हिन्दी व्याकरण का इतिहास | hindi grammar history in hindi | हिंदी भाषा का अतीत

By   June 15, 2020

(hindi grammar history in hindi) हिन्दी व्याकरण का इतिहास

हिन्दी व्याकरण के इतिहास की रूप-रेखा प्रस्तुत करना उपेक्षित विषय रहा है। हिन्दी भाषा के उद्भव के लगभग सात सौ वर्ष बाद सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में हिन्दी व्याकरण का निर्माण कार्य शुरू हुआ। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि यही समय हिन्दी गद्य के सूत्रपात का भी है। वस्तुतः हिन्दी गद्य के विकसित न होने के कारण हिन्दी व्याकरण के निर्माण की ओर लोगों का ध्यान नहीं गया। साथ ही संस्कृतक की तुलना में लोक भाषाओं का उतना महत्व नहीं था। इसीलिए आचार्यों का ध्यान हिन्दी भाषा की ओर नहीं गया। हिन्दी व्याकरण के निर्माण की दिशा में प्रारंभिक प्रयत्न करने वाले प्रायः सब के सब विद्वान् विदेशी थे। भिन्न-भिन्न उद्देश्यों से भारत में निवास करने वाले अपने-अपने देशवासियों के हिन्दी ज्ञान की आवश्यकता का अनुभव करते हुए अनेके विदेशियों ने हिन्दी व्याकरण लिखा।

हिन्दी व्याकरण के इतिहास के लगभग तीन सौ वर्षों की अवधि को निम्नलिखित काल खंडों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) आरम्भ काल- लगभग सन् 1676-1855 ई0।

(2) विकास काल- सन् 1855-1876 ई0।

(3) उत्थान काल- सन् 1876-1920 ई0।

(4) उत्कर्ष काल- सन् 1920-1947 ई0।

(5) नवचेतना काल- सन् 1947 से वर्तमान काल तक।

उपर्युक्त काल विभाजन के नामकरण के लिये हिन्दी-व्याकरण के स्वरूप में क्रमिक रूप से होने वाले विकास का आधार बनाया गया है। यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक काल का प्रारम्भ एवं समापन किसी विशेष प्रवृत्ति, विशेष उद्देश्य तथा विशिष्ट वैयाकरणों की प्रभावधि के आरम्भ और समापन के साथ जुड़ा हुआ है।

(1) आरम्भकाल (सन् 1676 से 1855 ई0 तक)

सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण से हिन्दी व्याकरण का लेखन-कार्य शुरू हुआ। विलक्षण होते हुए भी यह तथ्य है कि इस आरम्भकाल के लगभग पौने दो सौ वर्षो तक केवल विदेशियों द्वारा हिन्दी-व्याकरण लिखा जाता रहा। वस्तुतः इस अवधि में किसी विद्वान् ने हिन्दी-व्याकरण लिखने का प्रयत्न नहीं किया। इसके कई कारण हैं। मुसलमानों की साम्राज्य स्थापना के साथ ही खड़ी बोली के विकास के लिये अनुकूल अवसर मिला। यह खड़ी बोली हिन्दुस्तानी के रूप में लगभग पूरे देश में फैल रही थी। विदेशियों के आने पर यह हिन्दी बोली या हिन्दुस्तानी के रूप में लगभग पूरे देश में फैल रही थी। विदेशियों के आने पर यह हिन्दी बोली या हिन्दुस्तानी ही ऐसी बोली थी जिसके द्वारा व्यापार, धर्मप्रचार और शासन-कार्य चल सकता था। इसलिए विदेशियों के लिये हिन्दी सीखना अत्यावश्यक था। व्याकरण के माध्यम से हिन्दी सीखना संभव था। दूसरी ओर उस समय तक हिन्दी का व्याकरण नहीं था। गद्य का भी अभाव थाा और विद्वानों का संस्कृत के प्रति परम्परागत मोह था। देशी भाषाओं के प्रति आचार्यों का उपेक्षाभाव था। अतः भारतीय आचार्यों का ध्यान हिन्दी व्याकरण के निर्माण की ओर गया ही नहीं। इसलिए विवश होकर भारतीयों से पहले विदेशियों को हिन्दी-व्याकरण लिखने का काम शुरू करना पड़ा।

