व्यक्ति की गरिमा का अर्थ क्या है ? | मनुष्य की की गरिमा को परिभाषित कीजिए ? dignity of human person definition in hindi

By   November 19, 2021

dignity of human person definition in hindi व्यक्ति की गरिमा का अर्थ क्या है ? | मनुष्य की की गरिमा को परिभाषित कीजिए ?

स्वतंत्रता
‘लिबर्टी (स्वतंत्रता)‘ शब्द लैटिन शब्द ‘लिबर‘ से निकला है। इसका शाब्दिक अर्थ होगा बंधनमुक्ति, कारामुक्ति, दासता-मुक्ति, कृषि-दासता से मुक्ति या निरकुशता से मुक्ति । उदार पश्चिमी परंपराओ की कल्पना के अनुसार तथा अहस्तक्षेप के सिद्धांतों के संदर्भ मे स्वतत्रता अधिकाशतया एक नकारात्मक सकल्पना है। इसका अर्थ है व्यापार तथा उद्यम की स्वतत्रता पर, व्यापार तथा कारोबार मे अवसर की समानता पर, संविदा तथा प्रतियोगिता की स्वतत्रता पर नियत्रण का न होना। स्वतत्रता की कल्पना इस प्रकार की गई थी कि उसमें व्यक्ति की कार्य-स्वतंत्रता में सरकार का हस्तक्षेप न हो। कितु, हमारे संविधान की उद्देशिका मे स्वतंत्रता का अर्थ केवल नियत्रण या आधिपत्य का अभाव ही नहीं है। यह ‘‘विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतत्रता‘‘ के अधिकार की सकारात्मक संकल्पना है। इसमे उन विभिन्न स्वतत्रताओं का समावेश है जिन्होंने बाद मे संविधान के मूल अधिकारों वाले भाग मे मूर्त रूप लिया तथा जिन्हे व्यक्ति और राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक समझा गया। मिसाल के लिए, अनुच्छेद 19 मे भाषण तथा अभिव्यक्ति आदि की स्वतत्रता के अधिकारों की रक्षा की गारटी दी गई है और अनुच्छेद 25-28 में विश्वास, धर्म और उपासना समेत धर्म की स्वतत्रता का अधिकार समाविष्ट है। इस सकारात्मक अर्थबोध मे स्वतत्रता का अर्थ होगा किसी व्यक्ति की अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की स्वतत्रता। किंतु, ‘स्वतत्रता‘ तथा ‘स्वेच्छाचार‘ (लाइसेंस) का अतर स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। विचार, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता का, जिस रूप में उसकी व्याख्या संविधान के मूल अधिकारों वाले भाग में की गई है, विनियमन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे राज्य, लोक हित आदि की सुरक्षा खतरे में न पड़ जाए।
समानता
फ्रासीसी क्राति के नेताओं का विश्वास था कि कानून की नजर में सभी व्यक्ति समान हैं। कानून चाहे किसी को बचाता है या सजा देता है, ऐसा उसे जन्म आदि के विभेद का लिहाज किए बिना ही करना चाहिए। इसके अलावा, सभी नागरिक केवल अपनी क्षमता, गुण और प्रतिभा के अनुसार सभी लोक पद, सम्मान और स्थान प्राप्त करने के लिए समान रूप से पात्र है।
राजनीतिविज्ञान के संदर्भ में ‘समानता‘ का अर्थ यह नहीं है कि सभी पुरुष (तथा स्त्रिया) सभी परिस्थितियों में बराबर है। उनके बीच शारीरिक, मानसिक और आर्थिक अतर तो होंगे ही। हमारी उद्देशिका में केवल प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता की सकल्पना का समावेश किया गया है। इसके कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पहलू है। सभी नागरिक विधि की नजर में बराबर है और उन्हें देश की विधियों का समान रूप से सरक्षण प्राप्त है। सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश तथा लोक नियोजन के विषय में धर्म, मूलवंश, जाति, स्त्री-पुरुष या जन्मस्थान के आधार पर एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच कोई विभेद नहीं हो सकता। सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मतदान करने तथा शासन की प्रक्रिया में भाग लेने के राजनीतिक अधिकारो को प्राप्त करने का बराबर का हक है। आर्थिक क्षेत्र में समानता का अर्थ यह है कि एक-सी योग्यता तथा एक-से श्रम के लिए वेतन भी एक-सा होगा। इसके अलावा, एक व्यक्ति या एक वर्ग अन्य व्यक्तियों या वर्गों का शोषण नहीं करेगा। प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता की सकल्पना को अनुच्छेद 14 से 18 में ठोस आकार तथा रूप दिया गया है।
बंधुता
