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प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों के नाम लिखिए , ancient educational centres in india in hindi

ancient educational centres in india in hindi प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों के नाम लिखिए ?

प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्र
प्राचीन भारत में शिक्षा देने वालों को आचार्य, उपाध्याय, चरक (भिखु या साधु), गुरू, यौजनसतिका, शिक्षक कहा जाता था। तत्कालीन शिक्षण संस्थानों में गुरुकुल, परिषद्, संगम, गोष्ठी, आश्रम, विधापीठ, घटिका, अग्रहार, मठ,ब्रह्मपुरीएवं विहार प्रमुख थे। भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में निम्नलिखित का नाम लिया जा सकता हैः
तक्षशिलाः यह छठी शताब्दी ईसा पूर्व का एक प्रमुख अधिगम केंद्र था। यहां विभिन्न विषयों की 16 शाखाओं को पढ़ाया जाता था। इसमें प्रत्येक का एक विशेष प्रोफेसर था। इसमें चित्रकला, मूर्तिकला, तस्वीर निर्माण एवं दस्तकारी विषय भी थे। इस शैक्षणिक संस्थान का एक प्रमुख चिकित्सा स्कूल का प्रसिद्ध छात्र जीवक था जिसने मगध के राजा बिम्बिसार और महान बुद्ध का उपचार किया। जीवक ने यहां पर ऋषि अत्रेय के अंतग्रत सात वर्षों तक अध्ययन किया।
5वीं शताब्दी के आस-पास तक्षशिला का वर्णन जातक कथाओं में हुआ। यह ईसा पूर्व की कई शताब्दियों तक शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बना रहा, और 5वीं शताब्दी में इस शहर के नष्ट हो जागे के बाद भी विद्यार्थियों को निरंतर आकर्षित करता रहा। तक्षशिला चाणक्य के साथ जुड़े होने के कारण शायद इतना प्रसिद्ध हुआ। प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र को चाणक्य द्वारा स्वयं तक्षशिला में ही संकलित किया गया था। चाणक्य (कौटिल्य), मौर्य शासक चंद्रगुप्त एवं आयुर्वेदाचार्य चरक ने तक्षशिला में ही अध्ययन किया।
सामान्य तौर पर,एक विद्यार्थी को 16 वर्ष की आयु में ही तक्षशिला में प्रवेश मिलता था। इस शिक्षण केंद्र में चिकित्सा, विधि एवं सैन्य कौशल के अतिरिक्त वेदों एवं 18 कलाओं को भी सिखाया जाता था जिसमें धनुर्विद्या, आखेट एवं हाथी की सवारी एवं नियंत्रण शामिल थे।
तक्षशिला के भग्नावशेषों में एक बड़े क्षेत्र में भवन एवं बौद्ध स्तूप शामिल हैं। तक्षशिला के भग्नावशेषों को तीन मुख्य शहरों में विभाजित किया जा सकता है, जो अलग-अलग कालों से सम्बन्ध रखते हैं। इसमें सबसे प्राचीन हाथीयल क्षेत्र है। तक्षशिला का दूसरा शहर सिरकप में स्थित है, और जिसका निर्माण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में ग्रेको-बैक्टीरियन राजाओं द्वारा कराया गया। तक्षशिला का तीसरा और अंतिम शहर सिरमुख में था जो कुषाण राजाओं से सम्बद्ध था।
शहरों के ख.िडत अवशेषों के अतिरिक्त, एक बड़ी संख्या में बौद्ध विहार एवं स्तूप भी तक्षशिला क्षेत्र से जुड़े हैं। कई स्तूपों के अतिरिक्त धर्मराजिका के स्तूप, जाॅलियन में विहार, मोहरा मुराडु के बौद्ध विहार इस श्रेणी में शामिल कुछ महत्वपूर्ण भग्नावशेष हैं। इस प्रकार सर जाग मार्शल के पुरातात्विक प्रयासों ने तीन पृथक् शहरों के अस्तित्व की बात को स्थापित किया। हिंदुओं, पारसियों, मेसिडोनियाई, मौर्यों, बैक्टिरियन ग्रीक, पार्थियनों एवं कुषाण के प्रभुत्व वाली तक्षशिला ने विभिन्न शासनों की राजधानी के रूप में सेवा की, और विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों को उद्घाटित किया और आवश्यक रूप से एक वैश्विक गुण को धारण किया। इस मिलनसार केंद्र में शैक्षिक संस्थान किस प्रकार घुलमिल गए? क्या शहरों ने सामूहिक रूप से प्राचीन गिजी.शिक्षक व्यवस्था से जुड़े महानगर का निर्माण किया? क्या पर्याप्त मात्रा में ब्राह्मण काॅलोनियां थीं जिन्होंने शिक्षक के तौर पर अपनी स्वतंत्रता को बना, रखा? बौद्ध धर्म के चरम पर यह किस प्रकार एक विश्वविद्यालय नगर के रूप में विकसित हुआ?