निश्चित रूपा से यह कहना कठिन है कि हिन्दी के आदि वैयाकरण कौन थे। किन्तु अनेक विद्वानों के साक्ष्य पर अद्यावधि ज्ञात हिन्दी-वैयाकरणों में सर्वाधिक प्राचीन हालैण्ड निवासी जोहन जोशुआ केटेलेर को माना जा सकता है। केटेलेर का ‘हिन्दुस्तानी ग्रामर’ सन् 1698 ई0 में अथवा उसके पूर्व लिखा गया था। केटेलर से पूर्व मिर्जा खाँ ने सन् 1676 ई0 में ब्रजभाषा व्याकरण की रचना की थी, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि केटेलेर के भारत आगमन के पूर्व हिन्दी-व्याकरण के निर्माण की परम्परा शुरू हो गयी होगी।

इस काल में हिन्दी-व्याकरण के अतिरिक्त ब्रजभाषा तथा उर्दू के भी व्याकरण लिखे गये। इस काल में उर्दू-हिन्दी सम्मिलित रूपा को ‘हिन्दुस्तानी’ कहा गया। कहा जाता है कि सर्वप्रथम जोहन जोशुआ केटेलेर ने ‘हिन्दुस्तानी-ग्रामर’ की रचना की थी। यह परिनिष्ठित हिन्दी अथवा हिन्दुस्तानी का व्याकरण नहीं था, अपितु वह बंबई, सूरत आदि दक्षिणी नगरों की बाजारू हिन्दी का ग्रामर था। केटेलेर के बाद बेज्जसमिप शुुल्जे कस ‘ग्रामेटिका हिन्दोस्तानिका’ नामक हिन्दी व्याकरण सन् 1744 ई0 में प्रकाशित हुआ था। जाॅर्ज हाड्ले का हिन्दी व्याकरण विषयक एक ग्रंथ सन् 1872 ई0 में लन्दन से प्रकाशित हुआ। लन्दन से ही सन् 1873 ई0 में जाॅन फरगूसन का ‘हिन्दुस्तान भाषा का कोष’ प्रकाशित हुआ था, जिसके प्रारंभिक 58 पृष्ठों में ‘हिन्दुस्तान भाषा का व्याकरण’ लिख गया था। जाॅन बाॅर्थविक गिलक्राइस्ट सन् 1801 ई0 में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कालेज में हिन्दुस्तानी भाषा के प्रोफेसर नियुक्त हुये थे। उनका पहला ग्रंथ ‘इंगलिश-हिन्दुस्तानी कोष’ कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था, जिसका दूसरा संस्करण 1810 ई0 में एडिनबरा से निकला जिसमें ‘हिन्दुस्तानी फिलोेलाॅजी’ नामक एक भाग बढ़ा दिया गया। इसके तीसरे संस्करण में भी व्याकरण सम्बन्धी बातें जोड़ दी गयी थीं। ‘ए ग्रामर आॅफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ के अतिरिक्त गिलक्राइस्ट ने और कई व्याकरण सम्बन्धी पुस्तकें लिखी।

