कृषि के विकास में उद्योग का योगदान role of industry contribution to agriculture development

By   December 30, 2020

role of industry contribution to agriculture development in hindi कृषि के विकास में उद्योग का योगदान क्या है ?

कृषि के विकास में उद्योग का योगदान
उद्योग कई प्रकार से कृषि के विकास में योगदान करता है तथा इसकी प्रगति को संभव बनाता हैः

उर्वरक, कीटनाशक और यहाँ तक कि पानी सहित अधिकांश आधुनिक आदान उद्योग द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं।

उद्योग खेतों के लिए आवश्यक मशीन उपलब्ध कराते हैं।

कृषि-अभियांत्रिकी उद्योग का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

हमारे देश में हरित क्रांति के लिए उत्तरदायी अधिकांश अनुसंधान उस वातावरण में संभव हुए जिसे औद्योगिक संस्कृति कहा जाता है।

उद्योग कृषि की प्रगति के लिए अपेक्षित आधारभूत संरचना के निर्माण में सहायता करता है। इसमें परिवहन और संचार, व्यापार और वाणिज्य, बैंकिंग और विपणन तंत्र इत्यादि सम्मिलित हैं।

उद्योग ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ती हुई जनसंख्या और आय के परिणामस्वरूप उपभोक्ता मालों की बढ़ती हुई माँग को पूरा करता है।

संक्षेप में, एक विकासशील देश के लिए कृषि और उद्योग दोनों के एकीकृत विकास को बढ़ावा देना एक विवेकसम्मत और युक्तिसंगत रणनीति है, न सिर्फ इसलिए कि आर्थिक विकास की दिशा में वे परस्पर निर्भर हैं; अपितु इसलिए भी कि वे तकनीकी दृष्टि से भी परस्पर संबंधित हैं, चूंकि दोनों क्षेत्र अपनी-अपनी उत्पादन प्रक्रिया में दूसरे के उत्पादन का किसी न किसी प्रकार से उपयोग अवश्य करते है। कृषि और उद्योग के एकीकृत विकास की रणनीति तैयार करने में कृषि आधारित उद्योगों को महत्त्वपूर्ण भूमिका सौंपी जानी चाहिए, क्योंकि वह दोनों के बीच में अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण कड़ी है। विकासशील देश अत्याधुनिक औद्योगिक काम्प्लेक्स को बढ़ावा देने के प्रयास में कृषि आधारित उद्योगों की, उस महत्त्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज कर देते हैं। जो वह, कृषि और उद्योग के एकीकृत विकास को बढ़ावा देने और जड़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गतिमान औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बदलने में निभा सकता है।

उद्योग और व्यापार में सहलग्नता (लिंकेज)
उद्योग और व्यापार के बीच पश्चानुबंध और अग्रानुबंध अर्थव्यवस्था के किसी अन्य दो क्षेत्रों के बीच सहलग्नता की तुलना में अधिक पारदर्शी और गहरा है। यह कहना सिर्फ पुनरोक्ति होगी कि:
ऽ तीव्र औद्योगिकरण के फलस्वरूप व्यापार का तेजी से प्रसार होता है, और
ऽ व्यापार का तेज प्रसार, तीव्र औद्योगिकरण की अनिवार्य शर्त है।

तथापि, इससे पहले कि हम इस सहलग्नता की प्रकृति की जाँच-पड़ताल करें हम यह बताना चाहेंगे कि व्यापार घरेलू व्यापार अथवा विदेशी व्यापार दोनों में से एक हो सकता है। घरेलू व्यापार में माल और सेवाओं का प्रवाह देश की भौतिक सीमाओं के अंदर होता है, विदेश व्यापार में माल और सेवाओं का प्रवाह सीमा के आर-पार होता है। इस भाग में हम औद्योगिकरण और विदेश व्यापार के बीच सहलग्नता का अपना विश्लेषण जारी रखेंगे। हम घरेलू व्यापार का विश्लेषण आगे के भाग में करेंगे।

