कल्पसूत्र के लेखक कौन है ? कल्पसूत्र के रचनाकार कौन है रचना किसने की नाम kalpsutra written by in hindi

By   March 12, 2021

kalpsutra written by in hindi कल्पसूत्र के लेखक कौन है ? कल्पसूत्र के रचनाकार कौन है रचना किसने की नाम ?

उत्तर : कल्पसूत्र के लेखक ‘भद्रबाहु’ है अर्थात यह ग्रन्थ भद्रबाहु चरित के द्वारा रचित है या इसके रचियता भद्रबाहु चरित है |

प्रश्न: चित्रकला की पश्चिमी भारतीय शैली पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: चित्रकला की पश्चिमी भारतीय शैली (बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी) गुजरात, राजस्थान और मालवा क्षेत्र में प्रचलित थी। पश्चिम भारत में कलात्मक क्रियाकलापों का प्रेरक बल जैनवाद था। अजन्ता और पाल कलाओं के मामले में बौद्धवाद की भांति, जैनवाद को चालुक्य वंश के राजाओं का संरक्षण प्राप्त था जिन्होंने 961 ईसवी से लेकर तेरहवीं शताब्दी के अन्त तक गुजरात और राजस्थान के कुछ भागों तथा मालवा पर शासन किया। राजकुमारों, उनके मंत्रियों और समृद्ध जन व्यापारियों ने धार्मिक पुण्यफल प्राप्त करने के लिए बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी तक जैन धर्म की पाण्डुलिपियों को भारी संख्या में बनवाया था। ऐसी कई पाण्डुलिपियां ऐसे जैन पुस्तकालयों (भण्डार) में उपलब्ध हैं जो पश्चिमी भारत के कई स्थानों पर पाए जाते हैं।
इन पाण्डुलिपियों के सचित्र उदाहरण अत्यधिक विकति की स्थिति में हैं। इस शैली में शरीर की कतिपय विशेषताओं, नेत्रों, वक्षस्थलों और नितम्बों की एक अतिशयोक्ति के विस्तार को देख पाते हैं। नाक-नक्शे की कोणीयता सहित आकृतियां सपाट हैं और नेत्र आकाश की ओर बाहर निकले हुए हैं। यह आदिम जीवन-शक्ति, सशक्त रेखा और प्रभावशाली वर्णों की एक कला है। लगभग 1100 से 1400 ईसवी तक पाण्डुलिपियों के लिए ताड-पत्ते का प्रयोग किया गया था और बाद में इसके प्रयोजनार्थ कागज को लाया गया था। जैन ग्रथों के दो अति लोकप्रिय ग्रंथ, यथा कल्पसूत्र और कालकाचार्य-कथा को बार-बार लिखा गया था और चित्रकलाओं के माध्यम से सचित्र किया गया था। कल्पसूत्र की पाण्डुलिपियों के कुछ उल्लेखनीय उदाहरण अहमदाबाद के देवासनो पादो भण्डार में हैं। तकरीबन 1400 ईसवी के कल्पसूत्र व कालकाचार्य कथा प्रिंस ऑव् वेल्स संग्रहालय, मुंबई में है। माण्डू में 1439 ईसवी में निष्पादित कल्पसूत्र अब नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में है। कल्पसूत्र को 1465 ईसवी में जौनपुर में लिखा तथा रंगा गया था।
प्रश्न: लघु चित्रकला की सोलहवीं सदी की अन्य भिन्न-भिन्न शैलियों के बारे में बताइए।
