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Grape snail in hindi meaning अंगूरी घोंघा क्या है | अंगूरी घोंघे के पेड़-पौधों को नुकसान फायदा ?

अध्याय ४
मोलस्क

१६. अंगरी घोंघा
जीवन-प्रणाली अंगूरी घोंघा (आकृति २७) एक स्थलचर प्राणी है जो जीवन-प्रणाली गरम दक्षिणी इलाकों में अंगूर की लताओं और फल-वृक्षों पर रहता है।
घोंघे का मुलायम शरीर चूने के एक सख्त कवच से सुरक्षित रहता है। इस कवच के कोई वैल्व नहीं होते और वह पतली-सी कुंडलाकार टोपी-सा लगता है। घोंघा अपना पूरा शरीर कवच में समेट ले सकता है।
कवच उसे हवा में और तेज धूप में सूख जाने से बचाता है। शरीर पर चिपचिपे श्लेष्म का आवरण भी वाष्पीकरण को कम कर देता है। गरमियों में घोंघा जल्दी से सूखनेवाले श्लेष्म के सहारे अपने कवच को पेड़ के तने या शाखा से चिपकाये रखता है और वहीं सुषुप्तावस्था (hibernation) में रहता है। गरमियों के दौरान पूरे के पूरे पेड़ और झाड़-झंखाड़ अंगूरी घोंघों से ढंके नजर आते हैं।
ये घोंघे उनपर चिपके रहते हैं। ऐसी स्थिति में वे गरमियों के सूखे और जाड़ों के गीत में सुरक्षित रहते हैं।
वतावरण से संपर्क जब बांधा चलता है उस समय सिर को आगे रखे शरीर का एक बड़ा-ना हिल्सा कवच में से बाहर निकल आता है। सिर में छोटी और लंबी स्पर्शिकाओं के दो जोड़े होते हैं। छोटी स्पर्शिकाओं के सहारे घोंघा जमीन और अपने भोजन का स्पर्श करता है और गंध पहचान सकता है। लंबी स्पर्शिकाओं के सिरों पर छोटी छोटी काली आंखें होती हैं। यह प्राणी न केवल प्रकाश और अंधकार के बीच का अंतर जानना है बल्कि चीजों को देख तक सकता है। फिर भी घोंघा आम तौर पर झुटपुटे में और रात में चलता-फिरता है। उसकी दृष्टि विशेष विकसित नहीं होती। वह नजदीक की ही चीजें देख सकता है और उनके रंग बिलकुल नहीं पहचान सकता।
गति चारों ओर से भोजन से घिरा हुआ घोंघा एक पत्ती से दूसरी पत्ती तक और पेड़ों के तनों पर धीरे धीरे रेंगता जाता है। शरीर का उदर की ओर का हिस्सा चलनेंद्रिय का काम देता है।
यदि घोंघे को शीशे की तश्तरी पर रखकर नीचे की ओर से देखा जाये तो शरीर की प्रौदरिक सतह पर लहरनुमा कुंचन नजर आयेंगे। ये कुंचन घोंघे को चलने में मदद देते हैं और वह चैन से शीशे पर सरकता जाता है। उदरपेशियों के सतत व्यायाम के कारण शरीर का निचला हिस्सा सुपरिवर्दि्धत होता है।
इससे एक चैड़ा पेशीय अंग निकलता है जो रेंगते समय कवच में से उभर आता है। यह मोलस्क का पाद है।
पोषण और श्वसन अंगरी घोंघे का मुंह स्पर्शिकाओं के पहले जोड़े के नीचे होता है। मुंह के अंदर नन्हे नन्हे तेज दांतों की कई पंक्तियों से की हुई जीभ होती है जिसे हम रेती कह सकते हैं। यदि हम इस प्राणी को शीशे पर रख दें और नीचे की ओर से उसका निरीक्षण करें तो यह जीभ बार बार बाहर निकलकर शीशे का स्पर्श करती हुई दिखाई देगी। अपने दांतों की सहायता से घोंघा वनस्पतियों के ऊतक खरोंच लेता है। वह फल-वृक्षों और अंगूर-लताओं की पत्तियां नप्ट कर देता है और इसलिए एक कृषिनाशक जंतु माना जाता है।
घोंघे के रेंगते समय कवच के बगल में उसके दाहिने किनारे के नीचे हम गोल श्वसन-द्वार देख सकते हैं। यह आंचल-गुहा में खुलता है जिसकी दीवालों में अनगिनत रक्त-वाहिनियां फैली रहती हैं। जब गुहा फैलती है उस समय श्वसन-द्वार के जरिये उसमें हवा प्रवेश करती है। हवा में जो ऑक्सीजन होता है वह रक्तवाहिनियों की दीवालों के जरिये रक्त में चला जाता है। रक्त में से कारवन डाइ-आक्साइड गुहा में फेंका जाता है। जब आंचल-गुहा का संकोच होता है उस समय अतिरिक्त कारबन डाइ-आक्साइड वाली हवा श्वसन-द्वार से बाहर निकल जाती है। इस प्रकार आंचल-गुहा श्वसनेंद्रिय या फेफड़े का काम देती है।
प्रश्न – १. पेड़ों पर रहनेवाले अंगूरी घोंघे में और ताजे पानी के मोतिया शिपले में क्या अन्तर है? २. घोंघा पेड़-पौधों को कैसे हानि पहुंचाता है ?