 औद्योगिकरण और विदेश व्यापार
पूर्व में विदेश व्यापार ने ‘‘विकास के इंजिन‘‘ की भाँति कार्य किया है (उन्नीसवीं शताब्दी में ग्रेट ब्रिटेन और बीसवीं शताब्दी में जापान), और हाल के समय में भी एशिया की नई औद्योगिकरण करने वाली अर्थव्यवस्थाएं जैसे, हांगकांग (इस समय चीन का विशेष प्रशासित क्षेत्र), सिंगापुर, ताइवान, मलेशिया, थाइलैंड और दक्षिण कोरिया द्वारा अपनाई गई ‘‘बहिर्गामी-अभिविन्यास विकास रणनीति‘‘ (आउटवार्ड ओरिएण्टेड ग्रोथ स्ट्रेटेजी) ने उन्हें छोटे संसाधनविहीन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की बाधाओं को पार करने में सक्षम बनाया है।

विदेश व्यापार कई प्रकार से तीव्र औद्योगिकरण में योगदान करता है:
सबसे पहले विदेश व्यापार तीव्र औद्योगिकरण के लिए भौतिक साधन (पूँजीगत माल, मशीन और कच्चा माल तथा अर्द्ध निर्मित वस्तुएँ) सुलभ कराते हैं।

दूसरा, संभवतः भौतिक सामग्रियों के आयात से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण तकनीकी ज्ञान, दक्षता, प्रबन्धकीय मेधा और उद्यमिता का आयात है। यह, निश्चय ही विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। किंतु विकसित देशों को भी परस्पर व्यापार से अत्यधिक लाभ होता है और कम विकसित औद्योगिक देशों को भी अधिक विकसित देशों से बेहतर तकनीकी और प्रबन्धकीय ज्ञान की प्राप्ति से लाभ हो सकता है।

विकास और औद्योगिकरण की प्रक्रिया में विलम्ब से सम्मिलित होने वाले देशों को इस बात का सदैव फायदा रहता है कि वे औद्योगिकरण के क्षेत्र में अग्रणी देशों के अनुभवों, सफलताओं-असफलताओं और भूलों से सीख ले सकते हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी में महाद्वीपीय यूरोपीय देशों और अमरीका को ग्रेट ब्रिटेन में हुई औद्योगिक क्रांति की प्रौद्योगिकीय आविष्कारों तथा उपलब्धियों से अत्यधिक लाभ हुआ था, बाद में जापानी नवीन आविष्कारों, ज्ञान-विज्ञान आदि को सीखने में अत्यन्त योग्य सिद्ध हुए।

आज विकासशील देशों के सम्मुख प्रौद्योगिकीय ज्ञान का विशाल और सतत् वर्द्धमान भण्डार विद्यमान है जिसमें से वह प्रौद्योगिकीय ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यह सच है कि विकसित देशों की परिस्थितियों के अनुकूल विकसित पद्धतियों को सीधे अपना लेना बहुधा संभव नहीं है। किंतु अनुकूलन पहली-पहली बार आविष्कार करने से निश्चय ही कहीं अधिक आसान है।

व्यापार प्रौद्योगिकीय ज्ञान के पारगमन का सबसे महत्त्वपूर्ण वाहक है। लेकिन ऐसा नहीं कि व्यापार ही इस पारगमन का एकमात्र स्रोत है। वस्तुतः सौ वर्ष पूर्व व्यापार की यह भूमिका जितनी महत्त्वपूर्ण थी, संभवतः आज उतनी नहीं है क्योंकि विचार, दक्षता, तकनीकी जानकारी उन्नीसवीं शताब्दी की अपेक्षा अधिक आसानी तथा तीव्रता से और कम खर्च पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाते हैं। आज बाजार जिसमें अभियांत्रिकी और प्रबन्धकीय विशेषज्ञों को वेतन पर रखा जा सकता है पहले की अपेक्षा अधिक संगठित है। इस क्षेत्र में और महत्त्वपूर्ण पूँजीगत उपस्करों के क्षेत्र में आज कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा है। उन्नीसवीं शताब्दी में सिर्फ ग्रेट-ब्रिटेन ही एक ऐसा केन्द्र था जिससे औद्योगिक उपस्कर और तकनीकी जानकारी हासिल की जा सकती थी, और इन दोनों के निर्यात पर अनेक प्रतिबन्ध भी थे। आज यदि अधिक नहीं तो कम से कम ऐसे एक दर्जन केन्द्र हैं और यह सभी अपनी मशीनें और अभियांत्रिकी परामर्श तथा तकनीकी जानकारी बेचने को तत्पर हैं।

