भूमिगत जल किसे कहते हैं groundwater definition in hindi भौम या भूगर्भिक जल की परिभाषा क्या है

By   May 25, 2021

groundwater definition in hindi भूमिगत जल किसे कहते हैं भौम या भूगर्भिक जल की परिभाषा क्या है  ?

भौम या भूगर्भिक जल
जैसा कि पहले बताया गया है कि वर्षा से प्राप्त हुए जल की कुल मात्रा का कुछ भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है। इसका 60 प्रतिशत भाग मिट्टी की ऊपरी सतह तक ही पहुंचता है। यही जल कृषि उत्पादन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। शेष जल धरातल के नीचे प्रवेश्य स्तर तक पहुंचता है। इस जल को कुएं खोद कर प्राप्त किया जाता है। अनुमान है कि भारत में कुल अपूर्णीय भौम जल क्षमता लगभग 433 अरब घन मीटर है।
देश में भूगर्भिक जल का वितरण बड़ा असमान है। इस पर चट्टानों की संरचना, धरातलीय दशा, जलापूर्ति की दशा आदि तत्वों का प्रभाव पड़ता है। भारत के समतल मैदानी भागों में स्थित जलज चट्टानों वाले अधिकांश भागों में, भूगर्भिक जल की अपार राशि विद्यमान है। यहां पर प्रवेश्य चट्टानें पाई जाती हैं, जिनमें से जल आसानी से रिसकर भूगर्भिक जल का रूप धारण कर लेता है। भारत के उत्तरी मैदान में पंजाब से लेकर ब्रह्मपुत्र घाटी तक भूगर्भिक जल के विशाल भंडार हैं। इस मैदान का निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों की निक्षेप क्रिया द्वारा हुआ है और यह कोमल मिट्टी तथा प्रवेश्य चट्टानों का बना हुआ है। लगभग 42 प्रतिशत से भी अधिक भौम जल भारत के विशाल मैदानों के राज्यों में पाया जाता है। अकेले उत्तर प्रदेश में ही भौम जल की क्षमता का लगभग 19.0 प्रतिशत है। इसके विपरीत प्रायद्वीपीय पठारी भाग कठोर तथा अप्रवेश्य चट्टानों का बना हुआ है, जिनमें से जल रिसकर नीचे नहीं जा सकता। इसलिए इस क्षेत्र में भूगर्भिक जल का अभाव है। परन्तु महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में भौम जल संसाधनों की संभावित क्षमता अधिक है।
भौम जल का सर्वाधिक उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। लगभग तीन-चैथाई भौम जल सिंचाई के लिए प्रयोग किया जाता है। शेष एक-चैथाई भाग घरेलू, औद्योगिक तथा अन्य संबंधित उद्देश्यों की पूर्ति करता है। भारत में भूमिगत जल के विकास की बड़ी संभावनाएं हैं, क्योंकि अभी तक कुल उपलब्ध संसाधनों का केवल 37.23 प्रतिशत भाग ही विकसित किया गया है। राज्य स्तर पर भौम जल संसाधनों की कुल संभावित क्षमता को दृष्टि से बहुत विषमताएं पाई जाती हैं। यह जम्मू-कश्मीर में केवल 1.07 प्रतिशत है, जबकि पंजाब में 98.34 प्रतिशत है।
राज्यों में भौम जल के विकास में अंतर जलवायु में अंतर के कारण पाया जाता है। जिन राज्यों में वर्षा की मात्रा कम तथा इसको परिवर्तनशीलता अधिक होती है और धरातलीय जल का अभाव है उन राज्यों ने भौम जल का विकास बड़े पैमाने पर किया है। पंजाब हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु इसके उदाहरण हैं। आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी भौम जल संसाधनों के विकास को आवश्यकता है, क्योंकि यहां भी वर्षा अपेक्षाकृत अपर्याप्त और परिवतनशील है।
तालिका 2.3 में भारत में भौम जल क्षमता एवं उपयोग का विवरण दिया गया है।
केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड ने नदी बेसिनों के आधार पर भूजल के

