इतिहास की अवधारणा क्या है ? समाजशास्त्र में इतिहास किसे कहते है परिभाषा historical definition in sociology in hindi

By   November 12, 2020

historical definition in sociology in hindi history  इतिहास की अवधारणा क्या है ? समाजशास्त्र में इतिहास किसे कहते है परिभाषा ?

इतिहास की अवधारणा
जिस ऐतिहासिक युग में मार्क्स कार्यशील रहा वह फ्रांसीसी क्रांति से प्रारंभ होता है। यह काल औद्योगिक और सामाजिक क्रांति के उस सम्पूर्ण युग के साथ-साथ चलता है जो कि अन्ततरू आधुनिक युग में बदला। यही कारण है कि ऐसे समय में उपजे मार्क्स के विचारों में एक जोरदार अपील है, जो कि उस समय के इतिहास की देन है।

तीस वर्ष की आयु से पहले मार्क्स ने एक बहुत बड़ी संख्या में लेख लिखे। ये सभी मिलकर मार्क्स की ऐतिहासिक भौतिकवादी अवधारणा की समुचित रूप-रेखा प्रदान करते हैं। यद्यपि मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद पर स्पष्ट रूप से कभी नहीं लिखा, 1843-1848 के बीच के समय में उसके लेख इसकी ओर सरसरी नजर डालते हैं। मार्क्स के लिये यह कोई एकदम नया दार्शनिक सिद्धांत नहीं था। वस्तुतः सामाजिक ऐतिहासिक अध्ययनों का यह एक व्यवहारिक तरीका था। राजनैतिक रूप से कार्य-योजना के लिए भी यह एक आधार था।

इस सिद्धांत की संरचना अवश्य ही हीगल से प्रेरित थी। हीगल की भांति ही मार्क्स ने भी इस बात को माना कि मनुष्य का इतिहास सरल रूप में एक दिशा में चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें अवस्थायें पुनर्घटित नहीं होतीं। इसके साथ-साथ वह यह भी मानता था कि इतिहास की प्रक्रिया में निहित नियमों को खोजा जा सकता था। परन्तु शीघ्र ही आपको स्पष्ट होगा कि किस प्रकार मार्क्स हीगलवादी दर्शन से परे चला जाता है। युवा हीगलवादियों में से अनेक ने हीगल के विचारों में दोष पाया और उन विचारों को नया रूप देने का प्रयास किया। परन्तु केवल मार्क्स ही इन विचारों की सुव्यवस्थित श्रृंखला विकसित कर सका, जो कि वस्तुतः बाद में समाज के बारे में हीगलवादी सिद्धान्तों से कहीं आगे निकल गई। आइए हम कोष्ठक 6.2 में समझें कि हीगल के इतिहास का दर्शन (philosophy of history) तथा तर्क विज्ञान (science of logic) क्या हैं ।
कोष्ठक 6.2ः हीगल का इतिहास दर्शन
हीगल उदारवादी था अर्थात उसने कुछ व्यक्तियों के शासन की अपेक्षा कानून के शासन द्य को मान्यता दी। इस तरह उसने प्रशा राज्य (जर्मनी के विगत साम्राज्य) की सत्ता को माना। उसका दर्शन प्रत्ययवादी (idealist) परम्परा से जुड़ा हुआ था। यह परम्परा इमानुअल काँट से शुरू हुई तथा हीगल ने इसे अपनी चरमसीमा तक पहुंचाया। हीगल के अनुसार तर्क यथार्थ का मूल तत्व है जिसकी अभिव्यक्ति इतिहास की प्रक्रिया में होती है। उसका कहना था कि तर्क की वृद्धि से उसकी जागरूकता पैदा हो जाने तक की प्रक्रिया ही इतिहास है। उसने संवैधानिक राज्य को इतिहास की प्रगति का शिखर माना। हीगल के अनुसार स्वतंत्रता की चेतना में वृद्धि‘ का दूसरा नाम इतिहास है। हीगल के अनुसार मानव इतिहास का विकास इसाई धर्म, सुधारवाद, फ्रांसीसी क्रांति एवं संवैधानिक राजतंत्र की दिशा में हो रहा था। उसका यह भी मत था कि संवैधानिक राजतंत्र को चलाने वाले शिक्षित राज्याधिकारी ही मानव प्रगति के विचारों को जानते पहचानते हैं। हीगल के विचारों को मानने वाले युवा हीगलवादी कहलाते थे। मार्क्स भी इन्हीं में से था। युवा हीगलवादियों ने कालांतर में हीगल के विचारों से हटकर यह दावा किया कि मानव इतिहास की प्रगति के विचारों को केवल शिक्षित पदाधिकारी ही नहीं समझते अपितु सभी नागरिक इन विचारों को समझने की क्षमता हासिल कर सकते हैं। शुरू में कार्ल मार्क्स ने मानव इतिहास के विचारों को हीगल के दृष्टिकोण पर आधारित करके विकसित किया। लेकिन बाद में वह भी युवा हीगलवादियों के साथ जुड़ गया। अंततरू उसने मानव समाज के इतिहास के बारे में अपने स्वतंत्र विचार विकसित किए। इन्हें ऐतिहासिक भौतिकवाद कहा जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘‘मार्क्स ने हीगल को सिर के बल खड़ा कर दिया।‘‘ मार्क्स ने धर्म, राजनीति व कानून से सम्बन्धित हीगल के रूढ़िवादी विचारों की आलोचना की।

