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ecosystem notes class 12 biology pdf chapter 14 in hindi पारितंत्र अध्याय-14 नोट्स कक्षा 12 जीव विज्ञान ?

अध्याय-14 पारितंत्र

 पारितंत्र (Ecosystem)-
वातावरण में विभिन्न प्रकार के जीव पाये जाते है जो वातावरण में रहतेे हुये विभिन्न क्रिया कलाप करते रहते हैं और इस प्रकार वातावरण को प्रभावित करते है वातावरण भी अपना प्रभाव जीवों पर डालना है इस प्रकार जीवों का वातावरण से अटूट पारस्परिक सम्बन्ध है।
समुदाय तथा वातावरण का यह संरचनात्मक तथा क्रियात्मक सम्बन्ध पारितंत्र कहलाता है।
‘‘पारितंत्र वह तंत्र है जो वातावरण के सभी सजीव व निर्जीव घटकों के पारस्परिक सम्बन्धों व क्रिया कलापों द्वारा प्रकट होता है।‘‘
पृथ्वी पर सभी पारितंत्र सम्मिलित रूप जीवमण्डल का निर्माण करता है।
परितंत्र के प्रकार- सामन्यतया प्राकृति होती है।
1. जलीय पारितंत्र- जलीय पारितंत्र दो प्रकार का होता है-
 स्वच्छ जलीय पारितंत्र-
स्वच्छ जल के पारितंत्र में मुख्यतया छोटी नदियों या तालाबों का पारितंत्र आता है।
मुख्य रूप से दो घटकों से मिलकर बनता है-

(a) जैविक घटक-इसके अन्तर्गत सभी जीवित जीव आते है पोषीय स्तर के आधार पर इन्हे निम्न भागोें में बांटा गया है-

(a-I) उत्पादक-
इसके अन्तर्गत स्वपोषी पौधे आते है जो अपना भोजन स्वयं बनाते है उदाहरण पादप प्लवक (Phyhoblankrs) जैसे-डायरयूस, स्पाइरोगाडरा, यूलोथिकस, वैलिसनेरिया जल निग्मन तथा जल के उपर तैरने वाले पौधे जैसे- वोल्फिया निन्फिया तालाब के किनारे के पौधे जैसे रेननफुलस व पालीगोनम आदिं
(a-II) उपभोक्ता-
इसके अन्तर्गत जलीय जन्तु आते है जो अपने भोजन के लिए उत्पादकांे पर निर्भर रहते हैं।
जो निम्न प्रकार के है-

ऽ प्राथमिक उपभोक्ता – जन्तु प्लवक, अमीबा, पैरा मिश्यिम कीट मकौड़े आदि आते है।
ऽ द्वितीयक उपभोक्ता- ये छोटे मांसाहारी जीव जो प्राथमिक उपभोक्ता का भक्षण करते है। जैसे- मेढ़क, छोटी मछलियां, सांप आदि।
ऽ तृतीयक उपभोक्ता- बड़ी मछलियां, पक्षी आदि।
ऽ अपघटक- तालाब के जल एवं तली में बहुत से जीवाणु व कवक आते है जो मृत जीवों के अपघटन से कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ उत्पन्न करते है।

(b) अजैविक घटक (Abiotic Comporent)
इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थो को सम्मिलित किया जाता है जैसे- नाइटोजन, फास्फोरस, कैलिश्यिम, पौटेशियम, सल्फर Co2Z, n, Fe ये पदार्थ जल या मृदा में घुले होते है इसके अतिरिक्त प्रकाश, ताप, वायु भी अजैविक घटक है।