उत्तर: जैसा कि कल्पसूत्र की कुछ सचित्र पाण्डुलिपियों के किनारे पर दिखाई देने वाली फारसी शैली और शिकार के दृश्यों से स्पष्ट है, पन्द्रहवीं शताब्दी के दौरान चित्रकला की फारसी शैली ने चित्रकला की पश्चिम भारतीय शैली को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया था। पश्चिम भारतीय पाण्डुलिपियों में गहरा नीला और सुनहरा रंग का प्रयोग प्रारम्भ हो जाना भी फारसी चित्रकला का प्रभाव समझा जाता है। भारत आनेवाली ये फारसी चित्रकलाएं सचित्र पाण्डुलिपियों के रूप में थीं। इन अनेक पाण्डुलिपियों की भारत में नकल तैयार की गई थी। इस प्रकार की नकलों में प्रयुक्त कुछ रंगों की फ्री गैलरी ऑफ आर्ट, वाशिंगटन में और सदी के बुस्तान की एक सचित्र पाण्डुलिपि को राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में देखा जा सकता है। बुस्तान शैली को मालवा के सुल्तान नादिर शाह खिलजी (1500-1510 ई.) के लिए एक हाजी महमूद (चित्रकार) तथा शहसवार द्वारा निष्पादित किया गया था।
इण्डियन ऑफिस लाइब्रेरी, लन्दन में उपलब्ध निमतनामा (पाककला पुस्तक) मालवा की चित्रकला का एक सचित्र उदाहरण है। इस पाण्डुलिपि को मालवा के गियासलदीन खिलजी (1469-1500 ईसवी) के समय में लिखना प्रारम्भ किया था। इस पाण्डुलिपि के एक अवशेष को यहां स्पष्ट दर्शाया गया है। इसमें दासियों को भोजन पकाते हुए और गियासलदीन खिलजी को पर्यवेक्षण करते हुए दिखाया गया है। निमतनामा शैली में फारसी प्रभाव घुमावदार जैसे बादलों, फूलों से लदे वृक्षों, घास-भरे गुच्छों और पृष्ठभूमि में फूलों से लदे पौधों, महिलाओं की आकृतियों तथा परिधानों में दृष्टिगोचर है। कुछ महिला आकतियों और उनके परिधानों तथा आभूषणों एवं वर्णों में भारतीय तत्व सुस्पष्ट हैं। इस पाण्डुलिपि में हम स्वदेशी भारतीय शैली के साथ शिराज की फारसी शैली के विलयन द्वारा चित्रकला की एक नई शैली के विकास की दिशा में प्रथम प्रयास को देख सकते हैं। सोलहवीं शताब्दी के पूर्वादर््ध से संबंधित चित्रकला के सर्वोत्तम उदाहरणों का प्रतिनिधित्व लघु चित्रकला के एक समूह द्वारा किया जाता है जिसे सामान्यतः ’कुल्हाकदार समूह’ कहते हैं। इस समूह में ’चैरपंचाशिका’-बिल्हण द्वारा चोर की पन्द्रह पक्तियां, गीत गोविन्द, ‘भागवत’ पुराण और ’रागमाला’ के सचित्र उदाहरण शामिल हैं। इन लघु चित्रकलाओं की शैली की विशेषता चटकीले विषम वर्णो, प्रभावशाली और कोणीय आरेखण, पारदर्शी वस्त्रों का प्रयोग करना तथा ऐसी शंकुरूप टोपियां ’कुलहा’ का प्रकट होना है जिन पर पुरुष आकृतियां पगडियां पहनती है।
चैरपंचाशिका लघु चित्रकला का एक उदाहरण चम्पावती को कमल के फूलों के एक तालाब के निकट खडी हई दिखाया गया है। यह लघु चित्रकला एन.सी.