 इतिहास के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
समाज और इतिहास के बारे में अपने सिद्धान्त को विकसित करने में मार्क्स ने हीगलवाद का खंडन किया। उसने हीगल के बाद आने वाले परायथार्थवादी (speculative) दर्शन का भी खंडन किया। उसने फायरबाख (देखिये कोष्ठक 6.3) के नृशास्त्रीय प्रकृतिवाद से प्रेरणा लेकर अपना स्वयं का एक मानववादी दृष्टिकोण विकसित किया। यह दृष्टिकोण ऐतिहासिक प्रक्रिया के समाजशास्त्रीय अध्ययन पर आधारित था। मार्क्स ने फ्रांसीसी भौतिकवाद, अंग्रेजी अनुभववाद (मउचपतपबपेउ) तथा शास्त्रीय अर्थशास्त्र से प्रेरणा पाई। इस प्रेरणा के आधार पर उसने सभी सामाजिक प्रघटनाओं को समाज और प्रकृति की जटिल व्यवस्था में उनके स्थान और प्रकार्य के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। मार्क्स का यह प्रयत्न हीगल और उसके अनुयायियों द्वार मान्य दार्शनिक व्याख्याओं से एकदम भिन्न था। यही समझ बाद में मानव समाज के विकास और गठन की परिपक्व समाजशास्त्रीय अवधारणा बन गई।
कोष्ठक 6.3ः लुडविग फायरबाख़
लडविग फायरबाख का जन्म 28 जुलाई, 1804 को बवेरिया प्रान्त के लान्ड्सहूट नामक स्थान पर हुआ तथा उसकी मृत्यु 13 सितम्बर, 1872 को न्युरम्बर्ग में हुई। वह एक भौतिकवादी दार्शनिक था। फायरबाख़ द्वारा की गई धर्म पर हीगल के विचारों की आलोचना का युवा मार्क्स की लेखनी पर कुछ प्रभाव पड़ा।

फायरबाख धर्मशास्त्र का विद्यार्थी था, जो कि बाद में दर्शनशास्त्र में रुचि लेने लगा। 1824 में उसने हीगल के भाषणों को सुना और परिणामस्वरूप उसने धर्म में विश्वास छोड़कर हीगलवादी दर्शन अपना लिया। अपनी पुस्तक, थॉट्स ऑन डेथ एण्ड इम्मोटलिटी (1830) में उसने आत्मा की अमरता को नकारा है। उसके इस विचार ने उस समय के बुद्धिजीवियों को काफी उद्वेलित किया। उसके अधार्मिक विचारों के कारण ही उसे दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर का पद भी नहीं मिला। इस बात के विरोध में फायरबाख ने अध्यापन बन्द कर दिया और एक स्वतंत्र रूप से जीविका चलाने वाला विद्वान बन गया। हीगल के प्रत्ययवाद (idealism) पर उसने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे और भौतिकवाद पर अपने विचार विकसित किये। 1850 में वह चिकित्सीय भौतिकशास्त्र अथवा मेडिकल मेटेरियलिज्म से पूर्ण रूप से सहमत हो गया। उसने यह माना कि मानव अपने भोजन की प्रकृति और गुणवत्ता से बनता है। मार्क्स की बौद्धिक प्रगति में फायरबाख के विचारों का प्रभाव केवल क्षणिक ही था।

