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कलरीपायट्टु आयुध कला हिंदी में मार्शल आर्ट्स , kalaripayattu martial art in hindi

kalaripayattu martial art in hindi कलरीपायट्टु आयुध कला हिंदी में मार्शल आर्ट्स ?

भारत की आयुध कला (मार्शल आर्ट्स)
भारतीय प्रदर्शन परंपरा का सबसे जटिल और विचित्र तथ्य है ऐसे प्रदर्शन रूपों का प्रचलन या तो आयुध कला से उत्पन्न हुए हैं या उससे प्रभावित हुए हैं। आयुध कला प्रदर्शन रूपों के विकास में अथवा किसी भी रूप के विकास से अंतर्क्रिया करते हुए उसकी गतियों की प्रकृति और प्रारूपों को क्यों प्रभावित करती है?
आयुध कला की परंपरा केवल अस्त्र-शस्त्रों को पकड़ने और संचालित करने और युद्ध करने की नहीं है, वह एक संकुलित संस्कृति है, जिसमें लोगों के सामाजिक, धार्मिक, कलात्मक और सांस्कृतिक जीवन के सभी तत्व समाहित होते है। सभी आयुध परम्पराओं में विस्तृत दीक्षा-समारोह होता है, उसमें मंत्र पढ़े जाते हैं, चढ़ावा चढ़ता है और इस बात की शपथ ली जाती है कि आयुध कुशलता को अपनी रक्षा या किसी भले कार्य के लिए ही प्रयोग किया जाएगा।
अधिकांश आयुध पद्धतियों की प्रकृति ध्यानस्थता और चिंतनशीलता से युक्त होती है जो उनके अभ्यासों और गतियों में प्रतिबिम्बित होती हैं। आयुध कलाओं की ध्यानस्थता का गुण आयुध कलाओं से जुड़ी हुई योग तकनीकों और मुद्राओं का परिणाम होता है। आयुध कलाओं के अभ्यास में समुचित श्वसन प्रक्रिया के सिद्धांत और तकनीक उसकी चिंतनशीलता बढ़ाते हैं। श्वास को अंदर ले जागा आंतरिक शक्ति और एकाग्रता में सहायक होता है। आयुध कलाओं का आंतरिक गुण और चिंतनशीलता उनके आनुष्ठानिक और धार्मिक संदर्भ से भी जुड़ी होती है। इसका उद्भव मणिपुर के थांग-ता (तलवार-भाला) में सृष्टि कथा से है और युद्ध संरचना मणिपुरवासियों की जीवन-व्यवस्था से भी जुड़ी है। सबसे पुराने अनुष्ठान लाई हरोबा में प्रस्तुति स्थल के पवित्रीकरण के लिए थांग-ता की प्रस्तुति की जाती है। केरल की आयुध कला कलरीपयट्टु का गिजंधरी उद्भव है, और कलरी का एक आनुष्ठानिक परिवेश होता है।
आयुध कलाओं में खड़े होने की भंगिमा और हाव-भाव का वही प्रयोजन एवं महत्व होता है जैसे नृत्य में। आयुध कलाओं ने पारंपरिक कलाकारों, मूर्तिकारों, और शिल्पियों को भी आकर्षित किया है और उन्होंने आयुध कलाकार की ऊर्जा और गतियों को पकड़ने की चेष्टा की है। अधिकांश देशों की दृश्य कलाओं जैसे चीन के प्रसिद्ध शाओलिन विहार के भित्ति चित्रों, जापान की लकड़ी के ब्लॉकों की छपाई और चर्म-चित्रावली और इंडोनेशिया व भारत की मूर्ति पट्टिकाओं तथा पत्थर की मूर्तियों में आयुध कलाओं की तकनीक, खड़े होने की भंगिमा, हाव-भाव व अस्त्र-शस्त्र प्रलेखित किए हुए हैं। बालि के द्वारपालों की पत्थर की मूर्तियां युद्ध के उत्साह को प्रकट करती हैं।
आयुध कलाओं की परम्परा की सांस्कृतिक स्थिति वैसी ही है जैसी नाट्यकलाओं की और इसके कारण इन दोनों विपरीत कलाओं के बीच बहुत-से संपर्क सूत्र दिखाई देते हैं। जहां कुछ रूपों में आयुध कला की प्रकृति सशक्त और स्पष्ट होती है, वहीं दूसरों में शैलीबद्धता और सौंदर्यपरक सीमाओं की मात्रा अधिक होती है।
आयुध कलाओं की सह-स्थिति, संबंधित और व्युत्पन्न प्रदर्शन रूपों का तथ्य प्रमुखतः तीन प्रदेशों में मिलता है। दक्षिण भारत में केरल, उत्तर-पूर्व में मणिपुर और पूर्व में छाऊ नृत्य का प्रदेश जो तीन प्रांतों झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में विस्तृत है। तमिलनाडु में भी आयुध कलाओं की परम्परा है, और पारम्परिक प्रदर्शन रूप भी हैं जैसे तेरूकुतु और देवरात्तम आनुष्ठानिक नृत्य। इन दोनों में पैर का काम, गति और शरीर की गतियों पर आयुध कला का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