मेहता संग्रह, मुम्बई में है। इसे छठी शताब्दी के प्रथम चतुर्थाश में संभवतः मेवाड में निष्पादित किया गया था। इस चित्रकला की शैली शुद्ध स्वदेशी है और इसे पश्चिम भारत की कला की प्रारम्भिक परम्परा से लिया गया है और इस पर न तो फारसी और न ही मुगल शैली का कोई प्रभाव प्रतीत होता है। लाउरचन्दा की दो पाण्डुलिपियां मुल्ला दाउद द्वारा एक अवधी प्रेमलीला की दो पाण्डुलिपियों में से एक प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय, मुम्बई और अन्य जॉन रायलैंड्स पुस्तकालय मैनचेस्टर में है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें 1530 से 1540 ईसवी के बीच मुस्लिम राजमहलों में बनाया गया है। मालवा के निमतनामा की भांति, ये फारसी और भारतीय शैलियों के एक मिश्रण को दर्शाती हैं। इस युग की दो अन्य महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपियां मृगावती और महापुराण हैं जो कि एक जैन ग्रन्थ है। इन्हें चैरपंचाशिका की शैली से संबंधित एक शैली में निष्पादित किया गया है।
प्रश्न: लघु चित्रकला की मुगल शैली पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: चित्रकला की मुगलशैली (1560-1800 ईसवी सन्) की शुरुआत को भारत में चित्रकला के इतिहास की एक युगान्तरकारी घटना समझा जाता है। मुगल साम्राज्य की स्थापना हो जाने के पश्चात् चित्रकला की मुगल शैली की शुरुआत सम्राट अकबर के शासनकाल में 1560 ईसवी में हुई थी। सम्राट अकबर को चित्रकला और वास्तुकला में अत्यधिक रुचि उनके शासन के प्रारम्भ में दो फारसी अध्यापकों मीर सयद अली और अब्दुल समद खान की देखरेख में एक शिल्पशाला की स्थापना की गई थी, जिन्हें मूल रूप से सम्राट अकबर के पिता हुमायूं ने नौकरी दी थी। समूचे भारत में बडी संग में भारतीय कलाकारों को फारसी उस्तादों के अधीन काम पर रखा गया था।
मुगल शैली का विकास चित्रकला की स्वदेशी भारतीय शैली और फारसी चित्रकला की सफाविद शैली के एक उचित संश्लेषण के परिणामस्वरूप हुआ था। प्रकृति के घनिष्ठ अवलोकन और उत्तम तथा कोमल आरेखण पर आधारित सुनम्य प्रकृतिवाद, मुगल शैली की एक विशेषता है। यह सौन्दर्य के उच्च गुणों से परिपूर्ण है तथा प्राथमिक रूप से वैभवशाली और निरपेक्ष है।
क्लीवलैण्ड कला संग्रहालय (यू एस ए) में तूती-नामा की एक सचित्र पाण्डुलिपि मुगल शैली की प्रथम कलाकृति प्रतीत होती है। इस चित्रकला की शैली में मुगल शैली अपने विकास-काल में दिखाई देती है। इसके शीघ्र पश्चात 1564-69 ईसवी के बीच हमजानामा के रूप में एक अति महत्वाकांक्षी परियोजना पूरी की गई थी जिसमें कपड़े पर सत्रह खण्डों में मूल रूप से 1400 पृष्ठ शामिल हैं, प्रत्येक पृष्ठ का आकार लगभग 27720 है। हमजानामा की शैली तूती-नामा की अपेक्षा अधिक विकसित और परिष्कृत है।
आगे चल कर मुगल शैली मुगल राजदरबारों में आने वाली यूरोपियाई चित्रकला से प्रभावित हुई और इसमें छायाकरण और परिप्रेक्ष्य जैसी पश्चिमी तकनीकों में से कुछ को आत्मसात किया गया।
