शीत युद्ध किसे कहते हैं | cold war in hindi शीत युद्ध की परिभाषा क्या है , उत्पत्ति के कारण , विशेषता प्रभाव

By   September 30, 2020

cold war in hindi what is definition reasons effects शीत युद्ध किसे कहते हैं शीत युद्ध की परिभाषा क्या है , उत्पत्ति के कारण , विशेषता प्रभाव |

शीतयुद्ध: अभिप्राय, प्रतिमान और आयाम
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
शीतयुद्ध का अर्थ
शीतयुद्ध का उद्गम
शीतयुद्ध का प्रसार
सुदूर पूरब में शीतयुद्ध
शीतयुद्ध में कमी
शीतयुद्ध का पुनर्जन्म
शीतयुद्ध का ढाँचा एवं आयाम
शीतयुद्ध का अंत
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

 उद्देश्य
यह इकाई शीत युद्ध, इसके अभिप्राय एवं आयामों के विषय में विवेचना करती है। इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आपः
ऽ शीतयुद्ध की अवधारणा की परिभाषा के विषय में जान सकेंगे,
ऽ इस गैर-सैनिक संघर्ष के उद्गम की पहचान कर सकेंगे,
ऽ शीतयुद्ध के प्रतिमानों तथा आयामों को समझ सकेंगे,
ऽ शीतयुद्ध के अंत के कारणों की पहचान कों समझ सकेंगे, और
ऽ शीतयुद्ध के प्रभाव एवं परिणाम का अनुमान कर सकेंगे।

 प्रस्तावना
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के अंत के साथ ही दुनिया में एक नयी व्यवस्था का उदय हुआ जिसे समाजवादी व्यवस्था के नाम से जाना. गया है। लगते ही हाथ, इस विश्वयुद्ध ने दूसरे विश्वयुद्ध के बीज भी बो दिये थे। इन दोनों घटनाओं ने आगामी दसकों को व्यापक रूप में प्रभावित किया। और संभावनाओं के अनुसार 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध मित्र राष्ट्रों तथा धुरी राष्ट्रों के नाम से बने दो गुटों के बीच लड़ा गया। समाजवादी गुट मित्र राष्ट्रों के गुट में सम्मिलित हो गया। इससे मित्र राष्ट्रों की शक्ति दुगनी हो गई और मित्र राष्ट्रों ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इस युद्ध में पुराने पूँजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था का अंत हुआ जिसका विश्व पर व्यापक प्रभाव था। युद्ध के अंत में विश्व दो गुटों में विभाजित हो गया- पश्चिमी या पूँजीवादी गुट जिसका नेतृत्व नव उपनिवेशवादी शक्ति संयुक्त राज्य अमरीका करता था तथा दूसरा समाजवादी गुट और यह सोवियत संघ समाजवादी गणतंत्रों या सोवियत संघ के नेतृत्व में था। इस तरह से संयुक्त राज्य अमरीका तथा सोवियत संघ जैसी दो महाशक्तियों के रूप में उद्गम हुआ। ये दोनों गुट दो विरोधाभासपूर्ण व्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते थे। इसलिए उनके बीच टकराव का होना स्वाभाविक था। यह टकराव या संघर्षशील की अवस्था शीतयद्ध में परिवर्तित हो गयी क्योंकि दौरान विश्व ने एक गुणात्मक परिवर्तन का अनुभव किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध की विभिषिका तथा उसमें हुए असीम जान-माल के नुकसान ने विश्व को शांति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए प्रेरित किया तथा विश्व में फिर से ऐसी स्थिति फिर से न हो। इसको पुनिश्चित एवं सुरक्षित बनाने हेतु एक विश्व संगठन की स्थापना की गयी। इस विश्व संगठन को संयुक्त राष्ट्र संगठन या संयुक्त राष्ट्र का नाम दिया गया। दोनों महाशक्तियों ने उच्च परिष्कृत विध्वंसात्मक हथियारों को प्राप्त किया। यूरोप संयुक्त राज्य अमरीका पर निर्भर हो गया। उपनिवेशवाद का विखंडन एक वास्तविकता में बदल गया। इन सबसे ऊपर जनमत किसी भी प्रकार के विश्वव्यापी विध्वंस के पक्ष में न था। लेकिन ये परिवर्तन स्थानीय या विभिन्न देशों में गृहयुद्ध तथा दोनों महाशक्तियों को विश्व पर सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए तनावग्रस्त प्रतियोगिता से रोकने में असफल रहे। इस तरह से यह शत्रुतापूर्ण प्रतियोगिता शीतयुद्ध में बदल गई।