हालाँकि, व्यापार अभी भी पारगमन का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। जे एस मिल ने सैंकड़ों वर्ष पहले जो कहा था वह आज भी बहुत हद तक सच है: ‘‘मानव के अल्प विकास की इस स्थिति में मानव को उनसे विजातीय भिन्न प्रकार से सोचने तथा अलग प्रकार से कार्य करने वाले व्यक्तियों के संपर्क में रखने के महत्त्व का अधिमूल्यांकन करना संभव नहीं।‘‘ इस तरह के संपर्क सदैव और विशेषकर वर्तमान युग में प्रगति का प्रमुख स्रोत रहा है।

तीसरे, व्यापार पूँजी के प्रवाह के साधन के रूप में भी कार्य करता है। यह सच है कि एक विकासशील देश विदेश रो जो पूँजी प्राप्त कर सकता है वह पहले विकसित देश की ऋण देने की क्षमता और इच्छा पर निर्भर करता है और इस संबंध में निर्णय लेने की उनकी प्रक्रिया पर निश्चय ही उधार लेने वाले देश की आंतरिक नीतियों का प्रभाव पड़ता है। किंतु यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अन्य बातों के समान रहने पर यथार्थवादी पूर्वधारणा के अंतर्गत व्यापार का परिमाण जितना ही अधिक होगा, उतनी ही ज्यादा विदेशी पूँजी के आने की आशा की जा सकती है।

इसका कारण यह है कि, व्यापार की मात्रा अधिक होने से ब्याज और मूलधन के पुनर्भुगतान का अंतरण अधिक सरलता से किया जा सकता है, जो कि व्यापार का परिमाण कम होने पर संभव नहीं है और यदि ब्याज तथा मूल के पुनर्भुगतान की संभावना कम है, तो पूँजी के बड़े पैमाने पर प्रवाह की आशा करना अयथार्थवादी होगा। इससे भी अधिक संबंधित तथ्य यह है कि निर्यात उद्योगों के लिए विदेशी पूँजी प्राप्त करना अधिक सरल है क्योंकि उनमें अन्य प्रकार के निवेशों की तुलना में जो प्रत्यक्ष तौर पर स्वयमेव भुगतान संतुलन में सुधार नहीं करता है पुनः अंतरण की समस्या का समाधान अन्तर्निहित होता है। विदेशी पूँजी द्वारा निर्यात उद्योगों को यह अधिमानता दिया जाना खेद जनक है क्योंकि अन्य प्रकार के निवेश (जैसे सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, रेल मार्गों, विनिर्माण उद्योगों में निवेश) बहुधा अधिक उत्पादक होते हैं और ये तीव्र औद्योगिकरण में ज्यादा योगदान कर सकते हैं।

चैथा, व्यापार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का पोषण करके तथा अकुशल एकाधिकार को नियंत्रण में रख कर तीव्र औद्योगिकरण को बढ़ावा देता है। अमरीकी अर्थव्यवस्था दूसरी कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी और दक्ष है उसका कारण संभवतया यह है कि अमरीका में एकाधिकार विरोधी नीति की तुलना में अधिक आंतरिक व्यापार स्वतंत्रता है जो सदैव ही यूरोप या किसी भी अन्य जगह की तुलना में अमरीका में अधिक लोकप्रिय है।

