फ्रांसीसी क्रांति के कारण और परिणाम क्या है , france revolution in hindi causes and results effects

पढ़िए फ्रांसीसी क्रांति के कारण और परिणाम क्या है , france revolution in hindi causes and results effects ?

प्रश्न: “फ्रांसीसी क्रान्ति (1789) का प्रभाव प्रारम्भ में यूरोप तक सीमित रहा, परन्तु रूसी क्रान्ति (1917) का प्रभाव वैश्विक था।ष् समालोचनात्मक रूप से पुनरावलोकन कीजिए।
उत्तर: 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रान्ति एवं वर्ष 1917 की रूसी क्रान्ति वस्तुत: अपने-अपने देशों में शोषणकारी एवं भेदभावमूलक व्यवस्था सहित
अन्य कारणों का प्रतिफल थी, परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि इस क्रान्ति का उद्देश्य न सिर्फ अपनी आन्तरिक समस्या से निजात पाना
था वरन् दोनों क्रान्तियों का स्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय था अर्थात् इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण मानवता से था। फ्रांसीसी क्रांति का मूल मंत्र था – स्वतंत्रता, समानता एवं विश्वबन्धुत्व। ये तीनों मूल मंत्र यद्यपि फ्रांस की भौगोलिक व राजनीतिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं था, नेपोलियन के विजय अभियान के सिलसिले में यह आदर्श क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में यूरोपीय देशों में प्रसारित हुए। अतः विभिन्न
यूरोपीय देशों, जहां निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासन का. व्यापक प्रभाव था, के विरुद्ध सामान्य जनता की स्वतंत्रता, समानता एवं जन भागीदारी हेतु उदारवादी व्यवस्था का पुरजोर समर्थन किया जाने लगा। समय के साथ विभिन्न उपनिवेशों में भी स्वतंत्रता एवं समानता की
मांग उठने लगी।
यह फ्रांसीसी विचारधारा कालान्तर में यूरोप के बाहर विभिन्न एशियाई एवं अफ्रीकन देशों में भी फैल गई, जब विभिन्न परतंत्र देशों में
औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता, समानता एवं स्वशासन हेतु प्रबल आंदोलन की शुरूआत हुई। इतना ही नहीं सभी पराधीन देशों के
लिए यह तत्त्वं स्वाधीनता संघर्ष की मूल माँग बन गया। फ्रांसीसी क्रांति ने जहां एक ओर राष्ट्रवाद एवं जनतंत्रवाद जैसी नई शक्तियों को
पनपने का मौका दिया, तो वहीं दूसरी ओर आधुनिक तानाशाही एवं सैनिकवाद की भी नींव डाली गई, जिसने शीघ्र ही साम्राज्यवादी देशों
के बीच टकराहट को अनिवार्य कर दिया। फ्रांसीसी क्रांति की यह सैन्य नीति यूरोप सहित औद्योगिक रूप से विकसित देशों यथा जापान
एवं अमेरिका में भी सैन्यवाद को बढावा दिया तथा जिसकी अन्तिम परिणति साम्राज्यवाद के रूप में सामने आई। इसके साथ ही फ्रांसीसी
क्रांति का महत्व लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिस्थापित करने को लेकर भी है, जिससे शासन के दैवी सिद्धान्त का अन्त कर लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त को मान्यता दी।
फ्रांसीसी क्रांति ने अपने बहुमूल्य मानवाधिकारों की घोषणा द्वारा व्यक्ति की गरिमा एवं महत्त्व को प्रतिपादित किया और यह साबित किया कि सार्वभौम सत्ता जनता में अन्तर्निहित है और शासन के अधिकार का स्त्रोत जनता है। अतः इस घोषणा ने वैश्विक जगत में नव-चेतना का