शीतयुद्ध का अर्थ
“शीतयुद्ध‘‘ शब्द की उत्पत्ति अभी हाल में हुई है। इस शब्द का प्रयोग संयुक्त राज्य अमरीका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ की गैर-सैनिक शत्रुता को दर्शाने के लिए किया गया है जो द्वितीय विश्व युद्ध से ही चला आ रहा है। समय व्यतीत होने के साथ इसका प्रयोग अतरोष्ट्रीय संबंधों में एक अवधारणा के रूप में होने लगा है। ‘‘शीतयुद्ध‘‘ शब्द का अर्थ या अभिप्राय यह है कि राष्ट्रों के बीच वास्तविक युद्ध (अर्थात् गैर-सैनिक शत्रुता) के बगैर ही शत्रुता की स्थिति का बने रहना है। यह अवधारणा ऐसे संघर्ष के लिए है जिसको राष्ट्रों या राज्यों द्वारा कुप्रचार, आर्थिक उपायों, राजनीतिक चालों आदि के माध्यम से अपनी सर्वोच्चता को स्थापित करने के लिए एक दूसरे को नष्ट करने की मनसा से चलाया जाता है। शीतयुद्ध में व्यस्त राष्ट्र या राज्य वास्तविक युद्ध (सैनिक कार्यवाही) नहीं करते । यद्यपि यह गला काट प्रतियोगिता की स्थिति होती है लेकिन प्रतियोगी दल अपने बीच सशस्त्र संघर्ष से काफी दूर रहते हैं।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) शीतयुद्ध शब्द से आप क्या समझते हैं ?

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) शीत युद्ध का अभिप्राय है, गैर-सैनिक संघर्ष । सर्वोच्चता के लिये आक्रामक प्रतियोगिता।

शीतयुद्ध का उद्गम
शीतयुद्ध का उद्गम 1917 की उस रूसी क्रांति से माना जा सकता है जिसने एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया। इस व्यवस्था को एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था के रूप में जाना गया जो शोषणात्मक पूँजीवादी व्यवस्था का विरोध करती थी। संपूर्ण पूँजीवादी विश्व भयभीत हो उठा तथा सोवियत संघ के नये राज्य को नष्ट करने के लिए एकजुट हो गया। ऐसा कर पाने में असफल होकर उन्होंने जर्मनी में नाजी शक्ति के उद्भव को प्रोत्साहित किया जिससे इसका इस्तेमाल सोवियत संघ के विरुद्ध किया जा सके। सोवियत संघ ने नाजी जर्मनी के तीव्र उत्थान को रोकने के लिए पश्चिमी शक्तियों को सम्मिलित करने के गंभीर प्रयास किये। लेकिन पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के प्रयासों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसी दौरान 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रारंभ हो गया। जर्मनी ने जर्मनी तथा सोवियत संघ के बीच हुए गैर आक्रामक संधि अर्थात् शांति संधि का उल्लंध करते हुए सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सोवियत संघ मित्र शक्तियों के साथ शामिल हो गया तथा धुरी राष्ट्रों की पराजय में उसका महान योगदान रहा। धुरी राष्ट्रों को कुचलने में सोवियत संघ ने गंभीर प्रयास किए थे, किन्तु, इसके बावजूद पश्चिम ने सदैव सोवियत संघ को हमेशा ही संदेह की दृष्टि से देखा। नाजियों के अधीन शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान पश्चिम पर सोवियत संघ को समाप्त करने के आरोप लगाये गये। संभवतः यही कारण था कि पूर्वी यूरोप में जर्मनी के विरुद्ध दूसरा मोर्चा खोलने के लिये सोवियत संघ के लगातार अनुरोध का उत्तर मित्र राष्ट्रों ने नहीं दिया। युद्ध के उपरांत मित्र राष्ट्रों ने सोवियत संघ के विरुद्ध अपने भय एवं घृणा को नहीं छिपाया जिसका अब विश्व में एक महाशक्ति के रूप में उदगम हो । गया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में संयुक्त राज्य अमरीका भी एक दूसरी महाशक्ति के रूप में उमर कर विश्व के सामने आया। सोवियत संघ सहित युद्ध के समय संगठित हुए मित्र राष्ट्रों ने शांति बनाए रखने के लिए पृथ्वी को सुरक्षित बनाने के लिए विश्व संगठन संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की। लेकिन फिर भी ये स्थानीय युद्धों को रोकने में असफल रहे क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के पास इन महा या बड़ी शक्तियों के आपसी संघर्षों को रोकने के लिए अथवा किसी तरह का दबाव बनाए रखने के लिए किसी तरह की आवश्यक शक्तियाँ न थी। परिणामस्वरूप वे अपने स्वयं के स्वार्थों एवं हितों को पूरा करने के लिए मनमानी करते रहे। उन्होंने अपने द्वन्दी रक्षा संगठनों को संगठित किया और प्रत्येक संकट के समय अपने हितों के अनुकूल अपने कार्य और संघर्ष करते चले गए। इसके साथ ही उन्होंने अपने दबदबे से विश्व संगठन का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए किया या फिर उसकी अव्हेलना की। इस प्रकार हम देखते हैं कि विश्व द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने से पहले शीतयुद्ध की चपेट में आ गया और उसका अंत तब ही हुआ जब विश्व में दूसरे विश्वयुद्ध की आग थमी। इस प्रकार महाशक्तियों के दबाव, भेदभाव से विश्व संगठन का कमजोर होना आदि सभी मार्गों दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध की आग में धकेल दिया।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) शीतयुद्ध का प्रारंभ करने वाली परिस्थितियों का आलोचनात्मक विवरण दीजिए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर 
1) 1917 की रूसी क्रांति
द्वितीय विश्वयुद्ध
जर्मनी संकट
यूनान का गृहयुद्ध सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी गुट का उदय
संयुक्त राज्य अमरीका के नेतृत्व में नव उपनिवेशवाद का उदय ।
शीतयुद्ध का प्रसार
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ को जर्मनी से 10 अरब डॉलर की राशि क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त करनी थी। ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमरीका ने मिलकर जुलाई, 1945 की पोट्सडम सम्मेलन के निर्णय का उल्लंघन करते हुए क्षतिपूर्ति की राशि की अदायगी को रोक दिया। इस घटना से एक भयंकर संकट उत्पन्न हो गया जिसका नाम जर्मन संकट के नाम से जाना गया है।