विकासशील देशों के लिए भी बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा, विशेषकर उनके जैसे सामान्यतया छोटे आकार के बाजार में (यद्यपि कि भौगोलिक क्षेत्र विस्तृत होता है), महत्त्वपूर्ण है। फिर भी आरक्षण किया जाता है। औद्योगिकरण की शैशवावस्था में देश की विशालता और उद्योग के प्रकार के अनुसार एकाधिकार पूर्ण स्थितियों के सृजन को न्यायोचित ठहराया जा सकता है। किंतु यह समस्या हमेशा रहेगी कि एक उद्योग की जड़ें गहरी हो जाने तथा आयात संबंधी प्रतिबंधों की वैशाखी के बिना भी खड़ा हो सकने की स्थिति में आ जाने के बावजूद कैसे अकुशल तथा शोषक एकाधिकारी प्रवृत्तियों को जड़ जमाने से रोका जाए।

पाँचवाँ, विदेश व्यापार छोटे घरेलू बाजार की सीमाओं की समस्या को हल करता है।

संक्षेप में, विदेश व्यापार विकासशील देशों की उत्पादक क्षमताओं के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है और उस सीमा तक तीव्र औद्योगिकरण में सहायक होता है।

 विदेश व्यापार के विकास में उद्योग का योगदान
यह कहना मात्र पुनरावृत्ति करना होगा कि तीव्र औद्योगिकरण से विदेश व्यापार, निर्यात और आयात दोनों को बढ़ावा मिलता है। एक अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण की प्रक्रिया जैसे-जैसे बढ़ती है, व्यापार के माल का परिमाण भी बढ़ता जाता है। यह नहीं कि मात्र व्यापार के कुल आकार में वृद्धि होती जाती है अपितु इसका सापेक्षिक आकार इस अर्थ में भी बढ़ता जाता है कि सकल घरेलू उत्पाद में विदेश व्यापार के अनुपात का बढ़ना भी जारी रहता है।

इसी प्रकार, वैश्विक व्यापार में भी देश का हिस्सा बढ़ना जारी रहता है

सकल घरेलू उत्पाद में निर्यात/आयात का हिस्सा व्यापारिक कार्यकलाप के संबंध में अर्थव्यवस्था के बहिर्गामी-अभिविन्यास अथवा खुलेपन की अवस्था को दर्शाता है। यह हिस्सा मोटे तौर पर देश में अपनाई गई व्यापार रणनीति की प्रकृति को प्रतिबिम्बित करता है। सकल घरेलू उत्पाद में निर्यात का अनुपात निर्यात के संबंध में अर्थव्यवस्था की औसत आपूर्ति क्षमता की व्याख्या करने के लिए भी किया जा सकता है। इसे औसत निर्यात प्रवृत्ति भी कहा जा सकता है। आयात और सकल घरेलू उत्पाद के बीच इसी प्रकार के अनुपात से आयात की औसत प्रवृत्ति का पता चलता है।

तथापि, छोटी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बड़ी अर्थव्यवस्था में संसाधनों के कुशल आवंटन के अंतर्गत उत्पादन में निर्यात का उपयुक्त हिस्सा स्पष्ट तौर पर कम होगा। विश्व व्यापार में निर्यात का हिस्सा विश्व अर्थव्यवस्था में राष्ट्र के रूप में देश के महत्त्व को दर्शाता है।

आगे, निर्यात के मूल्य में परिवर्तनों की तुलना आयात के मूल्य में परिवर्तनों से की जा सकती है। इन दोनों चरों (प्रभावित करने वाली वस्तुओं) के बीच संबंध को आयात-निर्यात मूल्य-स्थिति के रूप में जाना जाता है; अर्थात् मूल्य जिस पर निर्यात का विनिमय आयात के लिए होता है; यदि निर्यात मूल्य आयात मूल्य की तुलना में वृद्धि दर्शाता है तो आयात-निर्यात मूल्य-स्थिति को अनुकूल कहा जाता है। अनुकूल आयात-निर्यात मूल्य-स्थिति का यह अर्थ है कि एक देश निर्यात मूल्य की अपेक्षा अधिक मूल्य में आयात कर सकता है। इसके विपरीत यदि आयात-निर्यात मूल्य-स्थिति प्रतिकूल है तो एक देश को अपने आयात की मात्रा के लिए कहीं अधिक मात्रा में निर्यात करना होगा।

