डिंगल और पिंगल में क्या अंतर है | डिंगल और पिंगल भाषा क्या है dingal and pingal in hindi language

By   February 20, 2021

dingal and pingal in hindi language डिंगल और पिंगल में क्या अंतर है | डिंगल और पिंगल भाषा क्या है ?

प्रश्न: डिंगल 
उत्तर: पश्चिमी राजस्थानी भाषा का वह साहित्यिक रूप जो गुजराती से साम्यता रखता है एवं जिसे चारणों द्वारा साहित्यिक लेखन में काम लिया गया, डिंगल के रूप में जाना जाता है। इसे मरु भाषा भी कहते हैं।
प्रश्न: पिंगल
उत्तर: पूर्वी राजस्थानी भाषा का वह साहित्यिक रूप जो ब्रज भाषा से प्रभावित है तथा जो भाटों द्वारा साहित्य लेखन में काम ली गई, पिंगल के रूप में मानी जाती है।

प्रश्न: राजस्थान के प्रमुख लोक गीतों के प्रकार एवं विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: किसी विशिष्ट क्षेत्र के जनमानस के स्वाभाविक उद्गारों का प्रस्फुटन जिसमें उल्लास, प्रेम, करुणा, दुरूख की अभिव्यक्ति होती है लोक गीत कहे जाते हैं।
विशिष्टताएं
लोक गीतों में भाषा की अपेक्षा भाव का अधिक महत्त्वपूर्ण होना। रचयिता के बारे में पता न होना तथा मौखिक होने पर भी लयबद्ध होना प्रमुख विशेषताएं हैं। लोक गीतों में लोक संस्कृति रहन – सहन तथा मानवीय भावनाओं का सजीव वर्णन होता है। इनका जीवन के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्ध होता है। ये संस्कृति को साकार करते हैं तथा परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाये रखते हैं।
लोकगीतों के प्रकार
राजस्थान में लोकगीतों की धारा सदियों में से तीन कोटियो में प्रवाहमान रही है।
प्रथम कोटि में जनसाधारण के गीत रखे जा सकते हैं जिनमें सर्वाधिक संख्या संस्कारों. त्यौहारों व पर्वो से सम्बन्धित गीतों का है। इनमें वैवाहिक आयोजन में बधावा, रातिजगा, जला, त्यौहारों में गणगौर, होली, तीज तथा लोक देवताओं से सम्बन्धित गीत सभी जगह गाये जाते हैं। दूसरी कोटि में व्यावसायिक जातियों के गीतों में मॉड, देस, सोरट, मारू, परज. कालिगडा आदि है जिन्हें ढोली, मिरासी, लंगा, ढाढी, कलावन्त, सरगडा आदि गाते हैं ये अपनी गायन शैली, स्वर माधर्य का विशिष्टता के कारण पृथक पहचान रखते हैं। तृतीय कोटि में क्षेत्रीय रंग प्रधान गीत आते हैं जिनमें मरूप्रदेशीय गीत अधिक आकर्षक व मधुर होते हैं। उन्मुक्त क्षेत्र के कारण यहाँ के लोक गीत ऊंचे स्वरों व लम्बी धुन वाले होते हैं। कुरजा, पीपली, रतन राणों, मूमल, घूघरी, केवडा आदि यहाँ के प्रसिद्ध लोक गीत हैं। पर्वतीय क्षेत्रों के गीतों में बीछियों, पटेल्यों, लालर आदि लोकगीत जनजातियों द्वारा गाये जाते हैं। मैदानी क्षेत्र के गीता में लांगुरिया, चिरमी, बिच्छू आदि जो राज्य के पूर्वांचल में गाये जाते हैं इनमें स्वरों का उतार-चढ़ाव अधिक मिलता है। यहाँ भक्ति व श्रृंगार रसों के गीतों का आधिक्य हैं जो सामूहिक रूप से गाये जाते हैं। इस प्रकार लोक गीतों की दृष्टि से राजस्थान देश का सम्पन्न क्षेत्र है लोक गीतों में हमारी संस्कृति का साकार रूप समाया हुआ है और ये हमारे जीवन के विविध पहलुओं सहित हमारे वास्तविक इतिहास का अक्षुण्ण रखे हुए हैं। हमारे साहित्य को समृद्ध करने में विशेष भूमिका लोक गीतों की रही है। जनजातियों, आदिवासियों, घुमन्तु जातियों, पशुपालकों एवं चरवाहों की समृद्ध संस्कृति का ज्ञान हमें लोक गीतों से ही होता है। महात्मा गांधी के शब्दों में श्लोक गीत ही जनता की भाषा है लोक गीत ही हमारी संस्कृति के पहरेदार हैं।
प्रश्न: राजस्थान के प्रमुख लोक नृत्यों एवं उनकी विशिष्टताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर: किसी क्षेत्र विशेष में लोगों द्वारा सामूहिक रूप में लोक गीतों को लोकवाद्यों की संगति से लयबद्ध रूप से गीतों के भावों को आनंद व उमंग भरकर नृत्य द्वारा साकार करना लोक नृत्य कहलाता है।
प्रकार/वर्गीकरण
राजस्थान के लोक नृत्यों को शैली एवं उसकी विशिष्टता के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है-