संचार किया। मूलतः फ्रांसीसी क्रांति ने ही राजनीतिक एवं धार्मिक स्वतंत्रता को बढावा दिया तथा साथ ही पहली बार अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता को स्वीकार किया गया और उसी से प्रेस की आजादी को बलं मिला। आज के समय में इसकी महत्ता का अन्दाजा इसी आलोक
में लगाया जा सकता है।
रूस में दो क्रान्तिया हुई (मार्च-नवम्बर)। वास्तव में क्रान्ति तो एक ही थी इसके अध्याय दो थे। मार्च की क्रांति इसका राजनीतिक अध्याय
था तो नवम्बर की क्रांति मजदूर जनतंत्र को जन्म देने वाला अध्याय था। मार्च, 1917 की क्रान्ति ने जारशाही का अन्त कर उदारवादी
शासन की स्थापना की। किन्तु इसके बाद नवम्बर की बोल्शेविक क्रांति ने उदारवादी शासन का अन्त कर सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व
कायम किया।
इस क्रांति (बोल्शेविक) ने मार्क्सवादी विचारों पर आधारित सर्वहारा वर्ग की स्थापना की तथा विश्व भर में साम्यवादी विचारों को फैलाया। रूस में पूँजीवाद का अंत हो गया. उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ, किसानों को शोषण से मुक्ति मिली, उच्च वर्गा का निम्न वर्गों के शोषण का अन्त हुआ। रूसी क्रान्ति ने व्यक्तिगत सम्पत्ति की समाप्ति की। रूस में न केवल जारशाही का अंत हुआ बल्कि रूस में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में पूँजीपति और कुलीन वर्गों का प्रभाव भी समाप्त हो गया।
इस क्रांति ने वैश्विक जगत में पुँजीवादी शोषण से मक्ति दिलाने का भरसक प्रयास किया। इस क्रान्ति ने वैश्विक समदाय हेतु आर्थिक समानता का आदर्श प्रस्तुत किया। इस क्रान्ति के परिणामस्वरूप उपजी मार्क्सवादी विचारधारा से समाजवाद का व्यावहारिक रूप सामने आया। किसानों एवं मजदूरों में यह विचारधारा काफी लोकप्रिय हुई। इतना ही नहीं अन्तर्गत स्तर पर साम्यवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार हेतु वर्ष 1919 में प्रथम कप्युनिस्ट इण्टरनेशनल की स्थापना की गई। इससे प्रेरित होकर अनेक साम्यवादी सरकारें स्थापित हुई। विभिन्न देशों में श्रमिक संगठनों के साथ ही वैश्विक संगठन अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना सम्भव हो पाई। वर्ष 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रान्ति ने ही साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध स्वतंत्रता, साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्षरत सभी देशों का मनोबल बढ़ाया। रूसी क्रान्ति ने आर्थिक स्वतंत्रता को सर्वोपरि स्थान दिया और विश्व के सामने यह विचार रखा कि आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।
बोल्शेविक क्रांति के प्रभाव ने न केवल रूस वरन् पूरे विश्व को प्रभावित किया। रूसी क्रांति में जिस नवीन पद्धति का जन्म हुआ वह श्समाजवादी सोवियत गणतंत्र संघश् के नाम से विख्यात हुआ।
अतः स्वाभाविक रूप से रूसी क्रान्ति फ्रांसीसी क्रान्ति से व्यापक प्रतीत होती है, परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि इन दोनों क्रान्तियों का पर्याप्त अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व है।

प्रश्न: लेनिन
उत्तर: लेनिन मार्क्सवाद का गहन अध्येता था वह बोल्शेविक दल का नेता था। वह आन्दोलन करने में सबसे बड़ा माहिर था। उसका नारा था
सर्वहारा वर्ग का शासन। प्रावदा उसका समाचार पत्र था।