इस बात पर कुछ असहमति है कि क्या तक्षशिला को एक विश्वविद्यालय माना जा सकता है। जबकि कुछ का मानना है कि तक्षशिला प्रारंभिक विश्वविद्यालय बना या उच्च शिक्षण का केंद्र था, अन्य लोग पश्चात्वर्ती नालंदा विश्वविद्यालय के संदर्भ में इसे आधुनिक विश्वविद्यालय नहीं मानते। तक्षशिला को हिंदुओं एवं बौद्धों द्वारा धार्मिक एवं ऐतिहासिक पवित्रता एवं महत्व का माना जाता है।
महाकाव्यों एवं जातकों में दिए गए संदर्भों ने यह स्पष्ट किया कि इस बात में कोई संदेह नहीं कि तक्षशिला की अधिगम के एक महान केंद्र के रूप में एक शानदार छवि थी। यहां पूरे देश से छात्रों के झुंड कला एवं विज्ञानों में महारत हासिल करने के लिए आते थे। जातक में उल्लेख किया गया है कि बनारस, राजग्रह, मिथिला, लाल्य देश, उज्जियिनी, कोसल, शिवि और कुरु राज्यों के ऐसे स्थान हैं जहां से तक्षशिला में विद्यार्थियों को शिक्षा के लिए भेजा जाता था। इन विद्यार्थियों में राजकुमारों के साथ-साथ आमजनों के बच्चे भी थे। अखमेनियन काल में खरोष्ठी लिपि लोकप्रिय बन गई और तक्षशिला के शिक्षकों ने अपने शिक्षण एवं प्रचार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बैक्टीरियन-ग्रीक के समय में, सिक्का निर्माण एवं मूर्तिकला जैसी कला एवं ग्रीक भाषा को प्रोत्साहन मिला। बौद्ध विहारों के नहीं आने तक तक्षशिला ने संभवतः कोई भी काॅलेज या विश्वविद्यालय का रूप धारण नहीं किया और गिजी.शिक्षक व्यवस्था का अनुसरण किया। क्राइस्ट युग के प्रथम कुछ शताब्दियों के दौरान, बौद्ध विहारों ने तक्षशिला की व्यवस्था को बना, रखने का प्रयास किया और उसकी शैक्षिक संस्थान के रूप में विख्यात छवि को और अधिक पल्लवित किया जब तक कि पांचवीं शताब्दी में हूणों ने इसे नष्ट नहीं कर दिया। जब द्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में इसमें प्रवेश किया तो इसके अधिकतर प्राचीन विहार नष्ट हो चुके थे।
नालंदाः नालंदा 427 से 1197 ईस्वी तक बिहार (भारत) में उच्च शिक्षा का एक प्राचीन केंद्र रहा। नालंदा की स्थापना बिहार में पांचवीं शताब्दी में बिहार में की गई। यह बौद्ध शिक्षा को समर्पित अध्ययन केंद्र था, लेकिन इसने विद्यार्थियों को ललित कलाओं, औषधि, गणित, खगोलशास्त्र, राजनीति एवं युद्ध कौशल में भी प्रशिक्षित किया।
नालंदा शिक्षा केंद्र में आठ पृथक् खण्ड, 10 मंदिर, मेडिटेशन हाॅल, कक्षाएं, झीलें एवं उद्यान थे। यहां पर आठ मंजिला पुस्तकालय था जहां भिक्षु गहन रूप से पुस्तकों एवं दस्तावेजों की नकल करते थे ताकि कोई शोधार्थी स्वयं का पुस्तक संग्रह रख सके। यहां पर विद्यार्थियों के लिए शयनकक्ष,शायद इस प्रकार का प्रथम शैक्षिक संस्थान जहां 10,000 से अधिक विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय में आवास मुहैया करा, गए और 2,000 शिक्षकों के लिए रहने एवं आवास का प्रबंध था। नालंदा विश्वविद्यालय ने कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, पर्शिया एवं तुर्की से शिष्यों एवं विद्वानों को आकर्षित किया। राजगीर से बस से आधे घंटे की दूरी पर नालंदा है, जो विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय स्थल है। यद्यपि प्रथम शताब्दी से यह एक तीर्थस्थान बन गया, जैसाकि यह बुद्ध से जुड़ा हुआ था और वह अपने दो मुख्य शिष्यों, सारीपुत्र और मोगलिन, के साथ इस स्थान पर अक्सर आया करते थे। यहां पर बड़ा स्तूप सारीपुत्र के स्तूप के तौर पर जागा जाता है। इस स्थल पर बड़ी संख्या में छोटे-छोटे बौद्ध विहार हैं जहां भिक्षु रहते थे और अध्ययन करते थे और उनमें से कइयों को बाद की शताब्दियों में बनाया गया।
