Cells of Immunity in hindi , प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाएं कौन कौनसी होती है नाम बताओ , मेक्रोफेजेज (Macrophages)

बताइए Cells of Immunity in hindi , प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाएं कौन कौनसी होती है नाम बताओ , मेक्रोफेजेज (Macrophages) ?

प्रतिरक्षा की कोशिकाएँ (Cells of Immunity)

परिचय (Introduction) :

प्रतिरक्षी तन्त्र का विकास गर्भ धारण के दो माह पश्चात् भ्रूण में आद्य कोशिकाओं (primordial cells) व (स्तम्भ कोशिकाओं (stem cells) से होता है। ये भ्रूण के पीतक कोष (Volk sac) एवं भ्रूणीय यकृत से भ्रूण काल के दौरान विकसित होती है। इसके उपरान्त ये अस्थि मज्जा (bone marrow) में पायी जाती है । जटिल विधि से इनका विभेदन होता है तथा ये दो प्रकार की कोशिकाओं को जन्म देती है।

(i)-रक्ताणु उत्पत्ति कोशिकाएँ (erythoropoietic cells) जो लाल रक्ताणुओं में विकसित होती है (ii) लसिका उत्पत्ति कोशिकाएँ (lymphoeitic cells) जो लसिका कोशिकाओं में विकसित होती हैं। लसिका कोशिकाएँ परिधीय लसिका ऊत्तकों (peripheral lymphoid tissues) जैसे (प्लीहा ) (थाइमस लसिका पव एवं यकृत में प्रवेश करती है। प्लीहा स्तनियों में तथा पक्षियों में पाये वाली रचना फ्रेब्रिसी प्रपुटी (bursa of fabricius) के समान होती है। यह B एवं T कोशिकाओं का संग्रह करती है।

कुछ लसिका कोशिकाएँ थाइमस नामक ग्रन्थि में प्रवेश कर जाती हैं। यहाँ से वृद्धि व परिपक्व होकर के थाइमस आश्रित लसिकाणुओं T लिम्फोसाइट्स (T- lymphocytes) या T कोशिकाओं को उत्पन्न करती हैं। ये परिवहन तन्त्र में प्रवेश कर रक्त के साथ देह के विभिन्न भागों में घूमती रहती हैं। पक्षियों में ये फ्रेब्रिसी प्रपुटी (bursa of fabricius) में प्रवेश कर B-लिम्फोसाइट्स lymphocytes) या B-कोशिकाओं को उत्पन्न करती हैं। मनुष्य में B कोशिकाएं भ्रूण के यकृत व पीतक थैले (liver and yolk sac) में तथा अस्थि मज्जा (bone marrow) में बनती है। वयस्क में ये अस्थि मज्जा में जीवन पर्यन्त बनती रहती हैं। मनुष्य में B लसिकाणु आन्त्र के एपेन्डिक् (appendix) भाग व टान्सिल्स (Tonsils) में भी बनती है। ये रक्त परिवहन तन्त्र के द्वारा देह के विभिन्न भागों में चक्कर लगाती रहती हैं। ये जब प्रतिजन के सम्पर्क में आती हैं तो प्रतिरक्षी प्रतिक्रिय आरम्भ हो जाती है। लिम्फोसाइट्स का एक अन्य वर्ग जिसे मारक कोशिकाएँ (killer.cells) हैं जो देह को भेद कर आने वाले सूक्ष्मजीवों को भक्षाणुशण (phagocytosis) द्वारा नष्ट करती हैं। इसी प्रकार मेकोफ्रेजेज (macrophages) कोशिकाएँ भी विशिष्ट प्रकार की लिम्फोसाइट्स हैं जो अत्यधिक संख्या में पायी जाती है।

प्रतिरक्षा की कोशिकाएँ देह के विभिन्न अंगों व ऊत्तकों में बनती रहती हैं। ये यहाँ से उत्पन्न होकर परिपक्व होती हैं एवं प्रतिरक्षा क्रियाओं में भाग लेती हैं।

प्राथमिक लिम्फॉइड अंगों में लाल अस्थिमज्जा (red bone marrow) लिम्फोसाइट्स सहित सभी रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करती है। अस्थिमज्जा में सभी रक्त कोशिकाओं की पूर्ववर्ती कोशिकाएँ (precursor cells) तथा इनसे रूपान्तरित वयस्क कोशिकाएँ इसके साइनूसॉइड (sinusoids) भाग में पायी जाती हैं। इस प्रकार अस्थि मज्जा में पूर्व मध्यम तथा वयस्क लाल रक्ताणु (erythrocytes) मोनोसाइट्स (monocytes), मेन्युलोसाइट्स (granulocytes), लिम्फोसाइट्स कोशिकाएँ एवं स्तम्भ कोशिकाएँ (stem cells) भी यहाँ उपस्थित रहती हैं। यह भी विभाजन कर कोशिकाओं को उत्पन्न करती हैं। अस्थि मज्जा B कोशिकाओं के विभेदन हेतु स्थान के साथ वह सूक्ष्म वातावरण भी उपलब्ध कराती है जो इसके लिये आवश्यक होता है।

