ऊर्जा संकट क्या है ? भारत में ऊर्जा संकट के प्रमुख कारण समाधान energy crisis in hindi definition

By   June 25, 2021

energy crisis in hindi definition ऊर्जा संकट क्या है ? भारत में ऊर्जा संकट के प्रमुख कारण समाधान किसे कहते हैं ?

हमारे निर्यात की अपेक्षा बढ़ता गया और व्यापार घाटे में निरंतर वृद्वि होती रही। सन् 2008-2009 में भारत न पेट्रोलियम तथा इसके उत्पादों के आयात पर 419946 करोड़ रुपए खर्च किए। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम की कीमतों में कमी होने के कारण स्थिती में कुछ सुधार हुआ। 1970 के दशक का ऊर्जा संकट मूलत पेट्रोलियम का संकट था, जिसने भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की को प्रभावित किया। इस समय भारत में ऊर्जा संकट के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैंः
i. ऊर्जा संकट का संबंध केवल पेट्रोलियम की मांग एवं आपूर्ति से ही संबंधित नहीं है। ऊर्जा के सभी साधनों ( पेट्रोलियम कोयला, जलविद्युत, नाभिकीय ऊर्जा ) की मांग तेजी बढ़ रही है। भारत में पेट्रोलियम के घरेलू उत्पादन को बढ़ा कर तथा आयात में वृद्धि करके पेट्रोलियम की मांग को पूरा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। परंतु भारत के पास विश्व के केवल 0.3 प्रतिशत पेट्रोलियम के भंडार हैं और घरेलू उत्पादन में अधिक वृद्धि करने की संभावना बहुत कम है। अतः भारत को इस महत्वपूर्ण ऊर्जा-संसाधन की आपूर्ति के लिए आयात पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
ii. काफी समय से कोयला ऊर्जा का महत्वपूर्ण साधन रहा है और औद्योगिक विकास में इस का बहुत बड़ा योगदान रहा है। परंतु कोयले के उत्पादन में वृद्धि के बावजूद भी उद्योगों की बढ़ती हुई मांग को पूरा नहीं किया जा सकता। कोयले की आपूर्ति इसकी मांग से सदा ही कम रही है। इसके अतिरिक्त कोयला भारी एवं कम मूल्य वाला ईंधन है, जिस कारण से अधिक दूरी तक इसका परिवहन करना आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं है। दुर्भाग्य से हमारे कोयला भंडारों का वितरण बहुत ही असमान है। भारत के अधिकांश कोयला भंडार प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पूर्वी भाग में ही मिलते हैं। इसके अतिरिक्त कोयले की मात्रा और इसकी गुणवत्ता भी संतोषजनक नहीं है। हमारे कोयले में सल्फर की मात्रा अधिक होती है, जिस कारण से यह कई उद्योगों के लिए अनुकूल ईंधन नहीं है। भारत का 78% कोयला ताप विद्युत उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाता है।
iii. बिजली की आपूर्ति तथा इसकी मांग में भी खाई दिन-प्रति-दिन चैड़ी होती जाती है। एक अनुमान के अनुसार 2010 में बिजली की उच्चतम मांग (Peak demand) 175,500 मेगावाट होगी. जबकि क्षमता केवल 90,000 मेगावाट की ही है। इस प्रकार 85,000 मेगावाट अर्थात 48 प्रतिशत बिजली की कमी होने का अनुमान है। भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत केवल 631 यूनिट है, जो विश्व की औसत खपत 3000 युनिट से बहुत कम हैं। अनुमान है कि, 2017 में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 1000 यूनिट हो जाएगी। तालिका 2.31 में विद्युत की मांग एवं आपूर्ति को दर्शाया गया है।
पअण् ऊर्जा के लिए गैस की माग तथा आपूत्र्ति में भी अन्तर बढ़ता ही जाता है। गैस की आपूर्ति में निरंतर वृद्धि हो रही है पंरतु गैस की मांग इसको आपूर्ति से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है (तालिका 2.32)। इससे ऊर्जा संकट और भी गहरा गया है।
अण् हमारे देश में परमाणु ऊर्जा का भी महत्व कम है। इसके लिए उच्च कोटि की प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है, जो कुछ ही विकसित देशों में उपलब्ध है। इस समय भारत की केवल 4% ऊर्जा परमाणु शक्ति से प्राप्त होती है, जबकि फ्रांस अपनी कुल शक्ति का तीन-चैथाई भाग परमाणु ऊर्जा से प्राप्त करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका से परमाणु करार के बाद भी भारत में परमाणु ऊर्जा का सहयोग 12-15 प्रतिशत से अधिक होने की संभावना नहीं है।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि भारत के आर्थिक विकास में ऊर्जा संकट एक बहुत बड़ी बाधा है। यह संकट तेल, कोयला, विद्युत, गैस तथा परमाणु ऊर्जा की मांग से कम आपूर्ति के कारण पैदा हुआ है। इससे आर्थिक विकास तो रुकता ही है, साथ में अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और मुद्रास्फीति में भी वृद्धि होती है।