 वन पारितंत्र- इस पारितंत्र में भी जैविक एवं अजैविक घटक पाये जाते है-
i. जैविक घटक- इसके अन्तर्गत, उत्पादक उपभोक्ता व अपघटकर्ता आतें है।
ii. उत्पादक- वन विभिन्नता के वृक्षों, झाड़ियों से सम्मिलित होता जो उत्पादक के कार्य करते है।
iii. उपभोक्ता- इसके अन्तर्गत वनीय जीव आते हैै-
ऽ प्राथमिक उपभोक्ता- हिरन, गाय, बकरी आदि।
ऽ द्वितीयक उपभोक्ता- तेदूूऐं, बाज, चील, सांप आदि।ं
ऽ तृतीय उपभोक्ता- चीता, शेर, अजगर आदि।

(c) अपघटनकर्ता- ये मृत जीवो का अपघटन करते हैं।

 कृत्रिम पारितंत्र- ये मानव द्वारा निर्मित पारितंत्र होता है, जैसे-पार्क, कृषि भूमि, जल जीवशाला आदि।
 पारितंत्र के घटक-
1. अजैविक घटक-
A. अकार्बनिक तत्व- S, N2, C, H2, O2
B. कार्बनिक तत्व- C6H12O6, CH4, C12H22O11
C. जलवायु- प्रकाश, जल, वर्षा, ताप
2. जैविक घटक (Biotic Component)
A. स्वपोषी- में अपना भोजन स्वयं बनाते है, पेड़ पौधे
B. परपोषी- में भोजन के लिए दूसरे जीव पर निर्भर होते है जैसे-शेर, चीता, मानव, गाय, भैंस, बकरी, खरगोश, पक्षी आदि।

 पारितंत्र में उर्जा प्रवाह-
गहरे समुद्र के जलीय पारितंत्र को छोड़कर पृथ्वी पर सभी पारितंत्रों के लिए एक मात्र उर्जा स्त्रोत सूर्य है आपतित सौैर विकिरण का 50 प्रतिशत से भी कम भाग प्रकाश संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण (Photo Syntheticly active radition or PAR) होता है। पौधे केवल दो से 10 प्रतिशत का प्रकाश संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण का प्र्रयोग प्रकाश संश्लेषण में करते है और यही आंशिक मात्रा की उर्जा सम्पूर्ण विश्व का सम्पोषण करती हैं।
पृथ्वी के सभी जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादों पर निर्भर करते हेै सूर्य उत्पादकांे की और फिर उत्पादक से उपभोक्ता की और उर्जा का प्रवाह सदैव एकदिशीय होता है।
खाद्य उर्जा का स्थानान्तरण जीव के पोषीय स्तर से अन्य पोषीय स्तर में अपहरासन एवं भोजन की प्रमुख उर्जा के अंश में उष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है।
लिन्डेमान के अनुसार- केवल 10 प्रतिशत भाग ही भोजन की उर्जा को प्रत्येक पोषी स्तर पर संरक्षित किया जाता इसे लिन्डेमान का 10 प्रतिशत नियम कहते है।
 पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता-
पारिस्थितिक तंत्र की किसी भी पोषी स्तर द्वारा ईकाई क्षेत्रफल व ईकाई समय में कार्बनिक पदार्थो के संश्लेषण की दर को उस पोषी स्तर की उत्पादकता कहते है उत्पादकता तीन प्रकार की होती है।