व्यावहारिक अभ्यास – १. एक अंगूरी घोंघे को शीशे की तश्तरी पर रखकर उसके रेंगने का निरीक्षण करो। घोंघे को देखकर उसका चित्र बनायो। यदि तुम्हारे इलाके में अंगूरी घोंघे न होते हों तो जंगली घोंघे का निरीक्षण करो जो बगीचे में या जंगल में मिल सकता है। यदि घोंघे कवच में सुषुप्तावस्था में हों तो उन्हें शीशे के बरतन में डालकर और उनपर ४० सेंटीग्रेड तक गरम किया गया पानी उंडेलकर जगा दो। २. किसी तालाब में से ताजे पानी के घोंघे पकड़कर उन्हें पानी के बरतन में डाल दो और उन्हें चलते , खाते , सांस लेते और अंडे देते। हुए देखो।

१५. मोतिया शिपला
पाद झीलों और नदियों के वलुए तटों पर हमें दो पटों वाले डिबिया-नुमा सख्त कवच से आवृत एक छोटा-सा प्राणी दिखाई देता है। यह है मोतिया शिपला (प्राकृति २५)। आम तौर पर यह बालू के तल में अधगड़ा-सा रहता है। शिपले पर से बहनेवाला पानी उसके लिए घुला
हुआ ऑक्सीजन और भोजन लाता है। यह प्राणी सूक्ष्म वनस्पतियों और पानी में तैरनेवाले प्रोटोजोआ पर जीता है।
ऐसी स्थितियों में गति विशेष महत्त्व नहीं रखती। शिपला , पाद नामक एक अवयव के सहारे बहुत ही धीरे धीरे रेंग सकता है। यह पाद वैल्वों के बीच से उठकर क्रमशः आगे निकल आता है और बाल को पच्चड़ की तरह काटता जाता है। जब पाद की पेशियां संकुचित हो जाती हैं तो शरीर वहां तक खिंच जाता है जहां पाद गड़ा रहता है।
सीप
सीप इधर-उधर शायद ही चलनेवाले शिपले के जीवन में सुरक्षा इंद्रियों का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। शिपले का कवच या सीप एक ऐसी इंद्रिय है। कवच आगे की ओर चैड़ा और पीछे की ओर संकरा होता है। कवच में दो पट होते हैं और वह दो उभरी हुई पेशियों से बंद होता है। ये पेशियां वैल्वों की अंदरूनी सतह से चिपकी रहती हैं और संकुचन के समय वैल्वों को एक दूसरे से मिला देती हैं। सीप एक कमानीनुमा स्नायविक चूल द्वारा खुलती है। यह चूल वैल्वों को पीठ की ओर जोड़े रहती है। जब पेशियां शिथिल होती हैं उस समय लचीली चूल एक वैल्व को दूसरे से दूर खींचती है। मृत शिपलों का कवच हमेशा खुला रहता है।
हर वैल्व तीन परतों का बना रहता है। बाहर की ओर हमें काली शृंगीय परत दिखाई देती है। इसके नीचे सफेद पोर्सलिननुमा परत होती है और अंदर की ओर सीपी की परत जिसमें इंद्रधनुष के सभी रंगों की चमक होती है। पोर्सलिननुमा और सीपी परतें- दोनों चूने की बनी होती हैं। गरमियों में शिपले का कवच जाड़ों की अपेक्षा अधिक शीघ्र बढ़ता है और शृंगीय परत पर कई वृद्धिदर्शक धारियां दिखाई देने लगती हैं – गरमियों में बननेवाली धारियां चैड़ी होती हैं जबकि जाड़ों में निकलनेवाले छल्ले संकरे होते हैं।
शिपले के सन्त कवच का उपयोग मोती के से बटन तैयार करने और चूनाखुराक के उत्पादन में किया जाता है। यह खुराक मवेशियों के चारे में मिलायी जाती है। पिलो के शरीर सूअरों और बत्तखों को खिलाये जाते हैं।
