महाखड्ड किसे कहते हैं ? कैनियन की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब interlocked Gorge in hindi canyon

By   August 26, 2021

interlocked Gorge in hindi canyon महाखड्ड किसे कहते हैं ? कैनियन की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब ?

नदी अपरदन द्वारा निर्मित स्थलाकृतियाँ
(Landforms made by River erosion)

(1) महाखड्ड (interlocked Gorge) – नदी जब पर्वतीय या पठारी क्षेत्रों से गुजरती है तब कमजोर चट्टानों के क्षेमत्र में अपनी घाटी को बहुत तेजी से गहरा करती जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में पर्वतीय मोडों के मध्य, निम्न घटियों में नदी अपनी घाटी को उसी गति से गहरा करती जाती है जिस दर से पर्वतों का उत्थान होता है। इन परिस्थितियों में नदी की घाटी संकरे ट अक्षर के समान बन जाती है। इसकी गहराई हजारों मीटर की पायी जाती है। जैसे कोलोरेडो नदी, सतलज नदी, ब्रह्मपुत्र नदी ने गहरी घाटियाँ बनाई हैं। जब इनकी गहराई अत्यधिक पायी जाती है तब इसे केनियन (canyon) कहा जाता हैं। कोलोरेडो नदी द्वारा 480 किमी. लम्बी 1800 मीटर गहरी घाटी बनायी गयी है। सिन्धु नदी ने गिलगित में 5500 मीटर गहरी केनियन बनायी है।
(2) नदी घाटी (River valley) – प्रत्येक नदी सर्वप्रथम अपनी घाटी का निर्माण करती है। बस जल जैसे ही स्थल पर ढाल के अनुरूपा आगे बढ़ता है, तब घाटी का निर्माण होता है, जो अंग्रेजी अक्षर ट के समान होती है। उपरोक्त वर्णित नदी अपरदन के प्रकारों से नदी अपनी घाटी का विस्तार करती है। इसके साथ क्षेत्र की जलवायु, अवसादों की मात्रा, जल की मात्रा घाटी के विकास को प्रभावित करते है। जब नदी में जल की मात्रा कम होती है तो घाटी संकरी बनती है। और जब नदी का मार्ग कठोर चट्टानों के ऊपर होता है तो नदी की घाटी मन्द गति से गहरी होती है,परन्तु चैड़ी नहीं होती व कन्दरा का निर्माण होता है। अवसादी चट्टानों में नदी चैड़ी घाटी बनाती है।
जिन प्रदेशों में वर्षा अधिक होती वहाँ नदियों में जल की मात्रा अधिक होती है जैसे अमेजन नदी व ब्रह्मपुत्र नदी। ऐसी नदियों की घाटी बहत चैडी पायी जाती है। जो नदियाँ हजारों कि.मी. लम्बी होती हैं उनके विभिन्न भागों धरातल की संरचना एवं जलवायु के अन्तर के कारण घाटी विभिन्न स्वरूपा की घाटियाँ बनाती है जैसे सिन्धु व ब्रह्मपुत्र नदियाँ हिमालय क्षेत्र में गहरी केनियन बनाती हैं तथा मैदानी इलाकों में चैड़ी घाटियों का निर्माण करती हैं तथा समुद्र से मिलने पर डेल्टा बनाती हैं। नदी की घाटी के मार्ग में कठोर चट्टानें आ जाती है तो यह मार्ग बदल लेती है। मार्ग के घुमावदार होने पर दोनों पार्श्व पर ऊँचे भाग तीव्र वर्षा व जल के बहाव से नतोदर ढाल (concave slope) के बन जाते हैं एवं ऊँची चोटियाँ स्पर (spur) की तरह बन जाती है। क्रम से दोनों पार्श्व में बनते हैं तब इन्हें अन्तर्बोधत (interlocked spur) कहते हैं।

