महत्वपूर्ण संत व्यक्तित्व एवं स्थान | great indian saints in hindi भारत के महान संत उनके कार्य स्थान

By   October 18, 2021

great indian saints in hindi भारत के महान संत उनके कार्य स्थान  महत्वपूर्ण संत व्यक्तित्व एवं स्थान ?

व्यक्तित्व
नंद ऋषि : मुस्लिम सूफी कवि नुरुद्दीन को ही नंद ऋषि कहा जाता है। उन्होंने ही ऋषि सिलसिले की नींव डाली। उन्हें कश्मीरी मुसलमानों का संरक्षक संत माना जाता है। ऋषिनामा एवं नूरनामा में उनकी कविताओं का संकलन है।
नरसिंह मेहताः नरसिंह मेहता गुजराती साहित्य के स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कृष्ण को समर्पित कविताएं लिखीं। इनका समय 15वीं सदी माना जाता है। हमारे राष्ट्रपिता इन्हीं संत कवि की रचनाएं गाया करते थे।
निम्बार्कः वैष्णव सम्प्रदाय के दार्शनिक निम्बार्क ने द्वैताद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। उन्होंने मथुरा क्षेत्र में निमांदी पंथ की नींव डाली। इन्होंने बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर टीका लिखी। इन्होंने ‘दशाश्लोक’ की रचना की।
रमण महर्षिः 1896 में 20 वर्षीय वेंकटरमन ने आध्यात्मिक प्रकाश के तहत् गृह त्याग दिया और ज्ञान प्राप्त किया। गहरी समाधि के उपरांत तिरुवन्नामलाई में उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद वे रमण महर्षि के नाम से जागे गए। 1950 में उन्होंने शरीर त्याग दिया।
रामानंदः ऐसा माना जाता है कि रामानंद (1400-1470) अपने प्रारंभिक दिनों में रामानुज के श्री वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी के रूप में दक्षिण भारत में रहते थे। बाद में वे बनारस आए और यहीं बस गए। यहीं पर उन्होंने रामानंदी नाम से अपना सम्प्रदाय चलाया। उन्होंने भगवान श्रीराम को सर्वशक्तिमान माना, जिनकी आराधना उनकी शक्ति सीता के साथ की जागी चाहिए और उनके भक्त हनुमान की भी उपासना करनी चाहिए। उन्होंने जातिगत ऊंच-नीच का विरोध किया और अपने सम्प्रदाय का द्वार हर किसी के लिए खुला रखा। उनका मानना था कि ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं। समतावादी दृष्टिकोण और देशी भाषा के प्रयोग ने इस सम्प्रदाय को सबसे अलग रूप प्रदान किया। इसी से कई अन्य सम्प्रदाय व पंथ निकले। कबीरपंथी और सिक्खों का बहुत कुछ इन्हीं की देन है।
रामानुजः तमिलनाडु के श्रीपेरम्बदूर में जन्मे रामानुज ब्राह्मण थे। इन्होंने तत्कालीन भक्ति को एक सुदृढ़ दार्शनिक आधार प्रदान किया। भक्तिमाग्र के अपने विचार रखे और वेदांत की विशेष व्याख्या की, जिसे विशिष्टाद्वैत के नाम से जागा गया। उन्होंने विष्णु को सबसे ऊपर माना और वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की। इसमें अछूतों तक को जगह मिली। समतामूलक सामाजिक व्यवस्था का समर्थन करते हुए उन्होंने महिलाओं की शिक्षा की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके स्त्रीभाष्य में इसका विशद विवरण एवं विवेचन किया गया है।
रामदासः महाराष्ट्र के भजन रचयिताओं में रामदास (1608-81) का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। ये बचपन में ही अनाथ हो गए थे। बरसों भटकने के बाद ये कृष्णा नदी के तट पर बस गए। वहीं उन्होंने अपने आराध्य श्रीराम का मंदिर बनवाया। रामदास न केवल ब्रह्मविज्ञानी थे, बल्कि समाज सुधारक भी थे। इस्लाम के प्रभाव को देखते हुए उन्होंने समाज में कई सुधारों की वकालत की। शिवाजी उनके शिष्य थे। रामदास में भक्ति और प्रेरणा का अद्भुत संगम था। ‘दासबोध’ में उनके प्रवचनों का संकलन है।
