दलित साहित्य का उद्भव एवं विकास , दलित साहित्य की विशेषता क्या है अवधारणा Dalit literature in hindi

By   June 22, 2021

Dalit literature in hindi दलित साहित्य का उद्भव एवं विकास , दलित साहित्य की विशेषता क्या है अवधारणा ?

दलित साहित्य
आधुनिकतावाद युग के बाद की स्थिति की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता परित्यक्तों द्वारा रचित साहित्य का एक प्रमुख साहित्यिक ताकत के रूप में आविर्भाव होना है। दलित शब्द का अर्थ है पददलित। सामाजिक दृष्टि से शाषित व्यक्तियों से जुड़ा साहित्य और अल्पविकसित व्यक्तियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का समर्थन करने वाला साहित्य इस नाम से जाना जाता है। साहित्य में दलित आन्दोलन डॉ. बी आर अम्बेडकर के नेतृत्व में मराठी, गुजराती और कन्नड़ लेखकों ने प्रारम्भ किया था। यह प्रगतिशील साहित्य के पददलितों के निकट आने के परिणामस्वरूप प्रकाश में आया। यह ब्राह्मणीय मूल्यों का समर्थन करने वाले ऊंची जाति के साहित्य का विरोध करने के लिए लडाकू साहित्य है। मराठी कवि नामदेव ढसाल या नारायण सुर्वे अथवा दया पवार या लक्ष्मण गायकवाड़ जैसे उपन्यासकारों ने अपने लेखन में एक समुदाय की वेदना को दर्शाया है और समाज में पददलितों और परित्यक्तों के लिए एक न्यायसंगत तथा यथार्थवादी भविष्य का आकार देने की मांग की है। महादेव देवनूर (कन्नड) और जोसफ मैक्वान (गुजराती) ने अपने उपन्यासों में हिसा, विरोध तथा शोषण के अनुभव के बारे में बताया है। यह विद्यमान साहित्यिक सिद्धांतों, भाव और प्रसंग को चुनौती देता और एक साहित्यिक आन्दोलन की समस्त प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण करता है। यह एक वैकल्पिक सौन्दर्यशास्त्र का सृजन करता है और साहित्य की भाषायी तथा सामान्य संभावनाओं का विस्तार करता है, दलित साहित्य, साहित्य में अनुभव की एक नई दुनिया से परिचय कराता है, अभिव्यक्ति की श्रृंखला का विस्तार करता है और परित्यक्तों तथा पद-दलित दलितों की भाषाई अंतःशक्ति का उपयोग करता है।
पौराणिकता का प्रयोग
शहरी और ग्रामीण जानकारी के बीच अतीत और वर्तमान के बीच की खाई को पाटने के लिए आधुनिक कविता के बाद के दृश्य में जो एक अन्य प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है वह आधुनिक दशा को प्रस्तुत करने के लिए पौराणिकता का प्रयोग करना है। वास्तव में पौराणिक विचार निरन्तरता और परिवर्तन के बीच की खाई को बांटने का प्रयास हैं और इस प्रकार से ‘समग्र साहित्य‘ के विचार का प्रामाणीकरण किया जाता हैं। समान पौराणिक स्थितियों का प्रयोग करके आज की उस अवस्थिति को एक व्यापक आयाम प्रदान किया जाता है जिसमें आज का मानव रह रहा है। पौराणिक अतीत मनुष्य के ज्ञानातीत से संबंध की पुष्टि करता है। यह एक मूल्य संरचना है। वह वर्तमान के लिए अतीत की पुनः खोज करता और भावष्य के लिए एक अनुकूलन है। अज्ञेय (हिन्दी) के काव्य में हम इस अनुभूति के संबंध में एक बदलाव पाते हैं कि भी व्यक्ति का अस्तित्व एक बृहत् वास्तविकता का एक साधारण-सा भाग मात्र है। सीताकांत महापात्र ने ओडिया माहिती नई दष्टि दी। रमाकान्त रथ (ओडिया) और सीताकान्त महापात्र (ओडिया) पौराणिकता या लोक दन्तकथाओं का प्रयोग परंपरा स आधनिकता के संबंधों पर विचार करने के लिए करते हैं। हमें लेखकों द्वारा अपनी जडों को तलाशने का अपन प्राचीन स्थलों का पता लगाने और गत कई दशकों के दौरान अति आधुनिकतावाद की अवधि में जनस्पष्ट हुए अनुभव के समस्त क्षेत्रों की छानबीन करने