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मेंढक क्या है , जानकारी , संरचना , चित्र , तंत्र , भाग , जीवन चक्र ,वैज्ञानिक नाम , Frog in hindi
मेंढक (Frog) :
वैगानिक नाम = राना टिग्रिना
वर्गीकरण :-
संघ – कोड्रेटा
वर्ग – एम्फिबिया
गण – एन्युरा
वंश – राना
जाति – टिग्रीना
आवास व प्रकृति : यह गड्डे , तालाब , दलदल व नम स्थानों पर पाया जाता है , यह समतापी प्राणी है , अनुहरण की क्षमता होती है |
यह जल व थल दोनों आवासों में रह सकता है , यह शीत निष्क्रियता व ग्रीष्म निष्क्रियता प्रकट करता है |
बाह्य आकारिकी
- त्वचा : मेंढक की त्वचा मुलायम नम व लसलसी होती है , त्वचा पर अनियमित धब्बे होते है , निचली सतह हल्के पीले रंग की होती है | मेढक पानी नहीं पीता बल्कि त्वचा द्वारा अवशोषित करता है |
- मेंढक का शरीर सिर , धड में विभाजित रहता है |
- मेंढक में गर्दन व पूंछ का अभाव होता है |
- मुख के ऊपर एक जोड़ी नासिका द्वार तथा निमेषक पटल युक्त आँखे पायी जाती है |
- आँखों के दोनों ओर कर्णपट्ट उपस्थित होता है जबकि बाह्य कर्ण का अभाव होता है |
- मेंडक में दो जोड़ी पैर , अग्रपाद व पश्च पाद होते है जो गमन करने व गड्ढा बनाने में सहायक होते है |
- अग्र पाद में चार व पश्चपाद में 5 अंगुलियाँ होती है |
- पश्चपाद में झिल्लीयुक्त संरचना पायी जाती है जो तैरने में सहायक है |
- नर मेंढक में ध्वनी उत्पन्न करने के वाक् कोष व अग्र पाद की पहली अंगुली पर मैथुनांग पाया जाता है |
- मादा में वाक्कोष व मैथुनांग का अभाव होता है |
आन्तरिक आकारिकी
- आहारनाल : मेंढक एक माँसाहारी प्राणी है , मेंडक का पाचन तंत्र आहारनाल व पाचक ग्रंथियों से बना होता है , आहारनाल के अन्तर्गत सिर के अग्र सिरे पर एक अर्द्धचन्द्राकर मुख होता है | जो मुखगुहिका में खुलता है , मुखगुहिका में एक द्विपालित जीभ होती है , जो पीछे से स्वतंत्र व आगे से जुडी रहती है | मुखगुहिका में दो जबड़े होते है , ऊपरी जबड़े में दांत उपस्थित जबकि निचले जबड़े में दांतों का अभाव होता है |
मुखगुहिका ग्रसनी में खुलती है जिसका अग्रसिरा ग्रसिका से जुडा होता है , ग्रसिका थैले समान आमाशय में खुलती है | आमाशय आगे की ओर आंत्र , मलाशय तथा अन्त में अवस्कर द्वारा बाहर खुलता है |
पाचन की क्रियाविधि
मेंढक माँसाहारी प्राणी है , यह कीट पतंगों को जीभ द्वारा पकड़कर मुखगुहा में ले जाता है , जहाँ से ग्रसनी व ग्रसिका से होते हुए आमाशय में पहुचता है | आमाशय की दीवारों से HCl व पाचक रसो का स्त्राव होता है , जो अम्लीय माध्यम बनाता है तथा भोजन को जीवाणु रहित करता है | यकृत पित्त रस का स्त्राव करता है जो गृहणी में पहुँचकर वसा का पाचन करता है , अग्नाशय अग्नाशयी रस स्त्रावित करता है जिसमे पाचक एंजाइम होते है जो कार्बोहाइड्रेड , प्रोटीन का पाचन करते है , पचित भोजन आंत्र के सुक्षमंकुरो द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है | अर्द्धपचित भोजन काइम कहलाता है , अपचित भोजन को अवान्कर द्वार से मल के रूप में त्याग दिया जाता है |
श्वसन (Reseiration)
मेंढक में श्वसन तीन प्रकार का होता है –
- त्वचीय श्वसन : मेंढक जलीय आवास में त्वचीय श्वसन करता है , जल में घुलित ऑक्सीजन विसरण विधि द्वारा त्वचा से विसरित होती है |
- मुखगुहीय श्वसन : थल पर मुखगुहीय श्वसन करता है , इसमें मुख द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण की जाती है तथा मुख के द्वारा ही कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर निकाली जाती है |
- फुफ्फुसीय श्वसन : यह श्वसन भी मेंढक थल पर करता है , फेफड़े मेंढ़क के वक्ष भाग में अण्डाकार गुलाबी संरचना के रूप में होते है , ऑक्सीजन नासामार्ग से होते हुए फेफड़ो में प्रवेश करती है तथा कार्बनडाइऑक्साइड फेफड़ो से नासामार्ग से होते हुए बाहर निकलती है |
रक्त परिसंचरण (circulatory system)
मेंढक में बंद प्रकार का परिसंचरण तंत्र पाया जाता है , ओक्सीजनित व अनऑक्सीजनित रुधिर ह्रदय में मिश्रित हो जाता है | यह निम्न संरचनाओ से मिलकर बना होता है –
