हड़प्पा सभ्यता इतिहास क्या है , प्रमुख विशेषता हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने की harappan civilization in hindi

By   October 10, 2021

harappan civilization in hindi हड़प्पा सभ्यता इतिहास क्या है , प्रमुख विशेषता हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने की ?

हड़प्पा सभ्यता

सिन्धु घाटी या हड़प्पा सभ्यता, विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। यह सभ्यता लगभग 3000 ईसा पूर्व अस्तित्वमान थी। हड़प्पा सभ्यता, मिस्र, मेसोपोटामिया एवं चीन की प्राचीन सभ्यताओं की समकालीन थी। इस सभ्यता का नामकरण हड़प्पा नामक स्थल के नाम पर किया गया है, जिसकी खोज सर्वप्रथम 1826 में की गई थी। वर्तमान समय में हड़प्पा पश्चिमी पंजाब में रावी नदी के तट पर स्थित है, जो अब पाकिस्तान में है। इस सभ्यता को सिंधु सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस सभ्यता के बहुत से स्थल सिंधु नदी की घाटी में सकेन्द्रित थे। सिंधु घाटी सभ्यता के प्रारंभ के संबंध में विभिन्न इतिहासकारों एवं पुरातत्ववेत्ताओं के मध्य मत-मतांतर था। कई इतिहासकारों का मत था कि विदेशी आक्रांताओं ने अचानक आक्रमण करके सिंधु घाटी क्षेत्र को जीत लिया था तथा यहां उन्होंने नए नगर बसाने प्रारंभ कर दिए। यद्यपि नवीनतम साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि सिन्धु घाटी की इस नगरीय सभ्यता का उद्भव सिन्धु क्षेत्र में स्थानीय सभ्यता से ही हुआ था। इस सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों एवं खुदाई के स्तरों के आधार पर विद्वानों ने इस सभ्यता को कुछ प्रमुख चरणों में विभक्त किया है। प्रथम चरण प्राक-हड़प्पा नव पाषाणकालीन चरण था, जिसकी अवधि 5500-3500 ईसा पूर्व मानी गई है। बलूचिस्तान एवं सिंध के मैदानी इलाकों में मेहरगढ़ एवं किली गुल मोहम्मद जैसी बस्तियों से सीमित कृषि, ग्रामों का मौसमी व्यवसाय एवं स्थायी ग्रामों के क्रमिक उद्भव के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इन्हें विभिन्न फसलों जैसे-गेहूं, जौ, खजूर, कपास इत्यादि का ज्ञान था तथा ये भेड़, बकरी एवं अन्य पशुओं को पालते थे। इस चरण में मिट्टी से बने आवासों, मृदभाण्डों एवं कलात्मक वस्तुओं के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।
दूसरा चरण प्रारंभिक हड़प्पा काल था, जिसकी अवधि 3500-2600 ईसा पूर्व निर्धारित की गई है। इस चरण में लोगों ने स्थायी तौर पर पहाड़ियों एवं मैदानी क्षेत्रों में रहना प्रारंभ कर दिया था। इस चरण में लोग तांबे के प्रयोग, पहिए एवं हल से परिचित थे। इस चरण में विविध प्रकार के सुंदर एवं कलात्मक मृद्भाण्डों की प्राप्ति से कई क्षेत्रीय परम्पराओं के प्रारंभ के संकेत भी मिलते हैं। अन्नागार, रक्षात्मक प्राचीर एवं लंबी दूरी के व्यापार एवं मृदभाण्ड संस्कृति के उद्भव के प्रमाण समस्त सैंधव घाटी क्षेत्र में पाए जाते हैं।