तालिका 2.3ः भारत में बेसिन के अनुसार भौम जल क्षमता और उपयोग घन कि.मी./वर्ष
क्र. बेसिन का नाम कुल पुनः पूर्ति योग्य भौम जल का विकास
स. भौम जल संसाधन भौमजल (प्रतिशत)
1. ब्राह्मणी और वैतरणी 4.05 8.45
2. ब्रह्मपुत्र 26.55 3.37
3. चंबल तथा सहायक नदियां 7.19 40.09
4. कावेरी 12.3 55.33
5. गंगा 170.99 33.52
6. गोदावरी 40.65 19.53
7. सिंधु 26.49 77.71
8. कृष्णा 26.41 30.39
9. कच्छ और सौराष्ट्र के साथ लूनी नदी 11.23 51.14
10. चेन्नई और दक्षिण तमिलनाडु 18.22 57.68
11 महानदी 16.46 6.95
12.. मेघना (बराक व अन्य) 8.52 3.94
13. नर्मदा 10.83 21.74
14. उत्तर-पूर्व की नदियां 18.84 17.2
15. पेन्नार 4.93 36.6
16. स्वर्णरेखा 1.82 9.57
17. तापीं 8.27 33.05
18. पश्चिमी घाट की नदियां 17.69 22.88
कुल योग 431.42 41.57
स्रोतः जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली 2006

आंकड़े एकत्रित करने बंद कर दिए और उसके स्थान पर राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की प्रशासनिक सीमाओं के अनुसार आंकड़े एकत्रित करने शुरू कर दिए हैं। इस बोर्ड द्वारा 2003 में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार देश में कुल पुनः पूर्ति योग्य (तमचसमदपेींइसम) भूजल 443 अरब घन मीटर (अ.घ.मी.) प्रतिवर्ष है। इसमें से सिंचाई के लिए 362.4 अ.घ.मी. भूजल उपलब्ध है। घरेलु एवं उद्योग सहित अन्य कार्यों के लिए 71.2 अ.घ.मी. भूजल उपलब्ध है। राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश के स्तर पर भूजल की मात्रा में अत्यधिक स्थानिक विषमताएं पाई जाती हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 81.12 अ.घ.मी. भूजल प्राप्त होता है। अन्य बड़े राज्यों में आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, तथा महाराष्ट्र हैं, जहां पर 30 अ.घ.मी. से अधिक पुनः पूर्ति योग्य जल प्राप्त होता है। असम, बिहार गुजरात, उड़ीसा, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल में 20 अ.घ.मी. से अधिक भूजल प्राप्त होता है। दूसरी ओर एक अ.घ.मी. से भी कम भूजल प्राप्त करने वाले राज्यों में गोवा, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा, सिक्किम, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह, चण्डीगढ़, दादरा व नगर हवेली, दमन व दीव, दिल्ली, लक्षद्वीप, पुदुचेरी आदि हैं।
परंतु जल के प्रयोग के संदर्भ में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि राज्यों में 40 सेमी. से भी कम वर्षा होती है और यहां पर धरातलीय जल की कमी है। परिणामस्वरूप यहां पर भूजल का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है। ये राज्य अपने भूजल भंडारों का बहुत बड़ा भाग, (प्रायः 80ः से अधिक) सिंचाई के लिए प्रयोग कर लेते हैं। 1960 के दशक में हरित क्रांति के आरम्भ से यहां पर सिंचाई की आवश्यकता अधिक हो गई। जलवायु की दृष्टि से यह क्षेत्र गेहूं की कृषि के लिए अधिक उपयुक्त है परंतु किसानों ने चावल की कृषि पर अधिक जोर देना शुरू कर दिया जिससे सिंचाई के लिए भूजल की मांग और भी अधिक हो गई। इस मांग को परा करने के लिए अधिकाधिक नलकूप खोदे गए। इससे भूजल का स्तर खतरनाक तल तक नीचे गिर गया है और भूजल की कमी महसूस होने लगी है। इसी प्रकार गुजरात में भी वर्षा कम होती है और कृषि मुख्यतः भूजल पर ही निर्भर करती है। उत्तर प्रदेश तथा बिहार गंगा नदी की घाटी में स्थित हैं जहां मिट्टी बड़ी उपजाऊ है। इसका लाभ उठाने के लिए गहन कृषि की जाती है और भूजल का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है। प्रायद्वीप के पठारी भाग में सख्त चट्टानें पाई जाती है, जो भूजल के भरण एवं उपयोग के अनुकूल नहीं हैं। उत्तर-पूर्वा राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर में पहाड़ी इलाके हैं, जिससे भूजल का अधिक प्रयोग नहीं हो पाता है।