इस संकट का समाधान ढूँढने के लिए 1947 के प्रारंभ में एक सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें चार बड़ी शक्तियाँ सोवियत संघ, अमरीका, ब्रिटेन तथा फ्रांस शामिल थी। इसमें ब्रिटेन तथा अमरीका ने जर्मनी के आर्थिक एकीकरण पर बल दिया। परन्तु सोवियत संघ तथा फ्रांस ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। इस तरह से संकट का समाधान ढूँढे बगैर ही यह सम्मेलन समाप्त हो गया। इसी बीच संयुक्त राज्य अमरीका ने समी नियमों का उल्लंघन करते हुए मार्च, 1947 में यूनान के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया। इस हस्तक्षेप को जायज ठहराते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ट्रमैन ने 12 मार्च, 1947 को अमरीकी कांग्रेस को सम्बोधित करते हुए अपना पक्ष स्पष्ट किया और यूनान में हस्तक्षेप को उचित ठहराया तथा यूनान एवं टर्की में साम्यवादियों के नेतृत्व में लड़े जा रहे गृहयुद्ध का दमन करने के लिए इन देशों को वित्तीय सहायता देने हेतु कांग्रेस में जिन सिद्धांतों, का प्रतिपादन ट्रमैन ने किया उनको टूमैन सिद्धांत के नाम से जाना गया और इसको उचित ठहराने के लिए यह मूल तर्क दिया कि साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका को कहीं भी हस्तक्षेप करने का अधिकार था। ट्रमैन सिद्धांत शीतयुद्ध को फैलाने के लिए एक नंगा दस्तावेज था जिसमें यह स्पष्ट अभिव्यक्ति की गई थी। 1950 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में शीतयुद्ध और गहरा हो गया। अमरीका ने दिसम्बर 1951 में यूरोप के पुनर्विकास का कार्यक्रम रखा। इसको मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है और यह ट्रमैन के सिद्धांत का आर्थिक प्रतिपक्ष था क्योंकि ट्रमैन का सिद्धांत मौलिक तौर पर एक राजनीतिक योजना थी। यद्यपि संयुक्त राज्य अमरीका ने घोषणा की थी कि इस योजना का लक्ष्य केवल युद्ध द्वारा बर्बाद किये गए यूरोप का पुनर्निर्माण करना है, लेकिन सामान्यतः यह साम्यवादियों के बढ़ते प्रभाव से यूरोप को सुरक्षित करने का एक-मात्र प्रयास था, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के तत्काल बाद संपूर्ण यूरोप में आंदोलनों का एक व्यापक उभार आ गया था। पश्चिमी यूरोप के सभी देश मार्शल योजना के अंतर्गत अमरीकी सहायता को स्वीकार करने के लिए तैयार थे। इसके साथ ही पूर्वी यूरोप के देशों पर यह आरोप लगाया गया कि सोवियत संघ के राजनीतिक तंत्र के कारण उन्होंने इस सहायता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। सोवियत संघ ने तुरन्त कोंसिल फार म्यूचल इकॉनामिक एसीसटेंट की स्थापना कर दी। जिसको मोलोतोब योजना के नाम से जाना गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि यूरोप दो गुटों में विभाजित हो गया और इन गुटों ने उस समय औपचारिक स्वरूप प्राप्त कर लिया जब सुरक्षा संधियों के होते हुए ये दोनों गुट खुल कर सामने आये।

संपूर्ण यूरोप में साम्यवादी आंदोलन के उभार के कारण जहाँ सोवियत संघ तथा अमरीका के मध्य तनाव में वृद्धि हुई वहीं अमरीका ने पश्चिमी शक्तियों के साथ सुरक्षात्मक गठबंधन करने का प्रस्ताव किया। इस प्रकार अप्रैल, 1949 में नॉर्थ अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर कर नॉर्ट अटलांटिक ट्रिटी आर्गेनाइजेशन (नाटो) की स्थापना की। इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले देश थे – संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम, नीद्रलैंड, लुक्जेम्बर्ग, इटली, पुर्तगाल, डेनमार्क, आइसलैंड तथा नार्वे। आगे चलकर पश्चिमी जर्मनी, यनान तथा टर्की भी इस संधि में शामिल हो गये। इस संधि के अनुसार, यदि संधि पर हस्ताक्षर करने वाले एक या एक से अधिक यूरोप, उत्तरी अफ्रीका या उत्तरी अमरीका के देशों पर सशस्त्र आक्रमण होता है तब उसको सभी हस्ताक्षर करने वाले देशों के विरुद्ध उपक्रमण माना जायेगा। नाटो के उत्तर में सोवियत संघ ने भी पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के साथ वार्सा संधि की। इसकी शर्ते एवं धाराएं नाटों के समान ही थी। इन घटनाक्रमों (अर्थात् यूरोप का आर्थिक एवं सैन्य दो गुटों में विभाजन) ने शीतयुद्ध को और तीव्र कर दिया था।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखें।
अ) जर्मन संकट
ब) ट्रमैन सिद्धांत
स) मार्शल योजना
द) नाटो

