भारतीय परिषद अधिनियम 1861 क्या है ? इंडियन कौंसिल अधिनियम Indian Councils Act 1861 in hindi

By   September 21, 2021

Indian Councils Act 1861 in hindi भारतीय परिषद अधिनियम 1861 क्या है ? इंडियन कौंसिल अधिनियम ?

1861 का इंडियन कौंसिल्ज अधिनियम : इस अधिनियम का उद्देश्य “गवर्नर-जनरल की कौंसिल के गठन के लिए बेहतर व्यवस्था करना” और “अनेक प्रेजिडेंसियों तथा प्रांतों की स्थानीय सरकार के लिए व्यवस्था करना‘‘ था । इस अधिनियम को ष्भारतीय विधानमंडल का प्रमुख घोषणा पत्र  कहा गया जिसके द्वारा “भारत में विधायी अधिकारों के अंतरण की प्रणाली‘‘ का उद्घाटन हुआ। इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय स्तरों पर विधान बनाने की व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। इसके अधीन गवर्नर-जनरल की कौंसिल पुनर्गठित की गई और तत्पश्चात उसके लिए अब तक के चार के स्थान पर पांच साधारण सदस्यों की व्यवस्था की गई। विधान बनाने के प्रयोजनार्थ, गवर्नर-जनरल को अधिकार दिया गया कि वह अपनी कौंसिल के लिए “कम से कम छह और अधिक से अधिक बारह‘‘ अतिरिक्त सदस्य मनोनीत करे जिनमें से कम से कम आधे गैर-सरकारी सदस्य हों । यद्यपि कानून द्वारा विस्तारित कौंसिल के लिए गैर-सरकारी सदस्यों में भारतीयों को नियुक्त किया जाना जरूरी नहीं था तथापि हाउस आफ कामंस में यह आश्वासन दिया गया कि भारतीयों को इन पदों पर नियुक्त किया जाएगा। इस आश्वासन और इस तथ्य के बावजूद कि कौंसिल के लिए स्पष्ट व्यवस्था थी कि वह केवल विधायी कार्य करे, इसे उत्तरदायी या प्रतिनिधि विधायी निकाय नहीं माना जा सकता। वह सरकार की विधायी समिति मात्र थी जिसके द्वारा कार्यपालिका विधान के बारे में मंत्रणा एवं सहायता प्राप्त करती थी। विचाराधीन विधान के अलावा किसी अन्य विषय पर चूंकि उसमें विचार नहीं किया जाता था और उसे शिकायतों की जांच करने, जानकारी प्राप्त करने या कार्यपालिका के आचरण की जांच करने का अधिकार नहीं था, अतः उस कौंसिल में उत्तरदायी संस्थाओं का कोई अंश नहीं था। फिर भी, सवैधानिक विकास की दृष्टि से 1861 के अधिनियम के परिणामस्वरूप पहले की स्थिति में सुधार हुआ क्योंकि अंग्रेजी राज के भारत में जमने के पश्चात इसमें पहली बार विधायी निकायों में गैर-सरकारी व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्वीकार किया गया । इसके अतिरिक्त, तत्पश्चात विधान उचित विचार-विमर्श के बाद बनाए गए और वे नियमित विधान थे जिन्हें केवल उसी प्रक्रिया द्वारा बदला जा सकता था, जिस प्रक्रिया से वे बने थे। इस प्रकार कार्यपालिका द्वारा विधान बनाए जाने के दिन व्यावहारिक रूप से बीत गए और यह समझा जाने लगा कि विधान बनाना केवल कार्यपालिका का ही कार्य नहीं है।

संसदीय शासन प्रणाली का उद्भव एवं विकास