भूजलीय स्थिति (Hydrological Situation)
भारत एक विशाल देश है, जिसमें भूगर्भीय संरचना, जल स्थलाकृतिक संबंधी विषमताए बहुत हैं। इनके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न भागों में भजल संबंधी स्थानिक विषमता भी बहन अधिक हैं। भारतीय चटटानं आर्कियन से लेकर वर्तमान काल की है जिसकी संरचना में काफी अंतर है। इससे भी भूजल प्रभावित होता है। दना द्य में हिमालय पर्वत की ऊंची शृंखलाओं के दक्षिण गगा सिन्धु-ब्रह्मपुत्र का सपाट मैदान है और राजस्थान में मरुभूमिया हैं। विविध प्रकार को स्थलाकृतियां, चट्टानों की प्रकृति तथा वर्षा की मात्रा भूजल के भरण को बहुत प्रभावित करती हैं। उत्तर के विशाल मैदान में सपाट भूमि तथा सरन्ध्र मृदा के कारण भूजल बहुत प्राप्त होता है और इसकी गणना विश्व के सर्वोत्तम जल भृतों (ंबुनपजमते) में होती है। प्रायद्वीप के पठारी भाग तथा राजस्थान के अरावली क्षेत्र में अप्रवेश्य सख्त चट्टान पाई जाती हैं, जिस कारण से जल भूमि में प्रवेश नहीं कर सकता।
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि भूजल बहुत-से प्राकृतिक कारकों द्वारा प्रभावित होता है जिन में जलवायु (विशेषतया वर्षा व तापमान) उच्चावच, भूगर्भिक संरचना और भूजलीय व्यवस्था प्रमुख हैं। इन तत्वों को ध्यान में रखते हुए डॉ. आर.एल. सिंह (ä- R-L- Singh) ने 1970 में भारत को निम्नलिखित 8 क्षेत्रों में बांटा है (चित्र 2.1)ः
1. प्री-कैम्ब्रियन रवेदार क्षेत्र (Pre-Cambrian Crystal line Province)ः यह भारत के लगभग आधे भाग पर विस्तृत है, जिसमें तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, दण्डकारण्य, बुन्देलखण्ड तथा अरावली पर्वत सम्मिलित हैं। इस क्षेत्र में भूजल की कमी है।
2. प्री-कैम्ब्रियन अवसादी क्षेत्र (Pre-Cambrian Sedimentary Province)ः ये कुडप्पा और विंध्यन बेसिन में स्थित है जहां पर कुडप्पा और विंध्य वर्ग की चट्टानें पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में भी भूजल अपर्याप्त है।
3. गोंडवाना अवसादी क्षेत्र (Gondwana SedimentaryProvince)ः बाराकार और गोदावरी नदी बेसिन में पर्याप्त मात्रा में जलभृत हैं।
4. दक्कन ट्रेप क्षेत्र (Deccan Trap Province)ः यहां पर 1200
मीटर मोटी अप्रवेश्य बेसाल्ट चट्टानें हैं जो जल को भूमि में प्रवेश करने से रोकती हैं। इसके परिणामस्वरूप इस समस्त क्षेत्र में भूजल की कमी है।
5. सेनोजोइक अवसादी क्षेत्र (Cenozoic Sedimentary Province)ः यह आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल तथा गुजरात के तटीय भाग में विस्तृत है। इस क्षेत्र में टर्शियरी बलुआ पत्थर हैं, जिस कारण से यहां भूजल पर्याप्त मात्रा में मिलता है।
6. सेनोजोइक भ्रंश बेसिन (Cenozoic Fault Basin)ः नर्मदा,
तथा तापी भ्रंशों में 80-160 मीटर मोटी रेत, सिल्ट एवं चीका की परत हैं, जिनमें पर्याप्त भूजल उपलब्ध है।