व्यापार के मूल्य से भी अधिक महत्त्वपूर्ण व्यापार का संघटन है। व्यापार के संघटन से एक अर्थव्यवस्था की संरचना और विकास के स्तर का पता चलता है। उदाहरण के लिए, अधिकांश विकासशील देश अपने निर्यात आय के लिए कुछ प्राथमिक वस्तुओं पर निर्भर करते हैं, ये देश कृषि क्षेत्र के कच्चे मालों का निर्यात और विनिर्मित औद्योगिक उत्पादों का आयात करते हैं, इस प्रकार वे मूल्य-संवर्द्धन के लाभ से वंचित रह जाते हैं। एक अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण जैसे-जैसे बढ़ता है, इसका व्यापार भी विविधतापूर्ण होता चला जाता है और यह कुछ ही देशों पर निर्भर नहीं रह जाता है। इस संबंध में, यह पूछा जा सकता है कि क्या निर्यात के लिए बाजार और आयात के लिए आपूर्ति के स्रोतों का केन्द्रीकरण हुआ है अथवा विकेन्द्रीकरण ।

विदेश व्यापार की सम्पूर्ण संरचना-मूल्य, संघटन और दिशा-बहुत हद तक सरकार द्वारा अपनाई गई व्यापार नीति से निर्धारित होती है।

व्यापार नीति से अभिप्राय उन सभी नीतियों से है जिसका किसी देश के व्यापार व्यवहार पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष प्रभाव पड़ता है। विभिन्न नीतियों का ब्यौरा देश में अपनाई गई व्यापक व्यापार रणनीति पर निर्भर करता है; और व्यापार रणनीति नियोजकों द्वारा अपनाई गई व्यापक विकास रणनीति पर निर्भर करता है।

मोटे तौर पर दो प्रमुख व्यापार नीतियों की पहचान निम्नवत् की जा सकती है:
ऽ अन्तर्मुखी (Inward-oriented) व्यापार नीति; और
ऽ बहिर्मुखी (Outward-oriented) व्यापार नीति।

एक व्यापक ढाँचे में, अन्तर्मुखी व्यापार नीति का अभिप्राय उन सभी नीतियों से है जो विदेशी संसाधनों पर निर्भरता को हतोत्साहित करती है। इस रणनीति के अंतर्गत, इसके अतिवादी स्वरूप में किसी भी विदेशी सहायता की अनुमति नहीं होती है, उत्पादन के कारकों को देश के अंदर लाने अथवा देश से ले जाने की अनुमति नहीं होती है, किसी भी बहुराष्ट्रीय निगम के लिए कोई स्थान नहीं होता है और अन्तरराष्ट्रीय संचार की स्वतंत्रता नहीं होती है।

प्राथमिक वस्तुओं के निर्यात की तुलना में, विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात से अधिक मूल्य संवर्द्धन लाभ प्राप्त होता है क्योंकि वह प्रसंस्करण के कई चरणों से होकर गुजरता है। विनिर्मित क्षेत्र का शेष अर्थव्यवस्था से अधिक सहलग्नता होता है और इसलिए प्राथमिक वस्तुओं के निर्यात की अपेक्षा इन क्षेत्रों से निर्यात का शेष क्षेत्रों पर अधिक अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

जिन वस्तुओं का व्यापार किया जाता है उन्हें अन्य विभिन्न मापदंडों के द्वारा भी वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे उत्पादन की प्रति इकाई में किया गया मूल्यसंवर्द्धन, श्रम की उत्पादकता,उत्पादन में पूँजी प्रधानता, पश्चानुबंध और अग्रानुबंध की शक्ति इत्यादि । इन वर्गों में व्यापार के वस्तु संघटन में परिवर्तन के परिणामस्वरूप आय के सृजन, रोजगार प्रभाव और सहलग्नता प्रभाव के माध्यम से समग्र औद्योगिकरण इत्यादि के संबंध में संरचनात्मक परिवर्तन होता है।

