राजस्थान में सर्वप्रथम रेल कब और कहां चली | राजस्थान में रेल का सर्वप्रथम प्रचलन कब हुआ first train in rajasthan in hindi

By   January 19, 2021
first train in rajasthan in hindi राजस्थान में रेल का सर्वप्रथम प्रचलन कब हुआ , राजस्थान में सर्वप्रथम रेल कब और कहां चली ?
उत्तर : राजस्थान राज्य में प्रथम रेलगाड़ी 1874 में आगरा फोर्ट से बांदीकुई (जयपुर रियासत) तक चली | अधिक जानकारी के लिए नीचे विस्तार से इसका उत्तर दिया गया है |
प्रश्न : राजस्थान में रेलवे के विकास पर एक टिप्पणी लिखिए। 
उत्तर : ब्रिटिश सरकार के उपक्रम रेलवे से राजस्थान में सर्वप्रथम 1877 में बांदीकुई , अजमेर और नसीराबाद को दिल्ली और आगरा से जोड़ा गया। 1879-86 ईस्वीं में राजपूताना मालवा रेलमार्ग को फुलेरा से कुचामन तक और दूसरा महत्वपूर्ण रेलमार्ग ग्वालियर-धौलपुर-आगरा निर्मित किया। 1899 ईस्वीं में महाराणा मेवाड़ से मिलकर उदयपुर-चित्तोड़ रेलमार्ग और 1909 ईस्वीं में बीना-गुना तथा बारां रेलमार्ग चालू हुआ।
राज्यों की तरफ से जोधपुर ने 1882-85 ईस्वीं में मारवाड़ जंक्शन पाली जोधपुर रेलमार्ग और 1891 तक बीकानेर और 1893 तक मेड़ता से कुचामन रोड तक निर्माण पूरा कर इसे राजपूताना मालवा रेलवे से जोड़ा। एक शाखा लूनी जंक्शन से सिन्ध , हैदराबाद और बीकानेर से भटिंडा तक विस्तारित हुई। जोधपुर रेलवे की लम्बाई 800 मील हो गई। इसी प्रकार बीकानेर में महाराजा गंगासिंह के प्रयासों से 800 मील रेल लाइन का निर्माण हुआ। जयपुर राज्य ने सांगानेर-माधोपुर रेलमार्ग निर्माण (1884-85) कर हाडौती को सांभर से जोड़ दिया। इस प्रकार राजस्थान में स्वतंत्रता पूर्व सभी भागों को ब्रिटिश तथा रियासती प्रयासों से रेलवे से जोड़ दिया गया।
लाभ : रेलों का आवागमन और संचार माध्यमों का विस्तार साम्राज्यवादी हितों को ध्यान में रखकर किया गया था। फिर भी इन रेल लाइनों के फलस्वरूप न केवल भारत वरन राजस्थान के भी विविध नगर , कस्बे और बाजार और मंडियां एक दूसरे से जुड़ गए। जिससे व्यापार वाणिज्य को बढ़ावा मिला , आयात-निर्यात में वृद्धि हुई और रोजगार के अवसर बढे। राजस्थान जैसे अकालग्रस्त क्षेत्रों में बाहर से चारा , अनाज आदि लाना सुगम हो गया। अकाल सूखे की विभिषिका के प्रभाव से बचाव का उपाय सामने आया। राजनितिक लाभ जो भारत को मिले वही राजस्थान में भी दिखाई दिए।
हानि : राज्य सरकारों द्वारा व्यापार पर लगने वाला परिवहन शुल्क व्यापारियों से वसूल किया जाने लगा जिससे व्यापारी नाराज हुए। रेलमार्गों के निर्माण हेतु जो भूमि अधिग्रहण की गयी उससे किसानों को अपनी परम्परागत कृषि भूमि से वंचित होना पड़ा। हजारों किसानों की भूमि रेल लाईनों से दो टुकड़ों से विभाजित हो गयी जिससे सिंचाई , जोत आदि की त्रासदी वे अभी भी झेल रहे है। रेलमार्गों के खुल जाने से बंजारों और गाड़ोलियो का परिवहन , व्यवसाय काफी सिमित हो गया। पुराने व्यापारिक मार्गों पर स्थित व्यापारिक केन्द्रों जैसे पाली , मालपुरा आदि का व्यापार – वाणिज्य ठप्प हो गया। राजस्थान में पूंजी विनियोग के अन्य क्षेत्र उपलब्ध न होने से व्यापारियों का निष्क्रमण आरम्भ हो गया। फलस्वरूप राजस्थान की पूंजी भी अन्य प्रान्तों की तरफ चली गयी।