उपर्युक्त व्याकरणों के अतिरिक्त कई विदेशी विद्वानों ने भी व्याकरण लिखे जिनमें हेरासिम लेवेडेफ, रोएबक (द इंग्लिश’ ऐण्ड हिन्दुस्तानी डिक्शनरी विथ एक ग्राम प्रिफिक्स्ड’, 1811 ई0 में कलकत्ता से प्रकाशित), जाॅन शेक्सपियर (ए ग्रामर आॅफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’-1813 ई0 में लन्दन से प्रकाशित), कैप्टेन विलियम प्राइस (‘हिन्दुस्तानी ग्रामर’-1827-28 ई0 में लन्दन से प्रकाशित), विलयम येट्रस (‘इन्ट्रोडक्शन टु द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’-1827 ई0 में कलकत्ता से प्रकाशित), एम0टी0 आदम, विलियम एण्ड्रिउ, सैण्डफोर्ड आर्नोट आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। एम0टी0 आदम हिन्दी का व्याकरण लिखने वाले प्रथम वैयाकरण थे जिनका ‘हिन्दी भाषा का व्याकरण’ 1827 ई0 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था। यों आदम के पूर्व ‘हिन्दी कवायद’ का उल्लेख मात्र मिलता है। आदम ने हिन्दी का पहला कोष भी लिखा था। विदेशी वैयाकरणों में आदम ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दुस्तानी’, ‘हिंदुई’ के स्थान पर ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग किया था। फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान् जोसेफ हेलिओडोर गार्सां द तासी ने सन् 1829 से 1848 ई0 के बीच हिन्दी भाषा एवं व्याकरण सम्बन्धी अनेक निब्नध लिखे थे। उन्होंने व्याकरण सम्बन्धी स्वतंत्र पुस्तकें भी लिखी थी। गार्सा द तासी के बाद जेम्स आर0 वैजेण्टाईन जिन्होंने हिन्दी व्याकरण सम्बन्धी तीन ग्रंथों की रचना की थी, डंकन फोर्बेस (‘हिन्दुस्तानी मैनुअल’- 1845 ई0), इ0 बी0 अस्टविक ( ‘ए कनसाईज ग्रामर आॅफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’-1847 ई0), जे0 डेटलो प्रोखनों, अलेग्जेण्डर फाॅकनर आदि ने हिन्दी व्याकरण की रचना की। फाॅकनर आरम्भकाल के अंतिम वैयाकरण थे। इनके पूर्व के सभी वैयाकरण विदेशी थे। बाद में भारतीय पंडितों ने भी हिन्दी व्याकरण लिखना शुरू किया।

(2) विकासकाल (सन् 1855 से 1876 ई0 तक)

पं0 श्रीलाल के ‘भाषा चन्द्रोदय’ के प्रकाशन के साथ ही सन् 1855 ई0 से हिन्दी व्याकरण के इतिहास के विकासकाल का आरम्भ हुआ। इसके पूर्व हिन्दी के जितने भी व्याकरण लिखे गये वे सभी विदेशियों द्वारा लिखे गये थे। ‘भाषा चन्द्रोदय’ उद्देश्य, आदर्श और आधार तीनों ही दृष्टियों से विदेशियों द्वारा आरम्भकाल के व्याकारणों से भिन्न कोटि का था। पं0 श्रीलाल भारतीय विद्वानों में हिन्दी के प्रथम वैयाकरण थे।

भारतीय छात्रों को हिन्दी के स्वरूप का व्याकरणिक परिचय देने के लिये ही विकासकाल के वैयाकरणों ने हिन्दी व्याकरण लिखा। आरम्भकाल के वैयाकरणों का उद्देश्य था- विदेशियों को हिन्दी का सामान्य ज्ञान प्रदान करना। विकासकाल के वैयाकरणों का आदर्श था भारतीय, जबकि आरम्भकाल के वैयाकरणों ने विदेशी आदर्श पर लिखा। यूरोपीय भाषाओं के व्याकरण को ही आरम्भकाल के वैयाकरणों ने आधार बनाया था, जबकि विकासकाल में वैयाकरणों ने संस्कृत व्याकरण के आधार पर व्याकरण की रचना की।