के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। समकालिक भारतीय काव्य में सौम्य होने के भाव के साथ-साथ विडम्बना का दृष्टिकोण, रचनात्मक प्रतिमाओं जैसे पौराणिक अनुक्रमों का निरन्तर प्रयोग और या शाश्वत्त्व की समस्याओं के लगातार उलझने में देखने को मिलते हैं। गिरीश कर्नाड. कंबार (कन्नड़), मेाहन राकेश, मणि मधुकर (हिंदी), जीपी सतीश आलेकर (मराठी) मनोज मित्र आर बादल सरकार (बाग्ला) जैसे नाटककार भारत के अस्तित्व को समझने के लिए मिथकों, लोक दंतकथाओं, परम्परा का प्रयोग करते रहे हैं।
यूरोप- केन्द्रस्थ आधनिकतावाद ने विचलन के एक नवीन सामाजिक- सांस्कृतिक पौराणिकी संहिता का, सृजन किया है जिसका प्रयोग कुंवर नारायण नारायण (हिन्दी), दिलीप चित्रे (मराठी), शंख घोष (बांग्ला) के काव्य और भैरप्पा (कन्नड़), प्रपंचम (तमिल) और अन्यों के उपन्यासों में किया गया है। अब मिथक को साहित्यिक पाठ के अर्थपर्ण स्वीकार किया जाता है। यू. आर. अनन्त मूर्ति (कन्नड़) अपनी कहानियों में आज के परिवर्तित प्रसंग में कुछ परम्परागत मूल्यों की प्रासंगिकता का पता लगाते रहे हैं। इनका संस्कार नामक उपन्यास एक विश्वस्तरीय शास्त्रीय कति है जो मनष्य के जीवन की मागों की अत्यावश्यकता की दृष्टि से मनुष्य के आत्मिक संघर्ष को प्रस्तुत करता है। इन लेखकों ने भव्श्यि की ओर देखते हुए जड़ों के गौरव को लौटा कर संस्कृति के तत्त्वों को एक रचनात्मक रीति द्वारा दुबारा जानने, पुनः की खोजने तथा पुनः परिभाषित करने का एक प्रयास किया है।
समकालीन साहित्य
उत्तर आधुनिक युग में सहज रहने, भारतीय रहने, आम आदमी के निकट रहने, सामाजिक दृष्टि से जागरूक रहने का प्रयास किया जा रहा है। एन. प्रभाकरन, पी. सुरेन्द्रन जैसे मलयालम के तृतीय पीढ़ी के लेखक आधनिक आधुनिकता से उच्च आधुनिकता तक का रेंज रखते है। मालव कहानियों बिना किसी सुस्पष्ट सामाजिक संदेश या दार्शनिक आडम्बर के सुनाने मात्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं। विजयदान देथा (राजस्थानी) और सुरेन्द्र प्रकाश (उर्दू) बिना किसी सैद्धांतिक पूर्वग्रह के कहानियां लिखते रहे हैं। अब यह स्थापित हो गया है कि सरल पाठ में भी मूल पाठ विषयक अतिरिक्त संरचना प्रस्तुत की जा सकती है। यहां तक कि कविता में सरलता से अभिव्यक्त किए जाने वाले सांस्कृतिक संदर्भ अर्थगत-मूल्य के हो सकते हैं।
अब यह सिद्ध हो गया है कि साधारण पाठ जटिल इतर-पाठ की संरचनाएं प्रस्तुत कर सकता है। यहां तक कि काव्य में साधारण रूप से दिए गए सांस्कृतिक संदर्भो के अलग- अलग अर्थगत मूल्य हो सकते हैं। जयमोहन (तमिला) देवेश (बांग्ला) और रेणु, शिवप्रसाद सिंह (हिन्दी) द्वारा रचित समकालिक भारतीय उपन्यास, जो कि विभिन्न उपेक्षित क्षेत्रों के करे में तथा वहां बोली जाने वाली उप-भाषा में हैं, समग्र भारत का एक मिश्रित दृश्य प्रस्तुत करते है जो नए अनुभवों के साथ स्पंदित हैं और पुराने मूल्यों से जुड़े रहने के लिए संघर्षरत हैं। उत्तर आधुनिकता की इस अवधि में ये उपन्यास अस्तित्व की रीतियों की समस्याओं को नाटक का रूप देते हैं। गांवों में वास्तविक भारत की झलक देते हैं और यह भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट करते हैं कि यह देश हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई का देश है। इसकी संस्कृति एक मिश्रित संस्कृति है। इन आंचलिक उपन्यासकारों ने पश्चिम द्वारा सृजित इस मिथक को नष्ट कर दिया कि भारतीयता भाग्यवाद है या यह कि भारतीयता की पहचान मैत्री तथा व्यवस्था से करनी होगी और भारतीय दृष्टि अपनी स्वयं ही वास्तविकता को समझ नहीं सकती।
