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epeirogenic movement in hindi definition निमज्जन , उन्मज्जन महादेशजनक संचलन क्या है ?

भू- संचलन: महादेशजनक एवं पर्वत निर्माणकारी
(EARTH-MOVE,EMTS : EPEIROGENETIC AND OROGENETIC)
पृथ्वी पर भूपटल विविध भूहलचलों, परिवर्तनकारी शक्तियों आदि के द्वारा प्रभावित होता रहता है। एक और भूपटल आतंरिक शक्तियों द्वारा असमतल बना दिया जाता है, तो दूसरी और बाहरी शक्तियों द्वारा समतलीकरण कर विभिन्न भू-आकारों का निर्माण किया जाता है। प्रकृति की कोई वस्तु स्थित नहीं है पृथ्वी पर पाए जाने वाले तत्व ही भूतल को प्रभावित करते है। एक समय वर्तमान हिमालय के स्थान पर इसी टेथीज सागर नामक भू-अभिनति स्थित थी, टेथीज सागर से विभिन्न बलों के प्रभाव से कालांतर में हिमालय पर्वत की रचना हुई। लेकिन अनेक प्रभाव इतने दीर्घकालीन न होकर आकस्मिक भी होते हैं। ज्वालामुखी एवं भूकंप इसी प्रकार के बल हैं। भूसतह पर अनेक परिवर्तन इतनी मन्द गति से होते हैं, जिनका सरलता से आभास नहीं हो पाता है क्योंकि मानव जीवन की अल्प अवधि (अधिकतम लगभग 100 वर्ष मानी जाती है, से कई गुना अधिक होती है।
भूपटल को प्रभावित करने वाले बलों की उत्पत्ति दो प्रकार से मानी जाती है। प्रथम पृथ्वी के आन्तरिक भागों में उत्पन्न शक्तियाँ, तथा द्वितीय बाह्य शक्तियों, जो सूर्यताप के आधार पर वायुमण्डलीय परिवर्तनों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, पृथ्वी के आन्तरिक भागों उत्पन्न होने वाले बल किसी प्रतिबल के कारण पैदा होते हैं। पृथ्वी तल पर विवर्तनीक क्रिया से तनाव, सम्पीडन तथा अपरूपण का आभास होता है।
भूपटल को प्रभावित करने वाले बल
(Forces Affecting the Earth’s crust)
भूपटल को प्रभावित करने में दो प्रमुख बलों का प्रभाव रहता है जो निम्न अनुसार हैः-
(1) अन्तर्जात बल (Endogenetic forces) – पृथ्वी के आन्तरिक भाग में उत्पन्न होने वाले ये बल भूपटल पर विषमता उत्पन्न करते हैं । इनकी उत्पत्ति चट्टानों के प्रसरण तथा सिकुड़न या सम्पीड़न पारणामस्वरूप होती है। इन बलों को निर्माणकारी शक्तियाँ भी कहा जाता है। इनकी उत्पत्ति पृथ्वी के आन्तरिक भाग में होने से प्रत्यक्ष रूप से इनके बारे में पर्याप्त भौगोलिक जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती है। आन्तरिक शक्तियों के रूप में इन बलों की उत्पत्ति उष्ण पृथ्वी के ठण्डे होने से संकुचित होने, परिभ्रमण गति में ह्यस तथा पृथ्वी के आन्तरिक भाग में रेडियोधर्मी पदार्थों के विघटन से उत्पन्न ऊष्मा एवं संवाहनिक धाराओं के कारण मानी जाती है। ये आन्तरिक क्रियाएँ मैग्मा द्वारा संचालित होती है। मैग्मा के साथ गैस ताप आदि भी मिश्रित रहते है, जिनके सामूहिक प्रभाव से मैग्मा पृथ्वी के बाहरी भाग में प्रवाहित होता है। यदि यह मैग्मा अन्य पदार्थों के साथ पृथ्वी की आन्तरिक परतों में जमा हो जाता है. तो इसे अन्तर्वेशन कहते है, जबकि मैग्मा के भूसतह पर जमाव को बहिर्वेधन कहते हैं।