सन् 1855 ई0 1876 ई0 तक हिन्दी व्याकरण के निर्माण की दिशा में पं0 श्रीलाल (भाषा चन्द्रोदय’ अर्थात् ‘भारतवर्षीय हिन्दी भाषा का व्याकरण’) के अतिरिक्त पं0 रामजसन (भाषातत्वबोधिनी, 1858ई0 में बनारसस से प्रकाशि), मुंशी गुलाम मुहम्मद (‘कोलोकियल डायलाॅग्स इन हिन्दुस्तानी’-1858 ई0 में बम्बई से प्रकाशित), हैदर जंगबहादुर की (‘टू हिन्दुस्तानी’-1861 ई0 में लन्दन से प्रकाशित), सर मोनियर विलियम्स (‘रूडिमेन्ट्स आॅफ हिन्दुस्तानी ग्रामर’-1858ई0, ‘एन ईजी इन्ट्रोडक्शन टू द स्टडी आॅफ हिन्दुस्तानी’-1858 ई0 में लन्दन  से प्रकाशित, ‘हिन्दुस्तानी प्राइमर’-1860 ई0 में लन्दन से प्रकाशित, ‘ए प्रैक्टिकल हिन्दुस्तानी ग्रामर’-1862ई0 में लन्दन से प्रकाशित), नवीन चन्द्र राय (नवीन चन्द्रोदय- 1868 ई0 में प्रकाशित), शीतल प्रसाद गुप्त (शब्द प्रकाशिका-1870ई0 में लखनऊ से प्रकाशित), विलियम एथरिंगटन (स्टूडेण्ट्स गा्रमर आॅफ द हिन्दी लैंग्वेज’ 1870 ई0 में बनारस से प्रकाशित), प0 हरिगोपाल पाध्ये (‘भाषातत्व दीपिका’-1871 ई0 में प्रकाशित), भैरव प्रसाद मिश्र (‘हिन्दी लघु व्याकरण-1971ई0 मंे प्रकाशित’), जान डाउसन (‘ए ग्रामर आॅफ द उर्दू आॅर हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ 1872 ई0 में लन्दन से प्रकाशित), जाॅन बीम्स (‘ए कम्परेटिव ग्रामर आॅफ द माडर्न आर्यन लै।ग्वेज आॅफ इण्डिया’ 1872 ई0 में लन्दन से प्रकाशित), ए0 एफ0 रूडोल्फ हाॅर्नली (‘ए कम्परेटिव ग्रामर आॅफ द गीडियन लैंग्वेजेज‘-1880 ई0 में लन्दन प्रकाशित), दामोदर शास्त्री (‘भाषादर्श-बाल व्याकरण’- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रेरणा से 1874 ई0 में प्रकाशित), पेज्जोनी विकारिओ (इतालवी भाषा में ‘ग्रामेटिका इटालियाना इन्दोस्ताना‘ नामक हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण 1874 ई0 में प्रकााशित), जाॅन0 टी0 प्लाट्स (हिन्दुस्तानी ग्रामर- 1874 ई0 में प्रकाशित), राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द (‘हिन्दी व्याकरण‘-1875 ई0 में बनारस से प्रकााशित) आदि श्रेष्ठ विद्वानों द्वारा हिन्दी व्याकरण के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण प्रयत्न हुए और व्याकरण लिखे गये। केलाॅग के व्याकरण के प्रकाशित (1876 ई0) होने तक भाषा के वास्तविक स्वरूप-विश्लेषण की दृष्टि से स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। विकासकाल में आरम्भकाल की अपेक्षा हिन्दी व्याकरण के स्वरूप में अधिक निखार आया एवं स्पष्टता आयी। वस्तुतः इसका कारण यह था कि इस काल के अधिकांश लेखक भारतीय थे जिनका हिन्दी पर अधिकार था। इसके साथ ही वे हिन्दी की पूर्व परम्परा एवं भारतीय व्याकरणशास्त्र से परिचित थे।

(3) उत्थान-काल (सन् 1876 से 1920 ई0 तक)

केलाॅग का हिन्दी व्याकरण 1876 ई0 में प्रकाशित हुआ। यही से हिन्दी व्याकरण के इतिहास का उत्थान काल शुरू होता है। इसके पूर्व बीम्स, हाॅर्नली आदि विद्वानों द्वारा आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन की नींव डाली जा चुकी थी। हिन्दी व्याकरणेतिहास का आरम्भकाल निर्देशप्रधान था और विकासकाल विवरणात्मक प्रधान। उत्थान काल का व्याकरण ऐतिहासिक स्रोत के संकेतों से संवलित था तथा उसमें हिन्दी के अतिरिक्त अन्यान्य बोलियों के भी व्याकरणिक रूपों का तुलनात्मक परिचय दिया गया था। इस प्रकार इस काल में ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक पद्धति पर हिन्दी के व्याकरण लिखे गये जिसका प्रारम्भ केलाॅग के व्याकरण से हुआ। व्याकरण रचना में केलाॅग का उद्देश्य शुद्ध भाषाशास्त्रीय था। यह काल केवल व्याकरण का ही उत्थानकाल नहीं था, अपितु हिन्दी भाषा एवं साहित्य का उत्थानकाल था।

हिन्दी व्याकरणेतिहास का आरम्भकाल फारसी से हिन्दुस्तानी के संघर्ष का काल था, तो विकासकाल हिन्दुस्तानी से उर्दू के संघर्ष का समय था। इसी प्रकार उत्थानकााल उर्दू से हिन्दी के संघर्ष का काल था। इस संघर्ष में अंततः हिन्दी ही विजयी हुई। अंग्रेजी आादि से अन्त तक साहित्येतर क्षेत्रों की सर्वोपरि भाषा बनी रही।

