के लिए पिण्ड-बद ऐसा निर्देश तंत्र लिया जाये कि जड़त्व आघूर्ण टेन्सर अपविकर्ण (off-diagonal) घटक अर्थात IXY, IYZ, IZX, IYY, IZY, IXZ शून्य हों तो ऐसे निर्देश तंत्र की अक्षों का मुख्य अक्ष (principal axes) कहते हैं। इस प्रकार निर्देश तंत्र के चयन से कोणीय संवेग, घूर्णन गतिल ऊजा आदि के सूत्र सरल बनाये जा सकते हैं। मुख्य अक्षों वाले निर्देश तंत्र में केवल तीन जडत्वीय गुणांकों IXY,IYY व IZZ का अस्तित्व होता है।

JX = IXX ωxJ

JY = IYY ωy

JZ = Izz ωZ

तथा   E = 1/2 (Ixx ωx2 + Iyy ωy2 + IZZ ωz2

= jx2/2Ixx + JY2/2IYY + JY2/2Izz

इसके अतिरिक्त कोणीय संवेग  J व कोणीय वेग  ω एक ही दिशा में होते हैं।

ज्यामितीय रूप से सममित पिण्डों के मुख्य अक्ष सरलता से प्राप्त किये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए कोई चकती (disc) पर विचार करते हैं। चकती के तल के लम्बवत व केन्द्र से गजरने वाली अक्ष के लिए यदि अक्ष को Z-अक्ष मानें वX.Y अक्ष चकती के तल में लें तो चकती में इस प्रकार के कणों के युग्म चुने जा सकते हैं जिनके लिए Σ mi Xi Yi इत्यादि शून्य हों अर्थात् यदि एक का स्थिति सदिश (x,y.0) हो तो दूसरे का (-x.y.0) हो। इस प्रकार इन अक्षों के लिए सममिति से

Ixy = Iyz = Izx = Iyx = Izy = Ixz = 0

गोले के लिए गोले के केन्द्र पर मूल बिन्दु लेकर कार्तीय निर्देश तंत्र की x,y व z अक्ष मुख्य अक्ष होंगी।

चक्रण करते लट्टू की पुरस्सरण गति (Precessional Motion of a Spinning Top)

व्यावहारिक प्रेक्षण के आधार पर यह ज्ञात है कि चक्रण करता हुआ लट्टू  अपने कीलक-बिंदु । (needle-point) पर खड़ा रह सकता ह जबकि चक्रण नहीं करने वाला लटू (non-spinning top) नीचे  गिर जाता है। इसके अतिरिक्त यह भी देखा जा सकता है कि चक्रण करता हुआ लट्टू न केवल अपनी सममित घूर्णन अक्ष के सापेक्ष चक्रण करता है वरन् कीलक बिन्दु से पारित एक आकाशीय ऊध्यधिर अक्ष के सापेक्ष पुरस्सरण गति (precessional motion) भी करता है। (किसी घूर्णन करते हुए पिण्ड की ‘घूणी-अक्ष का किसी अन्य नियत अक्ष के प्रति घूर्णन पुरस्सरण कहलाता है।) चक्रण करते हुए लट्ट की इस गति को समझने का प्रयास हम यहाँ करेंगे। चक्रण करते हुए लटू पर लगने वाला मात्र बाह्य बल गुरुत्वीय बल है। चक्रण करते हुए पिण्ड की गति को घूर्णाक्षस्थापी गति (gyroscopic motion) भी कहते हैं।

चित्र (21) में लटू की अपनी स्वयं की सममिति अक्ष के सापेक्ष ω कोणीय वेग से चक्रण करते हुए। प्रदर्शित किया गया है। लट्टू का स्थिर बिंदु O, जड़त्वीय निर्देश तंत्र के मूल बिंदु पर है। किसी भी क्षण ।

इसके कोणीय संवेग सदिश J को घूर्णन अक्ष के अनुदिश (ऊपर की ओर इंगित करते हुए) दिखाया गया है। यहाँ घूर्णन अक्ष Z-अक्ष से 0 कोण पर झुकाव लिए हुए है।।

अब यदि घूर्णन करते हुए पिण्ड पर कोई ऐसा बल आघूर्ण आरोपित करें जिसकी दिशा, पिण्ड की घर्णन अक्ष (या J की दिशा) के लम्बवत हो, तब पिण्ड के घूमने की दर तो नियत (constant) बनी। रहती है परत घर्णन अक्ष की दिशा निरंतर बदलती रहेंगी। परिणामस्वरूप घूर्णन अक्ष स्वयं घूमने लग जाती है। घूर्णन अक्ष के इस प्रकार Z-अक्ष के चारों ओर घूमने को ही पुरस्सरण गति (precessional motion) कहा जाता है।