1. प्राथमिक उत्पादकता-
इनमें हरेे पौधे, पादप प्लवक, जीवाणु इनके द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से सौर उर्जा को कार्बनिक पदार्थो में परिवर्तित करने की दर को प्राथमिक उत्पादकता कहते हैं।
a. सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) Gross Primary Productiving –
प्राथमिक उत्पादकों के द्वारा निश्चित समय व निश्चित क्षेत्रफल में, प्रकाश संश्लेषण द्वारा बनाये कुल कार्बनिक पदार्थो की मात्रा को सकल प्राथमिक उत्पादकता कहते हैं।
इण् शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (Net Primary Pro. NPP) –
उत्पादकों द्वारा प्रकाश संश्लेषण द्वारा बने कार्बनिक पदार्थोे की कुछ मात्रा श्वसन आदि में उपयोग कर लिया जाता है। इसके पश्चात् शेष बचे कार्बनिक पदार्थो को संचित कर लिया जाता है जिसे शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता कहते हैं।
NPP=GPP – Respriation loses
2. द्वितीयक उत्पादकता-
जब उर्जा संचयन की दर को उपभोक्ता स्तर पर मापा जाता है तो इसे द्वितीयक उत्पादकता कहते है। प्राथमिक स्तर पर संश्लेषित कार्बनिक पदार्थो का उपयोग उपभोक्ता कहते है।
3. शुद्ध उत्पादकता-
प्राथमिक उत्पादकों द्वारा संश्लेषित कार्बनिक पदार्थो का उपभोक्ताओं द्वारा उपभोग कर लिए जाने के पश्चात् जो कार्बनिक मात्रा प्राथमिक उत्पादकों शेष बचा रह जाता है जिससे वे उत्पादकों के जैवभार में वृद्धि होती है इसे शुद्ध उत्पादकता कहते है।

 खाद्य श्रृृंखला (Food Chain) –
परितंत्र में पौधों एवं जन्तुओं में होकर उर्जा व खाद्य पदार्थो का परिभ्र्रमण होता रहता है क्योंकि वे परस्पर एक दूसरे के भक्षक व भोज्य के रूप् में सम्बन्धित हुयें एक खाद्य कड़ी बनाते है जिसे खाद्य श्रृंखला कहतें हैं।
खा़द्य श्रृंखला ऐसे विभिन्न प्र्रकार के जीवों की कड़ी है जिनमें जीवों का सम्बन्ध भक्षक तथा भोज्य के रूप में होता है।
खाद्य श्रृंखला तीन प्रकार की होती है।
1. परभक्षक खाद्य श्रृृंखला (Predator food chain)
यह श्रृंखला उत्पादक से प्रारम्भ होकर, प्राथमिक, द्वितीय क एवं तृतीयक उपभोक्ता तक जाती है।
2. परजीवी खाद्य श्रृंखला (Parasitic food chain)
इस प्रकार की खाद्य श्रृृंखला बड़ेे जीवों से छोटे जीवों की और जाती हैं।
3. मृतोपजीवी खाद्य श्रृंखला (Saprophytic Food Chain)
यह खाद्य श्रृंखला मृत अवशेषों से प्रारम्भ होकर सूक्ष्म जीवों तक जाती हैं।
घास स्थल पारितंत्र में खाद्य श्रंृखला
प्ण् घास  बकरी  मनुष्य
प्प्ण् घास  कीट  मेढ़क  सांप  बाज
प्प्प्ण् घास  खरगोश  लोमड़ी  भेड़िया  चीता

किसी भी खाद्य श्रृंखला का प्रारम्भ सदैव उत्पादक से होता है।

 खाद्य जाल (Food Web) –
विभिन्न खाद्य श्रृंखलाएं मिलकर खाद्य जाल बनाती है ऐसा इसलिए होता है क्योकि पारितंत्र का एक उपभोक्ता एक सेे अधिक स्त्रोत पर निर्भर रहता है।
खाद्य जाल में भोज्य का स्थान्तरण बहुदिशीय होता है।

पोषीस्तर उत्पादक (प्रथम पोषी स्तर)

प्राथमिक उपभोक्ता (द्वितीय पोषी स्तर)

द्वितीय उपभोक्ता (तृृतीय पोषी स्तर)
पोषण चक्रण (Nutrient Cycle) –
पारितंत्र में पोषक कभी समाप्त नही होते है ये बार-बार पुनः चक्रित होते है और अन्नत काल तक उपस्थित रहते है।
ऽ पारितंत्र में विभिन्न घटकों के माध्यम से पोषक तत्वों की गतिशीलता का पोषक चक्रण कहा जाता है।
इसे जैव भू रसायन चक्र के नाम से भी जाना जाता है।