आंतरिक-शक्तियों में भूहलचलों के भूवैज्ञानिको ने चार निम्नलिखित कारण भी स्पष्ट किए है।
(1) ज्वारीय शक्ति (Indal Power)- सूर्य और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण भूपटल में खिंचवा उत्पन्न होता है। पृथ्वी का महाद्वीपीय भाग कम प्रभावित होता है तथा सागरीय जल अधिक प्रभावित होता है क्योंकि यह तरल होता है।
(2) सागरीय तली में प्रसरण का बल- सागरीय कटकों के समीप नवीन महासागरीय धरातल का निर्माण हो रहा है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त से इस तथ्य की पुष्टि हुई है कि अमेरिकन प्लेट के प्रशान्त सागरीय प्लेट की ओर प्रसरण से मध्य अटलांटिक कटक के सहारे नवीन धरातल का निर्माण हो रहा है। इस कारण भूपटल पर भ्रंशन एवं वलन की क्रिया को गति मिलती है।
(3) विवर्तनिक शक्तियाँ (Tectonic Forces)- सम्पूर्ण पृथ्वी 7 बड़ी तथा 14 छोटी भूप्लेटो में विभक्त है। ये प्लेटें गतिशील रहते हुए भूपटल पर.विभिन्न प्रकार के रचनात्मक दिखाती हैं।
(4) गरुत्वीय प्रतिबल (Gravitational Force) – सम्पूर्ण पृथ्वी गुरुत्व बल से सन्तुलित एवं प्रभावित होती है। पृथ्वी तल पर विभिन्न वस्तुएँ आकर्षित रहती है जिनके आकर्षण पृथ्वी के केन्द्र की ओर रहते है इस पद्धति से तनाव व सम्पीड़न की क्रिया को बल मिलता है जिससे स्थलाकृतियाँ बनती है।
महादेशजनक संचलन
(Epeirogenetic Movement)
यह शब्द ग्रीक भाषा के एपीरो (Epeiro) शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है, मुख्य भमि महाद्वीप ळमदमजपब शब्द Genesis से बना है जिसका अर्थ होता है उत्पत्ति। अर्थात् महाद्वीपों की उत्पत्ति से सम्बन्धित बल को महादेशजनक बल कहते हैं। एच. हाउलिंग ने भूपटल पर वलनकारी प्रभावों को इस श्रेणी में सम्मिलित किया है, जिन्हें सूक्ष्म स्तर पर अनुभव करना कठिन कार्य है। अतः स्पष्ट है कि किसी भी विस्तृत क्षेत्र में तनाव एवं सम्पीडन के दौरान चट्टानों के मुड़े अथवा टूटे बिना उत्थान या अवतलन हो, तो इसे महाद्वीपीय रचना सम्बन्धी बल कहते हैं।
महादेशजनक संचलन भूपटल के स्थायित्व में परिलक्षित होता है जिसमें स्थायी कटिबन्धों पर इस संचलनों के प्रभाव से तनाव एवं सम्पीड़न होता है। ये संचलन दिशा के अनुसार दो भागों में प्रभावी रहता है-
(I) अधोगमन अथवा निमज्जन
(II) भूउत्थान अथवा उन्मज्जन
जब महादेशजनक संचलन ऋणात्मक होता है, तो एक बड़ा भू-भाग अवतलित हो जाता है तथा उथला सागर एवं महाद्वीपीय मग्न तट का आविर्भाव होता है. इसके बाद जब धनात्मक संचलन, अथवा उत्थान होता है तो सागर तल पर एक बड़ा अवसादी आवरण उत्पन्न होता है। इस प्रकार जब कोई भूभाग अपने प्रादेशिक विस्तार में समीपवर्ती भूभाग से साव के कारण नीचा हो जाता है. तो इस क्रिया को अधोगमन कहते हैं तथा दूसरी ओर किसी महाद्वीपीय भाग के ऊपर उठने की क्रिया को भ-उत्थान कहते हैं। भारत का गंगा का डेल्टा तथा मुम्बई पाण्डिचेरी के तटीय भागों में ऐसे संचलन हो चके हैं लेकिन इनका प्रभाव महादेशीय न होकर स्थानीय ही माना जाएगा।