प्रश्न:शून्यवाद
उत्तर: रूसी क्रान्ति के दौरान समाज में शून्यवाद का उदय हुआ, जिसने प्राचीन व्यवस्थाओं एवं तत्कालीन शासन पद्धति को नष्ट करने और
अराजकता की शरण लेने पर जोर दिया।
प्रश्न: खूनी इतवार
उत्तर: गैपों के नेतृत्व में 22 जनवरी, 1905 को इतवार के दिन लाखों निहत्थे प्रदर्शनकारियों (मजदूर, उनकी पत्नियां व बच्चे) पर . सेंट पीटर्सबर्ग में सैनिकों ने गोली बरसायी जिससे 130 व्यक्ति मारे गये। इस घटना को विश्वइतिहास में श्खूनी इतवार कहा जाता है।
प्रश्न: गैपों (Gapon)
उत्तर: रूस में गैपों एक साहसिक पादरी था जिसका अपना पुलिस संघ था। 22 जनवरी, 1905 को इतवार के दिन लगभग डेढ़ लाख मजदूरों ने गैपों के नेतृत्व में जार के सम्मुख अपनी मांगे मनवाने के लिए प्रदर्शन किया। 1906 में क्रान्तिकारियों ने ही उसका कत्ल कर दिया – सन्देह था कि वह एक सरकारी जासूस था कि जो निराधार था।
प्रश्न: बोल्शेविक दल
उत्तर: इसका नेता लेनिन था, ये श्रमिक वर्ग का राज्य स्थापित करना चाहते थे। श्रमिकों के अलावा अन्य किसी वर्ग को मान्यता नहीं देना चाहते थे। उग्रवादी थे जल्दी से जल्दी श्रमिकों की सत्ता स्थापित कर सर्वहारा वर्ग का शासन स्थापित करना चाहते थे।
प्रश्न: मेन्शेविक दल
उत्तर: इसका नेता जार्ज प्लेखनोव था। ये लोग श्रमिकों के साथ-साथ अन्य वर्गों के सहयोग से जनतंत्र की स्थापना करना चाहते थे। धीरे-धीरे
समाजवाद की स्थापना अभीष्ट लक्ष्य था।

मध्यकाल में शिक्षा
भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ, शिक्षा की इस्लामी पद्धति सामने आयी। मध्यकाल में शिक्षा का अभिकल्पन बगदाद के अबासिद के अंतग्रत विकसित शिक्षा की परम्परा की तर्ज पर किया गया। जिसके परिणामस्वरूप, समरकंद, बुखारा और ईरान जैसे देशों के विद्वानों ने पथ प्रदर्शन के लिए भारतीय विद्वानों की ओर देखा। अमीर खुसरो,एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व, ने न केवल गद्यांश और पद्यांश के कौशल का विकास किया अपितु एक नई भाषा को भी वर्गीकृत किया जो स्थानीय जरूरतों एवं दशाओं के लिए उचित थी। मिन्हास-उस-सिराज, जियाउद्दीन बरनी एवं आतिक जैसे कुछ समकालीन इतिहासकारों ने भारतीय विद्वता के बारे में लिखा।
मुस्लिम शासन काल के दौरान शिक्षा को राज्य का बेहद संरक्षण मिला। मुस्लिम शासकों ने कई मकतब, मदरसे, पुस्तकालय इत्यादि स्थापित किए, और कई विद्वानों को संरक्षण दिया। उन्होंने कई विद्यार्थियों के लिए वजीफे की स्वीकृति भी दी।
अरब एवं मध्य एशियाई लोग उपमहाद्वीप में मध्यकाल एवं प्रारंभिक आधुनिक काल दोनों में मुस्लिम शैक्षिक प्रतिमान लेकर आए। 632 हिजरी संवत में पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के एक दशक के भीतर अरब समुद्री व्यापारी दक्षिण भारत में व्यापार करने एवं रहने लगे और उन्होंने स्थानीय महिलाओं के साथ विवाह किए। तुर्की और अन्य मध्य एशियाई आक्रातांओं ने 1000 ईस्वी के आस-पास उत्तरी भारत पर हमले किए और तत्पश्चात् कई विदेशी विजित साम्राज्यों की स्थापना की। मुस्लिम शासकों ने पुस्तकालयों एवं साहित्यिक समाजों की स्थापना करके शहरी शिक्षा को प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्राथमिक विद्यालय (मकतबद्ध भी स्थापित किए जहां विद्यार्थी पढ़ना, लिखना और