अकबर के युग के दौरान चित्रित अन्य महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपियां हैं- ब्रिटिश संग्रहालय, लन्दन में 1567 की सादी गुलिस्तां, 1570 की अनवरी-सुहावली (किस्से कहानी की एक पुस्तक) तूती-नासा की अन्य पाण्डुलिपि, जयपुर के रजमनामा (महाभारत का फारसी अनुवाद), बुटेलियन पुस्तकालय में 1595 की जामी की बहरिसतां, ब्रिटिश संग्रहालय में दराब-नामा, विक्टोरिया और एल्बर्ट संग्रहालय, लन्दन में अकबर-नामा (लगभग 1600 ईसवी), तेहरान में गुलिस्तां पुस्तकालय में 1596 ईसवी की तारीख-ए-अल्फीं, तवारीख-ए-खानदान तैमूरिया, 1602 की योग वाशिष्ठ, आदि। इसके अतिरिक्त अकबर के युग में राजमहल, आखेट के दृश्यों और प्रतिकृतियों की अनेक चित्रकलाएं भी निष्पादित की गई थीं।
अकबर के राजदरबार के चित्रकारों की एक सूची में बड़ी संख्या में नाम शामिल हैं। पहले जिन दो फारसी चित्रकारों का उल्लेख किया गया है उन्हें छोड़कर प्रसिद्ध चित्रकारों में से कुछ हैं – दसवंत, मिसकिना, नन्हा, कन्हा, बसावन, मनोहर, दौलत, मंसूर, केसू, भीम गुजराती, धर्मदास, मधु, सूरदास, लाल, शंकर गोवर्धन और इनायत।
जहांगीर के अधीन चित्रकला ने अधिकाधिक आकर्षण, परिष्कार और गरिमा प्राप्त की। उसे प्रकृति के प्रति अधिक आकर्षण था और उसे पक्षियों, पशुओं तथा पुष्पों को चित्रित करने में प्रसन्नता होती थी। इसके युग में सचित्र उदाहरण देकर स्पष्ट की गई कुछ महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपियां हैं- अयार-ए-दानिश नामक पशुओं के किस्से-कहानियों की एक पुस्तक, जिसके पन्नों का संग्रह कोवासजी जहांगीर संग्रह, मुम्बई और चेस्टनर बिट्टी पुस्तकालय, डबलिन में हैं, और अनवर-ऐ-सुनावली, ब्रिटिश संग्रहालय, लन्दन में किस्से-कहानी की एक अन्य पुस्तक है। इन दोनों को 1603-10 के बीच निष्पादित किया गया था। इसके अतिरिक्त, इस काल के दौरान दरबार के दृश्यों, प्रतिकृतियों, पक्षियों, पशुओं और पुष्पों का अध्ययन भी किया गया था। जहांगीर के प्रसिद्ध चित्रकार अकारिजा, अबुल हसन, मंसूर, बिशनदास, मनोहर, गोवर्धन, बालचन्द, दौलत, मुखलिस, भीम और इनायत हैं।
जहांगीर की प्रतिकृति जहांगीर के युग के दौरान निष्पादित लघु चित्रकलाओं का एक प्रतीकात्मक उदाहरण है। यह लघु चित्रकला राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में है। इसमें जहांगीर को अपने दाहिने हाथ में वर्जिन मेरी के एक चित्र को पकड़े हुए दिखाया गया है। यह प्रतिकृति अपने उत्कृष्ट आरेखण और परिष्कृत प्रतिरूपण तथा वास्तविकता के लिए असाधारण है। यह प्रतिकृति 1615-20 ईसवी की है। मुगल सम्राट के उदाहरण का पालन करते हुए, दरबारियों और प्रान्तीय अधिकारियों ने भी चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने चित्रकला की मुगल तकनीकों से प्रशिक्षित कलाकारों को कार्य सौंपा लेकिन उन्हें उपलब्ध कलाकार निम्न कोटि के थे जो राजसी कलागृह में रोजगार पाने में सक्षम नहीं थे। इन कलाकारों की कला-कृतियों को ’लोकप्रिय मुगल’ या ’प्रान्तीय मुगल’ चित्रकला की संज्ञा दी गई है। चित्रकला की इस शैली में राजसी मुगल चित्रकला की सभी विशेषताएं तो हैं लेकिन ये हैं निम्न कोटि की हैं। लोकप्रिय मुगल चित्रकला के कुछ उदाहरण हैं-1616 ईसवी की