औद्योगिकरण का परिमाण व्यापार की दिशा को भी प्रभावित करता है। औद्योगिकरण की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती है और व्यापार का विविधिकरण होता है, एक देश को अपने निर्यात के लिए नया बाजार खोजना पड़ता है। आयात के मामले में भी चयन का अवसर बढ़ जाता है। देश का सतत् वृद्धिशील वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था के साथ व्यापार शुरू हो जाता है।

इस अतिशय अन्तर्मुखी ढाँचा के ठीक विपरीत बहिर्गामी ढाँचा है जिसमें पूँजी, श्रम, माल, बहुराष्ट्रीय उपक्रमों के आने-जाने की छूट होती है और संचार की आजादी रहती है। विनिर्मित औद्योगिक मालों का निर्यात और औद्योगिक कच्चे मालों, पूँजीगत उपस्करों तथा तकनीकी जानकारी का आयात बढ़ जाता है। देश में अतिशय अन्तर्मुखी अभिविन्यास का अस्तित्व नहीं के बराबर रह जाता है।

अलग-अलग देशों में अलग-अलग समय और काल में अलग-अलग मात्रा में अन्तर्मुखी तथा बहिर्गामी अभिविन्यास देखा गया है।

बहिर्गामी अभिविन्यास के पक्ष में तर्क
बहिर्गामी अभिविन्यास के पक्षधर तर्क देते हैं कि खुलापन अच्छे शैक्षणिक प्रभावों, नए विचारों और नई तकनीकों को लाने, संगठन के नए रूपों के विकास इत्यादि में उपयोगी होता है । उनका विश्वास है कि मुक्त-व्यापार से व्यापार के माध्यम से सीखने को प्रोत्साहन मिलता है तथा अर्थव्यवस्था के गतिमान परिवर्तन से उच्चतर जीवन स्तर की प्राप्ति होती है। मुक्त-व्यापार में सबकी जीत है, सभी व्यापारिक साझीदारों को उनकी घरेलू संस्थाओं और नीतियों में विविधता होने पर भी उत्पादकता में सुधार से लाभ ही लाभ होता है ।

अन्तर्मुखी अभिविन्यास के पक्ष में तर्क
अन्तर्मुखी अभिविन्यास के पक्षधर इन तर्कों के विरुद्ध यह दलील देते हैं कि अन्तर्मुखी अभिविन्यास नीतियों से घरेलू प्रतिभा को प्रोत्साहन मिलता है, स्वयं ही कोई काम करना सीखता है, घरेलू प्रौद्योगिकीय विकास और उत्पादों की धारणीय श्रृंखला को प्रोत्साहन मिलता है तथा बाहरी विश्व के प्रदर्शन के बुरे प्रभावों से बचा जा सकता है। विकासशील और विकसित देशों के बीच विकास के अंतराल के मद्देनजर भी अनिवार्य नीति के रूप में अन्तर्मुखी अभिविन्यास के पक्ष में दलील दी जाती है।

उत्पादन में वृद्धि, रोजगार, आय के सृजन और आय संबंधी असमानता के संबंध में इन दो प्रकार की रणनीतियों के प्रभाव भी अलग-अलग तरह के हो सकते हैं और इस संदर्भ में कोई सामान्य निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।

बोध प्रश्न 2
1) उद्योग कृषि क्षेत्र के विकास में किस प्रकार से योगदान कर सकता है, किन्हीं पाँच तरीकों का उल्लेख कीजिए।
2) विदेश व्यापार किस तरह से एक अर्थव्यवस्था के तीव्र औद्योगिकरण में सहायक होता है?
3) किस प्रकार तीव्र औद्योगिकरण एक देश के विदेश व्यापार की संरचना को प्रभावित करता है?
4) एक विकासशील अर्थव्यवस्था में तीव्र औद्योगिकरण की प्रक्रिया में कृषि किस प्रकार योगदान करता है? किन्हीं चार का उल्लेख करें।