बाल अपराध की परिभाषा क्या है | बाल अपराध के कारण के रोकथाम के उपाय किसे कहते है juvenile delinquency in hindi

By   December 23, 2020

juvenile delinquency in hindi meaning definition बाल अपराध की परिभाषा क्या है | बाल अपराध के कारण के रोकथाम के उपाय किसे कहते है ?

बाल अपराध
बाल अपराध (juvenile delinquency) की परिभाषा है ष्व्यक्तिगत और सामाजिक अव्यवस्था से संबद्ध किसी भी तरह का गैर-सामाजिक व्यवहार।ष् यह व्यवहार का वह रूप है जो कि समाज के नियमों और प्रतिमानों के विरुद्ध है और जो लोगों को बुरी तरह से प्रभावित करता है। कुछ का विचार है कि वह कोई भी काम, व्यवहार या स्थिति जो अदालत में ले जायी जाए और वहाँ उसका निर्णय किया जाए, अपराध है। अतः अपराध व्यवहार का वह रूप है जो कि समाज के नियमों और मान्यताओं के विरुद्ध है और सामान्य व्यवहार से हटकर है, । अतः बाल अपराध सामाजिक और कानूनी दोनों ही तरह की संकल्पना है।

बाल अपराध में वृद्धि करने वाले कारक
बाल अपराध कई हालातों और परिस्थितियों की उपज है। इन हालातों या कारकों को निम्नलिखित समूहों में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है रू
प) वे टूटे परिवार, जहाँ बच्चों को प्यार, अपनापन, स्नेह व सुरक्षा नहीं मिलती।
पप) रहने की खराब जगह, घरों में और आसपास मनोरंजन के लिए स्थान की कमी।
पपप) गरीबी और माता-पिता द्वारा उपेक्षा।
पअ) बच्चे जो ऐसे व्यवसायों और ऐसी जगहों में काम कर रहे हैं जो अपराधी प्रवृत्ति के लिए अनुकूल हैं।
अ) स्कूल, काम की जगह और आस-पड़ोस में अवांछनीय संगी-साथी।
अप) सिनेमा और साहित्य का आपत्तिजनक प्रभाव।

ऊपर बताए गए कारक केवल उदाहरण के लिए हैं, अनन्य नहीं। इसका यह मतलब नहीं है कि इसमें से एक या एकाधिक कारणों की उपस्थिति बाल अपराध को अवश्य ही बढ़ाएगी। हाँ, ये तत्त्व एक रूप में या मिले-जुले रूप में, अपराधी व्यवहार को बढ़ा सकते हैं।

 बाल अपराध को सुधारने के तरीके
बाल अपराधी की चर्चा करते समय आयु एक महत्त्वपूर्ण घटक है। भारतीय परिपक्वता अधिनियम के अनुसार परिपक्वता की आयु 18 वर्ष निश्चित की गई है। भारतीय दण्डसंहिता के अनुसार 7 वर्ष की आयु से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया हुआ गलत काम अपराध नहीं माना जाता। सामान्यतया 7 से 21 साल तक के बच्चे किशोर माने जाते हैं। परंतु 1986 के बाल अधिनियम के अनुसार, भारत में 16 साल की आयु से कम उम्र का लड़का और 18 साल की आयु से कम उम्र की लड़की किशोर माने जाते हैं। पहले बाल अधिनियम के अनुसार अलग-अलग प्रदेशों में किशोरों की अलग-अलग आयु-सीमा होती थी।

यह अनुभव किया जाता है कि बाल अपराधियों से बर्ताव वयस्क अपराधियों से भिन्न तरीके से किया जाना चाहिए। यदि हम एक किशोर को एक वयस्क की भाँति ही सजा दें और जेल में बंद कर दें तो वह जेल से बाहर आने के समय तक एक पक्का अपराधी बन चुका होगा, जबकि अगर हम उसे एक भिन्न वातावरण में रहने में मदद करें तो यह संभव है कि वह बदल जाए और अपराधी बनने से बच सके। इसको ध्यान में रखते हुए कुछ निवारक और सुधारात्मक उपाय शुरू करने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। इन अधिनियमों के अंतर्गत बनाए गए प्रावधानों का नीचे वर्णन किया जा रहा है।

किशोरों के मामलों को अनौपचारिक व सरल वातावरण में सुलझाने के लिए किशोर अदालतों का गठन किया गया है। इन अदालतों का नेतृत्व पूर्णकालिक विशेष मजिस्ट्रेटों, अधिमानतः स्त्रियों द्वारा किया जाता है। किशोरों को अदालत में हथकड़ी या बेड़ी डालकर नहीं लाया जाता। उनके मामलों की पैरवी वकीलों द्वारा नहीं बल्कि विशेष अधिकारियों जिन्हें परिवीक्षा अधिकारी (चतवइंजपवद वििपबमत) कहते हैं, द्वारा होती है।

वे लोग जिन्हें सामाजिक कार्य और सुधारात्मक प्रशासन का प्रशिक्षण प्राप्त है, परिवीक्षा अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। प्रत्येक परिवीक्षा अधिकारी को कुछ बाल अपराधी सौंप दिए जाते हैं। वह अधिकारी (स्त्री या पुरुष) उनके घरों व स्कूलों में जाकर व उनके माता-पिता, मित्रों और पड़ोसियों से मिलकर उनके मामलों की जाँच-पड़ताल करता है। वह सुधारात्मक उपायों और बच्चों के पुनर्वास के लिए योजनाएँ बनाता है।

अदालत द्वारा मामलों का निर्णय होने तक बाल अपराधियों को ष्सुधार-गृहष् अर्थात् ष्रिमांड होमष् में रखा जाता है। वहाँ उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और उनके मानसिक, शारीरिक और नैतिक सुधार के लिए पर्याप्त उपाय किए जाते हैं। लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग सुधार-गृह है।

अदालत के निर्णय के पश्चात वे बच्चे, जिनके अपराध छोटे ही होते हैं, माता-पिता को सौंप दिए जाते हैं और वे बच्चे जिन्हें निगरानी की बराबर जरूरत है देखभाल, उपचार, शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए अनुमोदित स्कूलों और संस्थाओं में रखे जाते हैं। उनसे यह आशा की जाती है कि जब तक वे स्कूलों से बाहर आएंगे, उनकी अपराधी वृत्तियाँ समाप्त हो चुकी होंगी और वे अच्छी नागरिकता के गुणों से परिपूर्ण हो चुके होंगे।