(3) गर्तिका (Pot holes) नदी की तली में मुलायम चट्टानों पर अधिक अपरदन होता है व उसमें गर्त बनने लगता है, इसे ही जल गर्तिका कहते हैं। यहाँ नदी के जल में भंवर बन जाते हैं। जल गर्तिका के निमार्ण से नदी की घाटी गहरी होती जाती है। चट्टानों की संरचना में अन्तर पाये जाने से इस प्रकार के गर्त बनते हैं।
(4) क्षिप्रिका (Rapids) – जब चट्टानों की कठोरता में अन्तर होता है तब कठोर चट्टानें कम व कोमल चट्टानें अधिक अपरदित होती हैं जिससे नदी तल में असमानता उत्पन्न हो जाती है व नदी के मार्ग में छोटे-छोटे जल प्रपात क्रम से बनने लगते हैं इन्हें क्षिपिका कहा जाता है।
(5) जलप्रपात (Waterfalls) – किसी स्थान पर जब नदी का जल ऊँचाई से गिरता है तो उसे जल प्रपात कहते हैं। इनके निर्माण का प्रमुख कारण चट्टानों की संरचना में अन्तर है। कठोर व कोमल चट्टानों की असमान उपस्थिति से ये बनते हैं।
(अ) कठोर शैल जब क्षैतिज रूपा से कोमल चट्टान के ऊपर होती है तब उसका अपरदन नहीं हो पाता व नीचे की कोमल चट्टान कटती जाती है। बाद में ऊपर की कठोर चट्टान भी टूट कर गिर जाती है व जलप्रपात का निर्माण होता है। नियाग्रा प्रपात इसी प्रकार बना है व निरन्तर पीछे हट रहा है।
(ब) जब कठोर चट्टानें व कोमल चट्टानें लम्बवत रूपा से खड़ी रहती हैं तब कोमल चट्टानें तेजी स नदी द्वारा अपरदित हो जाती हैं तथा मार्ग में उतार -चढ़ाव उत्पन्न हो जाता है व जल प्रपात का निर्माण हो जाता है।
(6) नदी वेदिकायें (River Terraces) – नदी प्रौढ़ावस्था तक घाटी को चैड़ा कर लेती है। घाटी छिछली व तलछट से भर जाती है। इस समय नदी घाटी का पुनर्युर्वत (rejuvenation) हो जाने पर नदी अपनी घाटी पुनः गहरा करने लगती है। इस प्रकार घाटी के भीतर नई घाटी का निर्माण होने लगता है तथा घाटी के पार्श्व में सीढ़ीनुमा आकृति बन जाती है। इसे नदी वेदिकफा कहते हैं।
(7) नदी विसर्पण (River Meandering) – मैदानी भागों में नदी की घाटी का ढाल कम हो जाता है अतः नदी मार्ग में थोड़ा-सा भी अवरोध आने पर अपना मार्ग बदल देती है व उसके मार्ग में मोड़ बन जाते हैं। जब अवसादों की मात्रा बढ़ जाती है तो नदी मार्ग में उन्हें छोड़ देती है व अपना मार्ग दूसरी तरफ बना लेती है। इस क्रिया से मार्ग वक्राकार हो जाता है। इस क्रिया को नदी विसर्पण कहा जाता है। नदी अत्यधिक चैड़ी हो जाती है व नदी उसमें घुमावदार मार्ग का अनुसरण करती है। इसमें पाश्विक अपरदन शामिल रहता है।
(8) नदी अपहरण (River capture) – प्रारंभ में नदियाँ दाल के अनुरूपा मुखवर्ती अपरदान का अपना मार्ग सुनिश्चित करती है, किन्तु बाढ़ में यह उद्गम की ओर से शीर्ष अपरदन आराम कर देती है या प्रकार जल विभाजक कटने लगते हैं व छोटी नदियों को बड़ी नदी अपने में आत्मसात कर लेती है। इस किया को नदी अपहरण कहा जाता है। नदी अपहरण प्रायः जल विभाजक पर होता है। अगर जल विभाजक के एक तरफ कठोर चट्टानें व दूसरी तरफ कोमल चट्टानें हो तो अपरदन की भिनता से सरिता अपहरण हो जाता है। अगर एक तरफ नदी बड़ी हो व दूसरी तरफ नदियाँ छोटी कम जल वालों से तो बढे नदी अपनी घाटी का तेजी से प्रसार कर लेती है और समीपवर्ती सहायक नदियों को घाटी उसमें मिल जाते हैं तथा सरिता का भी अपहरण हो जाता है।