 मूल मान्यताएं
ऐतिहासिक भौतिकवाद मानव इतिहास के दर्शन पर आधारित है। फिर भी यह इतिहास का दर्शन नहीं है। सही तौर पर इसे मानवीय प्रकृति का समाजशास्त्रीय सिद्धांत कहा जा सकता है। सिद्धांत के रूप में यह अनुभवों पर आधारित अनुसंधान के लिये वैज्ञानिक तथा सुव्यवस्थित शोध का रास्ता दिखाता है। इसके साथ-साथ यह इस बात का दावा करता है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिये एक क्रांतिकारी कार्यक्रम भी इसमें निहित है।

अतः यह सिद्धान्त वैज्ञानिक और क्रांतिकारी विशेषताओं का एक अद्वितीय मिश्रण है, और ऐसा मिश्रण मार्क्स के मौलिक सृजन की विशिष्टिता है। समाज के इस सिद्धांत अर्थात् ऐतिहासिक भौतिकवाद की वैज्ञानिक और क्रांतिकारी प्रतिबद्धताओं के बीच जटिल तथा असामान्य संबंध हैं। ये संबंध मार्क्सवादी समाजशास्त्रियों के लिए विवाद के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। इन मुद्दों में न जाकर यहाँ ऐतिहासिक भौतिकवाद के वैज्ञानिक पक्ष (देखिये 6.2.2) की ही चर्चा की जा रही है। इस चर्चा के पहले आइए संक्षेप में समाज तथा मानव प्रकृति पर मार्क्स के विचार भी जान लें।

अन्तर्संबंधित समष्टि के रूप में समाज
मार्क्स के विचार में मानव समाज एक अन्तर्संबंधित समष्टि (whole) है। सामाजिक समूह, संस्थायें, विश्वास और विचारधारायें एक दूसरे के साथ जुड़े होते हैं। अतः मार्क्स ने इनको अलग-अलग समझने की अपेक्षा इनके अन्तसंबंधों का अध्ययन किया है। उसके अनुसार इतिहास, राजनीति, कानून, धर्म तथा शिक्षा आदि का अलग-अलग इकाइयों के रूप में अध्ययन नहीं किया जा सकता है।

 समाज की परिवर्तनशील प्रकृति
मार्क्स के अनुसार समाज में परिवर्तनशीलता अन्तर्निहित होती है, जिसमें परिवर्तन प्रायः आन्तरिक विरोधाभासों व संघर्षों का परिणाम होते हैं। यदि वृहद स्तर पर इस प्रकार के उदाहरणों का अध्ययन किया जाये तो मार्क्स के अनुसार इन परिवर्तनों के कारणों और परिणामों में पर्याप्त मात्रा में नियमितता पाई जाती है। इस नियमितता के आधार पर समाज के बारे में सामान्य राय बनाई जा सकती है। ये दोनों ही मान्यतायें मार्क्स के द्वारा बताई मानवीय प्रकृति से संबंधित हैं।

 मानवीय प्रकृति तथा सामाजिक संबंध
मार्क्स का मानवीय प्रकृति के बारे में विचार ऐतिहासिक भौतिकवाद के पीछे एक मूल मान्यता है। इसके बिना यह सिद्धांत ठोस रूप नहीं ले सकता। मार्क्स के अनुसार मानव प्रकृति में कोई भी बात स्थाई नहीं है। मानव प्रकृति मूल रूप से न तो दुष्ट स्वभाव की है अथवा न ही मूल रूप से सज्जन स्वभाव की। मूलतः यह अनेक संभावनाओं से भरी है। यदि मानव प्रकृति के कारण मनुष्य इतिहास की रचना करता है तो वह इतिहास के साथ-साथ मानव प्रकृति भी निर्मित करता है और मानव प्रकृति में क्रांति की सभी संभावनायें होती हैं। मानव इच्छा शक्ति से उत्पन्न उपलब्धि घटनाओं का सीधा सादा इतिहास मात्र नहीं है, अपितु इसमें ‘‘मानव प्रकृति‘‘ की धारणाओं के अनुरूप उत्पन्न स्थितियों के विरुद्ध विद्रोह करने की शक्ति भी निहित है। ऐसा नहीं है कि मनुष्य भौतिक लालसा अथवा धन की लालसा में उत्पादन करता है। होता यह है कि जीवनोपयोगी वस्तुओं की उत्पादन की प्रक्रिया में मनुष्य ऐसे सामाजिक संबंधों में जाता है, जो उसकी इच्छा से स्वतंत्र होते हैं। मार्क्स के अनुसार लगभग पूरे मानवीय इतिहास में ये संबंध वर्ग संबंध है और इनसे वर्ग संघर्ष उत्पन्न होता है।