पोषण चक्रण के प्रकार- पोषण चक्रण दो प्रकार –
1. गैसीय चक्रण- गैसीय प्रकार के पोषक चक्र ;कार्बन, नाइटोजन आदिद्ध के अधिकतर भण्डार वायुमण्डल में उपस्थित होते हैं।
2. अवसादी चक्रण- सल्फर, फास्फोरस का चक्रण अर्थात जिनके भण्डारण धरती पटल पर होते हैं।

 कार्बन चक्र (Carbon Cycle)  –
ऽ सजीव शरीर के शुष्क भाग का 49 प्रतिशत भाग कार्बन होता है।
ऽ 71 प्रतिशत कार्बन विलेय के रूप में सागटीन जल में विद्यमान है।

कार्बन को जीवों का आधार माना जाता है वायुमण्डल में सम्पूर्ण आयतन का 0.03 प्रतिशत Co2 है कार्बन चक्रण, वायुमण्डलीय, सागर, जीवित या मृत जीवों द्वार सम्पन्न होत है प्रकाश संश्लेषण द्वारा प्रतिवर्ष 41013 C का स्थिरीकरण होता हैं।

 फास्फोरस चक्रण-
फास्फोरस का प्राकृतिक भण्डार चट्टान है।
फास्फोरस जैविक झिल्लियों, न्यूक्लिक अम्लों (DNA – RNA) में पाया जाता है।

पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids) –
एक पारितंत्र में विभिन्न जीवों की उनकी संख्या, जीव भार, संचित उर्जा को आलेखी रूप् से प्रदर्शित करने पर प्राप्त पिरामिड पारिस्थितिक पिरामिड कहलाता है।
ये निम्न तीन प्रकार के होते है-

1. जीव संख्या का पिरामिड-
उत्पादक और प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी केे उपभोक्ताओं की संख्या का सम्बन्ध दिखानें वाले आलेख जीव संख्या का पिरामिड कहलाता है।
सामन्यतया पारितंत्र में उत्पादकों की संख्या सब से अधिक फिर क्रमश प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक उपभोक्ता आते है इसमें सीधा पिरामिड प्राप्त होता है पिरामिड ने आधार पर उत्पादों की संख्या दिखलाई जाती है।
स्थलीय पारितंत्र जीव
जलीय पारितंत्र का संख्या
का पिरामिड
एक अकेले वृृक्ष का पिरामिड उभरा बनता है क्योंकि उत्पादक 1 एवं उपभोक्ता (कीट, चीड़िया, मक्खी, जीवाणु) अधिक होते है।

2. जीव भार का पिरामिड-
एक पारितंत्र में जीवित प्राणियों का प्रति इकाई क्षेत्र में सम्पूर्ण शुष्क भाग अथवा ताजा पदार्थ की मात्रा उसका जीवभार कहलाता है इसके आधार भाग पर उत्पादक शीर्ष पर शीर्ष उपभोक्ता होते हंै। स्थलीय पारितंत्र के लिए जीव भार का पिरामिड सीधा प्राप्त होता है।
इसके विपरीत जलीय पारितंत्र में जीवभार का पिरामिड उल्टा बनता है।
3. उर्जा का पिरामिड-
प्रत्येक पारितंत्र में केवल उत्पादक ही सूर्य की उर्जा को अवशोषित करके अपना भोजन निर्माण करते है खाद्य श्रंृखला में इस उर्जा की मात्रा प्रत्येक स्तर पर क्रमशः घटती जाती है अतः किसी भी पारितंत्र में उत्पादकों में उर्जा सबसे अधिक होते है जिस के कारण उर्जा का पिरामिड सदैव सीधा बनता हैं।

 पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological Sussion) –
एक सुनिश्चित क्षेत्र में प्रजाति संरचना में उचित रूप से आकलित परिवर्तन को पारिस्थितिक अनुक्रमण कहते है। अनुक्रमण के दौरान किसी क्षेत्र में स्थापित होने प्रथम समुदाय को अग्रगामी समुदाय कहते है बाद स्थापित समुदाय चरम समुदाय कहलाता है।

1. प्र्राथमिक अनुक्रमण- यह ऐसे स्थानों पर होता है जहां पहले से कोई जीव उपस्थित नही होता है जैसे नग्न चटृान, ठण्डा लावा।
2. द्वितीयक अनुक्रमण- यह अनुक्रमण वहां होता है जहां पहले से मौजूद समुदाय नष्ट हो जाते एवं इसमें केवल कुछ ही जीव बने रहते है पहले से मौजूद समुदाय प्राकृतिक आपदा के चलतेे नष्ट हो जाता है।

अनुक्रमण का वर्गीकरण- वास स्थान के आधार पर अनुक्रमण निम्न प्रकार के होते हैं-
पण् जल क्रमक- जलीय प्रदेशों जैसे तालाबों झीले आदि में सम्पन्न होने वाले अनुक्रमण को जलक्रमक कहा जाता है।
पपण् शुष्क प्र्रदेशीय अनुक्रमक या मरूकमक- जहां जल की काफी कमी होती है होने वाले अनुक्रमक को मरूक्रमक कहा जाता है ये भी दो प्रकार के होते है-
पण् नग्न चट्टान या शैक्रमक – इस प्रकार का अनुुक्रमक जीव रहित होता है वनस्पति के अभाव में वर्षा नही हो पाती एवं नमी का अभाव होता है।
पपण् बालूक्रमक – मरूस्थलों में होने वाले अनुक्रमक को बालूक्रमक कहतेे है।
पपपण् लवण क्रमक- जब अनुक्रमण ऐसे स्थान पर हो जहां लवण की मात्रा अत्यधिक होते है लवण मृदा क्रमक कहलाते हैं।

 जलक्रमक या तालाब का अनुक्रमण-
जलीय प्रदेशों में सर्वप्रथम पादप प्लवक का समूहीकरण होता हैं। इसके साथ-साथ जन्तु प्लवक का निर्माण भी हो जाता हैै। धीरे-धीरे विभिन्न क्रमकी समुदाय के प्रतिस्थापित होते रहने से एक स्थायी चरम समुदाय का निर्माण हो जाता है। जलक्रमक में निम्न अवस्था आते है-
1. पादपर लवक अवस्था- इस अवस्था में विभिन्न पादप लवक जैसे- नीले हरित शैवाल, हरे शैवाल, डायफ्राम आदि उत्पन्न होते है जोकि अग्रगामी समुदाय का निर्माण करते हैं। इन जीवों के मरने एवं विघटन से कार्बनिक पदार्थ में वृ़ि़द्ध होती है जो नली में पहुंचकर मृदा का निर्माण करती हैं।
2. जड़ित जल निमग्न अवस्था- जलाशयों के तल में लगातार कार्बनिक पदार्थो के जमने एवं भूू-क्षरण से जलाशय के तल में कार्बनिक पदार्थो की मात्रा में वृद्धि होती है इस कीचड़ में जल निमग्न पौधेे जैसे-हाइडिला, वैलिसनेरिया, युद्रीकुेरिया आदि उत्पन्न हो जाते है इन पौधांे एवं संलग्न जन्तुओं के विघटन से कार्बनिक पदार्थो की मात्रा से जलाशय छिछत्वा होता जाता है और पानी में कमी आती हैं।
3. मूल आरोपित प्लावी अवस्था- इस अवस्था में कमल सिंघाड़ा, निम्फिया आदि पौधे आरोपित हो जाते है जिनके जड़ कीचड़ में किन्तु परती जल की सतह पर होती हैं।
4. दलदली अवस्था/उभयचर अवस्था- इस अवस्था में ऐसे पौधे आते है जिनके जड़ तो कीचड़ में किन्तु तना हवा में होते है ये सैजेटेरिया, टाइफा जैसे पौधे वाष्पोत्सर्जन क्रिया के कारण जलपूर्णतया कम हो जाता है फलस्वरूप अनुक्रमण भी अगली अवस्था का आगमन होता हैं।
5. दलदली घास अवस्था-जल के स्तर में लगातार कमी के कारण जलाशय दलदली अवस्था में हो जाते है इस क्षेत्र में मोथा कुल एवं घास कुल के पौधेे जैसे – कैरेक्स, साइपेट्स आदि उग आते है इनके बाद पोंलीगोनम, डाइकैन्थीयम जैसे पौधों उगते हैं।
6. वनस्थली अवस्था- इस अवस्था मेें झाड़ियों वाले पौधें जैसे- कार्नस, सैलिक्स, डाॅगवुड़स उगते है।
7. चरम समुदाय- जैसे – जैसे खनिज तत्वों एवं जीवाणुओं में वृद्धि होती है वैसे-वैसे विभिन्न प्रकार के वृक्ष एवं पेड़-पौधों उत्पन्न हो जाते है चरम अवस्था में जलाशय पूर्णतया वन में परिवर्तित हो जाता है।