पर्वत निर्माणकारी संचलन
(Orogenic Movements)
स्थलाकतियों की रचना की दृष्टि से अन्तर्जात बलों में पर्वत निर्माणकारी संचलन की प्रमुख भूमिका है। पर्वत निर्माणकारी जिसके लिए अग्रेजी भाषा व्तवहमदपब शब्द प्रयुक्त है। यह लेटिन भाषा के व्तवे तथा ळमदमेपे से मिलकर बना है, जिनका अर्थ क्रमशः औरोज (oros)= पर्वत तथा जेनेसिस (Genesis) तथा = उत्पत्ति होता है। पर्वत निर्माण की प्रक्रिया के लिए श्व्तवहमदलश् शब्द गिलबर्ट ने दिया तथा सर्वप्रथम इन्होंने ही भ्रंशोत्थ व वलित पर्वतों के मध्य अन्तर स्पष्ट किया। यह संचलन क्षैतिज रूप में उत्पन्न होता है, जिस कारण इसे स्पर्शीय भी कहते है। यह संचलन दो रूपों में कार्य करता है। जब क्षैतिज बल दो विपरीत दिशाओं से क्रियाशील होता है, तो उससे तनाव उत्पन्न होता है। जिसके परिणामस्वरूप् भ्रंश, दरार तथा चटकन पड़ते है। अतः इस बल को ‘तनावमूलक‘ बल कहते है। पर्वत निर्माण बल को दो भागों में बाटा जाता है।
(1) भ्रंश (Faults) –
अन्तर्जात बलों द्वारा क्षैतिज संचलन के कारण उत्पन्न तनाव तथा कभी-कभी अत्यधिक सम्पीडन के कारण होने वाले चट्टानोंह के स्थानान्तरण को भ्रंशन कहते हैं। वरसेस्टर के अनुसार ‘‘पृथ्वी के एक दरार को भं्रश कहते है, जिसके सहारे एक भाग दूसरे भाग की अपेक्षा सरक जाता है।‘‘ भ्रंशन के निम्नलिखित अंग पाए जाते है। अन्तर्जात बलों द्वारा जिला के कारण होने वाले चट्टानों के स्थाना को अंश कहते हैं, जिसके सहारे एक अंग पाए जाते है।
(अ) भं्रश तल- यह वह सतह है, जिसके सहारे चट्टानों का संचलन होने से स्थानान्तरण होता है। यह लम्बवत् झुका हुआ, वक्राकार तथा क्षेतिज रूप में भी हो सकता है।
(ब) अधः क्षेपित खण्ड- भ्रंश तल के सहारे नीचे धंसा हुआ भाग अधःक्षेपित खण्ड कहलाता है।
(स) आधार भित्ती – भ्रंश तल की निचली दीवार को आधार भित्ति कहते हैं।
(द) भ्रंश नति- भ्रंश तल तथा क्षैतिज तल के मध्य के कोण को भ्रंश नति कहते हैं।
(इ) शीर्ष भित्ति- भ्रंश तल की ऊपरी दीवार को शीर्ष या ऊपरी भित्ति कहते है।
(फ) गिरिपदीय कगार- इनका निर्माण प्रबल भ्रंशन क्रिया के फलस्वरूप होता है।
(ग) भ्रंश कगार – भ्रंश तल द्वारा बनी असमतल रेखा को भ्रंश कगार कहते हैं।
(ह) क्षेपण- भ्रंश प्रक्रिया में चट्टानों के विस्थापन होने से शैल परतों में जो लम्बवत् रूप में परिवर्तन होता है, उसे क्षेपण कहते हैं। यह दो रूपों में होता है। प्रथम भ्रंश का ऊपरी खण्ड होता है जिसे उत्क्षेपण सत्र कहते हैं तथा दूसरा भ्रंश का निचला खण्ड होता है जिसे निम्न क्षेपण क्षेत्र कहते हैं।
(ई) पार्श्वक्षेप- यह वह क्षैतिज दूरी है, जो विस्थापन के कारण विदरित परतों के सिरों के बीच पाया जाता है।
(ज) उत्कोण -भ्रंश तल और लम्बवत् रेखा के मध्य बनने वाले कोण को उत्कोण कहते हैं।