उत्थानकाल के वैयाकरणों में एस0एच0 केलाॅग का सर्वप्रथम स्थान है। उनका ‘ए ग्राम आॅफ द हिन्दी लैंग्वेज’ 1876 ई0 में लन्दन से प्रकाशित हुआ। केलाॅग ने हिन्दी प्रदेश में बोली जाने वाली सभी बोलियों के सामूहिक नाम के लिये ‘हिन्दी‘ शब्द का प्रयोग किया। केलाॅग के बाद अयोध्या प्रसाद खत्री (‘हिन्दी व्याकरण बाँकीपुर से प्रकाशित‘), केशव प्रसाद (भाषा लघु व्याकरण 1878 ई0), वंशीलाल (हिन्दी व्याकरण’-1879 ई0 में पटना से प्रकाशित), गोविन्ददेव शास्त्री (बाल-बोध व्याकरण-1879 ई0 में मिर्जापुर से प्रकाशित), पं0 मदन मोहन, काली प्रसाद त्रिपाठी (भाषा व्याकरण दर्पण), विनायक राम एवं गणपति लाल चैबे, ई0 एच0 पामर, जार्ज एव0 ग्रियर्सन (सेवुन ग्रामर आॅफ बिहारी लैंग्वेजेज’ 1883 ई0 से 1887 ई0 तक, लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इण्डिया), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (प्रथम हिन्दी व्याकरण-1884 में बाँकीपुर से प्रकाशित), बाबू रामचरण सिंह (भाषा प्रभाकर- 1885 ई0 में बाँकीपुर सेस प्रकाशित), पं0 अंबिकादत्त व्यास, गणपति लाल चैबे, पं0 सुधाकर द्विवेदी (हिन्दी भाषा का व्याकरण- 1890ई0 में बनारस से प्रकाशित), एडबिन ग्रीव्स (ग्रामर आॅफ माडर्न हिन्दी’- 1895 ई0 में बनारस से प्रकाशिता), ठाकुर रामनारायण सिंह (हिन्दी व्याकरण-1897 ई0 बाँकीपुर), पं0 नारायण शास्त्री पटवर्धन, माधव प्रसाद पाठक, श्याम सुन्दर दास (एलिमेन्टरी ग्रामर आॅफ हिन्दी एण्ड उर्दू- 1906 ई0 में बनारस से प्रकाशित), पं0 राम अवतार शर्मा (हिन्दी व्याकरण- 1914ई0), राम दहिन मिश्र (प्रवेशिका हिन्दी व्याकरण-1918ई0 बाँकीपुर), रामलोचन शरण (हिन्दी व्याकरण चन्द्रोदयय- 1918ई0 दरभंगा), पं0 अंबिकाप्रसाद वाजपेयी (हिन्दी कौमुदी 1919 ई0) आदि वैयाकरणों ने हिन्दी व्याकरणों का निमार्ण किया।

(4) उत्कर्ष काल (सन् 1920 से 1947 ई0 तक)

प0 कामताप्रसाद गुरू के हिन्दी व्याकरण के प्रकाशनवर्ष सन् 1911 ई0 से हिन्दी व्याकरण के इतिहास के उत्कर्षकाल का प्रारम्भ हुआ। उत्कर्ष काल के पूर्व उत्थान काल में जो भी व्याकरण लिखे गये, उनमें से कुछ को छोड़कर अधिकांश व्याकरण प्रवेशिका कक्षा तक के छात्रों को ध्यान में रखकर लिखे गये थे। इस उत्थान काल का कोई भी व्याकरण सर्वसामान्य नहीं बन सका था, क्योंकि उनमें भाषा के प्रचलित प्रयोगों के भीतर एकरूपता एवं स्थिरता लाने वाले नियमों का निर्धारण नहीं किया गया था। उत्कर्ष काल के शुरू होने के साथ हिन्दी की स्थिति में परिवर्तन हुए। गुरू के व्याकरण के कारण हिन्दी को विश्वविद्यालयीय उच्च परीक्षाओं में एक विषय के रूप में स्वीकृत किया गया। साथ ही इस व्याकरण से हिन्दी भाषा का एक परिनिष्ठित रूप स्थिर हुआ।