1. क्षेत्रीय लोक नृत्य
राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे लोकनृत्य विकसित हुए जो उस क्षेत्र की पहचान बन गए अथवा उन नृत्यों से क्षेत्र विशेष को पहचाना जाता है। ऐसे क्षेत्रीय लोक नृत्यों में मेवाड़-बाड़मेर का गैर नृत्य बड़ा प्रसिद्ध है जो लकड़ी की छड़ियां लेकर गोल घेरो में बांकियां, ढोल व थाली वाद्य यंत्रों के साथ पुरुष सामूहिक रूप से करते हैं। इसी प्रकार शेखावाटी के कच्छी घोड़ी, चंग नृत्य व गीदड़ नृत्य, मारवाड़ का डांडिया, जालौर का ढोल नृत्य जसनाथियों का अग्नि नृत्य, अलवर – भरतपुर का बम नृत्य आदि बड़े प्रसिद्ध हैं।
2. लोक नृत्यों को तीन उपवर्गों में बांट सकते हैं –
आदिवासियों के लोकनृत्य – इनमें भीलों का गवरी नृत्य नाट्य अपनी रोचकता के लिए प्रसिद्ध है तथा इनके अतिरिक्त घूमर, घेर, युद्ध नृत्य भी है। गिरासियों का ‘वालर‘ नृत्य जो स्त्री-पुरुषों द्वारा सामूहिक रूप से बिना वाद्य यंत्र के किया जाता है बड़ा प्रसिद्ध नृत्य है। इनके कूद नृत्य, घूमर नृत्य, मांदन नृत्य आदि अन्य प्रसिद्ध नृत्य हैं।
घूमन्तु जातियों में कंजरों का चकरी, कालबेलियों का इण्डोणी, पणिहारी, शंकरिया, बणजारों, सांसियों एवं गाडीवान लुहारों के गीत भी बड़े मनमोहक होते हैं इनके अलावा गूजरों का चरी नृत्य, मीणों का ढोल तथा अहीरों का बम नृत्य प्रसिद्ध है।
व्यावसायिक लोक नृत्य – लोक कला का प्रदर्शन जब जीविका कमाने का साधन बनाया गया तो वह व्यावसायिक (पेशेवर) नृत्य कहलाया। इस श्रृंखला में भवाई, तेरहताली, कच्छीघोड़ी नृत्य राजस्थान के प्रसिद्ध व प्रचलित व्यावसायिक लोकनृत्यों में आते हैं। ।
विशेषताएं/महत्व
लोक नृत्य किसी नियत से बन्धे नहीं होते और न ही निर्धारित मुद्राएं तथा अंगों का निश्चित परिचालन होता है। फिर भी इनमें लय, ताल, गीत, सुर आदि का सुन्दर एवं संतुलित सामंजस्य मिलता है। जनसाधारण व आदिवासियों के लिए इनका महत्व मनोरंजन तथा जीवन के अस्तित्व के लिए है। इनसे यहाँ के विभिन्न वर्गों, समुदायों के रीति-रिवाजों, मान्यताओं, परम्पराओं आदि का ज्ञान होता है और वे न केवल जीवित है बल्कि सुरक्षित भी है इन लोक नृत्यों में संघर्षों का प्रस्तुतिकरण प्रायः मिलता है जिनसे यहाँ के लोगों का जुझारूपन दिखाई देता है। राजस्थान लोक नृत्यों में काफी समृद्ध है और साथ ही हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं व सामाजिक जुड़ाव तथा संस्कारों को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।
4.
राजस्थानी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ एवं राजस्थान की बोलियाँ
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
राजस्थान की बोलियां
प्रश्न: मारवाडी
उत्तर: पश्चिमी राजस्थानी भाषा की प्रधान बोली मारवाड़ी है जो प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बोली है। मेवाड़ी, शेखावाटी, बागड़ी आदि इसकी प्रमुख उप बोलियाँ हैं। मारवाड़ी साहित्य अत्यन्त समृद्ध है।
प्रश्न: मेवाड़ी
उत्तर: उदयपुर व उसके आसपास का क्षेत्र मेवाड़ एवं वहाँ प्रयुक्त बोली मेवाड़ी कहलाती है जो मारवाड़ी की उप बोली है। विशुद्ध मेवाड़ी वहाँ के लोक साहित्य में मिलती है।
प्रश्न: बागड़ी [RAS Main’s 2000, 2012]
उत्तर: डूंगरपुर व बाँसवाड़ा का सम्मिलित क्षेत्र ‘बागड‘ एवं यहाँ प्रयुक्त बोली बागड़ी है जो मारवाड़ी की उप बोली है इस पर गुजराती का अधिक प्रभाव है। ग्रियर्सन इसे ‘भीली‘ कहते हैं।
प्रश्न: मेवाती [RAS Main’s 1994]
उत्तर: अलवर, भरतपुर व गुडगाँव क्षेत्र को मेवात एवं यहाँ प्रयुक्त बोली को मेवाती कहते हैं जो पूर्वी राजस्थान की प्रधान बोली है। राठी, मेहण, काठोर आदि इसकी उप बोलियाँ हैं।
प्रश्न: राँगड़ी [RAS Main’s 2007]

पर मालवा क्षेत्र में राजपूतों में प्रचलित मारवाड़ी और मेवाती के सम्मिश्रण से उत्पन्न बोली के विशिष्ट रूप को संगती वा जाता है। यह थोडी कर्कश है।