नालंदा का शिक्षा के केंद्र के तौर पर विशेष महत्व बौद्ध धर्म से आया। चीन से आया प्रसिद्ध तीर्थयात्री द्वेनसांग यहां आया और सातवीं शताब्दी में पांच वर्षों तक अध्ययन एवं शिक्षण कार्य किया। उस समय नालंदा विश्वविद्यालय में 10,000 से अधिक विद्यार्थी और 3,000 से अधिक शिक्षक थे। लगभग 700 वर्षों तक, 5वीं-12वीं शताब्दियों के बीच, नालंदा प्राचीन भारत में विद्वत्ता और बौद्ध अध्ययन का केंद्र था। एक भयंकर आग की चपेट में आने से यहां के पुस्तकालय की 90 लाख से अधिक पांडुलिपियां जलकर खाक हो गईं और 12वीं शताब्दी के प्रारंभ पर, मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खलजी ने विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया। 1860 के दशक में महान पुरातत्वविद् ,लेक्जेंडर कनिंघम ने इस स्थान की पहचान नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में की और 1915-1916 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने इस स्थल की खुदाई प्रारंभ कर दी। अभी तक उत्खनित स्थल समस्त क्षेत्र का एक बेहद छोटा हिस्सा है लेकिन ध्वस्त क्षेत्र का एक बड़ा भाग मौजूदा गांवों के नीचे दबा है और संभवतः सामने न आ पाए। मौजूदा स्थल का रख-रखाव बेहद कुशलतापूर्वक किया गया है और यह भ्रमण के लिए बेहद अच्छी जगह है। यहां पर एक छोटा संग्रहालय है जिसमें बुद्ध की उत्कृष्ट मूर्तियां रखी गई हैं और एक किलोमीटर दूर द्वेनसांग को समर्पित एक मंदिर है। पास में ही अंतरराष्ट्रीय बौद्ध अध्ययन केंद्र और नव नालंदा महाविहार है, जिसकी स्थापना बौद्ध दर्शन में अनुसंधान हेतु की गई है।
बिहार राज्य में पटना के 40 मील दक्षिण और राजगीर के 7 मील उत्तर में स्थित नालंदा को परम्परागत रूप से सारिपुत्र के जन्म एवं मृत्यु का स्थान माना जाता है। मूलतः यह वैदिक शिक्षा का एक स्थल था। नागार्जुन के साथ मिलकर तारानाथ का वर्णन, और उनके शिष्य आर्य देव का इस स्थान से जुड़ाव और बौद्ध तर्कशास्त्री दिनाग और सुद्रजया के बीच बहस ने नालंदा को 5वीं शताब्दी के प्रारंभ तक वैदिक शिक्षा के केंद्रों के रूप में इसके महत्व को पुनः प्रकट एवं स्थापित किया। बौद्ध विश्वविद्यालय के तौर पर इसका उदय 5वीं शताब्दी के मध्य से हुआ। गुप्त साम्राज्य से संरक्षण के अधीन बड़ी संख्या में बनते विहार की गतिविधियां बदल गईं और इन भवनों की गतिविधियां निरंतर 11वीं शताब्दी तक भली-भांति चलती रहीं। पुरातात्विक उत्खननों की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय का क्षेत्र एक मील लम्बा एवं आधा मील चैड़ा था। केंद्रीय काॅलेज में 7 बड़े हाॅल और 300 कमरे थे। अन्य विहारों की इमारतें नियोजन बद्ध तरीके से एक पंक्ति में व्यवस्थित की गईं थीं, और उनमें से कुछ, जैसाकि यशोवर्मन शिलालेख बताता है, इतनी ऊंची थी कि वे आकाश को छूती प्रतीत होती थी।
