हुरडा सम्मेलन कब और कहां हुआ क्या है | हुरडा सम्मेलन कब आयोजित किया गया hurda conference was held in hindi

By   December 23, 2020

when the hurda conference was held in hindi हुरडा सम्मेलन कब और कहां हुआ क्या है | हुरडा सम्मेलन कब आयोजित किया गया ?

प्रश्न : हुरड़ा सम्मलेन क्या है ? 

उत्तर : मराठा शक्ति पर अंकुश लगाने और राजपूताना पर संभावित मराठा आक्रमण को रोकने के लिए सवाई जयसिंह के प्रयासों से 17 जुलाई , 1734 ईस्वी को मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय की अध्यक्षता में राजपुताना के शासकों का हुरडा (भीलवाड़ा) में एक सम्मेलन हुआ। जिसमें तैयार अहदनामें के अनुसार सभी शासक एक दूसरे के सुख दुःख में साथ देंगे। शत्रु को शरण नहीं देंगे और वर्षा ऋतू बाद रामपुरा में ससैन्य एकत्रित होकर मराठों के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष करेंगे। यह खानवा युद्ध के बाद राजपूत शासकों का अपने शत्रु के विरुद्ध पहला संयुक्त मोर्चा था परन्तु निजी स्वार्थों के कारण वहाँ कोई उपस्थित नहीं हुआ। यों तो हुरडा सम्मलेन ऐतिहासिक तो हो गया परन्तु इतिहास नही बदल सका।
प्रश्न : बीकानेर के महाराजा रायसिंह की मुगलों को दी गयी सेवाओं की विवेचना कीजिये। 
उत्तर : राव कल्याणमल की मृत्यु के बाद उनके सुयोग्य पुत्र राव रायसिंह को बीकानेर का शासक बनाया गया। रायसिंह ने मुगलों की अच्छी सेवा की थी , अत: वह सम्राट अकबर और जहाँगीर का अत्यधिक विश्वस्त सेनानायक था। रायसिंह ने मुगलों के लिए गुजरात , काबुल तथा कंधार अभियान किये। रायसिंह ने महाराजा की पदवी धारण की। अकबर ने रायसिंह को 1572 ईस्वी में जोधपुर दिया। गुजरात के मिर्जा बन्धुओं के दमन के लिए 1573 इस्वी में भेजी गयी शाही सेना में रायसिंह भी थे। इन्होने कठौली नामक स्थान पर इम्ब्राहीम हुसैन को पराजित किया। इसके बाद 1574 ईस्वी में रायसिंह को मारवाड़ के चन्द्रसेन और देवड़ा सुरताण के विरुद्ध भेजा , जिसमें रायसिंह को सफलता मिली।
1581 ईस्वी में मानसिंह कच्छवाहा की सहायता के लिए एक जत्था रायसिंह के नेतृत्व में भेजा गया। इसी प्रकार बलूचिस्तान के विद्रोही सरदारों का दमन करने के लिए रायसिंह को भेजा गया। जिसमें रायसिंह सफल हुआ। जब खानेखाना ने कन्धार के विद्रोह को दबाने के लिए बादशाह से सहायता माँगी तो 1591 ईस्वी में रायसिंह को उसकी सहायता के लिए भेजा।
इसी प्रकार बुरहानुल्मुल्क के विरुद्ध दानियाल के 1593 ईस्वी के थट्टा अभियान में रायसिंह सम्मिलित था। जब 1599 इस्वी और 1603 ईस्वी में सलीम के नेतृत्व में मेवाड़ अभियान किया गया तो रायसिंह को भी इस अभियान में सम्मिलित किया गया। अकबर ने रायसिंह की सेवाओं से संतुष्ट होकर उसे 1593 ईस्वी में जूनागढ़ का प्रदेश तथा 1604 ईस्वी में शमशाबाद और नूरपुर की जागीर प्रदान की। जहाँगीर का विश्वास मानसिंह कच्छवाहा की बजाय रायसिंह पर अधिक था। जब जहाँगीर 1605 ईस्वी में मुग़ल सम्राट बना तो उसने रायसिंह का मनसब 5000 जात अर्थात 5000 सवार कर दिया। जहाँ भी राजस्थान में मुग़ल हितों की रक्षा करनी होती थी , रायसिंह की सेवाएँ ली जाती थी।