बड़ी संख्या में समकालीन उपन्यासकारों ने जो प्रमुख तनाव महसूस किया वह ग्रामीण और परम्परागत रूप से एक शहरी तथा आधुनिकतावाद से बाद की स्थिति तक का परिवर्तन है जिसे या तो पीछे छूट गए गांव के लिए एक रोमानी विरह के माध्यम से या इसकी समस्त काम-भावना, वीभत्सता, हत्या तथा क्रूरता सहित शहर के भय एवं घृणा के माध्यम से व्यक्त किया गया है। वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य (असमी), सुनील गंगोपाध्याय (बांग्ला), पन्नालाल पटेल. (गुजराती), मन्नू भंडारी (हिन्दी) नयनतारा सहगल (अंग्रेजी), वी बेडेकर (मराठी) समरेश बसु (बांग्ला) और अन्यों ने अपनी ग्रामीण-शहरी संवेदनशीलता के साथ भारतीयता के अनुभव को समग्र रूप से प्रस्तुत किया है। कुछ कथा-साहित्य लेखक प्रतीकों, प्रतिमाओं और अन्य काव्यात्मक साधनों की सहायता से जीवन के किसी एक क्षण विशेष को बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं। निर्मल वर्मा (हिन्दी), मणि माणिक्यम् (तेलुगु) और कई अन्यों ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का अहसास कराया है। उदारवादी महिलाओं के लेखन का सभी भारतीय भाषाओं में प्रखर अविर्भाव हुआ है जिसने पुरुष-प्रधान सामाजिक व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया है कमलादास (मलयालम, अंग्रेजी), कृष्णा सोबती (हिन्दी), आशापूर्णा देवी (बांग्ला), राजम कृष्णन (तमिल) और अन्यों जैसी महिला लेखकों ने अलग किस्म के मिथकों तथा प्रति-रूपकालंकार को आगे बढ़ाया।
विजय देव नारायण साही ने हिंदी में आलोचना की एक नई धारा दी। ‘लघुमानव‘ के सौंदर्य को उन्होंने साहित्य का सौंदयं बनाया तथा अपनी कविताओं के माध्यम से हिंदी में चली आ रही पारंपरिक भाषा व कथ्य को बदल दिया।
भारत में आज का संकट औचित्य और वैश्विकता के बीच के संघर्ष के बारे में है जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लेखक परम्परागत प्रणाली के भीतर रहते हुए समस्या का समाधान करने के लिए एक प्रवृति का अभिनिर्धारण कर रहे है जो आधुनिकीकरण की एक ऐसी स्वदेशी प्रक्रिया जनित करने तथा उसे बनाए रखने के लिए पर्याप्त रूप से प्रभावशाला है जिसे बाह्य समाधानों की आवश्यकता नहीं पड़ती और जो स्वदेशी आवश्यकताओं तथा दृष्टिकोणों के अनुसार है लाका लेखकों की नई फसल जीवन में अपने आस-पास के सत्य को जिस रूप में देखती है उससे वह चिन्तित है। यहा । कि भारत के अंग्रेजी लेखकों के लिए अंग्रेजी अब कोई उपनिवेशी भाषा नहीं है। अमिताभ घोष, शशि थरूर, विक्रम उपमन्यु चैटर्जी, अरुंधती राय और अन्य भारतीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के अभाव को दर्शाए बिना इसका प्रयोग रहे हैं। वे लेखक जो अपनी विरासत, जटिलता और अद्वितीयता के बारे में सजग हैं, अपने लेखन में परम्परा वास्तविकता दोनों को व्यक्त करते हैं।
हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कोई भी एकल भारतीय साहित्य स्वयं में पूर्ण नहीं है और इसलिए किसी एकल भाषा के प्रसंग के भीतर इसका कोई भी अध्ययन इसके साथ न्याय नहीं कर सकता है, यहां तक कि इसके लखकों के साथ भी, जो कि सामान्य वातावरण में बड़े होते हैं। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि भारतीय साहित्य कई भाषाओं में लिखा जाता है, लेकिन इनके बीच एक महत्त्वपूर्ण, जीवंत संबंध है। ऐसा बहुभाषी धाराप्रवाहिकता, अन्तर-भाषा- अुनववाद परस्पर सांझे विषयों, चिन्ताओं, दिशा और आंदोलनों के कारण हुआ है। ये सब मिल कर भारतीय साहित्य के आदर्शो को आज भी सक्रिय रूप से जीवित रखे हुए हैं।