हमने संसदीय लोकतंत्रात्मक प्रणाली को सोच-समझकर ही चुना है, हमने इसे केवल इसी कारण नहीं चुना कि हमारा सोचने का तरीका कुछ हद तक ऐसा ही रहा बल्कि इस कारण भी कि यह प्रणाली हमारी पुरातन परंपराओं के अनुकूल है । स्वाभाविक है कि पुरातन परंपराओं का पुरातन स्वरूप में नहीं अपितु नयी परिस्थितियों और नये वातावरण के अनुसार बदलकर अनुसरण किया गया है; इस पद्धति को चुनने का एक कारण यह भी है कि हमने देखा कि अन्य देशों में, विशेष रूप से यूनाइटेड किंगडम में यह प्रणाली सफल रही है।
-जवाहरलाल नेहरू

प्राचीन भारत में प्रतिनिधि निकाय
26 जनवरी, 1950 के दिन भारत के नये गणराज्य के संविधान का शुभारंभ हुआ और भारत अपने लंबे इतिहास में पहली बार एक आधुनिक संस्थागत ढांचे के साथ पूर्ण संसदीय लोकतंत्र बना । लोकतंत्र एवं प्रतिनिधि संस्थाएं भारत के लिए पूर्णतया नयी नहीं हैं। कुछ प्रतिनिधि निकाय तथा लोकतंत्रात्मक स्वशासी संस्थाएं वैदिक काल में भी विद्यमान थीं (सिरका 3000-1000 ईसा पूर्व) । ऋग्वेद में “सभा” तथा “समितिष् नामक दो संस्थाओं का उल्लेख है। वहीं से आधुनिक संसद की शुरुआत मानी जा सकती है। इन दो संस्थाओं का दर्जा और इनके कृत्य अलग अलग थे। “समिति” एक आम सभा या लोक सभा हुआ करती थी और “सभा” अपेक्षतया छोटा और चयनित वरिष्ठ लोगों का निकाय, जो मोटे तौर पर आधुनिक विधानमंडलों में उपरि सदन के समान था । वैदिक ग्रंथों में ऐसे अनेक संकेत मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि ये दो निकाय राज्य के कार्यों से निकट का संबंध रखते थे और इन्हें पर्याप्त प्राधिकार, प्रभुत्व एवं सम्मान प्राप्त था । ऐसा ज्ञात होता है कि आधुनिक संसदीय लोकमत के कुछ महत्वपूर्ण तत्व, जैसे निर्बाध चर्चा और बहुमत द्वारा निर्णय, तब भी विद्यमान थे । बहुमत से हआ निर्णय ‘‘अलंघनीय माना जाता था जिसकी अवहेलना नहीं हो सकती थी क्योंकि जब एक सभा में अनेक लोग मिलते हैं और वहां एक आवाज से बोलते हैं तो उस आवाज या बहुमत की अन्य लोगों द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती‘‘ । वास्तव में प्राचीन भारतीय समाज का मूल सिद्धांत यह था कि शासन का कार्य किसी एक व्यक्ति की इच्छानुसार नहीं बल्कि पार्षदों की सहायता से संयुक्त रूप से होना चाहिए । पार्षदों का परामर्श आदर से माना जाता था । वैदिक काल के राजनीतिक सिद्धांत के अनुसार ‘‘धर्म‘‘ को वास्तव में प्रभुत्व दिया जाता था और ष्धर्मष् अथवा विधि द्वारा शासन के सिद्धांत को राजा द्वारा माना जाता था और लागू किया जाता था। आदर्श यह था कि राजा की शक्तियां जनेच्छा और रीति-रिवाजों, प्रथाओं और धर्मशास्त्रों के आदेशों द्वारा सीमित होती थीं। राजा को विधि तथा अपने क्षेत्र के विधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती थी और अपनी जनता के भौतिक तथा नैतिक कल्याण के लिए राज्य को न्यास अथवा ट्रस्ट के रूप में रखना होता था । यद्यपि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक व्यवस्था मुख्यतया राजतंत्रवादी हुआ करती थी, फिर भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां राजा का चुनाव होता था। जो भी हो, कुछ लोकतंत्रात्मक संस्थाएं एवं प्रथाएं प्रायः हमारी राजतंत्रीय शासन प्रणाली का सदा अभिन्न अंग रहीं।