उत्कर्ष काल के वैयाकरणों में पं0 कामताप्रसाद गुरू का सर्वप्रमुख स्थान है। उनका ‘हिन्दी व्याकरण‘ सन् 1921 ई0 में नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी से प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त पं0 गुरू ने ‘भाषा वाक्य पृथक्करण‘, ‘हिन्दी बालबोध व्याकरण‘, ‘सहज हिन्दी रचना‘ की रचना की। उनका हिन्दी व्याकरण, हिन्दी भाषा के उत्थान में एक नये युग का मार्गदर्शक बनकर आया। पं0 गुरू के अतिरिक्त शिवनारायण लाल (एक मैनुअल आॅफ हायर हिन्दी ग्रामर ऐण्ड कम्पोजीशन-1920 ई0 कलकत्ता), अमृतलाल दासगुप्ता (‘सहज हिन्दी और हिन्दुस्तानी’-1921 ई0), श्रीनारायण चतुर्वेदी (‘नवीन हिन्दी व्याकरण‘ 1924 ई0 लखनऊ), बी0एल0 जैन तैतन्य (बुलन्द शहरी), शिवत्र शास्त्री, देवी प्रसाद वर्मा, शिवनारायण झा, बलदेव प्रसाद और भगवान दीन (सरल हिन्दी व्याकरण-1928 ई0 लाहौर), सुरेश्वर पाठक विद्यालंकार (व्याकरण मयंक-1929ई0), गंगा प्रसाद उपाध्याय, जंगबहादुर मिश्र ‘रंजन, एस0 जी0 मुहाउद्दीन कादरी (हिन्दुस्तानी फोनेटिक्स’ 1930 ई0), पं0 गिरिजाप्रसाद शर्मा (व्याकरण भूषण-19831 ई0), सत्यप्रकाश (हिन्दी व्याकरण-1933 ई0 इलाहाबाद), डा0 धीरेन्द्र वर्मा एवं डा0 बाबूराम सक्सेना (‘नवीन हिन्दी व्याकरण‘- 1933 ई0, इलाहाबाद), धरणीधर शास्त्री (हिन्दी व्याकरण- 1930 ई0), भुवनेश्वर मिश्र (हिन्दी व्याकरण बोध- 1934 ई0), पं0 गणेशप्रसाद द्विवेदी (आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना 1934-35 ई0), रमानाथ उपाध्याय और पं0 विष्णुदत्त उपाध्याय, रघुनाथ दिनकर काणे, पं0 गोपालशास्त्री, एच0सी0 शोलबर्ग (कनसाईज ग्रामर आॅफ द हिन्दी लैंग्वेज-1940ई0), ना0 नागप्पा (‘व्यावहारिक हिन्दी‘ 1941ई0, द0 भा0 हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास), केदारनाथर शर्मा, आत्माराम, सत्यजीवन वर्मा (हिन्दी के विराम चिन्ह- 1943 ई0), वी0पी0 जोसफ (‘हिन्दी उस्ताद‘), रामचन्द्र वर्मा (मानक हिन्दी व्याकरण- वि0 सं0 2010, अच्छी हिन्दी 1944 ई0, हिन्दी प्रयोग- 1946 ई0), बासुदेव पिल्लै (हिन्दी व्याकरण-1945 ई0 ), ई0 बी0 ईस्टविक (हिन्दुस्तानी ग्रामर- 1947ई0 लंदन), नरदेव विद्यालंकार आदि लेखकों ने हिन्दी व्याकरण लिखे एवं हिन्दी के व्याकरण को आगे बढ़ाया।

(5) नवचेतना काल (सन् 1947 ई0 के बाद)

पं0 किशोरीदास वाजपेयी हिन्दी व्याकरण के क्षेत्र में नवीन चेतना के अगुवा बनकर आये उन्होंने सर्व प्रथम यह घोषणा की कि हिन्दी एक स्वतंत्र भाषा है जो संस्कृत से अनुप्राणित होते हुए भी अपने क्षेत्र में सार्वभौम सत्ता रखती है। हिन्दी की अपनी प्रकृति है जिसके अनुसार उसका व्याकरण बनेगा। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी आंखे बन्द करके संस्कृत का सब कुछ नहीं ले लेगी। संस्कृत अथवा अन्य भाषाओं से आने वाले शब्दों पर वह अपने नियमों के अनुसार शासन करेगी।