इस प्रकार नदी अपने मार्ग में घाटी के साथ अन्य भू-रूपा भी बनाती है। इसमें स्थल को बनावट, चट्टानों की संरचना, नदी में जल व अवसाद की मात्रा जैसे कई तत्व प्रभावित करते हैं।
नदी का परिवहन कार्य
(Transportation by River)
नदी के जल के साथ ही वह अपने साथ मार्ग में मिलने वाले कंकड़-पत्थर बहाकर ले जाती है। ढाल का प्रवणता तथा जल का वेग एवं जल की मात्रा के अनुसार छोटे-बड़े अनेक पत्थर साथ में बहकर या लुढ़ककर नदी के साथ चल देते हैं। एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष नदियों द्वारा यू.एस.ए. में 80,000,000 अवसाद समुद्रों में निक्षेपित किए जाते हैं। नदी के अपरदन के अलावा अपक्षय से भूस्खलन से, स्तापग स प्राप्त चट्टान चूर्ण नदी अपने साथ प्रवाहित करती है। नदी के जल के साथ अवसादों का परिवहन कई प्रकार से होता है
(1) लुढ़ककर (By friction) – जब नदी के बहाव की शक्ति से बड़े चट्टान के टुकड़े जो मार्ग में आ जाते है, वह तली में लुढ़कते हुए आगे बढ़ते हैं। यह आपस में टकराकर गोलाकार रूपा ले लेते है साथ ही नदी घाटी की तली को भी रगड़ते जाते है।
(2) रगड़ खाकर (By abrnsion) – नदी में अवसादों की अधिक मात्रा में होने पर बारीक का व मटर जैसे दाने रगड़ खाते हए बहते जाते हैं। कुछ कण उछलते हए भी आगे बढ़ते हैं, इससे नदी के पेदें व किनारों पर कटाव होता है।
(3) तैरती अवस्था में (By Susnension) – महीन हल्के कण नदी जल में झुलती अवस्था में बदले है। इसी कारण नदी का जल बाद के समय मटमैला दिखाई देता है। ये इतने बारीक हो जाते हैं कि तैरते लगते है परन्तु जल में धुलते नहीं है।
(4) घुली अवस्था में (By Solution) –  नदी मार्ग में आने वाली चट्टानों के अनेक खनिज जल से संपर्क होने पर जल मेघल जाते है। ऐसा घला हआ नदी का भार दिखाई नहीं देता, परन्तु पर्याप्त मात्रा में नदी जल के साथ बहता रहता है।
नदी अवसादों को कब तक परिवहित करेगी व कितनी मात्रा में करेगी यह नदी की कई विशेषताओं पर निर्भर करता है। जब नदी का वेग तीव्र होता है व जल की मात्रा अवसादों से अधिक होती है तभी अवसादो का परिवहन संभव है। अमेजन नदी यद्यपि विश्व की सबसे बड़ी नदी है, परन्तु उसमें अवसादों की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि नदी का जल फैल जाता है व उसका मैदानी इलाका दलदली अवस्था में मिलता है। पर्वतीय नदियों में जल की मात्रा कम होती है, परन्तु तीव्र ढाल के कारण वह अपनी क्षमता से अधिक अवसादों को लुढ़काकर ले जाती है। विभिन्न प्रकार के पत्थरों को बहा ले जाने की शक्ति नदी में उसके वेग से तीन गुना अधिक होती है। नदी का परिवहन अवसाद के स्वरूपा पर भी निर्भर करता है। बहत बड़े पत्थरों को नदी दूर तक लुढ़काकर साथ नहीं ले जा पाती। छोटे व महीन कणों का परिवहन अधिक दूरी तक होता है। चीका, दोमट, जैसे महीन कण अन्तिम छोर तक परिवहित होते हैं। बड़े-बड़े पत्थर व मोटा शिलाचूर्ण जैसे ही ढाल (गति) में परिवर्तन आता है निक्षेपित हो जाती है।