‘‘आत्रेय ब्राह्मण‘‘, पाणिनि की “अष्टाध्यायी‘‘, कौटिल्य के “अर्थशास्त्र‘‘, ‘‘महाभारत‘‘, अशोक स्तंभों के शिलालेखों, समकालीन यूनानी इतिहासकारों तथा बौद्ध एवं जैन विद्वानों द्वारा लिखित ग्रंथों में तथा “मनुस्मृति‘‘ में इस तथ्य के पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं कि वैदिकोत्तर काल में अनेक गणराज्य भी थे। उन गणराज्यों में, जो “समधा‘‘ अथवा गणराज्य के नाम से जाने जाते थे, प्रभुसत्ता एक बहुत बड़ी सभा में निहित रहती थी और उसी सभा के सदस्य न केवल कार्यपालिका के सदस्यों को, बल्कि सैनिक प्रमुखों को भी चुना करते थे। वही वैदेशिक कार्यों पर नियंत्रित रखती थी और शांति और युद्ध जैसे मामलों का फैसला भी करती थी। इसके अतिरिक्त, कार्यपालिका पर निर्वाचित सभा का पूर्ण नियंत्रण रहता था। पाली में लिखित ग्रंथों में इस विषय में दिलचस्प ब्यौरे मिलते हैं कि प्राचीन गणराज्यों में सभाओं में क्या क्या प्रथाएं एवं प्रक्रियाएं अपनाई जाती थीं जो कुछ विद्वानों के अनुसार “आधुनिकतम स्वरूप के विधि एवं संवैधानिक” सिद्धांतों पर आधारित थीं। उदाहरण के तौर पर, सभा का अपना अध्यक्ष हुआ करता था जिसे ‘‘विनयधार‘‘ कहा जाता था और सचेतक भी हुआ करता था जिसे ‘‘गणपूरक‘‘ कहा जाता था। “विनयधार‘‘ संकल्प, गणपूर्ति का अभाव, बहुमत द्वारा मतदान, इत्यादि जैसे प्रक्रियागत उपायों एवं शब्दावली से परिचित होता था। सभा में चर्चाएं स्वतंत्र, स्वच्छ एवं निर्बाध हुआ करती थीं। मतदान शलाकाओं (टिकटों) द्वारा होता था जो विभिन्न मतों का प्रतिनिधि करने वाली भिन्न भिन्न रंगों की लकड़ी की पट्टियां होती थीं। जटिल और गंभीर मामले प्रायः सभा के सदस्यों में से चुनी गई विशेष समिति के पास भेजे जाते थे।
निचले स्तर पर लोकतंत्र प्रादेशिक परिषदों (जनपद), नगर परिषदों (पौर सभा) और ग्राम सभाओं के रूप में विद्यमान था।ये निकाय स्थानीय कार्यों की देखरेख पूरी स्वाधीनता से करते थे जिसमें स्थानीय उपक्रम एवं स्वशासन का तत्व रहता था । “अर्थशास्त्र‘‘, ‘‘महाभारत‘‘ और ‘‘मनुस्मृति‘‘ में ‘‘ग्राम संघ‘‘ विद्यमान होने का अनेकों स्थानों पर उल्लेख मिलता है। उन दिनों ग्राम सभाओं, ग्राम संघों अथवा पंचायतों जैसे निर्वाचित स्थानीय निकाय साधारणतया भारतीय राजनीति व्यवस्था के अंग होते थे। “सभा” तथा “समिति‘‘ जैसी लोकतंत्रात्मक संस्थाएं तथा गणराज्य तो बाद में लुप्त हो गए परंतु ग्राम स्तर पर ‘‘ग्राम संघ‘‘, ‘‘ग्राम सभाएं‘‘ अथवा ‘‘पंचायतें‘‘ अनेक हिंदू तथा मुस्लिम राजवंशों के शासन काल में अस्तित्व में रहीं तथा ब्रिटिश शासकों के आगमन तक और उसके पश्चात भी किसी न किसी रूप में प्रभावी संस्थाओं के रूप में कार्य करती रहीं और फलती फूलती रहीं।

आधुनिक संसदीय संस्थाओं का उद्भव