रजम-नामा की एक श्रृंखला, रसिकप्रिया की एक श्रृंखला (1610-1615) और लगभग 1610 ईसवी की रामायण की एक श्रृंखला जो कि अनेक भारतीय और विदेशी संग्रहालयों में उपलब्ध हैं। सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रामायण की एक श्रृंखला की प्रतीकात्मक लोकप्रिय मुगल शैली में एक उदाहरण राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में है। इसमें लंका में राम और रावण के सैनिकों के बीच लड़ाई को दिखाया गया है। राम अपने
भाई लक्ष्मण के साथ अग्रभाग में बाई ओर दिखाई दे रहे हैं जबकि रावण अपने राजमहल में दानव प्रमुखों के साथ सुनहरे किले में विचार-विमर्श करते हुए दिखाई दे रहा है। आरेखण अच्छा है लेकिन उतना परिष्कृत नहीं है जैसा राजसी मुगल चित्रकला में देखने को मिलता है। मानव मुखाकृति, दानव, वृक्ष और शैलों की अभिक्रिया सभी मुगल अन्दाज के हैं। इस लघु चित्रकला की विशेषता युद्ध के दृश्यों में सजित कार्रवाई की भावना और नाटकीय संचलन है, शाहजहां के अधीन मुगल चित्रकला ने अपने अच्छे स्तर को बनाए रखा तथापि उनके राज्य की अन्तिम अवधि के दौरान शैली परिपक्व हो गई थी। उनके चित्रकारों ने चित्रकला पर पर्याप्त ध्यान दिया था। उनके समय के जाने-माने कलाकार विचित्र, चैतरमन, अनूप चत्तर, समरकन्द का मोहमद नादिर, इनायत और मकर हैं। चित्रकला के अतिरिक्त, तपस्वियों और रहस्यवादियों के समूहों को दर्शाने वाली अन्य चित्रकलाएं और अनेक निदर्शी पाण्डलिपियां भी इस अवधि के दौरान निष्पादित की गई थी। इन पाण्डुलिपियों मे ध्यान देने योग्य कुछ उदाहरण हैं: गुलिस्तां तथा सादी का बुस्तान, सम्राट के लिए उनके शासनकाल के प्रथम और द्वितीय वर्ष में प्रति तैयार की और विंडसर दुर्ग में शाहजहां नामा (1657)। राष्ट्रीय संग्रहालय के संग्रह में एक लघु चित्रकला सूफियों की एक सभा को चित्रित करती हैं। सूफी खुले स्थान पर बैठे हुए हैं और चर्चा में व्यस्त हैं, यह शाहजहां काल की मुगल शैली के ग्रहणशील प्रकृतवाद को प्रदर्शित करती है। आरेखण परिष्कृत है और वर्ण फीके हैं, पृष्ठभूमि हरी है तथा आकाश सुनहरे रंग का है। किनारे सुनहरे रंग में पुष्पीय अभिकल्पों को दर्शाते हैं। यह लघु कला-कृति लगभग 1650 ईसवी की है।
औरंगजेब अति धर्मनिष्ठ था, इसलिए कला को प्रोत्साहित नहीं करता था। इस अवधि के दौरान चित्रकला के स्तर में गिरावट आई और इसकी पूर्ववर्ती गुणवत्ता कहीं विलुप्त हो गई। राजदरबार के असंख्य चित्रकार प्रान्तीय राजदरबारों में चले गए। बहादुरशाह के शासनकाल में, औरंगजेब द्वारा अवहेलना के पश्चात् मुगल चित्रकला का पुनरुद्धार हुआ, जो शैलीगत सुधार को दर्शाती है।
1712 ईसवी के पश्चात् मुगल बादशाहों के अधीन मुगल चित्रकला में पुनः कमी आने लगी थी। हालांकि इसका बाह्य रूप वैसा का वैसा रखा गया, फिर भी यह निर्जीव होती चली गई और पूर्ववर्ती मुगलकला की अन्तर्निहित गुणवत्ता को खो दिया।