बोध प्रश्न 3 उत्तर 
1) क) महाशक्तियों द्वारा जर्मनी पर नियंत्रण करने के लिए संघर्ष ।
ख) साम्यवाद विरोधी आंदोलनों को संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा समर्थन देने की प्रतिज्ञा।
ग) साम्यवादी शासन से दूरी बनाये रखने के लिए देशों की आर्थिक सहायता करना।
घ) साम्यवादी शक्तियों को रोकने के लिए आक्रामक रक्षात्मक संगठन बनाना।

सुदूर पूरब में शीतयुद्ध
यद्यपि शीतयुद्ध का उद्गम यूरोप में हुआ था किंतु यह यूरोप तक सीमित न रह कर उसके बाहर भी फैल गया था। यूरोप के तुरंत बाद इसका प्रचार-प्रसार सुदूर पूरब में भी हुआ। चीन में साम्यवादी क्रांति 1949 में सफल हुई। हालांकि च्यांग काई शेक ने संयुक्त राज्य अमरीका का पूरा समर्थन प्राप्त किया था लेकिन वह साम्यवादी आक्रमण को रोकने में बिल्कुल असफल रहा। साम्यवादियों ने च्यांग काई शेक की बदनाम राष्ट्रवादी सेनाओं को जबरदस्त शिकस्त दी और च्यांग को चीन की मुख्य भूमि से बाहर खदेड़ दिया। चीन में साम्यवादियों की सफलता की घटना ने अमरीका को झकझोर दिया उसके लिए यह एक भारी आघात था क्योंकि वह संपूर्ण विश्व में साम्यवाद को रोकने की नीति की घोषणा कर चुका था और उसका अनुसरण कर रहा था। अमरीका ने इसी दौरान अपने पश्चिमी सहयोगियों सहित जापान के साथ एक शांति संधि की इससे सोवियत संघ का क्रोध और अधिक बढ़ गया। इस संधि ने जापान को अमरीका पर निर्भर बना दिया और सुदूर पूरब जापान में अमरीका ने मुख्य सैनिक अड्डे को निर्मित करने की स्वीकृति प्रदान करके उसे बनाये रखने के लिए विशाल धनराशि खर्च की। इसी दौरान कोरिया में शीतयुद्ध प्रारंभ हो गया। साम्यवादियों द्वारा समर्थित सेना ने उत्तरी कोरिया में अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना लिया और साम्यवाद विरोधी तथा पश्चिम समर्थक सेनाओं ने दक्षिण कोरिया पर अधिकार कर कोरिया की 38वीं समांतर रेखा के साथ तथा कोरिया को चीन से अलग करने वाली बहती नदी तक विभाजन हो गया। सोवियत संघ द्वारा समर्थित चीन भी साम्यवादियों के समर्थन वाले संघर्ष में शामिल हो गया। उत्तरी कोरिया की सेनाओं ने तत्काल आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया। आगामी दो वर्षों तक यह युद्ध जारी रहा। जुलाई, 1953 में युद्ध विराम पर हस्ताक्षर हो जाने से युद्ध का अंत तो हो गया लेकिन दोनों महाशक्तियों में कोरिया को लेकर अब तक भी तनाव चला आ रहा है।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणीः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) सुदूर पूरब में शीतयुद्ध कैसे प्रसारित हुआ। इसकी आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

बोध प्रश्न 4 उत्तर
1) चीन पर साम्यवादियों का अधिकार होना।
जापान में अमरीकी अड्डा।
कोरिया युद्ध।

