क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा को प्रभावित करने वाले कारक crystal field split energy in hindi

crystal field split energy in hindi क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा : t2g एवं eg कक्षकों के मध्य के उर्जा अंतर को क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा कहते है।

क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण उर्जा (crystal field stabilization energy ) (CFSE) : d कक्षकों के उच्च उर्जा के eg एवं निम्न उर्जा के t2g कक्षकों में विभाजन के पश्चात् e के निम्न उर्जा स्तर में जाने की प्रवृति होती है इसलिए t2g कक्षकों में electron के प्रवेश करने से उर्जा मुक्त होती है एवं eg कक्षकों में e के प्रवेश करने से उर्जा अवशोषित होती है अत: इस प्रक्रिया के दौरान कुछ उर्जा निष्कासित होती है जिसे CFSE कहते है।

CFSE का मान तंत्र के स्थायित्व को दर्शाता है इसलिए इसका मान ऋणात्मक होता है।

धातु आयन के t2g एवं eg कक्षकों के e की संख्या के आधार पर CFSE का मान ज्ञात किया जाता है।

अष्ट फलकीय संकुलों के लिए CFSE का मान शून्य या ऋणात्मक हो सकता है लेकिन धनात्मक नहीं हो सकता।

 प्रश्न : क्या कारण है की चतुष्फलकीय संकुल यौगिक सैदेव उच्च चक्रण संकुल यौगिक बनाते है।

उत्तर : चतुष्फलकीय संकुल यौगिकों  क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा का मान प्रबल एवं दुर्बल क्षेत्र दोनों ही प्रकार के लिगेंड़ो के लिए कम होता है अत: इस दोनों ही electrons के लिए कम होता है , अत: इन दोनों electrons के लिए क्रिस्टल क्षेत्र उर्जा का मान pi उर्जा से कम होता है।

इसलिए e की युग्मन की सम्भावना नगण्य होती है , फलस्वरूप चतुष्फलकीय संकुल सैदेव उच्च चक्रण वाले होते है।

क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा को प्रभावित करने वाले कारक

संकुल यौगिक के निर्माण के समय धातु आयन के d कक्षकों में उपस्थित electrons एवं लिगेंड के दाता परमाणुओं के मध्य प्रतिकर्षण के कारण क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन होता है।
या
धातु आयन के d कक्षक भिन्न उर्जा के दो सेटों में t2g एवं eg में विभाजित हो जाते है।
अत: वे सभी कारक जो धातु आयन के d कक्षकों में स्थित e एवं लिगेंड के मध्य प्रतिकर्षण को बढ़ाते है।  वे क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा के मान को बढ़ा देते है।

1. धातु आयन की प्रकृति

केन्द्रीय धातु आयन से संबंधित निम्न तीन कारक क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा के मान को प्रभावित करते है।
(a) धातु आयन के d कक्षकों की मुख्य क्वांटम संख्या : केन्द्रीय धातु आयन के d कक्षकों की मुख्य क्वांटम संख्या का मान बढ़ने से d कक्षक का आकार बढ़ता है।
जिससे लिगेंड के दाता परमाणु एवं केन्द्रीय धातु आयन के मध्य प्रतिकर्षण बढ़ता है फलस्वरूप क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा का मान बढ़ता है।
(b) धातु आयन (oxidation state) : धातु आयन पर आवेश की मात्रा बढ़ने से लिगेंड धातु आयन के अधिक पास आ जाते है जिससे धातु आयन के d कक्षकों में स्थित e एवं लिगेंड के मध्य प्रतिकर्षण बढ़ता है।  जिससे △ का मान बढ़ जाता है।
(c) धातु आयन के d कक्षकों में e की संख्या : धातु आयन के d कक्षकों में e की संख्या बढ़ने से यह आने वाले लिगेंड को कम आकर्षित करता है , जिससे धातु एवं लिगेंड के मध्य प्रतिकर्षण कम हो जाता है जिससे △ का मान कम हो जाता है।

2. लिगेण्ड की प्रकृति

विभिन्न लिगेंड़ो को उनकी बढती हुई क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा के क्रम में व्यवस्थित करने पर एक श्रेणी प्राप्त होती है जिसे स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी कहते है।

3. लिगेण्ड का आकार

छोटे आकार के लिगेंड धातु आयन के अधिक पास आ जाते है जिससे धातु आयन के d electron लिगेंड के मध्य प्रतिकर्षण बढ़ने से क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन उर्जा के मान बढ़ जाता है।

4. संकुल की ज्यामिति

संकुल यौगिक की ज्यामिति भी क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा के मान को प्रभावित करती है।
टेट्रा गोनल, वर्ग समतलीय , अष्टफलकीय एवं चुष्फलकीय ज्यामिति वाले संकुल यौगिको के लिए क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन उर्जा का घटता क्रम निम्न होता है –
टेट्रा गोनल > वर्ग समतलीय > अष्टफलकीय > चुष्फलकीय

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