विद्युत जनित्र , electric generator in hindi class 10

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कुंडली-1 से बैटरी को हटाने पर कुंडली-2 में एक क्षणिक विद्युत धारा प्रवाहित होती है, परंतु इसकी दिशा पहले से विपरीत होती है।

निष्कर्ष 

1.कुंडली-1 में विद्युत धारा स्थायी होती है तो कुंडली-2 से संयोजित गैल्वेनोमीटर में कोई विक्षेप नहीं आता है।

2.जब कुंडली-1 में प्रवाहित विद्युत धारा के परिमाण में परिवर्तन होता है (विद्युत धारा आरंभ अथवा समाप्त होती तो कुंडली-2 में एक विभवांतर प्रेरित होता है। जिसके कारण गैल्वेनोमीटर में विक्षेपण आते है।

कुंडली-1 को प्राथमिक कुंडली तथा कुंडली-2 को द्वितीयक कुंडली कहते हैं। प्रथम कुंडली में प्रवाहित विद्युत धारा ले मान में परिवर्तन होने पर इससे संबधित चुंबकीय क्षेत्र भी परिवर्तित होता है। इस प्रकार से द्वितीयक कुंडली के चारों ओर की चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ भी परिवर्तित होती हैं। अतःद्वितीयक कुंडली से संबद्ध चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं में परिवर्तन के कारण इसमें एक विभवान्तर उत्पन्न होता है जिसके कारण इसमें विद्युत धारा उत्पन्न होती है।

वह प्रक्रम जिसके द्वारा किसी चालक में परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण अन्य चालक में विद्युत धारा प्रेरित होती है वैद्युतचुंबकीय प्रेरण कहलाता है।

किसी कुंडली में विद्युत धारा को उत्पन्न या तो उस कुंडली को किसी चुंबकीय क्षेत्र में गति कराकर अथवा उसके चारों ओर के चुंबकीय क्षेत्र को परिवर्तित करके उत्पन्न कर सकते हैं। अधिकांश परिस्थितियों में कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में गति कराकर प्रेरित विद्युत धारा को उत्पन्न करना अधिक सुविधाजनक होता है। जब कुंडली की गति की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लंबवत होती है तब कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा अधिकतम होती है। इस स्थिति में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए हम फ्रलेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम का उपयोग करते है।

इस नियम के अनुसार “दाहिने हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाए कि ये तीनों एक-दूसरे के परस्पर लंबवत हों। यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा की ओर संकेत करती है तथा अँगूठा चालक की गति की दिशा की ओर संकेत करता है तो मध्यमा चालक में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा दर्शाती है।“

विद्युत जनित्र (electric generator in hindi)

वैद्युत चुंबकीय प्रेरण की परिघटना से किसी चालक में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा का परिमाण प्रायः बहुत कम होता है। इस सिद्धांत का उपयोग घरों तथा उधोगो में अत्यधिक परिमाण की विद्युत धारा उत्पन्न करने में किया जाता है। विद्युत जनित्र में यांत्रिक ऊर्जा को विधुत उर्जा में परिवर्तित किया है। विद्युत जनित्र में किसी चालक को चुंबकीय क्षेत्र में घूर्णी गति प्रदान करने पर इस चालक में विद्युत धारा उत्पन्न होती है।

विद्युत जनित्र में एक घूर्णी आयताकार कुंडली ABCD होती है जिसे किसी स्थायी चुंबक के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है। इस आयताकार कुंडली के दो सिरे वलयों R1 तथा R2 से संयोजित होते हैं। दो स्थिर चालक ब्रुशों B1 और B2 को वलयों R1 तथा R2 पर दबाकर रखा जाता है। दोनों वलय R1 तथा R2 भीतर से धुरी से जुड़े होते हैं। चुंबकीय क्षेत्र के भीतर स्थित कुंडली को धुमाने के लिए यांत्रिक उर्जा का उपयोग किया जाता है। कुंडली को घूर्णन गति देने के लिए इसकी धुरी को यांत्रिक रूप से बाहर से घुमाया जाता है। दोनों ब्रुशों के बाहरी सिरे गैल्वेनोमीटर से संयोजित होते हैं ताकि यह बाहरी परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को दर्शा सके।

जब दो वलयों से जुड़ी धुरी को इस प्रकार घुमाया जाता है कि कुंडली की भुजा AB ऊपर की ओर तथा भुजा CD नीचे की ओर, स्थायी चुंबक द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र में गति करती है तो कुंडली स्थायी चुंबक द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती है। यदि इस कुंडली को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाया जाता है तो फ्रलेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम लागू करने पर इन भुजाओं में AB तथा CD दिशाओं के अनुदिश प्रेरित विद्युत धाराएँ प्रवाहित होने लगती हैं। इस प्रकार कुंडली मे प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है। यदि कुंडली में फेरों की संख्या अत्यधिक है तो प्रत्येक फेरे में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा परस्पर मिलकर कुंडली में एक शक्तिशाली विद्युत धारा का निर्माण करती है। अत: बाह्य परिपथ में B2 से B1 की दिशा में विद्युत धारा प्रवाहित होती है।

अर्धघूर्णन के बाद भुजा CD ऊपर की ओर तथा भुजा AB नीचे की ओर जाने लगती है। फलस्वरूप इन दोनों भुजाओं में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है तथा DCBA से नेट विधुत धारा प्रवाहित होती है। बाह्य परिपथ में B2 से B1 की विपरीत दिशा में विधुत धारा प्रवाहित है अतः प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद क्रमिक रूप से इन भुजाओं में विद्युत धारा की ध्रुवता परिवर्तित होती रहती है। ऐसी विद्युत धारा जो समान काल-अंतरालों के बाद अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं। प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न करने की इस युक्ति को प्रत्यावर्ती विद्युत धारा जनित्र कहते हैं।

दिष्ट धारा (अर्थात इसमें समय के साथ दिशा में परिवर्तन नहीं होता) प्राप्त करने के लिए विभक्त वलय प्रकार के दिक़परिवर्तक का उपयोग किया जाता है जो की प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में परिवर्तित कर देता है। एक ब्रुश सदैव ही उस भुजा के संपर्क में रहता है जो चुंबकीय क्षेत्र में ऊपर की ओर गति करती है जबकि दूसरा ब्रुश सदैव नीचे की ओर गति करने वाली भुजा के संपर्क में रहता है। इस प्रकार इस व्यवस्था के साथ एक दिष्ट विद्युत धारा उत्पन्न होती है इस प्रकार के जनित्र को दिष्ट धारा जनित्र कहते हैं।