 खाली चट्टानों मेें होने वाला अनुक्रमण/मरूक्रमक-
यह अत्यधिक जल कमी वाले या शुष्क स्थान पर होने वाला अनुक्रमक है जैसे- नग्न चट्टान, मरूस्थलों व पवन वहित रेत आदि में इनकी अवस्थाएं निम्न हैै-
1. क्रस्टोज लाइकेन अवस्था- वर्षा या भारी ओस के तुरन्त बाद नवीन समुुदाय केे रूप में लाइकेन के प्रजनन सम्बन्धी अंग हवा से उड़कर भीगी चट्टानों की सतह पर आते है जो की पोषक तत्वांे के अभाव में भी वृृद्धि करने में सक्षम होते है इनसे चट्टानों का अपक्षय होता है जिससे मृदा की पतली परत का निर्माण होता है।
क्रस्टोज लाइकेन- राइजोकार्पन , रीनोडिना व ग्राॅफिस।
2. फोलियोज लाइकेन अवस्था- ये बड़ी एवं चपटी पत्ती वाले फोलियोज लाइकेन प्रकट होते है इसमें परमेलिया एवं डर्मेटोकार्पन आते है इनके कारण अपक्षय अधिक होता है जिससे मृदा की मोटी परत का निर्माण होता है।
3. माॅस अवस्था- मिट्टी की परत बन जाने से माॅस जैसे- पालीटाइकम, ग्रिमिया आदि वहां उग आते है ये बड़े आकार एवं समूह में होते है ये मूलाभास युक्त होते है इनके आ जाने के कारण लाइकेन समाप्त हो जाता है इनके विघटन से अधिक कार्बनिक पदार्थ कर स्त्रावण होता है जिससे नई अवस्था प्रकट होता हैं।
4. शाकीय अवस्था- मृदा की मोटी परत बन जाने केे कारण वर्षा के कारण नमी से एकवर्षीय घास एवं कुछ बड़े शाकीय पौधे जैसे-पोेआ, आरिस्टिडा, ट्ल्यूसिन उग आते हैं।
जो चट्टान को लगभग मृदा में परिवर्तित कर देता हैं।
5. झाड़ी अवस्था- शाकीय अवस्था के बाद झाड़ी जिजाइफस व कैपेरिस के उग जाने से चट्टान पूरी तरह मृदा में परिवर्तित हो जाता है।
6. चरम अवस्था- मरूद्भिद् पौधे के आगमन से झाड़िया संगत हो जाती है जिससे धीरे-धीरे वन का निर्माण हो जाते हैं।