उत्प्रेरक : उत्प्रेरक का अभिक्रिया के वेग पर प्रभाव (effect of catalyst on reaction rate in hindi)

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(effect of catalyst on reaction rate in hindi) उत्प्रेरक का अभिक्रिया के वेग पर प्रभाव : सबसे पहले बात करते है कि उत्प्रेरक क्या होता है ?

उत्प्रेरक : वह रासायनिक स्पीशीज जो किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को बढ़ा देता है , लेकिन स्वयं अपरिवर्तित रहता है , अर्थात वह पदार्थ जिसकी उपस्थिति से अभिक्रिया का वेग तो बढ़ जाता है लेकिन उत्प्रेरक रासायनिक दृष्टि या संघटन की दृष्टि से खुद अपरिवर्तित रहता है।
अर्थात अभिक्रिया के पूर्ण होने के बाद भी हमें उत्प्रेरक का वही द्रव्यमान प्राप्त होता है जो अभिक्रिया के प्रारंभ में था।
उदाहरण : हाइड्रोजन पेरोक्साइड के विघटन में मैंगनीज (IV) ऑक्साइड, MnO2 को उत्प्रेरक के रूप में काम में लिया जाता है।
ठीक इसी प्रकार
हेबर प्रक्रिया में अमोनिया बनाने के लिए आयरन (लोहे) को उत्प्रेरक के रूप में उपयोग किया जाता है।
रासायनिक बलगतिकी के आधार पर यह माना जाता है कि उत्प्रेरक अभिक्रिया के लिए कम सक्रियण ऊर्जा वाला दूसरा पथ बना देता है जिससे उन कणों की संख्या की सांद्रता बढ़ जाती है जो इस संक्रियण ऊर्जा को पार करके क्रियाकारक से उत्पाद में परिवर्तित हो जाते है।
अर्थात जब उत्प्रेरक द्वारा कम सक्रियण ऊर्जा का मार्ग बन जाता है तो जिन क्रियाकारक के अणुओं की ऊर्जा कम थी वे भी भी सक्रियण ऊर्जा बाधा को पार करके क्रियाकारक से उत्पाद में बदल जाते है अर्थात क्रियाकारक की अधिक सांद्रता क्रियाकारक से क्रियाफल या उत्पाद में बदल जाती है जिससे हम कह सकते है कि अभिक्रिया का वेग पहले की तुलना में बढ़ जाता है।
अर्थात उत्प्रेरक सक्रियण ऊर्जा को घटाकर , अभिक्रिया के वेग को बढाता है , उत्प्रेरक द्वारा सक्रियण ऊर्जा का मान जितना घटाया जाता है उस अभिक्रिया का वेग उतना ही अधिक बढ़ जाता है।
चित्र में दिखाया गया नील रंग द्वारा अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा सामान्य अवस्था में है लेकिन जब इस अभिक्रिया में उत्प्रेरक मिलाया जाता है तो यह कम सक्रियण ऊर्जा का मार्ग तैयार कर देता है जिसे लाल रंग द्वारा दिखाया गया है , चूँकि हम उत्प्रेरक द्वारा कम सक्रियण ऊर्जा का पथ तैयार कर दिया गया है इसलिए हम अधिक क्रियाकारक , उत्पाद में परिवर्तित होने लगेंगे जिससे अभिक्रिया का वेग बढ़ जाता है।
किसी भी अभिक्रिया में उत्प्रेरक की बहुत ही सूक्षम मात्रा ही काफी होती है , अर्थात उत्प्रेरक की सूक्ष्म मात्रा ही अभिक्रिया के वेग को प्रभावित कर देती है।
किसी भी उत्प्रेरक के द्वारा अभिक्रिया की साम्यावस्था को प्रभावित नहीं किया जा सकता है क्यूंकि उत्प्रेरक किसी भी अभिक्रिया को अग्र और प्रतिप दोनों स्थितियों में समान रूप से प्रभावित करता है।