इंडो गोथिक शैली क्या है ? what is indo gothic style of architecture in hindi meaning definition

By   June 3, 2021

what is indo gothic style of architecture in hindi meaning definition इंडो गोथिक शैली क्या है ?

इंडो-गॉथिक शैली
विक्टोरियन शैली के रूप में ज्ञात यह वास्तुकला की भारतीय, फारसी और गोथिक शैली का अनूठा मिश्रण थी। इंडो-गॉथिक शैली की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैंः
ऽ निर्माण बहुत विशाल और अपने निष्पादन में विस्तृत थे।
ऽ इंडो-इस्लामिक निर्माण कार्यों की अपेक्षा दीवारें पतली थीं।
ऽ इंडो-इस्लामिक युग के वक्राकार मेहराबों के विपरीत मेहराब नुकीले थे।
ऽ विक्टोरियन शैली की एक अनूठी विशेषता विशाल खिड़कियों का उपयोग थी।
ऽ चर्चों की क्रूसीफाइड भूमि योजना थी।
ऽ इनमें ब्रिटेन की उन्नत संरचनात्मक इंजीनियरिंग के मानकों का पालन किया गया था। इस्पात, लोहे और ढाले गए कंक्रीट का उपयोग किया जाना आरंभ किया गया।
उदाहरणः कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल, मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया आदि।

आईबेरियन और गोथिक वास्तुकला के बीच अंतर
आधार आईबेरियन वास्तुकला गोथिक वास्तुकला
प्रयुक्त सामग्री पुर्तगालियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली मुख्य निर्माण सामग्री ईंटें थीं। छतों और सीढ़ियों के लिए लकड़ियों का उपयोग किया गया था। मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर और मोटे चूना-पत्थर का उपयोग किया गया था।
संरचनात्मक विविधताएं पुर्तगालियों ने अपनी पश्चिमी परंपराओं को जारी रखा और किसी भी संरचनात्मक विविधता का प्रचलन नहीं किया। अंग्रेजो ने वास्तुकला की इंडो-गॉथिक शैली को उत्कर्ष पर पहुंचाते हुए भारतीय रूपांकनों और शैलियों को अपनाया।

नव-रोमन शैली
1911 के उपरांत, अंग्रेजी राज द्वारा करवाए गए निर्माण नव-रोमन शैली या नव-शास्त्रीय शैली के अनुसार करवाए गए थे। एडविन लुटियन और हरबर्ट बेकर द्वारा की गई नई दिल्ली की वास्तुकला इस शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसे प्रायः ‘हिंदुस्तान के रोम‘ के रूप में वर्णित किया जाता है। इस चरण की विशेषताएं इस प्रकार हैंः
ऽ निर्माण अनजान और बिना किसी रुचिकर विशेषताओं वाले होते थे।
ऽ यह वास्तुकला की सभी शैलियों का संगम था, जिस कारण इस शैली में संकुलन था और कलात्मक अभिव्यक्ति के अवसर संकीर्ण थे।
ऽ निर्माण कार्य की संकर प्रकृति के नाते सादगी, आधुनिकता और उपयोगिता से अत्यधिक समझौता किया गया था।
ऽ चक्राकार भवनों पर अधिक ध्यान दिया गया।
ऽ पश्चिमी वास्तुशिल्प डिजाइनों को साकार कराने के लिए प्राच्य रूपांकनों का अत्यधिक प्रयोग किया गया।
ऽ औंधे अथवा ऊपर उठे हुए गुंबद की अवधारणा इसी चरण के दौरान प्रचलित की गर्दी इसे सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति भवन के शीर्ष पर देखा जा सकता है।

स्वातंत्र्योत्तर वास्तुकला
1947 के उपरांत वास्तुकला की दो शैलियां उभरी-पुनरुत्थानवादी और आधुनिकतावादी। हालांकि, दोनों शैलियां औपनिवेशिक खुमारी को नहीं तोड़ सकीं। इससे भारत की स्थापत्य परंपराओं के स्तर में गिरावट आई।
उदाहरण के लिए, पंजाब सरकार ने चंडीगढ़ का नगर डिजाइन करने के लिए फ्रांसीसी वास्तुकार ली कार्बुजियर की सेवाएं ली थीं।

लॉरी बेकर
लॉरी बेकर को ‘‘गरीबों के वास्तुकार‘‘ के रूप में भी जाना जाता है। श्री बेकर केरल में क्रांतिकारी सामूहिक आवास अवधारणा के लिए उत्तरदायी थे। उनकी कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं:
ऽ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग करके पर्यावरण अनुकूल भवनों का निर्माण।
ऽ इस्पात और सीमेंट की खपत कम करने के लिए पूरक स्लैब निर्माण की अवधारणा प्रचलित की।
ऽ उन्होंने हवा के आवागमन और गर्मी संबंधी आरामदायक व्यवस्था पर बल दिया।

इस प्रकार, हम देखते हैं कि पूर्व ऐतिहासिक काल से ही कला और स्थापत्य कला को भारत के लोगों के जीवन और अवकाश में अनूठी अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। यूनानी, अरब, फारसी और यूरोपियाई में से सभी ने वर्तमान परंपराओं में अपने तरीके से योगदान दिया है तथा जिसके परिणामस्वरूप एक मिश्रित भारतीय स्थापत्य कला का विकास हुआ।

आधुनिक वास्तुकला
यूरोपीय औपनिवेशिकों के आगमन के साथ ही मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हुआ। इसके फलस्वरूप पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों, डच, डेनिश और अंग्रेजों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष आरंभ हुआ, जिसकी परिणति 1947 तक भारत पर अंग्रेजों शासन के रूप में हुई। हालांकि, यूरोपियाई अपने साथ स्थापत्य शैली का खजाना भी लाए जिसे उनके द्वारा करवाए गए अनेक निर्माण कार्यों में देखा जा सकता है।

पुर्तगाली प्रभाव
पुर्तगाली अपने साथ वास्तुकला की आईबेरियन शैली लाए। आरंभ में उन्होंने व्यापारिक ठिकानों और गोदामों का निर्माण करवाया। ये आगे चलकर समुद्र तट के साथ-साथ दुर्गीकृत नगरों में रूपांतरित हो गए। उन्होंने आईबेरियन शैली में ‘आँगन गृहों‘ और ‘बैरोक चर्चा‘ की अवधारणा प्रचलित की। उदाहरणः गोवा में सेंट कैथेड्रल और मुंबई में कैसल डीअगुआंडा।

फ्रांसीसी प्रभाव
फ्रांसीसी अपने साथ शहरी नगर नियोजन की अवधारणा लाए। पुडुचेरी और चंद्रनगर के फ्रांसीसी नगरों का निर्माण कार्टेजियन ग्रिड योजना और वैज्ञानिक वास्तुशिल्प डिजाइन का उपयोग करके किया गया था। उन्होंने शक्ति के प्रदर्शन के रूप में भव्य भवनों का निर्माण करवाया। उन्होंने गुमनाम वास्तुकला की अवधारणा भी आरंभ की जो आधुनिक वास्तुकला की एक विशेषता है।
उदाहरणः पुडुचेरी का चर्च ऑफ सैक्रेड हार्ट ऑफ जीसस।

अंग्रेज प्रभाव
अंग्रेज अपने साथ वास्तुकला की गोथिक शैली लाए। यह भारतीय वास्तुकला के साथ मिल गई और इसकी परिणति वास्तुकला की इंडो-गॉथिक शैली में हुई। 1911 के पश्चात, नव-रोमन स्थापत्य कला के रूप में ज्ञात वास्तुकला की एक नई शैली उभरी।