(क) भ्रंश नति लम्ब- नति के साथ समकोण बनाने वाली रेखा को नतिलम्ब कहते है। यह नति के साथ 90° का कोण बनाती है।
भ्रंशों के संचलन की दिशा एवं निर्माणकारी शक्ति में विभिन्नता के आधार पर निम्न रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
भ्रंश के प्रकार (Types of Faults)
होम्स के अनुसार “भ्रंश वह विभंजित भू-सतह है, जिसके विरुद्ध चट्टाने सापेक्ष रूप से ऊपर नीचे हो जाती हैं। ऊपरी उठा हुआ भाग उत्क्षेपित खण्ड (Upthrone side) व नीचे फँसा हुआ भाग अधः क्षेपित (Down throne side) खण्ड कहलाता है। भ्रंशतल के ऊपर खुली दीवार को शीर्ष भिती (Hanging wall) निचले भाग को पाद भित्ती (foot wall) कहते हैं। अंश के फलस्वरूप भूपटल पर निर्मित खड़े ढाल का भ्रंश कगार (Fault scarm) कहते हैं। भ्रंश का विस्तार, प्रभावित भूपृष्ठ तथा चट्टानों का विस्थापन चट्टानों म तनाव की तीव्रता के अनुसार होता है। अतः भ्रंश के कई प्रकार पाये जाते हैं।‘‘
(1) सामान्य भ्रंश (Simple Fault):– इसे गुरुत्व भ्रंश (gravity fault) भी कहा जाता है। जब भ्रंश तल से एक भाग नीचे धंस जाता है तथा भ्रंश नति 450 से 90° के मध्य पायी जाती है तब इसे सामान्य भं्रश कहा जाता है। भ्रश का कारण सामान्य भ्रंश कहा जाता है। भ्रंश के कारण दोनों भूखण्ड विपरीत दिशा में खिसकते हैं व शैलों में प्रसार पाया जाता है।
(2) व्युत्क्रम भ्रंश (Reversed fault)ः- इस प्रकार के भ्रंश में तनाव या संपीड़न के कारण भ्रंश तल से चट्टानें ऊपर की ओर उठ जाती हैं। दोनों भूखण्ड एक दूसरे की ओर खिसकते हैं। इसका मूल कारण संपीड़न होता है अतः इसे संपीड़न भ्रंश (compressional fault) भी कहते हैं।
(3) विदीर्ण भ्रंश (Tear fault)ः- इस प्रकार के भ्रंश में भूखण्ड का स्थानान्तरण क्षैतिज दिशाम होता है। चट्टानों में भ्रंश पड़ने पर भूखण्ड ऊपर-नीचे नहीं खिसकते हैं सिर्फ उसी तल में सरक जात है।
(4) सोपानी भ्रंश (Step fault)ः- जब एक भूभाग में कई स्थानों पर भ्रंश पड़े और भ्रशत (fault plane) एक ही दिशा में ढाल (Dip) प्रस्तुत करे तब योपानी भ्रंश का निर्माण होता है।
(5) घाटी भ्रंश (Rift fault)ः- यदि किसी भू-भाग में कई सामान्य भ्रंश पडे व उनके मध्य भाग फँसकर नीचा हो जाये जिससे घाटी का निर्माण हो तो उसे घाटी भ्रंश कहा जाता है। भ्रंश का निमाण संपीड़न व तनाव दोनों प्रकार से हो सकता है।
(6) क्षेप भ्रंश (Thrust fault)ः- इस प्रकार के भ्रंश में भ्रंश कोण अत्यंत न्यन होता है, परन्तु शिलाखण्ड का स्थानान्तरण (Displacement) पाया जाता है।
(7) सन्धि (Jointing):- स्थानीय तनाव एवं संपीड़न से कई बार चट्टानों में दरार पड़ जाती है पर कोई विस्थापन नहीं होता। इन दरारों को सन्धियाँ कहा जाता है। सन्धियों के कारण चट्टानों की तहें कमजोर पड़ जाती हैं व ऋतु अपक्षय से शीघ्र प्रभावित हो जाती है। प्रायः आग्नेय चट्टानों में इस प्रकार की संधियों पायी जाती है। इनमें सन्धि स्थल (Joint plane) का विस्तार एक दूसरे के सामान्तर पाया जाता है।