पं0 वाजपेयी ने 1943 ई0 में ‘ब्रजभाषा का व्याकरण’ लिखा। उ सके बााद 1948 ई0 में ‘अच्छी हिहन्दी का नमूना‘ और 1949 ई0 में ‘राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण‘ और ‘हिन्दी निरूक्त‘ प्रकाशित हुए। इनके प्रकाशन से वाजपेयी जी हिन्दी जगत् में एक प्रसिद्ध वैयाकरण के रूप में ख्यात हो गये। इनमें उन्होंने गुरू के व्याकरण तथा अन्य व्याकरणों की भूलों पर विस्तार से प्रकाश डाला था। इनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी ने इन्हें हिन्दी का बड़ा व्याकरण लिखने के लिये आमंत्रित किया। फलतः इन्होंने ‘हिन्दी शब्दानुशासन‘ लिखा जो सभा से ही 1958 ई0 में प्रकाशित हुआ। यों हिन्दी व्याकरण में नवचेतना का उन्मेष उनके ‘ब्रजभाषा का व्याकरण‘ से ही 1943 ई0. में हो गया था लेकिन 1948-49 मे जो उनके अन्य व्याकरणग्रन्थ प्रकाशित हुए, उनसे नवचेतना का व्यापक रूप एवं प्रभाव स्पष्ट हुआ। इन सबकी पुष्टि ‘हिन्दी शब्दानुशासन’(1958ई0) से हो गयी।

ठस काल के प्रसिद्ध वैयाकरणों में पं0 किशोरीदास वाजपेयी के अतिरिक्त डा0 आर्येन्द्र शर्मा, दुनीचन्द्र, डा0 भोलानाथ तिवारी तथा डा0 दीमशित्स ने सर्वाधिक ख्याति प्राप्त की। इस काल में हिन्दी व्याकरण का बहुविध विकास हो रहा है। अनेक विद्वानों ने तो हिन्दी भाषा एवं व्याकरण से संबंद्ध शोधप्रबन्ध भी प्रस्तुत किये।

पं0 वाजपेयी के अतिरिक्त अन्य वैयाकरणों के नाम एवं ग्रंथ इस प्रकार हैं- आचार्य शिवपूजन सहाय ‘व्याकरणदर्पण‘, दुनीचन्द्र (हिन्दी व्याकरण-1950 ई0), डा0 आर्येन्द्र शर्मा (ए बेसिक ग्रामर आॅफ माडर्न हिन्दी-1958 ई0), डा0 ज0 म0 दीमशित्स (हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा- 1966 ई0, दिल्ली) इनके अतिरिक्त अनेकानेक अन्य व्याकरण गं्रथ भी लिखे गये- शिवप्रसाद अग्रवाल (शुद्ध हिन्दी-1952ई0), सेठ गोविन्द दास (राजभाषा हिन्दी-1963 ई0), भगीरथ मिश्र (अच्छी हिन्दी कैसे लिखे-1963 ई0), देवेन्द्रनाथ शर्मा (हिन्दी- समस्याएँ और समाधान- 1965 ई0), विनयमोहन शर्मा (हिन्दी का व्यावहारिक रूप- 1968 ई0), मुरलीधर श्रीवास्तव (हिन्दी धातुकोश-1969 ई0), रमेशचन्द्र मेहरोत्रा (हिन्दी ध्वनिकी और धवनिमी- 1970ई0), बालमुकुन्द (हिन्दी क्रिया-स्वरूप् और विश्लेषण- 1970 ई0), पं0 करूणापति त्रिपाठी (हिन्दी धातु और क्रिया पद वाराणसी), देवेन्द्र नाथ शर्मा और रामदेव त्रिपाठी(हिन्दी भाषा का विकास- 1971 ई0), डा0 विजयपाल सिंह (हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण 1972)। इस समय अन्य भी अनेक व्याकरण लिखे गये है। इस समय एक सुव्यवस्थित व्याकरण की महती आवश्यकता है जो पं0 कामताप्रसाद गुरू के व्याकरण तथा पं0 किशोरीदास वाजपेयी के शब्दानुशासन की विशेषताओं को समेटते हुए आधुनिक हिन्दी की विशेषताओं का भी उद्घान करे।