यद्यपि नालंदा महायान के अध्ययन का विशिष्ट केंद्र था, विशेष रूप से वसुबंधु, नागार्जुन, असंग और धर्मकीर्ति द्वारा किया गया कार्य, तथापि इसने हीनयान एवं ब्राह्मणों के धर्मनिरपेक्ष लोकप्रिय विषय जैसे वेदों, हिंदूविद्या,शब्द विद्या एवं आयुर्वेद को भी पढ़ाया। वास्तव में, भारत में उस समय ज्ञात लगभग ज्ञान की प्रत्येक शाखा को अध्ययन के एक विषय के रूप में, शामिल किया गया। यहां पर मौजूदा विषयों की व्यापक शृंखला एवं शिक्षकों की बड़ी मंदाकिनी यह स्पष्ट करती है कि क्यों चीन, कोरिया, तिब्बत एवं तोखरा जैसे दूरवर्ती स्ािानों से विद्वान एवं शोधार्थी इस विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने का प्रयास करते थे। इसी कारण से नालंदा में प्रशिक्षित शिक्षिकों एवं विद्वानों की भारत से बाहर अत्यधिक मांग थी। इसकी निरंतर मांग तिब्बत से सर्वाधिक होती थी, जिसने 8वीं शताब्दी में कांडरागोमिन के नेतृत्व में, जिन्होंने स्वयं 60 से अधिक पुस्तकें लिखीं थीं, तिब्बती अध्ययन एवं भाषा को प्रोत्साहित एवं प्रबंधित किया गया। राजा के विशेष निमंत्रण पर बौद्ध शिक्षा देने और संस्कृत एवं पाली कृतियों का तिब्बती भाषा में अनुवाद करने के लिए संतरक्सिता, पद्मसंभव, कमलाशिला एवं थिरमाती जैसे नालंदा के कुछ विद्वान तिब्बती के दौर पर गए। शुभकर सिम्म (8वीं शताब्दी) एवं धर्मदेव (10वीं शताब्दी) नालंदा के वे विद्वान थे जिन्होंने चीन में शिक्षण कार्य किया।
भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति एवं परम्परा को जीवंत रखने और आगे बढ़ाने के लिए 28 मार्च, 2006 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ए.पी.जेअब्दुल कलाम ने बिहार विधान सभा के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते समय नालंदा विश्वविद्यालय के पुनर्रु)ार के विचार को प्रस्तुत किया। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए नालंदा विश्वविद्यालय विधेयक, 2010 लाया गया जिसे 21 अगस्त, 2010 को राज्यसभा ने और 26 अगस्त, 2010 को लोकसभा ने पारित कर दिया। 21 सितंबर, 2010 को इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो गई और यह अधिनियम बन गया। 25 नवम्बर, 2010 को नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया गया जब इस अधिनियम को क्रियान्वित किया गया।
नालंदा विश्वविद्यालय, जिसे नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के नाम से भी जागा जाता है, भारत के बिहार राज्य में राजगीर में नालंदा के पास स्थित है। विश्वविद्यालय, जिसका सृजन नालंदा में शिक्षा के प्राचीन केंद्र के तौर पर इसे जीवंत करने के दृष्टिगत किया गया है, का प्रथम अकादमिक सत्र 15 विद्यार्थियों, जिसमें पांच महिलाएं भी हैं, के साथ 1 सितंबर, 2014 को प्रारंभ किया गया। शुरुआती दौर में इसकी व्यवस्था अस्थायी रूप से राजगीर में की गई है और वर्ष 2020 तक विश्वविद्यालय का एक आधुनिक कैम्पस तैयार हो जागे की उम्मीद है।
उल्लेखनीय है कि जापान एवं सिंगापुर निर्माण कार्य में वित्तीयन कर रहे हैं जो कुल मिलाकर 100 मिलियन अमेरिकी डाॅलर है। गोपा सब्बरवाल को वर्ष 2011 में इसका प्रथम कुलपति नियुक्त किया गया। आकलित किया गया है कि इसमें नवीनतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए 500 मिलियन अमेरिकी डाॅलर की जरूरत होगी और आगे आस-पास के अवसंरचनात्मक विकास एवं पर्याप्त सुधार हेतु 500 मिलियन अमेरिकी डाॅलर की और आवश्यकता पड़ेगी। संगठन सरकारों, गिजी संगठनों एवं व्यक्तियों तथा धार्मिक समूहों से दान की उम्मीद कर रहा है। बिहार राज्य सरकार ने स्थानीय लोगों से 443 एकड़ जमीन इकट्ठा करके विश्वविद्यालय को दी है, जहां निर्माण कार्य शुरू हो गया है।