रायसिंह ने मंत्री कर्मचन्द की देखरेख में बीकानेर के सुदृढ़ किले का निर्माण सन 1594 में करवाया। किले के अन्दर इसने एक प्रशस्ति लिखवाई जिसे अब “रायसिंह प्रशस्ति” कहते है। रायसिंह एक धार्मिक , विद्यानुरागी और दानी शासक था। इन्होने “रायसिंह महोत्सव” , “वैधक वंशावली” , “बाल बोधिनी” और ज्योतिष रत्नमाला की भाषा टीका लिखी।
“कर्मचन्द्रवंशोत्कीर्तनकाव्यम” में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है। इसमें लिखा है कि वह विजित शत्रुओं के साथ बड़े सम्मान का व्यवहार करते थे। रायसिंह के समय में घोर त्रिकाल (अकाल) पड़ा जिसमें हजारों व्यक्ति और पशु मारे गए। महाराजा ने व्यक्तियों के लिए जगह जगह सदाव्रत खोले और पशुओं के लिए चारे पानी की व्यवस्था की इसलिए मुंशी देवी प्रसाद ने इसे “राजपूताने का कर्ण” की संज्ञा दी है। सन 1612 ईस्वी में दक्षिण भारत (बुरहानपुर) में इनकी मृत्यु हो गयी।
प्रश्न : जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह बहुमुखी प्रतिभाओं का धनी था। कथन के सन्दर्भ में सवाई जयसिंह के योगदान का वर्णन कीजिये। 
उत्तर :  खगोल विद्या : संस्कृत तथा फारसी का विद्वान होने के साथ साथ वह गणित तथा ज्योतिष का भी असाधारण पण्डित था। हालाँकि जयसिंह की विद्या के सभी अंगों में रूचि थी , खगोलशास्त्र उसका प्रिय विषय था। यह उसने अपने गुरु जगन्नाथ से सिखा था। जगन्नाथ महराष्ट्रीय ब्राह्मण थे एवं वे जयसिंह को वेद पढ़ाने के लिए नियुक्त किये गए थे।
जगन्नाथ जो “सम्राट यज्ञ ” करने के बाद सम्राट जगन्नाथ कहलाये तथा उन्होंने टॉलेमी की “अलमूजेस्ट” के अरबी अनुवाद के आधार पर सिद्धान्त कौस्तुभ और सम्राट सिद्धान्त की रचना की तथा यूक्लिड के रेखा गणित का अरबी से संस्कृत में अनुवाद किया। सवाई जयसिंह ने 1725 ईस्वी में नक्षत्रों की शुद्ध सारणी बनवायी एवं उसका नाम तत्कालीन मुग़ल सम्राट मुहम्मदशाह के नाम से “जीज मुहम्मद शाही” (मुहम्मदशाह की एस्ट्रोनोमिकल टेबल) रखा। यह 1733 ईस्वी में प्रकाशित हुई। उसने जयसिंह कारिका नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की।
जयसिंह के पास सम्राट जगन्नाथ के अलावा दूसरा भारतीय सिद्धान्त ज्योतिष विशेषज्ञ गुजरात का केवलराम था , जो 1725 ईस्वी में जयसिंह के दरबार में आया। केवलराम ने खगोल सम्बन्धी आठ ग्रन्थ लिखे जो नक्षत्रों की सही स्थिति और गति बताने में बहुत सहायक है। केवलराम ज्योतिषी ने लागोरिथम का फ्रेंच से संस्कृत में अनुवाद किया , जिसको “विभाग सारणी” कहा जाता है। इसी विषय के अन्य ग्रन्थो की रचना भी की जिनमें ‘मिथ्या जीवछाया सारणी’ , ‘दुकपक्ष सारणी’ , ‘दुकपक्षग्रन्थ’ , “तारा सारणी” , जयविनोद सारणी जयविनोद , राम विनोद , ब्रह्म प्रकाश , निरस आदि मुख्य है।
सवाई जयसिंह ने राजा एमानुएल के दरबार में पुर्तगाली पादरियों के साथ अपने आदमी को भेजा , वहां से ग्रन्थों को मंगवाया। उसने पाया कि उनमें कुछ हद तक अशुद्ध गणना आती थी क्योंकि उनके पास सूक्ष्म परिज्ञान उपकरणों की कमी थी। उसने यूनानी ग्रंथो के अनुवाद से त्रिकोणमिति और लघुगणकों के व्यवहार पर अध्ययन किया तथा अपने द्वारा निर्मित यन्त्रों में लघुतम गणना के सिद्धान्तों को इस तरह स्थापित किया कि इस नवनिर्मित वेधशाला में नक्षत्रादि की गति की जानकारी शुद्ध रूप से जानी जा सकती थी। जयसिंह के ग्रन्थों में जिन विदेशी खगोल विद्या विशेषज्ञों का उल्लेख मिलता है उनमें युक्लिड , हिप्पारकस , टॉलेमी , डी.