रविदासः रामानंद के शिष्य रविदास यद्यपि जाति से चमार थे, किंतु 15वीं सदी में उन जैसा कोई वैष्णव भक्त नहीं था। मीराबाई उन्हीं की शिष्या थीं। उनका पंथ सत्नामी कहलाया, जिसने मूर्तिपूजा का विरोध किया और हमेशा भगवान का ध्यान करने की बात कही। रविदास ने भावपूर्ण भजन लिखे, जो हिन्दी साहित्य की धरोहर बने। इनके कुछ भजनों को गुरुग्रंथ साहिब में शामिल किया गया है।
शंकराचार्यः केरल के कलादि में जन्मे शंकर ब्राह्मण थे। उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही संन्यास ले लिया था, जिसकी रोचक कथा भी है। दार्शनिक गोविन्दपाल से शिक्षा ग्रहण करने के बाद इन्होंने अपना दर्शन प्रतिपादित किया, जो अद्वैत के नाम से जागा गया। इनके अनुसार ईश्वर ही सबकुछ है, उससे अलग कुछ भी नहीं है। शंकर की विद्वता ने सबको धूमिल कर दिया था, किंतु ऐसा कहा जाता है कि वे स्वयं मंडन मिश्र की पत्नी से शास्त्रार्थ में पराजित हो गए थे। शंकराचार्य ने देश में चार पीठों की स्थापना की, जिनके नाम हैं शृंगेरी, बद्रीनाथ, द्वारका व पुरी।
शंकरदेवः असम में तांत्रिक शाक्त धर्म का विरोध-प्रतिरोध व मुकाबला करने हेतु वैष्णव धर्म को यहां लाने वाले सुधारक एवं कवि शंकरदेव ही थे। शंकर देव की रचनाओं में रुक्मिणी हरण काव्य, कीर्तन घोष, कालिया दमन और राम विजय शामिल हैं। इन्होंने ऐसे समाज के निर्माण हेतु अनवरत प्रयास किया जिसमें समतामूलक प्रवृत्तियां प्रभावी हों। इन्होंने आदिवासियों के हिंदू धर्म में आगमन का खुले दिल से स्वागत किया।
सूरदासः वल्लभ के प्रतिभावान शिष्य सूरदास जन्मांध थे। आगरा और मथुरा के मंदिरों में ये गाया करते थे। कृष्ण के बालरूप की जैसी कल्पना इन्होंने की, वैसी किसी भक्ति कवि ने नहीं की। इनके गीतों में ऐसा भान होता था कि कृष्ण अपने बाल्य रूप में आपके सम्मुख खड़े हैं या अपनी लीलाएं कर रहे हैं। ‘सूरसागर’ में इनकी रचनाओं का संग्रह है।
गुरु तेग बहादुरः सिक्खों की गुरु परम्परा के ये नौवें गुरु थे। इन्होंने सन 1665 में आनंदपुर की नींव डाली। मुगल सम्राट औरंगजेब ने इन्हें काफिर करार देते हुए फांसी पर लटकवा दिया। चांदनी चैक, दिल्ली में बना शीश गंज गुरुद्वारा उसी स्थान पर है। किसी लबाना सिक्ख ने उनका शरीर ले जाकर उस स्थान पर संस्कार किया, जहां आज गुरुद्वारा रकाब गंज बना है।
तुकारामः जाति से शूद्र तुकाराम ने विठोबा की भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए। 17वीं शताब्दी के समाज में वर्ण विन्यास की मान्यता नकारते हुए तुकाराम ने उन भक्ति गीतों की रचना की, जो आज भी महाराष्ट्र में विपुल श्रद्धा व भक्ति भाव से गाए जाते हैं।
तुलुलसीदासः रामानदं के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी तलु सीदास (1532-1623) ने अपनी रचना ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से मर्यादापुरुषोत्तम को घर-घर पहुंचा दिया। वाल्मिकीकृत ‘रामायण’ की संस्कृत के स्थान पर इन्होंने अवधी में राम का गुणगान किया और इन्हें ऐसे आदर्श पुरुष के रूप में पेश किया, जिसका अनुसरण कर कोई भी मंगल की कामना कर सकता था। तुलसीदास की भक्ति दास भाव पर आधारित थी।
वल्लभः वाराणसी में जन्मे तेलगू मूल के वल्लभ (1479-1531) ने भक्ति माग्र के संतों में अपनी अलग पहचान बनाई। गुजरात और राजपूताना में इनका विशेष प्रभाव रहा। महान कवि सूरदास का गुरु होने का गौरव इन्हें ही प्राप्त है। हिंदू दर्शन की व्याख्या में इन्होंने नए अध्याय जोड़े। इनका सिद्धांत शुद्धाद्वैत कहलाया।
याज्ञवल्क्यः प्राचीन ऋषि एवं ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ के रचयिता याज्ञवल्क्य ऋषि को ही यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण और वृहदारण्यक उपनिषद् का संकलनकर्ता माना जाता है।