प्रश्न : राजस्थान के विशेष सन्दर्भ में 1857 की विद्रोह की असफलता के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिये। 

उत्तर : 1. राजा महाराजाओं का अंग्रेजों को भरपूर सहयोग देना – बीकानेर का महाराजा सरदारसिंह गदर में अंग्रेजों को सहायता देने में अग्रणी था। वह राज्य की सेना के 5000 घुड़सवार तथा पैदल सैनिक लेकर पंजाब के हांसी , सिरसा तथा हिसार जिलों में पहुँच गया। राजस्थान के राजाओं में बीकानेर ही अकेला राज्य था। जहाँ का शासक स्वयं अपनी सेना के साथ अंग्रेजों की सहायतार्थ राज्य के बाहर गया। जयपुर के महाराजा रामसिंह ने ग़दर के दौरान अंग्रेजों की तन , मन तथा धन से सहायता की जिसके फलस्वरूप गदर के अंत में अंग्रेज सरकार ने जयपुर को कोटपुतली का परगना स्थायी रूप से दे दिया। अलवर के महाराजा बन्नेसिंह ने आगरा के किले में घिरे हुए अंग्रेजों की स्त्रियों और बच्चों की सहायता के लिए अपनी सेना तथा तोपखाना भेजा। धौलपुर का महाराज राणा भगवन्तसिंह अंग्रेजों का वफादार था। अक्टूबर 1857 में ग्वालियर तथा इंदौर से लगभग 5000 विद्रोही सैनिक धौलपुर राज्य में घुस गए। विद्रोहियों ने दो महीनों तक राज्य पर अपना अधिकार बनाये रखा। दिसंबर में पटियाला की सेना ने धौलपुर पहुँचकर विद्रोहियों का सफाया किया। करौली के महाराव मदनपाल ने ग़दर के दौरान कोटा के महाराव को विद्रोहियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अपनी सेना भेजकर ब्रिटिश सरकार की खैरख्वाही का परिचय दिया। इसके उपलक्ष में करौली जैसी छोटी सी रियासत के राजा को अंग्रेजों ने 17 तोपों की सलामी तथा जी.सी.आई. की उपाधि से विभूषित किया। राजस्थान के अन्य राज्य जैसलमेर , सिरोही , बूंदी , शाहपुरा तथा डूंगरपुर के शासक भी गदर में अंग्रेजों के वफादार रहे। विद्रोह में राजाओं के सहयोग के बारे में लार्ड कैनिंग ने कहा ‘इन्होने तूफान में तरंग अवरोध का कार्य किया , नहीं तो हमारी किश्ती बह जाती। ‘
2. विद्रोह के बारे में जॉन लारेन्स ने कहा कि ‘यदि विद्रोहियों में एक भी योग्य नेता रहा होता तो हम सदा के लिए हार जाते। ‘ अर्थात विद्रोह में कोई भी एक योग्य नेता नहीं था जो इसका सफलतापूर्वक सञ्चालन कर सकता था।
3. क्रांतिकारियों में रणनीति और कूटनीति में दक्ष सेनानायकों का अभाव था।
4. क्रांतिकारियों के पास धन , रसद और हथियारों की कमी थी।
5. क्रांति के प्रमुख केंद्र कुछ ही थे जैसे नसीराबाद , नीमच , कोटा , एरिनपुरा , जोधपुर , धौलपुर आदि। इसके अलावा महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि इन केन्द्रों पर क्रांतिकारियों के मध्य समय अन्तराल अधिक था और इनमें आवश्यक समन्वय का अभाव था जो क्रांति को दबाने के लिए पर्याप्त था।
नसीराबाद के क्रांतिकारी सीधे दिल्ली चले गए। यदि वे दिल्ली न जाकर अजमेर मुख्यालय जाते तथा वहां स्थित शस्त्रागार पर कब्ज़ा कर लेते तो शायद क्रांति का स्वरूप कुछ और ही होता।