शीतयुद्ध में कमी
1952 में हैरी एस ट्रूमैन के स्थान पर डिवाइट आइजनावर सत्ता में आ गये। ट्रूमैन के सिद्धांत की अवहेलना करते हुए आइजनावर ने कोरिया युद्ध को समाप्त करने के लिए कई प्रभावकारी कदम उठाये। इसके बाद अप्रैल 1953 में जोजेफ स्टालिन की मृत्यु हो गई। सोवियत संघ में स्टालिन के स्थान पर और अधिक उदारवादी एवं युवा नेतृत्व सत्ता में आया। किसी सीमा तक उन्होंने सोनि संघ की गृह एवं विदेशी नीतियों का उदारीकरण किया। इसी दौरान सोवियत संघ ने हाइड्रोजन बम का निर्माण कर लिया और यह बम हिरोशिमा पर इस्तेमाल किये गये अणु बम से लगभग 800 गुणा ताकतवर था। हाइड्रोजन बम क्षमता को प्राप्त करने से सोवियत संघ ने संयुक्त राज्य अमरीका की बराबरी प्राप्त कर ली। अब विश्व नेतागण और अधिक भयभीत हुए और युद्ध की अपेक्षा शांति की अधिक आवश्यकता को मानने लगे।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों महाशक्तियों के पास हाइड्रोजन बम न होते तो हो सकता है आगामी वर्षों में दोनों के बीच विध्वंसकारी स्थिति उत्पन्न हो गयी होती। उससे दोनों महाशक्तियों के बीच वास्तविकता में युद्ध शुरू हो सकता था। इस प्रसंग में वे क्यूबा संकट का दृष्टांत देते हैं। 1960 के दशक के प्रारंभ में क्यूबा में साम्यवादी सरकार की स्थापना हो गई थी जिसके कारण एक संकटकालीन स्थिति पैदा हुई। साम्यवादी क्यूबा को डेमोक्लेस की तलवार के रूप में समझा गया जो अमरीका के हृदय में चुभी जा रही थी इसलिए अमरीका इस शीशु साम्यवादी राज्य का दमन करना चाहता था। लेकिन सोवियत संघ ने क्यूबा की रक्षा के लिए मिसाइलों को भेजकर जो तुरन्त कार्यवाही की उससे अमरीका के आक्रामक रूप में कमी आयी। इस संकट ने दोनों महाशक्तियों को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया था, किन्तु रूस के कड़े रुख ने युद्ध को पनपने नहीं दिया। इसलिए क्यूबा के प्रति संयुक्त राज्य अमरीका के दृष्टिकोण में कुछ नम्रता आयी थी। तब सोवियत संघ ने अपने मिसाइलों को वापस बुला लिया। इस प्रकार क्यूबा के संकट को रूस ने शांति से हल करने में अपनी शक्ति का उपयोग किया था।

क्यूबा के संकट के अंत का अनुसरण करते हुए दोनों महाशक्तियों ने नाभिकीय हथियारों के उत्पादन को कम करने के लिए कई समझौते किये। 1963 में जिन देशों के पास पहले से ही नाभिकीय हथियार थे उनको छोड़ कर आगे नाभिकीय हथियारों का उत्पादन न करने के लिए संधि पर हस्ताक्षर किये गये। समुद्र तथा दूसरी जगहों पर नाभिकीय हथियारों के अभिस्थापन तथा जैविक हथियारों के प्रयोग पर 1971 में संधियों के हस्ताक्षर पर रोक लगायी गयी। इस तरह से हम कह सकते हैं कि सामूहिक रूप में इन समझौतों ने शीतयुद्ध के तनावों में कमी की।

इसी दौरान यूरोप ने स्वयं को युद्ध के खतरों से अपने आपको उबार लिया। पुनर्स्थापित यूरोप ने अमरीकी अर्थव्यवस्था से प्रतियोगिता प्रारंभ कर दी। इसी दौरान फ्रांस ने चार्ल्स डीगॉल के नेतृत्व में अमरीका पर निर्भर बने रहने से इंकार कर दिया। जर्मनी भी शीघ्र संभल गया। अखंड अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन को विभाजन का सामना करना पड़ा। चीन तथा सोवियत संघ एक प्रकार के शीतयुद्ध में फंस गये। इन घटनाओं के कारण शीतयुद्ध के तनावों में काफी कमी आयी।

बोध प्रश्न 5
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) उन कारणों का उल्लेख कीजिए जो शीत युद्ध में कमी करने के लिए उत्तरदायी हैं।

बोध प्रश्न 5 उत्तर
1) संयुक्त राज्य अमरीका तथा सोवियत संघ में नया नेतृत्व। हाइड्रोजन बम में सोवियत संघ की सफलता। यूरोप का पुनरुत्थान। एकीकृत साम्यवादी बाजार में विघटन।

शीतयुद्ध का पुनर्जन्म
1980 के दशक के अंतिम वर्षों में अफगानिस्तान में एक प्रकार की क्रांति हुई। इसके बाद एक साम्यवादी सरकार सत्ता में आ गयी। लेकिन धार्मिक कट्टरवादियों के सहयोग से साम्यवाद विरोधी शक्तियों ने इस नयी सरकार का विरोध किया। परिणामस्वरूप अफगानिस्तान कभी अंत न होने वाले गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। इस गृहयुद्ध में अमरीका ने पाकिस्तान के माध्यम से साम्यवाद विरोधी तथा धार्मिक कट्टरतावादी ताकतों का समर्थन किया। साम्यवादी सरकार ने गृहयुद्ध का सामना करने के लिए सोवियत संघ से सैनिक एवं आर्थिक सहायता की मांग की और सोवियत संघ ने तुरन्त दिसम्बर, 1979 में एक बड़ी सशस्त्र सेना सहित अन्य सैनिक एवं आर्थिक सहायता भेजी। अमरीका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना की उपस्थिति को एक आक्रमण की संज्ञा दी। अमरीका के इस दृष्टिकोण ने सोवियत संघ, अमरीका के पहले से ही चले आ रहे तनावपूर्ण रिश्तों में और तनाव पैदा किया। दोनों महाशक्तियों के बीच इस नए संघर्ष को नये शीतयुद्ध के पुनर्जन्म या प्रारंभ का नाम दिया गया। शीतयुद्ध तब और गहरा हो गया जब 1981 में पोलैण्ड में लोकतंत्र समर्थित आंदोलन का दमन करने के लिए मार्शल कानून लागू किया गया। अमरीका ने इस कार्यवाही को पोलैण्ड में सोवियत संघ का हस्तक्षेप कहा। अमरीका तथा सोवियत संघ के आपसी संबंध उस समय टूटने के कगार पर पहुँच गये जबकि 1983 में सोवियत संघ ने दक्षिण कोरिया के एक नागरिक विमान को यह कहते हुए मार गिराया कि उसका उद्देश्य जासूसी करना था। अमरीका ने इस नागरिक विमान के गिराये जाने की भर्त्सना की और तुरन्त अमरीका ने यूरोप में मध्यम दरी तक मार करने वाली मिजाइलों को लगा दिया। सोवियत संघ ने जवाबी कार्यवाही करते हुए अमरीका के साथ हथियारों पर चल रही वार्ता को तोड़ दिया। इसी दौरान संयुक्त राज्य अमरीका ने 1983 में ग्रेनेडा पर आक्रमण कर दिया, निकारगुआ में लोकप्रिय सेन्डस्टा सरकार के विरुद्ध अप्रत्यक्ष युद्ध छेड़ दिया और स्ट्रेटजिक डिफेन्सिव इनिशियेटिव (एस डी आई) या स्टार युद्धों के विकास के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। इस तरह विश्व भर में नवीन शीतयुद्ध का फिर से प्रसार हुआ।