मणिपुर में जहां आयुध कला बड़ी संपन्न और निरंतर बनी हुई है और प्रदर्शन परम्परा के साथ परस्पर विनिमय और अंतर्क्रिया के संबंध में वर्तमान है। केरल के कलरी में साधारण लोक नृत्यों जैसे कोलकली और वेलकली और आनुष्ठानिक नृत्य तेय्यम से लेकर अत्यधिक विकसित नृत्य नाट्य प्रकार कथकलि और कृष्णाट्टम तक सबका संबंध कलरी से है। छाऊ प्रदेश के परिखंडा की स्थिति थांग-ता और कलरी से भिन्न है। यहां छाऊ नृत्य को जन्म देने वाला परिखंडा समाप्त हो चुका है और इसके आयुध तत्व छाऊ नृत्यों में समा गए हैं।

कुछ सुप्रसिद्ध आयुध कलाएं

कलरीपयट्टु
इसे सर्वाधिक प्राचीन मौजूदा आयुध कला रूप माना जाता है, जिसका इतिहास 2000 वर्ष से अधिक का है, और इसे लोकप्रिय तौर पर जागे जागी वाली चीन की आयुध कलाओं का अग्रणी कहा जाता है, जैसाकि बौद्ध भिक्षु बोधिधर्म इस ज्ञान को भारत से चीन ले गए। कलरीपयट्टु कला का (कलरी = अखाड़ा; पयट्टु = युद्ध/लड़ाई) उद्गम धर्नु वैदिक सामग्री से कहा जाता है जिसमें सभी युद्ध कलाओं को शामिल किया गया है और विष्णु पुराण, जैसाकि ज्ञान की अट्ठारह शाखाओं में से एक, द्वारा वर्णन किया गया है। कलरी स्कूल होते हैं जहां इस आयुध कला का प्रशिक्षण गुरुओं द्वारा दिया जाता है। यह मूलतः केरल की आयुध कला है जिसका सृजन योद्धा संत परशुराम, भगवान विष्णु के अवतार, द्वारा समुद्र में कुल्हाड़ी फेंककर किया गया जिसका जल कुल्हाड़ी गिरने के बिंदु तक सूख गया। तत्पश्चात् परशुराम ने 41 कलरी की स्थापना की और उनके द्वारा सृजित भूमि की रक्षा के लिए 21 मास्टर को कलरी आयुध कला का ज्ञान सिखाया। कलरीपयट्टु प्राथमिक तौर पर चाल, कूद, शरीर के झुकाव एवं उछाल पर बल देकर प्रतिस्प)ीर् के शरीर के मर्मों, 108 ऐसे करण जो बेहद कमजोर होते हैं, पर जोरदार प्रहार करने की योग्यता प्रदान करता है। कलरी में पशु-पक्षियों जैसे हाथी, घोड़ा, सिंह, मुग्र, सूअर, बिल्ली, मछली, और सर्प की गतियों पर आधारित गतियों का बड़ा रीतिबद्ध स्वरूप होता है।
कलरी के बड़े अनुक्रम जिनमें इन पशु और पक्षियों की गतियां मिली-जुली होती हैं जैसे कि कलरी प्रशिक्षु की नमस्कार मुद्रा बेहद सुरूप और ललित होती है,
उसके पूरे शरीर को एक जटिल रेखागणितीय प्रारूप में समेट लेती है।
थांग-ता
थांग-ता और सरित-सारक का इतिहास 17वीं शताब्दी के मणिपुर से है। एक स्थानीय कथा के अनुसार मैतियों (मणिपुरियों) की सब गतियां थांग-ता से ही उद्भूत हुई हैं। इस गिजंधरी कथा से मणिपुर की आयुध कला और प्रदर्शन परम्परा के आंतरिक और आधारभूत संबंध पर प्रकाश पड़ता है। लोक एवं जगजातीय नृत्य विशेषकर नगा जातियों के नृत्यों से लेकर सांस्कृतिक और आनुष्ठानिक प्रदर्शन रूप नट संकीर्तन और सबसे प्राचीन और विस्तृत आनुष्ठानिक प्रदर्शन लाई हरोबा से शास्त्रीय रास नृत्य सभी में थांग-तलवार और ता-भाला के गति तत्व प्रदर्शन रूप में दिखाई देते हैं।
मृदुल पदाघात, दबाव, जटिल पÛचाल, छोटी उछाल, बार-बार आने वाले चौथाई या आधे घुमाव और भौंकने जैसी क्रियाएं ता की विशेषताएं हैं। ऊर्ध्ववर्ती शस्त्रचालन मुद्रा,शरीर के चक्कर काटने और भौंकने जैसी क्रियाएं थांग की गतियों की विशेषता है।
परिखंडा
झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में प्रचलित छाऊ नृत्य भारत की प्राचीन और संपन्न नृत्य परम्परा में विशिष्ट हैं। छाऊ नृत्य लोक और क्लासिकी नैरन्तर्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो भारतीय कला परम्परा की विशिष्टता है। प्रदेश के लोक और जगजातीय नृत्यों से उनका संबंध है, उनका आधार आयुध कला है जो प्रदेश में परिखंडा कहलाता है। स्थानीय भाषा ओडिया में परिखंडा और छाऊ दोनों की शब्दावली एक ही है।
परिखंडा की गतियां भी पशु-पक्षियों की गतियों पर ही आधारित होती हैं जैसे सिंह, सारस, मछली, अश्व, हिरन, और बकरी की गतियां। परंतु परिखंडा की विशेषता यह है कि अनेक गतियां Ûृहिणी के दैनिक कार्यों पर, और किसान की खेतों पर चर्या पर भी आधारित है।
पाइक
यह भी एक आयुध कला है। यह पूरी तरह विकसित छाऊ और परिखंडा के बीच की आयुध कला है। इसमें नर्तक पगड़ी, शिरस्त्राण तथा हाथ और छाती पर लोहे के कवच पहने योद्धा की सज्जा में होते हैं। वे तलवार और टेढ़े खंजर से सज्जित होते हैं। प्रत्येक स्तर पर एक विशेष आयुध या नटबाजी का एकल होता है।
सिलाबम
तमिलनाडु राज्य को आधुनिक एवं वैज्ञानिक ढाल का पालना माना जाता है, जिसे तमिल में लोकप्रिय तौर पर सिलाबम कहा जाता है। तमिलनाडु में पांड्य राजाओं ने ढाल को प्रोत्साहित किया और उनके समकालीन समकक्ष चोल और चेर ने भी इसे प्रोत्साहित किया। सिलाबम एक प्रकार का आयुध कला हथियार था जिसकी रोम एवं यूनान के अतिरिक्त अन्यों ने भी बहुत मांग की।
चेइेइबी गड-गा
यह मणिपुर की एक बेहद प्राचीन आयुध कला है। इसमें युद्ध के हथियार के तौर पर एक तलवार और एक ढाल होती थी, जो अब लाठी और चमड़े की ढाल के रूप में परिवर्तित हो गई है। प्राचीन समय में, इसमें तलवार का प्रयोग किया जाता था। इस आयुध कला में विजय शारीरिक बल या अंधाधुंध बल की अपेक्षा कौशल पर निर्भर करती है।
थोड़ा
यह हिमाचल प्रदेश की आयुध कला है जो धनुर्विधा कौशल पर आधारित है और इसका इतिहास महाभारत के समय से है। इस आयुध कला का उद्गम कुल्लू में हुआ। थोडा नाम तीर के मुहाने पर लगने वाले गोलाकार लकड़ी के टुकड़े से लिया गया है जिसकी भेद्य क्षमता तीव्र होती है। हिमाचल प्रदेश में, प्राचीन समय में थोडा का खेल बेहद रुचिकर तरीक से आयोजित किया जाता था। यह प्रतिस्प)ार् आयुध कला, संस्कृति एवं खेल का सुंदर मिश्रण है और 13 और 14 अप्रैल बैसाखी के दिन आयोजित किया जाता है।
गटका
यह एक हथियारबद्ध भारतीय आयुध कला है जिसे पंजाब के सिक्खों द्वारा स्िापित किया गया। लाठी, तलवार, कृपाण या कटार इसमें हथियार हो सकते हैं। आक्रमण एवं रक्षा पद्धति हाथों एवं कदमों की स्थिति पर आधारित होती है। गटका को पंजाब में विभिन्न समारोहों पर प्रस्तुत किया जाता है।
मर्दानी खेल
यह एक हथियारबद्ध मराठाओं की आयुध कला है। यह परम्परागत आयुध कला कोल्हापुर में की जाती है।
लाठी
यह लाठी-युद्ध शैली है जिसे मूलतः ग्रामीणों द्वारा किया जाता है।
कुश्ती कला
यह पूरे भारत में चलन में है और सामान्यतः संस्कृत में मलविद्या के तौर पर जागा जाता है। वास्तविक प्रहार-युद्ध को मल्ल-युद्ध कहा जाता है, जबकि मालाखरा शब्द का इस्तेमाल खेल में कुश्ती के लिए किया जाता है। वस्तुतः मल्ल-युद्ध उत्तर भारत में विलुप्त हो गया है जबकि इसकी पूर्ति मुगल पहलवानी ने की। वज्र-मुष्ठी एक अन्य प्राचीन कुश्ती कला रूप था जिसमें प्रतिस्पर्द्धी मल्ल करते हैं। मणिपुर में मुकना और मिजोरम में इनबुआन जैसे लोक कुश्ती के अन्य रूप भी पाए जाते हैं।