वर्ष 2007 में, भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के फ्रेमवर्क, और भागीदारी के प्रस्तावित ढांचे के परीक्षण के लिए अमत्र्य सेन की अध्यक्षता में एक नालंदा मेंटर ग्रुप (एनएमजी) का गठन किया, जो इस विश्वविद्यालय को एक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के तौर पर शासित करेगा। एनएमजी में सिंगापुर, चीन, जापान और थाईलै.ड के भी प्रतिनिधि हैं। बाद में एनएमजी का नाम बदलकर गवर्निंग बोर्ड आॅफ नालंदा यूनिवर्सिटी कर दिया जाएगा।
नालंदा विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड में शामिल हैं (i) अमत्र्य सेन (हार्वर्ड विश्वविद्यालय); (ii) सुगाता बोस (हार्वर्ड विश्वविद्यालय); (iii) बेंग बेंगवई (पीकिंÛ विश्वविद्यालय); (iv) सुसुमु नकानिशि (क्योटो सिटी यूनिवर्सिटी आॅफ आर्ट्स); (v) मेघनाद देसाई (लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स); (vi) प्रपोद अश्वतिरूलहकर्न (चूलालोंगकर्न विश्वविद्यालय); (vii) जार्ज पो (सिंगापुर के भूतपूर्व विदेश मंत्री); (viii) तानसेन सेन (बरूच काॅलेज); (ix) नंद किशोर सिंह (राज्यसभा सदस्य); (x) चंदन हरे राम खरवार (पुणे विश्वविद्यालय)।
वर्तमान में नालंदा विश्वविद्यालय में निम्न संकाय हैं
ऽ स्कूल आॅफ हिस्टोरिकल स्टडीज
ऽ स्कूल आॅफ एनवायरन्मेंट एंड इकोलाॅजिकल स्टडीज
ऽ स्कूल आॅफ बुदिस्ट स्टडीज, फिलाॅस्फी एंड कम्परेटिव रिलीजन
ऽ स्कूल आॅफ लैंग्वेजेज एंड लिटरेचर
ऽ स्कूल आॅफ इंटरनेशनल रिलेशंस एंड पीस स्टडीज
ऽ स्कूल आॅफ इंर्फोर्मेशन साइंसेज ए.ड टेक्नोलाॅजी
ऽ स्कूल आॅफ बिजनेस मैनेजमेंट (पब्लिक पाॅलिसी एंड डेवलपमेंट स्टडीज)।
वल्लभीःएक बौद्ध विश्वविद्यालय के तौर पर, वल्लभी, पश्चिमी भारत में काठियावाड़ में वाला के गजदीक, ने उसी प्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जैसी पूर्व में नालंदा ने अदा की थी। यह एक महत्वपूर्ण राज्य की राजधानी थी। इसका विकास मैत्रक राजा के विपुल अनुदान के कारण हुआ, जो पांचवीं से आठवीं शताब्दी तक मिलता रहा। द्वेनसांग ने वल्लभी का दौरा किया और वहां लगभग 100 संघों एवं 6000 भिक्षुओं को पाया। इत्सिंग ने भी इस विश्वविद्यालय की प्रशंसा की और गौर किया कि नालंदा और वल्लभी दो स्थान थे जहां भारत के सभी हिस्सों से विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए आते थे। ये दो विश्वविद्यालय, यद्यपि, प्राचीन भारत के क्रमशः आॅक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय थे। नालंदा की तरह वल्लभ बौद्ध धर्म के हीनयान शाखा के अध्ययन का विशिष्ट केंद्र था। नीति, व्रत, विद्या जैसे सर्वधर्मसमभाव विषयों को प्रोत्साहित किया गया।
