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साइक्लोट्राॅन उपकरण का कार्य लिखिए तथा इसका सिद्धान्त दीजिए तथा इसकी संरचना समझाकर तथा इसकी कार्य प्रणाली समझाइये। अधिकतम वेग और ऊर्जा का सूत्र ज्ञात कीजिए।

उत्तर – साइक्लोट्राॅन आवेशित कणो जैसे – प्रोट्रोन, एल्फा कण आदि के वेग में वृद्वि करने में काम आता है।

सिद्धान्त – इसमें विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र एक दूसरे के लम्बवत लगाये जाते है। चुम्बकीय क्षेत्र आवेशित कण को बार 2 वृताकाल मार्ग में घुमाकर विद्युत क्षेत्र में प्रवेश करता है जबकि विद्युत क्षेत्र आवेशित कण के वेग में वृद्वि करता है। इसके लिए आवश्यक शर्त हैं कि आवेशित कण के परिक्रमण की आवृत्ति और प्रत्यावर्ती स्त्रोत की आवृत्ति बराबर होनी चाहिए।

संरचना एवं कार्य प्रणाली (Cyclotron Structure and working)

साइक्लोट्रॉन
साइक्लोट्रॉन

इसमें धातु के डी आकार के खोखले बर्तन होते हैं जो एक दूसरे के सम्मुख रखे होते है। इन्हें प्रत्यावर्ती स्त्रोत से जोड़ देते हैं तो बर्तनों के अन्दर विद्युत क्षेत्र शून्य होगा। परन्तु चुम्बकीय क्षेत्र शून्य नहीं होता है  चुम्बकीय क्षेत्र लगाने के लिए चुम्बकीय ध्रुव खण्ड एन (N) और एस (S) लगाते है। इसकी कार्य प्रणाली समझने के लिए दोनों D  के मध्य तक आवेशित कण रखते है तो विद्युत क्षेत्र से त्वरित होकर एक D में प्रवेश करता है और आधा चक्कर लगाकर जैसे ही D से बाहर निकलता है ध्रुवता बढ़त जाती है। पुनः विद्युत क्षेत्र से त्वरित होता है और दूसरे D में प्रवेश करता है वहा चुम्बकीय क्षेत्र के कारण अद्र्ववृत में चक्कर लगाने के बाद D से बाहर निकलता है तो पुनः ध्रुवता बदल जाती है इस प्रकार बार बार विद्युत क्षेत्र में प्रवेश करने के कारण आवेशित कण के वेग में काफी वृद्वि हो जाती है।