- हृदय (Heart) : यह एक त्रिकोष्ठीय मासल संरचना है , ह्रदय में दो आलिन्द व एक निलय होता है | ह्रदय पेरीकाड्रेयम नामक पतली झिल्ली से ढका रहता है , दाहिने आलिन्द से त्रिकोष्ठीय शिराकोटर जुडा रहता है |
- रक्त वाहिनियाँ : यह दो प्रकार की होती है –
- महाशिरा व शिराएँ : ये शरीर से रुधिर एकत्रित कर ह्रदय तक पहुँचाती है |
- महाधमनी व धमनियाँ : ये रुधिर को शरीर के सभी भागो में पहुँचाती है |
- रुधिर (blood) : यह तीन घटकों से बना होता है –
- लाल रुधिर कणिकाएँ (RBC)
- श्वेत रुधिर कणिकाएं (WBC)
- पत्तिकाणु
RBC में हिमोग्लोबिन श्वसन वर्णक पाया जाता है , रक्त पोषक पदार्थो व गैसों का परिवहन करता है | ह्रदय रूधिर पम्प का कार्य करता है |
उत्सर्जन तंत्र : मेंढक में उत्सर्जन एक जोड़ी वृक्क द्वारा होता है , वृक्क गहरे लाल रंग के तथा सेम के बीज के आकार के होते है | जो कशेरुकी दण्ड के दोनों ओर स्थित होते है | प्रत्येक वृक्क की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई को वृक्काणु कहते है , प्रत्येक वृक्क से मूत्रवाहिनी निकलती है जो अवस्कर द्वार में खुलती है , मेंढक यूरिया का उत्सर्जन करता है | उत्सर्जी अपशिष्ट रक्त द्वारा वृक्क में पहुँचते है जहाँ पर अलग कर उत्सर्जित कर दिए जाते है |
तंत्रिका तंत्र : मेंढक का तन्त्रिका तन्त्र तीन प्रकार का होता है –
- केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र : यह मस्तिष्क व मेरुरज्जु से बना होता है |
- परिधीय तंत्रिका तंत्र : यह कपालीय व मेरुतंत्रिकाओ से बना होता है |
- स्वायत्त तंत्रिका तंत्र : यह परानुकम्पी व अनुकम्पी तंत्रिकाओ से बना होता है |
मेंढक का मस्तिष्क कपाल में सुरक्षित रहता है तथा तीन भागो में विभेदित होता है |
- अग्र मस्तिष्क : इसमें घ्राण पालियां , दो प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध डायनसिफेलोन होते है |
- मध्य मस्तिष्क : इसमें एक जोड़ी द्द्कपलियां होती है |
- पश्च मस्तिष्क : इसमें अनुमस्तिष्क व मेडुलाआबलागेटा होते है , मस्तिष्क से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ निकलती है |
संवेदी अंग
- त्वचा – स्पर्श ज्ञान
- जीभ – स्वाद ज्ञान
- नासिका उपकला – गंध ज्ञान
- नेत्र – दृष्टि ज्ञान
- कर्णपट्ट – श्रवण व संतुलन बनाने का कार्य करते है |
प्रजनन तंत्र :
- नर जननांग
- वृषण : मेंढक में लाल अथवा पीले अण्डाकार एक जोड़ी वृषण होते है जो पैरोटोनियम झिल्ली द्वारा वृक्क से जुड़े रहते है | वृषण का मुख्य कार्य शुक्राणुओं का निर्माण करना है |
- शुक्रवाहिकाएं : प्रत्येक वृषण से 10-12 शुक्रवाहिकाएं निकल कर वृक्क में धंस जाती है जो बिडरनाल में खुलती है , बिडरनाल मूत्रवाहिनी में खुलती है जो अवस्कर में खुलती है |
- मादा जननांग
- अण्डाशय : मादा में एक जोड़ी अण्डाशय पैरीटोनियम झिल्ली द्वारा वृक्क से जुड़े रहते है | इनका कार्य अंडाणुओं का निर्माण करना है |
- अण्डवाहिनी : एक जोड़ी अण्ड वाहिनी होती है जिनका एक सिरा अण्डाशय से व दूसरा सिरा अवस्कर में खुलता है |
मैथुन एवं निषेचन : मैथुन वर्षाकाल में जुलाई से सितम्बर माह के मध्य होता है , नर वाक्कोष से ध्वनि उत्पन्न कर मादा को आकर्षित करता है | मैथुन के दौरान नर मैथुनांग की सहायता से मादा की पीठ दबाता है , जिससे मादा उत्तेजित होकर तथा नर भी उत्तेजित होकर क्रमशः अण्डाणु व शुक्राणु अवस्कर द्वार से जल में छोड़ देते है इसे मिथ्या मैथुन कहते है | मादा एक बार में 2500 – 3000 अंडे देती है | निषेचन जल में होता है , लार्वा टेडपोल कहलाता है | जो कायांतरण के बाद व्यस्क में बदल जाता है |
आर्थिक महत्व :
- यह कीटो को खाकर फसलो की रक्षा करता है |
- पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखता है |
- इनके मासल पाद मनुष्यों द्वारा भोजन के रूप में खाए जाते है |
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