विक्रमशिलाः नालंदा और वल्लभी की तरह, विक्रमशिला विश्वविद्यालय भी राजसी संरक्षण का परिणाम था। विक्रमशिला की स्थापना राजा धर्मपाल ने 8वीं शताब्दी में की थी, जो चार शताब्दियों से भी अधिक समय तक प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र रहा। राजा धर्मपाल ने (775-800 ईस्वी) यहां पर मंदिरों एवं विहारों का निर्माण किया एवं उदारतापूर्वक उनका संवर्द्धन किया। उन्होंने संभाषण एवं संबोधन के लिए कई हाॅलों का निर्माण भी किया। उनके उत्तराधिकारियों ने 13वीं शताब्दी के अंत तक विश्वविद्यालय को निरंतर संरक्षण प्रदान किया। अध्यापक कार्य को प्रसिद्ध शिक्षकों के एक मण्डल द्वारा नियंत्रित किया जाता था और यह कहा गया है कि विक्रमशिला का यह मण्डल नालंदा के मामलों को भी प्रशासित करता था। विश्वविद्यालय में छह काॅलेज थे जिसमें प्रत्येक में स्टाफ के साथ 108 अध्यापकों की मानक संख्या होती थी, और एक केंद्रीय कक्ष था जिसे विज्ञान सभा कहते थे और जिसके छह द्वार छह काॅलेजों में खुलते थे। पूरे विश्वविद्यालय के चारों ओर एक दीवार बनी थी जिसे कलात्मक कार्य एवं चित्रों से सुसज्जित किया गया था।
विक्रमशिला में व्याकरण, तर्कशास्त्र, भौतिक मीमांसा, रीतिरिवाज एवं अनुष्ठान पढ़ा, जागे वाले विशिष्ट एवं मुख्य विषय थे। तबकाते-ए-नासिरी के लेखक के अनुसार, 1203 में बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में मुस्लिमों ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया।
यद्यपि विभिन्न विषयों यथा दर्शनशास्त्र, औषध, साहित्य, तर्क, योग, ज्योतिष, तंत्र, व्याकरण आदि की शिक्षा विक्रमशिला में दी जाती थी लेकिन तांत्रिक बुद्धिज्म की पढ़ाई को अधिक महत्व दिया जाता था। राहुल सांस्कृत्यायान ने विक्रमशिला में लिखी गई पुस्तकों की एक सूची प्रकाशित की है जिसका अब तिब्बती अनुवाद उपलब्ध है।
धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला विश्वविद्यालय की पहचान और स्ािल निर्धारण, निश्चित साक्ष्य के अभाव में सही निष्कर्ष पर पहुंचने में बाधित हो रहा था। नालंदा के निकट सिलाव को विक्रमशिला के रूप में एलेक्जे.डर कनिंघम द्वारा की गई पहचान को स्वीकार नहीं किया गया। चूंकि यह गंगा से बेहद दूर है और तिब्बत के यात्रियों द्वारा किए गए वर्णन से मेल नहीं खाता है जिन्होंने उस स्थल को देखा था। आतिशा के ब्रूम टोन के जीवन वृत्त से स्पष्ट संकेत मिलता है कि वह विश्वविद्यालय गंगा नदी के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर ऊंचाई पर स्थापित था। नन्दलाल डे ने इसे पाथरघाट से समीकृत किया है। यद्यपि यह पहचान ब्रूम-टोन द्वारा दिए गए वर्णन से मेल खाती है कि गंगा नदी के किनारे पर पहाड़ी के ऊपर विश्वविद्यालय स्थापित है लेकिन उस स्थल के समन्वेषण और उत्खनन से ऐसा कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ जिसके आधार पर कोई भी पाथरघाट को विक्रमशिला के रूप में निर्धारित कर सके। चूंकि पाथरघाट की सभी प्रतिमाएं और चैखटें ब्राह्मणीय हैं और यह स्थल बौद्ध चिन्हों (अवशेषों) से अछूता है, जो स्थल के अगले परीक्षण और विश्लेषण के बगैर विक्रमशिला के रूप में इसकी पहचान त्याज्य है। विद्याभूषण जैसे विद्वानों ने इसकी पहचान सुल्तानगंज से की है और बगर्जी शास्त्री ने इसे केयुर के निकट हुलासगंज समीकृत किया है तथापि एन के मिश्र और एल के मिश्र ने अन्तीचक गांव में स्थित टीला को विक्रमशिला बताया है जिसके बारे में बुचान द्वारा 1811 ई. में एक राजा के मकान के रूप में पहले ही वर्णन किया जा चुका है।