ला.हेरे , अब्दुर रहमान इब्न उमर अब्दुल हुसैन अल सूफी , नासिर अल दुई अत तूसी , ऊलूग बेग , मौलाना चाँद आदि है। 1719 में फ्लेमस्टीड की मृत्यु हुई जो ग्रीनविच के प्रथम एस्ट्रोनोमर रॉयल नियुक्त किया गया था। उसकी हिस्टोरिका कोइलेस्टिस ब्रिटेनिका जो प्रकाशित भी नहीं हुई थी , की प्रति जयसिंह ने अपने यहाँ मँगवा ली। इस दिशा में उसका कार्य श्लांघनीय माना जाता है।
जयसिंह की मान्यता थी कि अब तक यूरोप या एशियाई देशों में बारीकी से गणित तथा ज्योतिष पर अध्ययन नहीं होने पाया था। इसी अभिलाषा से उसने जयपुर , दिल्ली , उज्जैन , बनारस तथा मथुरा में बड़ी बड़ी वेधशालाओं को बनवाया तथा बड़े बड़े यन्त्रों को बनवाकर नक्षत्रादी की गति को सही तौर से जानने के साधन उपलब्ध किये। वर्तमान में जयपुर की वेधशाला कार्य कर रही है। यह देश की सबसे बड़ी वेधशाला है जिसका निर्माण सवाई जयसिंह ने 1728 में करवाया था। इसे जंतर मंतर कहते है। जंतर से तात्पर्य है उपकरण और मन्त्र से तात्पर्य है गणना अर्थात उपकरणों के माध्यम से गणना करना। इस जन्तर मन्तर में संसार की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी है। अभी हाल ही में जुलाई , 2010 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित कर लिया है।
साहित्य : सवाई जयसिंह के समय में साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई , साहित्यकारों के लिए ब्रह्यपुरी की स्थापना की। जयसिंह के पिता बिशनसिंह ने तेलंगाना के शिवानन्द गोस्वामी को सम्मिलित किया था। शिवानन्द की 48 रचनाएँ उपलब्ध है। शिवानन्द के छोटे भाई जनार्दन भट्ट गोस्वामी द्वारा श्रृंगारशतक , वैराग्यशतक , मन्त्र चन्द्रिका , ललिताची प्रदीपका की रचना की गयी। शिवानन्द के दुसरे भाई चक्रपाणी तंत्र शास्त्र के प्रसिद्ध पंडित थे।
इनकी लिखी “पंचायतन प्रकाश” उपलब्ध है।
जयसिंह के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षो में सबसे प्रसिद्ध विद्वान रत्नाकार भट्ट पौण्डरीक था जिसने “जयसिंह कल्पद्रुम” लिखा। रत्नाकार के पुत्र सुधाकार पौण्डरीक ने साहित्य सार संग्रह की रचना की। रत्नाकर के भतीजे ब्रजनाथ भट्ट के ब्रह्म सुत्राणु भाष्यवृत्ति (मरीचिका) और पद्यतरंगिणी ग्रन्थ उपलब्ध है। जयसिंह के समय में सबसे प्रसिद्ध विद्वानों में कवि कलानिधि , श्री कृष्ण भट्ट थे। इनके द्वारा राम क्रीडाओं पर राघवगीतम (राम रामा) पर जयसिंह ने इन्हें राम रसाचार्य की उपाधि दी। इनके अन्य ग्रन्थों में पद्य मुक्तावली , वृत्त मुक्तावली , ईश्वरविलास महाकाव्य , सुन्दरी स्तवराज , वेदान्त पंच विशति , रामगीतम , प्रशस्ति मुक्तावली , सरस रसास्वाद आदि प्रमुख है।
ज्योतिषराय केवलराम की दो साहित्यिक रचनाएँ ‘अभिलाष शतकम’ और गंगा स्तुति है। गलता के कृष्णदास पयहारी के शिष्य प्रियदास द्वारा रचित “भक्तमाला टीका” और भागवत भाष्य तथा सूरत मिश्र की बिहारी सतसई की टीका पिंगल में लिखी गयी। नयन मुखोपाध्याय द्वारा अरबी ग्रन्थ ऊकर का संस्कृत में अनुवाद जयसिंह के काल में हुआ था।
पुण्डरीक रत्नाकार ने जयसिंह कल्पद्रुम नामक पुस्तक लिखकर उस समय के समाज तथा राजनीतिक घटनाओं का अच्छा चित्रण किया है।