कृषि की तकनीक के उन्नत होने तथा सिन्धु के उपजाऊ मैदानों के उपयोग से निश्चित तौर पर कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई होगी। इससे अधिशेष बढ़ा होगा, जनसंख्या में वृद्धि हुई होगी तथा दूरवर्ती समुदायों से व्यापारिक संबंध स्थापित हुए होंगे। अधिशेष की मात्रा बढ़ने से लोगों ने गैर-कृषि हस्तशिल्प, यथा-धातुकर्म, मृदभाण्ड निर्माण एवं कलात्मक वस्तुओं की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया होगा। इसी से संभवतः शासक वर्ग की उत्पत्ति भी हुई होगी। इस चरण ने श्परिपक्व हड़प्पा चरणश् का मार्ग प्रशस्त किया, जिसकी अवधि 2600-1800 ईसा पूर्व मानी गई है। इस चरण की मुख्य विशेषताएं थीं-शहरी जीवन, लेखन, एकसमान मानक प्रणाली, हस्तशिल्प का क्षेत्रीय विशिष्टीकरण एवं मेसोपोटामिया तथा खाड़ी के अन्य देशों से समुद्रपारीय व्यापार। सिन्धु सभ्यता की नगरनियोजन व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी तथा यह जल-निकासी की समुन्नत व्यवस्था के लिए जानी जाती थी। इस तथ्य के सुस्पष्ट प्रमाण सिन्धु सभ्यता के दो प्रमुख स्थलों-हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के उत्खनन से भी प्राप्त हुए हैं। गेहूं, जौ, राई, मटर, तिल एवं सरसों हड़प्पा सभ्यता की मुख्य फसलें थीं। चन्हुदड़ो से सरसों के बीज प्राप्त हुए हैं।
सिन्धु सभ्यता, ताम्र-पाषाण काल से संबंधित थी। यह इस बात की पुष्टि करता है कि इस सभ्यता के निवासी तांबे एवं पाषाण दोनों के प्रयोग से भलीभांति परिचित थे। तांबे की एक मिस्र धातु कांसे का उपयोग बर्तन, आभूषण एवं औजार बनाने में किया जाता था। इस सभ्यता की भाव-चित्रात्मक लिपि को अभी तक नहीं पढ़ा जा सका है। इस सभ्यता के विभिन्न स्थलों से कई मुहरें भी प्राप्त हुई हैं, जिसमें विभिन्न प्रकार के प्रतीक बने हुए हैं।
हड़प्पा सभ्यता विस्तृत भू-क्षेत्र में फैली थी तथा हड़प्पा, घग्घर एवं मोहनजोदड़ो धुरी में केन्द्रित थी। सुतका कोह एवं सुत्कागेंडोर, जो मकरान तट पर स्थित थे, इस सभ्यता की पश्चिमी सीमा का निर्धारण करते थे जबकि बड़गांव, मानपुर एवं उत्तर प्रदेश में आलमगीरपुर इस सभ्यता की पूर्वी सीमा का निर्माण करते थे। इस सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल, जो अब पाकिस्तान में हैं, उनमें सम्मिलित हैंः मोहनजोदड़ो, अलीमुराद, हड़प्पा, कोटदिजि एवं सुत्कागेंडोर। भारत में स्थित महत्वपूर्ण स्थल हैंः पंजाब में रोपड़, गुजरात में लोथल, रंगपुर एवं सुरकोटडा; राजस्थान में कालीबंगा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलमगीरपुर। कुछ समय पूर्व ही भारत के गुजरात राज्य में खोजा गया स्थल धौलावीरा इस सभ्यता का सबसे बड़ा एवं सबसे नवीन स्थल है।
हड़प्पा सभ्यता का उत्तरवर्ती चरण 1800 ईसा पूर्व एवं उसके आगे से प्रारंभ होता है। इस चरण में हड़प्पा सिन्धु सभ्यता के अवसान के संकेत दिखाई देते हैं। इस चरण में शहरी विशेषताएं विलुप्त होने लगी थीं, यद्यपि हड़प्पाई हस्तशिल्प एवं मृदभाण्ड परम्परा विद्यमान रही।