बोध प्रश्न 6
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) वे कौन-कौन सी घटनाएँ थी जो नए अथवा द्वितीय शीतयुद्ध के प्रांरभ होने के लिए उत्तरदायी है।

बोध प्रश्न 6 उत्तर
1) अफगान संकट, कोरिया के नागरिक विमान को मार गिराना, निकारागुआ में अप्रत्यक्ष अमरीका द्वारा युद्ध, अमरीका का स्टार युद्ध कार्यक्रम।

 शीतयुद्ध का ढाँचा एवं आयाम
शीतयुद्ध के दौरान विश्व मूल रूप से वैचारिक आधारों पर दो गुटों में विभाजित हो गया था। 1917 में रूसी क्रांति ने विश्व में एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया था, पूँजीवादी एवं साम्राज्यवादी शक्तियों ने सोवियत संघ के नए राज्य और शासन के विरुद्ध अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध घोषित कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरन्त बाद शीतयुद्ध का जन्म यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य साम्यवादी शक्तियों के प्रसार को रोकना था। साम्यवादी आंदोलन तथा राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष, दोनों ने एक दूसरे का सहयोग करके एशिया, अफ्रीकाय लेटिन अमेरीका के देशों में चल रहे पुराने साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध कई क्षेत्रों में मिलकर संघर्ष किया । संयुक्त राज्य अमरीका तथा दूसरे साम्राज्यवादी देशों के लिए रूस के विस्तार को रोकने के लिए असमर्थ नजर आ रहे थे। क्योंकि साम्यवादी आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन द्वारा समर्थन प्राप्त था इसलिए अमरीका के लिए इस उभरतें मुक्ति संघर्ष के उफान का दमन करना मुश्किल हो गया था। इसलिए उन्होंने विश्वभर में साम्यवादी दुनिया की घेरेबंदी एवं गठबंधनों को विकसित करना आरंभ कर दिया था।

लेकिन शीतयुद्ध के लिए साम्यवाद एकमात्र मुद्दा न था। संघर्षरत राष्ट्रों के राष्ट्रीय हितों ने भी शीतयुद्ध को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। चीन, सोवियत संघ के टकराव में राष्ट्रीय हितों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसमें धर्म भी एक मुद्दा बना था। शिया और सुन्नी के झगड़ों, हिन्दू मुस्लिम धार्मिक मुददों ने क्रमशः ईरान-इराक तथा भारत पाकिस्तान के बीच तनाव पैदा करके शीतयुद्ध में वृद्धि की दक्षिण एशिया में भारत-पाकिस्तान के मध्य शीतयुद्ध के प्रसार में धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र तथा राष्ट्रवाद जैसे मुददों का विशेषकर योगदान रहा है। काश्मीर के सवाल को लेकर भारत-पाकिस्तान के मध्य अंतविहीन संघर्ष जारी है। भारत का दावा है कि वह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है इसलिए इस देश में विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ सद्भावपूर्ण वातावरण में रह सकते हैं। काश्मीर भारतीय धर्मनिरपेक्षता के लिए एक परीक्षण मैदान है।

यह शीतयुद्ध केवल महाशक्तियों तक ही सीमित न था। शीतयुद्ध के बहुत से आयाम थे। एक ओर यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो महाशक्तियों के मध्य संघर्ष था। दूसरी ओर क्षेत्रीय स्तर पर क्षेत्रीय शक्तियों के बीच शीतयुद्ध लड़ा जा रहा था। 1970 के दशक में, ईरान तथा इराक के बीच शीतयुद्ध चला था, सीमा के प्रश्नों को लेकर चीन तथा सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध शुरू हो गया। काश्मीर के प्रश्न पर भारत तथा पाकिस्तान के बीच शीतयुद्ध चल रहा है। पाकिस्तान ने इस समस्या का सैनिक बल से समाधान करना चाहा था किन्तु उसे असफलता हाथ लगी और मुंह की खानी पड़ी। इस तरह से यह क्षेत्र शीतयुद्ध की चपेट में आ गया।