न्याय, स्वतंत्रता और समानता के आदर्श तभी तक प्रासंगिक तथा सार्थक होते है जब तक वे भाईचारे की, भारतीय बधुत्व की, एक ही भारतमाता के सपूत होने की सर्वसाझी भावना को बढ़ावा देते हैं और इसमें जातीय, भाषाई, धार्मिक और अन्य अनेक प्रकार की विविधताएं आडे नहीं आतीं। सर्वसामान्य नागरिकता से संबधित उपबंधों का उद्देश्य भारतीय बंधुत्व की भावना को मजबूत करना तथा एक सुदृढ़ भारतीय भाईचारे का निर्माण करना है। सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मूल अधिकारों की जो गारंटी दी गई है और सामाजिक तथा आर्थिक समानता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जो निदेशक सिद्धांत बनाए गए हैं, उनका उद्देश्य भी बंधुता को बढ़ावा देना है। इस संकल्पना को संविधान के नये भाग 4 (क) में विशिष्ट रूप से स्पष्ट किया गया है और उसमें नागरिकों के मूल कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को, अन्य बातों के साथ साथ, यह कर्तव्य भी सौंपा गया है कि वे सभी धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या वर्गगत विविधताओं को लांघकर भारत के सभी लोगो मे समरसता और सर्वसामान्य भाईचारे की तथा एक भारतीय परिवार से सबंध रखने की भावना को बढ़ावा दे। वास्तव मे, बधुता की सकल्पना पंथनिरपेक्षता की संकल्पना से कहीं अधिक व्यापक है। यह धर्म तथा राजनीति के पृथक्करण, धर्म की स्वतत्रता, सभी धर्मों के प्रति समान आदर आदि से कहीं आगे जाती है। दुर्भाग्यवश, न्यायविदो तथा न्यायाधीशों ने इस सकल्पना को पर्याप्त महत्व नहीं दिया है। बंधुता के सिद्धात को मान्यता देने की जरूरत के विषय मे बोलते हुए डा. अबेडकर ने संविधान सभा में कहा था:
बधुता का अर्थ क्या है? बधुता का अर्थ है सभी भारतीयो के सर्वसामान्य भाईचारे की, सभी भारतीयो के एक होने की भावना। यही सिद्धात सामाजिक जीवन को एकता तथा अखडता प्रदान करता है। इसे प्राप्त करना कठिन है।
बधुता का एक अतर्राष्ट्रीय पक्ष भी है जो हमे विश्व-वधुत्व की सकल्पना ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘-अर्थात समूचा विश्व एक परिवार है-के प्राचीन भारतीय आदर्श की ओर ले जाता है। इसे संविधान के अनुच्छेद 51 मे निदेशक सिद्धातो के अतर्गत स्पष्ट किया गया है।
व्यक्ति की गरिमा
बधुता से व्यक्ति की गरिमा को सुरक्षित रखने तथा बढ़ावा देने की आशा की जाती है। संविधान निर्माताओ के मन मे व्यक्ति की गरिमा सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि स्वतंत्रता, समानता आदि के मूल अधिकारों की गारटी करके तथा निदेशक तत्वों के रूप में राज्य का ये दिशानिर्देश जारी करके कि वह अपनी नीतियों को इस प्रकार ढाले कि सभी नागरिको को, अन्य बातो के साथ साथ, जीविका के पर्याप्त साधन, काम की न्यायसंगत तथा मानवोचित दशाएं और एक समुचित जीवन-स्तर उपलब्ध कराया जा सके, व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जाए। अनुच्छेद 17 में दिए गए मूल अधिकार का उद्देश्य अस्पृश्यता के आचरण का अत करना था, जो मनुष्य की गरिमा का एक अपमान था। अनुच्छेद 32 में ऐसा उपबंध किया गया कि कोई व्यक्ति अपने मूल अधिकारों के प्रवर्तन तथा अपनी व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय के पास भी जा सकता है।
राष्ट्र की एकता तथा अखंडता
व्यक्ति की गरिमा को तभी सुरक्षित रखा जा सकता है जब राष्ट्र का निर्माण हो तथा इसकी एकता और अखंडता सुरक्षित रहे। सर्वसामान्य भाईचारे तथा बंधुत्व की भावना के द्वारा ही हम अत्यधिक बहुवादी तथा पंचमेल समाज में राष्ट्रीय एकता का निर्माण करने की आशा कर सकते है। इसके अलावा, राष्ट्र की एकता तथा अखंडता के बिना, हम अपने आर्थिक विकास के प्रयासो मे सफल नहीं हो सकते और न ही हम लोकतत्र या देश की स्वाधीनता तथा देशवासियो के सम्मान की रक्षा करने की आशा कर सकते है। इसलिए, अनुच्छेद-51 (क) के अतर्गत सभी नागरिको का यह कर्तव्य बना दिया गया है कि वे भारत की सप्रभुता, एकता और अखडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे। कम-से-कम ऐसे मामलो मे, जो राष्ट्र की एकता तथा अखडता के लिए खतरा बन सकते हों, सभी नागरिकों में यह आशा की जाती है कि वे सभी भेदभावों को भुलाकर तथा अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर उनका मुकाबला करेंगे। यदि ऐसा नहीं होता तो राष्ट्र-निर्माण का कार्य असंभव हो जाता है।
निष्कर्ष
उद्देशिका मे समाविष्ट विभिन्न सकल्पनाओ तथा शब्दो से पता चलता है कि हमारी उद्देशिका के उदात्त और गरिमामय शब्द भारत के समूचे सविधान के साराश, दर्शन, आदर्शों और उसकी आत्मा का निरूपण करते है। संविधान के अन्य भाग तथा उपबंध उद्देशिका के शब्दो की एक व्याख्या तथा उन्हे ठोस रूप, विचार-तत्व और अर्थ प्रदान करने का एक प्रयास मात्र है। इसमे कोई अचभे की बात नहीं कि उच्चतम न्यायालय ने पाया कि उद्देशिका मे सविधान की कुछ ऐसी बुनियादी विशेषताए अंतर्निहित है जिन्हे अनुच्छेद 368 के अधीन सविधान के किसी सशोधन द्वारा भी बदला नही जा सकता।
किंतु यह लगता है कि उद्देशिका में प्रयोग में लाए गए ‘समाजवादी‘, ‘पथनिरपेक्ष‘ आटि शब्द बहुत ही अस्पष्ट है और सविधान में उनकी सही सही परिभाषा न होने के कारण हमारी राज्य व्यवस्था को काफी दिक्कतो का सामना करना पड़ा है। इसलिए उचित यही है कि एक संविधान सशोधन के द्वारा उनकी परिभाषा कर दी जाए।