फिर भी समस्त साहित्यिक आंकड़ों को देखने के पश्चात् डाॅ. बी.पी. सिन्हा विश्वस्त हुए कि विक्रमशिला और कहीं नहीं हो सकता और उन्होंने इस स्ािल की भू-आकृति, टीला की ऊंचाई.निचाई और आस-पास के बेढंगे क्षेत्रों का अध्ययन कर आगे खोज-बीन की। सुनसान खण्डहरों ने उन्हें अद्भुत रूप से प्रभावित किया। विस्मयकारी परिज्ञान से संपन्न वे सुविख्यात विश्वविद्यालय को मलबे के नीचे दबे देख सके जो सदियों से इस पर जमा हो गया था।
उघाड़ा गया विहार 330 वग्र मीटर की नाप का चैकोर है जिसका विन्यास केंद्रों को आच्छादित करते हुए दुहरे छत वाले चैत्य के साथ था। चैत्य में उभरे मण्डप के साथ शिखरयुक्त चार कक्ष हैं। शिखर विशेष में चूना-पलस्तर की बुद्ध प्रतिमाएं विभिन्न मुद्राओं में ग्रेनाइट स्तम्भ अथवा पीछे की दीवार से टिकी है। शिखर का सम्मुख मण्डप ग्रेनाइट स्तम्भ पर टिका है। उत्तरी मण्डप में वैदिक कर्म संबंधी पवित्र जल रखने के लिए दबे हुए छह पात्र हैं।
18वीं शताब्दी ईस्वी का एक तिब्बती स्रोत ‘सुम्पा कहान्पो ये पाॅल’ के अनुसार विक्रमशिला में 58 संकाय थे। राजा रामपाल के शासन काल में जब अभ्यंकर गुप्त वहां के प्रधान थे, विक्रमशिला में 160 प्रोफेसर (आचार्य) और 1000 विद्यार्थी थे। लेकिन मुस्लिम आक्रमण के बाद से विद्यार्थियों की संख्या घटने लगी जैसाकि अतिशा के एक तिब्बती शिष्य नागत्सहो द्वारा प्रमाणित है जिन्होंने आठ श्लोकों के एक स्रोत की रचना की है। अंतिम अवस्था में यहां लगभग 100 सन्यासी थे। वृद्ध धर्मस्वामी (1153-1216) और कश्मीरी पंडित शाक्य श्रीभद्र (1145-1225) द्वारा नालन्दा भ्रमण के समय विक्रमशिला यथारूप विद्यमान था। लेकिन जब युवा धर्मस्वामी 1235 में नालन्दा आए तब तक विक्रमशिला ढह चुका था। तिब्बती लेख पाग-साम-जोन-गंगा अथवा बौद्ध का इतिहास सुम्पा कहान्पो ये पाॅल द्वारा उसके उत्थानझुकाव और पतन के वर्णन का हवाला देते हुएशाक्य श्रीभद्र (1145-1225) कहते हैं कि उदन्तपुरी और विक्रमशिला के विहार तुर्कों द्वारा नष्ट किए गए थे।
विक्रमशिला का तिब्बत के साथ गजदीकी संबंध था। विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए तिब्बत से बहुत से विद्यार्थी आते थे। विक्रमशिला के परिचित विद्वानों की तिब्बत में बहुत मांग थी। बेहद प्रमुख विद्वान जिन्होंने तिब्बतियों को प्रभावित किया वे दीपंकर श्रीज्ञान थे। इस हृदयग्राही व्यक्तित्व की छाप इतनी अधिक थी कि वे उन्हें अतिशा मंजूश्री के एक अवतार की तरह पूजते थे। तिब्बत के राजा के द्वारा समर्थन प्राप्त उनके तेरह वर्षों के कार्य के कारण तिब्बत में बौद्ध धर्म, राज-धर्म के रूप में स्थापित हो सका था और पद्मसम्भव द्वारा स्थापित लामाओं के धर्म शासन को पक्का आधार मिला।
जगद्लाः इसकी स्थापना राजा रामपाल द्वारा की गई ऐतिहासिक महाकाव्य रामचरित के अनुसार, बंगाल और मगध के राजा रामपाल, जिन्होंने 1108-1130 ईस्वी के बीच शासन किया, ने वारीन्द्र में गंगा एवं करातोया नदियों के तट पर एक नया शहर रामावती बसाया और शहर में विहारों का निर्माण किया जिसे जगद्ला कहा गया। यह विश्वविद्यालय मुश्किल से सौ वर्ष कार्य कर सका। 1203 ईस्वी में मुस्लिम आक्रांताओं ने इसे नष्ट कर दिया। लेकिन अपने अल्प जीवन काल में इसने अपने विद्वानों की प्रसिद्ध कृतियों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में एक मुख्य योगदान किया। इस छोटे से समय के भीतर विश्वविद्यालय ने विभूतिचंद्र, दनशिला,शुभकारा और मोकसकरागुप्त जैसे कई सुप्रसिद्ध विद्वानों को जन्म दिया, जिनमें से कुछ अच्छे तिब्बती विद्वान भी थे।