यद्यपि द्वितीय विश्वयुद्ध के समापन से लेकर सोवियत संघ के विखंडन तक के समय को शीतयुद्ध का युग कहा गया है, लेकिन यह एक सतत विशेषता नहीं थी और न ही समस्याएँ समान थी। शीतयुद्ध ने विश्व शांति को अनेक चरणों में भंग किया, जो सामयिक रूप से चलती रही है। इस तरह हम कह सकते हैं कि पूरे शीतयुद्ध के दौरान न समस्याएँ ही समान थी और न ही समय और काल समान था। प्रथम जर्मन संकट एक समस्या थी, फिर कोरिया का युद्ध अफगान संकट सामने आया, स्टार युद्ध एक भयानक कार्यक्रम था जो इस दिशा में संयुक्त राज्य अमरीका का निर्णय आदि ने शीतयुद्ध की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने एवं उसको गति देने में विशेषरूप से सहायता की । थी।

इस प्रकार शीतयुद्ध का ढाँचा एवं आयाम विभिन्न प्रकार के थे जिनके प्रभाव बहुमुखी थे।

बोध प्रश्न 7
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) शीतयुद्ध के ढाँचे एवं आयामों की विवेचना कीजिये।

बोध प्रश्न 7 उत्तर
1) विचारधारा, समय-समय पर शीतयुद्ध,
अंतर्राष्ट्रीय शीतयुद्ध
क्षेत्रीय शीतयुद्ध

शीतयुद्ध का अंत
1980 के दशक के अंत में शीतयुद्ध की व्यापकता में कमी आने लगी थी। अमरीका तथा सोवियत संघ सभी प्रकार के नाभिकीय हथियारों को समाप्त करने के लिए सहमत हो गए थे। इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज (आई एन एफ) के नाम से प्रचलित इस संधि को प्रभावकारी बनाने के लिए दोनों ओर से हस्ताक्षर किये गये । यद्यपि इस संधि को पूर्णरूप से लागू न किया जा सका किन्तु इसने सामरिक महत्व के हथियारों को नष्ट करने के लिए 30 प्रतिशत की कटौती की गई। इसी दौरान, इन सब घटनाओं के कारण दुनिया भर के तनाव में भी कमी आई। 1988 में एक दशक पुराना ईरान-इराक युद्ध समाप्त हो गया। गोर्बाचोव के नेतृत्व में सोवियत संघ ने पुरानी ब्रेजनेव व्यवस्था के उलट निर्णय लिए गए। उसने अफगानिस्तान से अपनी सेनाओं को वापस बुला लिया। वियतनाम जोकि 1970 के दशक के अंत से गृहयुद्ध का अंत करने के लिए कम्बोडियाई सरकार की सैनिक मदद कर रहा था, उसने भी अपनी सेनाओं को कम्बोडिया से वापस बुला लिया। क्यूबा ने अपनी सेनाओं को अंगोला में भेजा था, उन्हें वापस बुला लिया। दक्षिण अफ्रीका को नाम्बिया की स्वतंत्रता का समझौता करने के लिए बाध्य किया गया। ये सभी घटनाएँ विश्व में शांति स्थापित करने के लिए सकारात्मक निर्णय लिए गए थे।

लेकिन 20वीं सदी के 9वें दशक के अंत से तथा 10वें दशक के प्रांरभ से स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हुआ। मध्य अमरीका में सेण्डिनिस्ता सरकार का पतन हो गया। 1980 के दशक के पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ जिस आर्थिक संकट की चपेट में आये उसका समाधान राजनीतिक उदारीकरण एवं बाजार अर्थव्यवस्था की नीतियों को अपनाकर खोजने की कोशिश की गयी। सोवियत संघ में पेरीस्ट्रोयिका तथा ग्लासनोस्ट ने गोर्बाचोव की नीतियों को लागू किया। सोवियत संघ की गृह एवं विदेश, दोनों नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव आया। इन सब नीतियों के परिणामस्वरूप पूर्वी यूरोप में एक-एक कर साम्यवादी सरकारों का पतन होने लगा। पूर्वी जर्मनी के राज्य का अंत हो गया तथा संपूर्ण जर्मनी का एकीकरण हो गया। बदनाम बर्लिन दीवार को गिरा दिया गया। और इस तरह से सोवियत संघ का बिखराव हो गया। एक महाशक्ति के पतन के साथ शीतयुद्ध का अन्त हुआ। सोवियत संघ के बिखराव के साथ ही रूस ने अपने महाशक्ति के स्तर को खो दिया।