आधुनिक अर्थों में संसदीय शासन प्रणाली एवं विधायी संस्थाओं का उद्भव एवं विकास लगभग दो शताब्दियों तक ब्रिटेन के साथ भारत के संबंधों से जुड़ा हुआ है। परंतु यह मान लेना गलत होगा कि बिल्कुल ब्रिटेन जैसी संस्थाएं किसी समय भारत में प्रतिस्थापित हो गईं। जिस रूप में भारत की संसद और संसदीय संस्थाओं को आज हम जानते हैं उनका विकास भारत में ही हुआ। इनका विकास विदेशी शासन से मुक्ति के लिए और स्वतंत्र लोकतंत्रात्मक संस्थाओं की स्थापना के लिए किए गए अनेक संघर्षों और ब्रिटिश शासकों द्वारा रुक रुककर, धीरे धीरे, झिका झिकाकर, छोटे छोटे टुकड़ों में दिए गए संवैधानिक सुधारों के द्वारा हुआ।
1833 का चार्टर अधिनियम: भारत में केंद्रीय विधानमंडल की पहली धुंधली-सी शुरुआत 1833 के चार्टर अधिनियम से हुई जिसके द्वारा भारतीय शासन प्रणाली में और भारत सरकार की विधायी शक्तियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए । इस अधिनियम के द्वारा भारत में सब ब्रिटिश राज्य क्षेत्रों के लिए एक विधान परिषद की स्थापना की गई। वह पहला अवसर था जबकि गवर्नर-जनरल की सरकार “भारत सरकारश् के नाम से जानी जाने लगी और उसकी कौंसिल ‘‘इंडियन कौंसिल‘‘ के नाम से । गवर्नर-जनरल की कौंसिल की विधि-निर्माण बैठकों और कार्यपालिका बैठकों में भेद करके इस अधिनियम द्वारा संस्थागत विशेषज्ञता का तत्व भी जोड़ा गया। गवर्नर-जनरल की कौंसिल के कार्यपालिका तथा विधायी कृत्यों में इस अधिनियम के द्वारा जो भेद किया गया उसके परिणामस्वरूप एक ‘‘चैथा‘‘ अथवा विधायी सदस्य शामिल किया गया और इस पद पर विशिष्ट विधिवेत्तालार्ड मैकाले को नियुक्त किया गया। इस प्रकार, हमें 1833 के अधिनियम में कार्यपालिका परिषद से भिन्न एक विधान परिषद के बीज दिखाई पड़ते हैं, यद्यपि बहुत बाद तक इस नाम का उपयोग नहीं हुआ।
1853 का चार्टर अधिनियमः 1853 का अधिनियम अंतिम चार्टर अधिनियम था जिसके द्वारा गवर्नर-जनरल की कौंसिल में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। कौंसिल के “चैथे‘‘ अथवा विधायी सदस्य को कार्यपालिका बैठकों में उपस्थित होने और मतदान करने का अधिकार देकर उसे अन्य सदस्यों के बराबर का दर्जा प्रदान किया गया। इसके साथ ही छह विशेष सदस्य शामिल करके, जिन्हें ‘‘विधायी पार्षद‘‘ का पदनाम दिया गया. विधायी प्रयोजनों के लिए कौंसिल का विस्तार किया गया। इस प्रकार, गवर्नर-जनरल तथा कमांडर इन चीफ के अतिरिक्त, 1853 के अधिनियम के अधीन गठित कौंसिल में बारह सदस्य थे। कौंसिल जब विधायी निकाय के रूप में क करती थी तो वहां चर्चा लिखित न होकर मौखिक होती थी; विधेयक किसी एक सदस्य के पास भेजने के बजाए प्रवर समितियों के पास भेजे जाते थे, विधान कार्य गोपनीय होने के बजाय सार्वजनिक रूप से किया जाता था और कार्यवाहियों के वृतांत सरकारी तौर पर प्रकाशित किए जाते थे। इस प्रकार, विधानमंडल और कार्यपालिका में भेद करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। नयी कौंसिल के कर्तव्य विधान बनाने तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि, जैसा कि मांटेगु-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) में कहा गया, “संसद के आशयों के विपरीत, इसने शिकायतों की जांच करने और उन्हें दूर करने के प्रयोजनार्थ समवेत लघु प्रतिनिधि सभा का रूप धारण करना आरंभ कर दिया‘‘ ।