आंचल गहा शिपले के कवत्र के नीचे आंचल कहलानेवाले ऊतक की दो तहें होती है जो पीठ की ओर से उतरती हुई उक्त प्राणी के शरीर को दोनों बाजुओं से एक मुलायम आंचल की तरह ढक देती हैं। कवच बनानेवाला पदार्थ इन्हीं तहों में से रसता है।
शरीर और आंचल के बीच के हिस्से को आंचल-गुहा कहते हैं। शिपले का गरीर मुलायम होता है और इसी लिए इस प्राणी को मोलस्क कहते हैं। इस यूनानी शब्द का अर्थ है मुलायम शरीरवाला प्राणी। आंचल-गुहा में स्थित अवयव तभी दिखाई देते हैं जब हम कवच को खोलकर आंचल को उठाते हैं (आकृति 26)
पच्चड़नुमा पाद के दोनों ओर भरी-सी पट्टिकानों के दो जोड़े होते हैं – ये हैं जल-श्वमनिकाएं। ये उक्त प्राणी की श्वसनेंद्रियां हैं।
आगे की ओर शिपले का मुंह होता है जो नन्हे नन्हे मुलायम परदों के दो जोड़ों से घिरा रहता है। ये परदे स्पर्शिकाएं कहलाते हैं। शिपले के प्रांखें नहीं होती।
दो छेद उक्त प्राणी की आंचल-गुहा में खुलते हैं। ये पिछले सिरे पर वैल्वों के बीच होते हैं। निचले छेद से पानी गुहा में घुसता है और ऊपरवाले छेद से बाहर निकलता है। गुहा में पानी का प्रवाह जल-श्वसनिकानों को ढकनेवाली अनगिनत रोमिकाओं के अविराम लहराने के कारण उत्पन्न होता है। इस प्रकार जल-श्वसनिकाओं को ऑक्सीजन से समृद्ध पानी की सतत पूर्ति होती रहती है और मुंह को पानी में तैरनेवाले भोजन-कणों की।
केंचुए की तरह शिपले के भी पाचन , रक्त-परिवहन , मलोत्सर्जन और जनन इंद्रियां होती हैं। सभी इंद्रियों की गतिविधियां तंत्रिका तंत्र के नियंत्रण में होती हैं। तंत्रिका तंत्र के जरिये शिपले को उद्दीपन मिलता है। कवच की तह में पतलीसी सींक डाल देने से यह सहज ही स्पष्ट हो जाता है। उद्दीपन के उत्तर में कवच अपनी वैल्वों को इतनी मजबूती से भींच लेता है कि हम उसे सींक के सहारे उठाकर आसानी से पानी में से बाहर निकाल सकते हैं।
प्रश्न – १. मोतिया शिपले की मुख्य संरचनात्मक विशेषताएं क्या हैं? २. शिपले को जीवित रहने के लिए कौनसी स्थितियां आवश्यक हैं ? ३. शिपला किस तरह चलता है, खाता है, सांस लेता है और उद्दीपन का उत्तर देता है ?
व्यावहारिक अभ्यास – १. गरमियों की छुट्टियों में स्थानीय ताल-तलैयों और नदियों की जांच करो और अपने स्कूल के प्राणि-शास्त्र कक्ष के लिए शिपले के कवचों और दूसरे स्थानीय मोलस्कों का संग्रह तैयार करो। २. यदि तुम्हें कोई जिंदा शिपला मिल जाये तो उसे पानी से भरे और तल में बालुवाले शीशे के बर्तन में छोड़ दो। प्राणी के पिछले सिरे के पास काजल की रोशनाई की या दूसरे किसी अहानिकर रंग की एक बूंद डाल दो और देखो किस प्रकार पानी आंचल-गुहा में घुसता है और उससे बाहर निकलता है। शिपले को ५० सेंटीग्रेड तक गरम किये गये पानी में पंद्रह मिनट के लिए रख दो। प्राणी के मर जाने और उसके कवच के खुल जाने के बाद उभरी हुई पेशियों को काट दो। २६ वी आकृति की सहायता से शिपले की इंद्रियां ढूंढ निकालो।