मूलभूत इस्लामी प्रार्थनाओं को सीखते थे, और उच्च विद्यालयों (मदरसा) की भी नींव रखी जिसमें उन्नत भाषा कौशल, कुरान की आयतें, पैगम्बर परम्परा, इस्लामी कानून (शरिया) और सम्बद्ध विषय पढ़ाये जाते थे। इस्लामी स्कूल, जो अक्सर मस्जिद के साथ जुड़े होते थे, गरीबों के लिए भी खुले थे लेकिन लैंगिक रूप से वर्गीकृत थे, जिसमें केवल लड़कों को ही प्रवेश मिलता था। समृद्ध परिवारों की मुस्लिम लड़कियां घर पर ही पढ़ाई करती थीं, यदि वे कुरान के अतिरिक्त कोई शिक्षा लेनी चाहती थीं। 1526 ईस्वी में भारत में मुगल साम्राज्य के प्रारम्भ से लेकर 1848 में मुगल राजनीतिक शक्ति के अंत तक, फारसी दरबारों की भाषा थी और अभिजात्य वग्र के लड़के साहित्य, इतिहास, आचार, विधि, प्रशासन, और दरबार प्रोटोकाॅल सीखने के लिए फारसी स्कूलों में प्रवेश ले सकते थे। औषधि, गणित एवं तर्कशास्त्र जैसे विषयों ने भी इस्लामी शिक्षा केंद्रों में पाठ्यक्रम के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में स्थान बनाया। अत्यधिक गहन व्यवस्था थी प्रसिद्ध सूफियों (खानकाह) के विचारों को फैलाना। इन नवीन शैक्षिक प्रतिरूपों ने आवश्यक रूप से पुराने प्रतिमानों को प्रतिस्थापित नहीं किया, यद्यपि राज्य संरक्षण का पैटर्न बदल गया था। संस्कृत विद्यापीठों ने युवा पुरुष ब्राह्मणों को साहित्य एवं विधि पढ़ाना जारी रखा( प्रशिक्षण प्रदान करने वाले और व्यापारिक स्कूलों ने लड़कों को व्यापार के लिए आवश्यक कौशल में पारंगत किया। कन्या शिक्षा एक अपवाद थी।
भारत ने आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में बड़ी संख्या में मुस्लिम आक्रमणकारियों का सामना किया। महमूद गजनी ने भारत में आक्रमण किया और ढेर सारा धन लूट कर ले गया जिससे उसने अपने देश में एक बड़ी संख्या में स्कूलों एवं पुस्तकालयों की स्थापना की। बाद में जब मुस्लिम शासकों ने भारत में स्थायी रूप से साम्राज्य स्थापित किए, तो उन्होंने शिक्षा की एक नई पद्धति प्रस्तुत की। परिणामस्वरूप शिक्षा की प्राचीन पद्धति व्यापक रूप से बदल गई। वास्तव में, मुस्लिम शासन काल में हिंदू शासन काल की अपेक्षा शिक्षा की गुणवत्ता में कहीं अधिक कमी आयी। अकबर के अलावा किसी भी मुस्लिम शासक ने शिक्षा के क्षेत्र में प्रशंसनीय कार्य नहीं किया।
मुस्लिम शासन काल में शिक्षा का प्राथमिक एवं मुख्य उद्देश्य ज्ञान का विस्तार एवं इस्लाम का प्रचार करना था। इस समयावधि के दौरान शिक्षा का प्रसार इस्लामी सिद्धांतों के प्रचार, कानूनों एवं सामाजिक अभिसमयों के लिए किया गया। शिक्षा धर्म पर आधारित थी और इसका उद्देश्य धर्मावलंबी लोगों को तैयार करना था। इसका दूसरा उद्देश्य भौतिक समृद्धि हासिल करना था।
मुस्लिम शासनकाल में शिक्षा को मकतबएवं मदरसा में बांटा गया। प्राथमिक शिक्षा मकतब में दी जाती थी और उच्च शिक्षा मदरसा में दी जाती थी। मकतब में बच्चों को कुरान की आयतें याद कराईं जाती थीं। इसके साथ-साथ पढ़ना, लिखना एवं प्राथमिक गणित की शिक्षा भी दी जाती थी। इसके अतिरिक्त उन्हें अरबी लिपि, फारसी भाषा और लिपि की शिक्षा भी दी जाती थी। पैगम्बरों एवं मुस्लिम फकीरों की कहानियां बच्चों को सुनाई जाती थीं। बच्चों को लेखन एवं वाक् कौशल की जागकारी एवं शिक्षा भी दी जाती थी। उन दिनों में मौखिक शिक्षा ही अधिकतर दी जाती थी। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद बच्चों को मदरसा में भेजा जाता था। वहां पर विभिन्न विषयों के अलग-अलग शिक्षक होते थे। इस्लाम की शिक्षा पर विशेष जोर दिया जाता था। मदरसे में धार्मिक एवं धर्मनिरपेक्ष विषय भी पढ़ा, जाते थे। धार्मिक शिक्षा में कुरान का अध्ययन, मोहम्मद एवं उनके विश्वास, इस्लामी कानूनों एवं इस्लामी इतिहास इत्यादि की शिक्षा शामिल थी। धर्मनिरपेक्ष शिक्षा में अरबी साहित्य, व्याकरण, इतिहास, दर्शन, गणित, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, ग्रीक भाषा एवं कृषि इत्यादि का अध्ययन कराया जाता था।
इस्लामी शिक्षा पद्धति की मुख्य विशेषता थी कि यह आत्मा में परम्परागत और सामग्री में ईश्वर मीमांसा या धर्मविज्ञानी थी। पाठ्यक्रम को दो व्यापक भागों में विभाजित किया गया था परम्परागत (मनकुलात) एवं तार्किक (मकुलात) विज्ञान। परम्पराएं, कानून एवं इतिहास और साहित्य परम्परागत विज्ञानों के अंतग्रत रखे गए। तर्क, दर्शन, औषधि, गणित एवं खगोल विज्ञान तार्किक विज्ञानों के अंतग्रत आते हैं। बाद में, परम्परागत विज्ञानों की अपेक्षा तार्किक विज्ञानों पर जोर दिया गया। इस्लामी शिक्षा में परम्परागत विषयों का प्रभुत्व इल्तुतमिश (1211-36) के शासनकाल से लेकर सिकंदर लोदी (1489-1517) के शासनकाल तक रहा। शिक्षा परिदृश्य में बदलाव उस समय शुरू हुआ जब सिकंदर लोदी ने दो भाइयों शेख अब्दुल्ला और शेख अजीजुल्लाह को मुल्तान से दिल्ली आमंत्रित किया। उन्होंने पाठ्यक्रम में दर्शन एवं तर्क के अध्ययन को प्रस्तुत किया।
मुगल शासक शिक्षा एवं साहित्य के मुख्य संरक्षक थे। इस काल में उर्दू का उत्थान देखा गया। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा लिखी जिसे तजुक-ए-बाबरी के नाम से जागा जाता है। मुगल शासक हुमायूं ने दिल्ली में मदरसों में गणित, खगोलशास्त्र और भूगोल का अध्ययन प्रारंभ कराया। इसने मौजूदा शिक्षा पद्धति में पक्षपातीय स्थिति को कम करने में मदद की। कई हिंदुओं ने फारसी भाषा सीखी एवं संस्कृत से फारसी में बड़ी मात्रा में अनुवाद कार्य किया। अकबर ने लेखांकन, लोक प्रशासन, ज्यामिति जैसे विषयों को शिक्षा में शामिल किया और अपने महल के पास एक कार्यशाला का निर्माण किया। उसने कार्यशाला की स्वयं देख-रेख की। मुगल शासकों ने शिक्षा के प्रति बेहद लगाव जाहिर किया और पाठशालाओं, विद्यापीठों, मकतबों और मदरसों के माध्यम से शिक्षा के प्रसार में योगदान दिया। अकबर ने शैक्षिक संस्थानों को अनुदान दिया। उसने जामा मस्जिद के निकट एक काॅलेज शुरू किया। उस समय, शिक्षा राज्य का विषय नहीं था। आम तौर पर, मंदिरों एवं मस्जिद प्रारंभिक शिक्षा के केंद्र थे। वे अपने वित्त पोषण के लिएशासकों, अमीर लोगों एवं दानकर्ताओं द्वारा दिए गए दान पर निर्भर थे। संस्कृत एवं फारसी भाषा मंदिरों एवं मस्जिदों में पढ़ाई जाती थी। महिला शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं था। शाही घरानों एवं समृद्ध परिवारों की महिलाएं घर पर ही शिक्षा प्राप्त करती थीं। मुगल शासक अकबर ने अबुल फजल, फैजी, राजा टोडरमल, बीरबल तथा रहीम जैसे कई विद्वानों को संरक्षण दिया। ये अकबर के दरबार के नवरत्नों में से थे जिन्होंने संस्कृति एवं शिक्षा के विस्तार में मदद की।