माना लटटू का द्रव्यमान केन्द्र G है जिसका मूल बिन्दु के सापेक्ष स्थिति सदिश r है। लट्ट पर दो बल कार्य करते हैं। एक उसके द्रव्यमान केन्द्र G पर उसका भार mg नीचे की ओर तथा दूसरा प्रतिक्रिया बल उसके कीलक बिन्दु 0 पर ऊपर की ओर लगता है। इस बल से कोई आघूर्ण नहीं लगता है  क्योंकि आघूर्ण भुजा शून्य होगी जबकि mg के कारण O के प्रति बल आघूर्ण कार्य करेगा। भार mg औ द्रव्यमान केन्द्र स्थिति सदिश r  के सदिश गुणनफल से बल आघूर्ण τ प्राप्त होता है। अतः बिन्दु o  के प्रति भार (बल) का आघूर्ण –

Τ = r x mg

| τ  | = r mg sin (1800 – θ) = r mg sin θ ……………(1)

इस बल आघूर्ण की दिशा r  व mg के लम्बवत् होगी। जिस तल में r व mg दोनों सदिश स्थित  हैं उसी तल में कोणीय संवेग सदिश j भी स्थित होगा। अतएव बल आघूर्ण τ कोणीय संवेग j के भी लम्बवत होगा और इसके प्रभावस्वरूप लटू पुरस्सरण गति करेगा। वास्तव में यह बल आघूर्णन τ लटू के कोणीय संवेग j की दिशा में परिवर्तन लाता है (कोणीय संवेग j का परिमाण परिवर्तित  नहीं होता है) चित्र (21 b) के अनुसार बल आघूर्ण τ , लटू के कोणीय संवेग j को परिवर्तित करता। है। यदि किसी समयान्तराल dt में लटू के कोणीय संवेग में परिवर्तन dj हो तो बल आघूर्ण

Τ = dj / dt ……………………………..(2)

यहाँ कोणीय संवेग में परिवर्तन ,dj लट्टू पर लगने वाले बल आघूर्ण τ के समान्तर होगा। अतः  dj की दिशा J की दिशा के लम्बवत् होगी और समयान्तरल dt के पश्चात् निकाय का कोणीय संवेग, पूर्व कोणीय संवेग  j तथा परिवर्तन dj के योग के तुल्य होगा, चित्र (21 b)।

J के परिमाण में कोई परिवर्तन नहीं होता केवल परिणामी कोणीय संवेग की दिशा बदल जाती है। अतः कोणीय संवेग सदिश J का सिरा (tip) क्षैतिज तल में एक वृत्त का अनुरेखण (trace) करता है तथा कोणीय संवेग j  की दिशा, लट्टू की घूर्णन अक्ष के सम्पाती रहती है। अतः लटू की घूर्णन अक्ष स्वतः ही सममिति अक्ष अर्थात् Z-अक्ष के प्रति घूर्णन करती है और एक शंकु के आकार (cone shaped) की आकृति को प्रसर्पित करती है जिसका शीर्ष (vertex) स्थिर बिन्दु O पर रहता है।

पुरस्सरण की दर-

चित्र (21 b) के अनुसार क्षैतिज तल में सदिश J  का सिरा त्रिज्या (J sin θ) का वृत्त बनाता है। यदि dt समय में समय में वृत्त का त्रिज्य सदिश कोण d θ से घूम जाता है, तो।

D θ = |dj|/J sin θ

अतः पुरस्सरण गति का कोणीय वेग  ωp = d /dt = dj/j sin θ. dt = Τ/j sin θ ………………………..(3)

ωp  = mgr sin θ/j sin θ

= mgr/J ……………………………………(4)

इस प्रकार पुरस्सरण का दर (rate of precession) चक्रण करने वाले लटू के कोणीय संवेग के। व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसी कारण से जैसे-जैसे चक्रण कर रहे लटू के वेग घर्षण आदि से मन्दित  होता जाता है, वैसे वैसे इसका कोणीय सवेग घटता है और इसका पुरस्सरण उतना ही तीव्र होता जाता है। पुरस्सरण वेग ωp की दिशा, Z-अक्ष के अनुदिश होती है। समीकरण (3) के अनुसार

T = ωp J  sin θ

जहाँ θ, पुरस्सरण वेग, ωp (Z-अक्ष) तथा कोणीय संवेग J (अर्थात्ω) की दिशा के मध्य कोण है।

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