शीतयुद्ध के खंडहरों पर बनी संयुक्त राज्य अमरीका की बेलगाम सर्वोच्चता स्थापित हो चुकी है। अब विश्व एक ध्रुवीय बन चुका है। शीत युद्ध किसी न किसी रूप में चार दशकों तक जारी रहा, लेकिन विश्व दो महाशक्तियों के प्रत्यक्ष विश्वव्यापी संघर्ष से मुक्त बना रहा परन्तु दीर्घकालिक गृहयुद्धों या क्षेत्रीय युद्धों को रोकने में ये असफल हो गए। शीतयुद्ध के दौरान अधिकतर स्थानीय क्षेत्र या गृहयुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के लिए थे। शीतयुद्ध काल में विश्व का गैर-औपनिवेशीकरण हुआ। अफ्रीका, एशिया तथा लैटिन अमरीका के दो देश सदियों से यूरोपीय औपनिवेशिक शासन से पीड़ित थे, शीतयुद्ध के अंत ने स्थानीय या गृहयुद्धों को समाप्त नहीं किया। लेकिन अब स्थानीय या गृहयुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन नहीं रह गये हैं। वे अधिकतर ऐसे भ्रातघातक युद्ध हैं जो संकीर्ण उपलब्धियों के लिए लड़े जा रहे हैं।

बोध प्रश्न 8
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) शीतयुद्ध के कारणों का विवरण दीजिए।
2) उत्तर शीतयुद्ध के दौरान विश्व की क्या विशेषताएँ हैं।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
यहाँ पर केवल कुछ प्रसंगों की पहचान की गयी है। विस्तृत जानकारी के लिए विद्यार्थी इस इकाई तथा सुझायी गयी पुस्तकों का अध्ययन करें।

बोध प्रश्न 8
1) समाजवादी देशों में आर्थिक संकट, सोवियत संघ में उदारीकरण, सोवियत संघ का विखंडन।
2) एकमात्र शक्ति (संयुक्त राज्य अमरीका) की सर्वोच्चता, संकीर्ण एवं जातीय प्रश्नों पर स्थानीय एवं गृहयुद्ध।

सारांश
शीतयुद्ध का अर्थ है गैर-सैनिक अर्थात इसमें सेनाएँ आमने-सामने होकर युद्ध नहीं करती हैं बल्कि चोरी छुपे कूट चालों से किसी, देश की शांति को भंग किया जाता है। यद्यपि इसका उद्गम प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुआ था (समाजवादी व्यवस्था के जन्म के साथ) किन्तु इसकी तीव्रता को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के समय में महसूस किया गया। 1940 के दशक के अंत में शीतयुद्ध की उत्पत्ति यूरोप में हुई। लेकिन आगामी दशकों में विश्व के अन्य भागों में भी इसका प्रसार हुआ। यद्यपि विचारधारा इसका मुख्य विषय बनी रही लेकिन यदा-कदा गैर-वैचारिक मुद्दे भी छाये रहे। शीतयुद्ध का प्रारंभ सोवियत संघ की स्थापना के साथ हुआ था तथा उसका अंत भी सोवियत संघ के विखंडन के साथ ही हुआ है। शीतयुद्ध के दौरान विश्व ने उपनिवेशवाद के विखंडन की प्रक्रिया को अनुभव किया। विश्वभर में एक महाशक्ति के प्रभुत्व ने शीतयुद्ध का स्थान ग्रहण किया और कुछ क्षेत्रों का प्रांतों के रूप में उद्भव हुआ। उत्तर शीतयुद्ध काल में संकीर्ण एवं जातीय प्रश्नों को। लेकर स्थानीय या गृहयुद्ध हो रहे हैं जबकि शीतयुद्ध के दौरान इस प्रकार के युद्ध उपनिवेशवाद के विखण्डन तथा दलित जनता की मुक्ति जैसे व्यापक मुद्दों को लेकर लड़े गये थे।

शब्दावली
मित्र राष्ट्र ः वे राष्ट्र जो धुरी राष्ट्रों से संघर्ष करने के लिए एक दूसरे के समीप आये। बड़े मित्र राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस तथा चीन थे। इस गुट में पचास देश थे।
धुरी राष्ट्र ः फासीवादी देशों – जर्मनी, इटली तथा जापान ने एक गुट का गठन किया जिसमें कई अन्य छोटे देश भी शामिल हुए।
ग्लासनोस्ट ः मुक्त राजनीति तथा बहु-दलीय लोकतंत्र। यह एक रूसी शब्द है।
पेरीस्ट्रोयिका ः यह एक रूसी शब्द है जो बाजार अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। इसके द्वारा रूसी अर्थव्यवस्था में बाजार की शक्तियों को और अधिक भूमिका प्रदान की जिसको योजनाबद्ध या नियंत्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता था।
स्टार युद्ध ः नाभिकीय युद्ध को रोकने की यह एक ऐसी प्रणाली है जिसके द्वारा तकनीकी ज्ञान तथा साधनों को उपलब्ध करा कर अपने लक्ष्य पर गिरने से पूर्व आते हुए मिसाइलों को हवा में ही रोक देना है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
एल एस स्टाब्रियनस, 1983, एग्लोबल हिस्ट्री, दि ह्यूमैन हैरीटेज, न्यूजर्सी।
जैम्स ली रे, 1992, ग्लोबल पोलिटिक्स, न्यू जर्सी।
डी एफ फ्लेमिंग, 1961, दि कोल्ड वार एण्ड इटस आरिजन, 1917-1960, 2 जिल्द, डबलडे।
डब्लयू ला फेबर, 1968, अमरीका रसिया एण्ड दी कोल्डवार, जौन विली।