7. गंगा – ब्रह्मपुत्र अवसादी क्षेत्र (Ganga&Brahmaputra Alluvial Province)ः यह भारत का सबसे समृद्ध भूजल क्षेत्र है। इसमें भाबर तथा तराई की पेटियां सुनिश्चित रूप में व्यवस्थित हैं। जो नदियां भाबर प्रदेश में भमिगत हो जाती हैं वे तराई क्षेत्र में दुबारा भृतल पर प्रकट हो जाती हैं। भूजल अधिक मात्रा में होने से भूजल तल काफी ऊपर हैं और कम गहराई पर ही जल प्राप्त हो जाता है।
8. हिमालय क्षेत्र (Himalayan Province)ः यहां धरातलीय एवं संरचनात्मक स्थिति बड़ी जटिल है, जिन कारणाम भजन की कमी है। स्थानीय रूप में चश्मे मिल जाते हैं पार कर बहुत कम हैं।
जल का अभाव (Water Scarcity)
यद्यपि जल एक चक्रीय एवं नवीकरणीय संसाधन है, तथापि इसकी आपूर्ति की एक निश्चित सीमा है। पृथ्वी पर जल आज भी उतना ही है जितना कि आज से दो हजार वर्ष पहले था। परतु पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि, कृषि के विकास तथा सिंचाई के विस्तार औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा जीवन स्तर में सुधार होने से जल की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। नदियों पर बांध बनाकर जल को एकत्रित करने के प्रयास किए गए हैं। गन्दे तथा खारे जल को साफ करके भी जल प्राप्त किया जा सकता है, परंतु इसके लिए अभी उचित प्रौद्योगिकी का विकास नहीं हुआ है और वर्तमान समय में उपलब्ध प्रौद्योगिकी बहुत महंगी है। अनुमान है कि अब से तीस वर्ष बाद हमारी एक-तिहाई जनसंख्या को जल की कमी से संबंधित समस्या का सामना करना पड़ेगा। जल के प्रदूषण से भी जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जल की आपूर्ति कम हो जाती है। जल की आपूर्ति पहले जितनी ही है परत इसकी मांग कई गुना बढ़ गई है। मलिन फाकनमार्क (Malin Falkenmark) के अनुसार, मानव की घरेलू आवश्यकताओं के लिए न्यूनतम मांग 100 लीटर (36.5 घन मीटर) प्रतिवर्ष जल की है और अच्छा जीवन व्यतीत करने तथा कृषि, उद्योग एवं ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 5-20 गुने जल की आवश्यकता होती है।
भारत में उपलब्ध जल की मात्रा में कोई वृद्धि नहीं हुई परंतु जनसंख्या द्रुत गति से बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता में बहुत कमी आई है। स्वतंत्रता के समय भारत में 6008 घन मीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्ध था। यह मात्रा कम होकर 1951 में 5177 घन मीटर तथा 2001 में 1820 घन मीटर रह गई। दसवी पंचवर्षीय योजना के मध्यकालीन मूल्यांकन के अनुसार 2025 में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता केवल 1,340 घन मीटर रह जाएगी और 2050 तक यह और भी घट कर 1140 घन मीटर रह जाएगी। चित्र 2.2 में जल की वास्तविक तथा संभावित उपलब्धता को दर्शाया गया है।
जल का उपयोग
चित्र 2.3 (क) तथा (ख) से स्पष्ट है कि, धरातलीय एवं भौम का सर्वाधिक उपयोग कृषि के लिए किया जाता है। कृषि क्षेत्र शतलीय जल का 89 प्रतिशत और भौम जल का 92 प्रतिशत उपयोग किया जाता है जबकि औद्योगिक सेक्टर में, धरातलीय जल का केवल 2 प्रतिशत और भौम जल का 5 प्रतिशत भाग ही उपयोग में लाया जाता है। घरेलू सेक्टर में धरातलीय जल का उपयोग भौम जल की तुलना में अधिक (9ः) है। कुल जल उपयोग में कृषि सेक्टर का भाग दूसरे सेक्टरों से अधिक है। फिर भी, भविष्य में विकास के साथ-साथ देश में औद्योगिक और घरेलू क्षेत्रों में जल का उपयोग बढ़ने की संभावना है।