भारत में प्रागैतिहासिक संस्कृति

मानवीय अस्तित्व की अवस्था का वह काल, जिसका कोई लिखित साक्ष्य प्राप्त नहीं होता, प्रागैतिहासिक काल कहलाता है। भारत में, प्रारंभिक प्रागैतिहासिक काल 8 सहस्राब्दी ईसा पूर्व के पहले माना जाता है तथा प्रागैतिहासिक पशुपालन एवं कृषि का काल आठ से चैथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। इसी कालावधि में पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण सभ्यताओं का उद्भव हुआ।
पुरापाषाण काल लगभग 5 लाख वर्ष पहले था। इस काल में मानव सभ्यता विकास की बिल्कुल प्रारंभिक स्थिति में थी। यह शिकार संग्रहण का चरण था तथा मानव को धातु एवं कृषि की कोई जानकारी नहीं थी। वे अग्नि से भी परिचित नहीं थे। मृतकों को दफनाया नहीं जाता था बल्कि उन्हें खले में ही फेंक दिया जाता था, जहां जंगली जानवर उन्हें आहार बना लेते थे। ये भोजन के लिए मुख्यतः फलों, जानवरों एवं मछलियों पर निर्भर थे, जिनका शिकार ये पाषाण के बने विभिन्न उपकरणों, यथा-हैण्डएक्स, क्लीवर, चोपर, फ्लेक, साइड स्क्रैपर एवं ब्यूरिन इत्यादि के माध्यम से करते थे। भारत में पुरापाषाणकालीन उपकरण एक विस्तृत क्षेत्र में पाए गए हैं जबकि मानव की उपस्थिति के सबसे प्रारंभिक प्रमाण पंजाब में मिले हैं। विन्ध्याचल पर्वत-शृंखलाओं में स्थित भीमबेटका अपनी शैल चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है।
मध्यपाषाणकाल, जो लगभग 8000 ईसा पूर्व में प्रारंभ हुआ, पुरापाषाणकाल एवं नवपाषाणकाल के बीच का चरण था। मध्यपाषाणकालीन लोग शिकार-संग्रहण समूह से संबंधित थे। ये मुख्यतया मत्स्य आखेट पर निर्भर थे तथा लघु स्तर के कृषक भी थे। इनके आहार में मांस एवं फल-सब्जियां दोनों सम्मिलित थे। ये जंगली जड़ें, कंद एवं शहद भी बड़े चाव से खाते थे। मध्यपाषाण कालीन उपकरण माइक्रोलिथ (छोटे पाषाण उपकरण) हैं। इनमें ब्लेड, कोर, प्वाइंट, तिकोने औजार, फ्लैक इत्यादि उपकरण सम्मिलित थे। इलाहाबाद-प्रतापगढ़ क्षेत्र में स्थित सराय-नाहर-राय, भीमबेटका, होशंगाबाद में आदमगढ़ एवं छोटा नागपुर का पठार वे क्षेत्र हैं, जहां से बड़ी संख्या में मध्यपाषाणकालीन पाषाणोपकरण प्राप्त हुए हैं। भीमबेटका एवं आदमगढ़ में चित्रकारी एवं नक्काशी के सुंदर नमूने प्राप्त होते हैं। इन चित्रों में तत्कालीन मानव की विभिन्न गतिविधियों यथा-शिकार, आहार-संग्रहण एवं दाह संस्कार इत्यादि के जो चित्र प्राप्त होते हैं, वे इस बात के परिचायक हैं कि इस चरण में मानवीय जीवन स्थायी एवं सामाजिक होने लगा था।
नवपाषाणकाल की अवधि 5000-3000 ई.पू. मानी जाती है। इस चरण की सबसे मुख्य विशेषता स्थायी तौर पर कृषि का प्रारंभ एवं पशुओं को पालतू बनाया जाना है। अनाजों की खेती एवं कृषि के विकास से उनके जीवन में कायांतरण हुआ तथा वे घुमन्तू शिकारियों से स्थायी कृषक बनने लगे। इससे ग्रामीण सभ्यता का उद्भव एवं विकास, नए प्रकार के पाषाणोपकरणों का निर्माण एवं प्राकृतिक संसाधनों पर मानव के बेहतर नियंत्रण की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ। नवपाषाणकालीन उपकरण सुघड़ एवं पालिशदार हैं। इन उपकरणों में सम्मिलित हैं-कुल्हाड़ी, हथौड़े, सिलबट्टे, सींग एवं हड्डी की बनी छेनी, बाण, बरमा, सुई, कुदाल, चूड़ी इत्यादि। ये उपकरण लगभग पूरे देश में पाए गए हैं। कश्मीर घाटी में बुर्जहोम तथा गुफ्फकराल, (जहां से गर्त आवास के साक्ष्य भी मिले हैं); दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश, जिसमें सम्मिलित हैं-चोपानी, मांडो; उत्तरी बिहार; उत्तर-पूर्व में दाओजली हडिंग; छोटा नागपुर का पठार एवं दक्षिण भारत से ये उपकरण प्राप्त किए गए हैं। कराची के मैदान में स्थित मेहरगढ़ की पहचान दक्षिण एशिया की पहली कृषि बस्ती के रूप में हुई है। बुर्जहोम एवं गुफ्कराल के पुरातात्विक उत्खनन से मसूर, मटर, गेहूं एवं जौ; चोपानी मांडो के उत्खनन से चावल तथा दक्षिण भारत से रागी की खेती के प्रारंभिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। दाह संस्कार की प्रक्रिया तथा शवाधान से संबद्ध अनुष्ठानों के प्रयोग का प्रारंभ होना भी इस काल की महत्वपूर्ण विशेषताएं थीं।

प्ण् सिंधु तंत्रः 1. मोहनजोदड़ो 2. हड़प्पा 3. रोपड़ 4. सूरतगढ़ 5. हनुमानगढ़ 6. चन्हुदड़ो 7. झुकर 8. आमरी 9. झंगर
प्प्ण् गंगा तंत्रः 10. कौशाम्बी 11. आलमगीरपुर
प्प्प्ण् ब्रह्मपुत्र तंत्र
प्टण् महानदी तंत्र
टण् चम्बल तंत्रः 12. सेवा 13. नागदा 14. परमार-खेत 15. तुंगनी 16. मेटवा 17. टकराओडा 18. भिलसुरी 19. माओरी 20. घटा-बिलोड 21. बेतवा 22. बिलावली 23. अष्ट
टप्ण् राजपुताना-सौराष्ट्रः 24. रंगपुर 25. अहर 26. प्रशास पाटन, 27. लखाबावल 28. लोथल 29. पिथादिया 30. रोजड़ी 31. अदकोट
टप्प्ण् नर्मदा तंत्रः 31. नवदातोली 33. महेश्वर 34. भगतराव 35. तेलोद 36. मेहगम 37. हसनपुर
टप्प्प्ण् तापी तंत्रः 38. प्रकाश 39. बहल ।
प्ग्ण् गोदावरी-प्रवर तंत्रः 40. जोरवे 41. नासिक 42. कोपरगांव 43. नेवासा 44. दायमाबाद
ग्ण् भीमा तंत्रः 45. कोरेगांव 46. चन्दोली 47. उम्बरा 48 चानेगांव 49 अनाची 50 हिंगनी 51. नागरहल्ली
ग्प्ण् कर्नाटक तंत्रः 52. ब्रह्मगिरि 53. पिकलीहाल 54. मास्की