ओदन्तपुरीः ओदन्तपुरी विहार (मठ) और विश्वविद्यालय का निर्माण 8वीं शताब्दी के मध्य में पाल वंश के राजा गोपाल ने किया था। इस शिक्षा के केंद्र ने प्रमुख बौद्ध विद्वानों जैसे रत्नाकरसन्ति, दीपांकर, श्रीजन अतिशा, शिला रक्शिता एवं अन्य से सम्बद्ध होने के कारण प्रसिद्धि प्राप्त की। इस विश्वविद्यालय के बारे में बेहद कम ज्ञात है, यद्यपि अभ्यंकरगुप्त के समय यहां पर 1000 बौद्ध भिक्षु रहते थे। ओदन्तपुरी अब अपने प्रसिद्ध विद्वान प्रभाकर के नाम से जागी गई जो बंगाल में छतरपुर से आए थे। यह जाग पड़ता है कि यह विश्वविद्यालय मगध में पाल राजाओं के सत्ता में आने से पूर्व काफी लंबे समय से अस्तित्व में था। इन राजाओं ने इस विश्वविद्यालय का विस्तार वैदिक एवं बौद्ध कार्यों की एक अच्छी पुस्तकालय बनाकर किया। इस विहार को एक माॅडल के तौर पर लिया गया जिस पर आधारित 749 ईस्वी में प्रथम तिब्बती बौद्ध विहार का निर्माण किया गया। इस पहले तिब्बती विहार का निर्माण तिव्बत के राजा खरी-स्रोन-देयू-सान द्वारा अपने गुरू संतारक्शित के परामर्श पर किया गया।
नादियाः भागीरथी और जलांगी के साथ इसके मिलन स्थल पर नादिया की स्थापना की गई। यह एक व्यापार एवं शिक्षा केंद्र था।
बनारसः बनारस हमेशा से पूरे भारत के लिए एक सांस्कृतिक केंद्र बना रहा और यहां तक कि बुद्ध के समय में भी यह संस्कृति केंद्र के तौर पर मौजूद था, इस प्रकार यह स्वाभाविक रूप से बेहद प्राचीन है। यद्यपि यह एक औपचारिक विश्वविद्यालय नहीं था, यह भारत में एक अद्वितीय स्थान है, जिसने सभी युगों में उच्च अध्ययन के लिए एक अत्यधिक उपयुक्त वातावरण प्रदान किया। यहां पर प्रारंभिक समय से ही तक्षशिला से अपनाई गई निर्देश पद्धति को भी पाठ्यक्रम के तौर पर अनुसरण किया गया। बनारस विश्वविद्यालय हिंदू संस्कृति के लिए प्रसिद्ध था। विद्यार्थी के तौर पर शंकराचार्य इस विश्वविद्यालय से परिचित थे। बनारस भारत में एकमात्र ऐसा शहर है जहां हिंदू विचार की प्रत्येक शाखा का प्रतिनिधित्व करने वाले स्कूल हैं। हिदू का प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय का यहां पर तीर्थस्थान है। प्राचीन दिनों में, सारनाथ को बौद्ध शिक्षा के केंद्र के तौर पर मान्यता प्राप्त हुई।
कांचीपुरमः यह दक्षिण भारत में एक अन्य अधिगम केंद्र था। इसे दक्षिण काशी के तौर पर भी जागा जाता है। द्वेनसांग ने 642 ईस्वी में यहां का भ्रमण किया और पाया कि यहां वैष्णव मतावलम्बी,शैव मतावलम्बी, दिगम्बर जैन और महायान बौद्ध एक साथ मिलकर अध्ययन करते थे।
नवद्वीपः यह तुलनात्मक रूप से नूतन काल के सम्बन्ध रखता है और इसकी स्थापना 1063 ईस्वी में बंगाल के सेना नरेश द्वारा की गई थी। यह जल्द ही शिक्षा के महान केंद्र के रूप में उदित हुआ। इसने वेदों एवं वेदांग की शिक्षा प्रदान की। चैतन्य को नवद्वीप संस्थान की उपज माना जाता है। यहां पर 500-600 विद्यार्थी थे, जो बंगाल, असम, नेपाल एवं दक्षिण भारत से आते थे। ए.एचविल्सन ने 1821 ईस्वी में यहां का भ्रमण किया।