थाइमस के रेटिकुलर जाल में लिम्फोसाइट्स भरे रहते हैं। यह T लिम्फोसाइट्स के वर्धन व विकास का केन्द्र होती है। यहाँ लिम्फोसाइट्स लगातार बनते रहते हैं। बचपन में यह अत्यधिक सक्रिय रहती है उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह निष्क्रिय होती जाती है।

द्वितीयक लिम्फॉइड अंगों में वयस्क, व B लिम्फोसाइट्स प्रतिजन के सम्पर्क में आती हैं एवं विभेदन प्राप्त करती हैं। इन ऊत्तकों में प्रतिजन मेक्रोफेजेज (macrophages) के सम्पर्क में आते हैं। (प्लीहा (spleen) का कार्य रक्त प्रवाह में से प्रतिजन को पृथक करना होता है। प्लीहा के वल्कुट (cortex) भाग में T कोशिकाएँ बनती हैं यहाँ श्वेत मज्जा (white pulp ) भरा होता है। इसके भीतरी भाग मध्यान्श (medulla) में लाल मज्जा (red pulp ) भरा होता है यहाँ B कोशिकाएँ भरी होती है। लाल मज्जा में वृद्ध व मृत लाल रक्ताणु पृथक किये जाते हैं। बीमारी के दौरान सभी रक्ताणु कोशिकाएँ बनती हैं। (लसिका ग्रन्थियाँ भी रक्त को छानने का कार्य करती है इनमें भी वल्कुट व मध्यान्श भाग होता है। इनमें भी B व T कोशिकाएँ पायी जाती हैं।

प्रतिरक्षा तन्त्र में इस प्रकार निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रतिरक्षी कोशिकाएँ (immunity cells) भाग लेती हैं-

मेक्रोफेजेज (Macrophages)

ये हिस्टीओसाइट्स भी कहलाती हैं। ये अस्थि मज्जा में पूर्ववर्ती कोशिकाओं से बनती हैं। कुछ समय तक ये रक्त में मोनोसाइट्स की भाँति घूमती रहती है। फिर मेक्रोफेजेज संयोजी ऊत्तक में प्रवेश कर जाती है। मेकोफेजेज संयोजी ऊत्तक यकृत, लसीका ग्रन्थियों, प्लीहा, अस्थि मज्जा व त्वचा में होते हैं। यहाँ ये मेक्रोफेजेज के रूप में विकसित किये जाते हैं। मेक्रोफेजेज दो प्रकृति के होते हैं। (i) स्थिर (fixed) (ii) भ्रमणशील ( wandering)। भ्रमणशील मेक्रोफेजेज अण्डाकार आकृति रखते हैं जबकि स्थिर प्रकृति के मेकोफेजेज अनियमित आकृति के होते हैं इनकी परिधि से लम्बे कोशिकाद्रव्यी प्रवर्ध निकले रहते हैं। इसके कोशिकाद्रव्य में सामान्य कोशिकाओं की भाँति गॉल्जीकाय, माइटोकॉण्ड्रिया लाइसोसोम्स व दोनों प्रकार की अन्त: द्रव्यी जालिका पायी जाती हैं। इनका केन्द्रक छोटा व गोल होता है। इनका मुख्य कार्य भक्षाणुशण (phagocytosis) होता है। ये सुरक्षा (defence) के साथ-साथ सफाई (मृत पदार्थों का निष्पादन) का कार्य भी करती हैं।

मेक्रोफेजेज बड़े परिमाण के प्रतिजन अणुओं का भक्षण कर इन्हें तोड़ देते हैं, इनका पाचन कर देते हैं। मेक्रोफेजेज अधिक संख्या में एकत्रित होकर वृहत परिमाण के प्रतिजन अणुओं को घेर इन पर आक्रमण भी करते हैं। इस स्थिति में 100 से अधिक मेक्रोफोजेज कोशिकाएँ संगलित होकर दैत्याकार काय बाह्यकाय (forgeign body) हेतु बना लेती हैं। इनसे उत्पन्न सुरक्षा तन्त्र को मेक्रोफेज सुरक्षा तन्त्र (macrophage defense system) कहते हैं। इस समूह की कुछ कोशिकाएँ यकृत की कुफ्फर कोशिकाएँ (kuffer cells), रक्त की मोनोसाइट्स हैं ये भी उपरोक्त कार्य ही कर देह के इन भागों में बाह्य पदार्थों से सुरक्षा प्रदान करती है। इसी प्रकार की कुछ कोशिकाएँ फेफड़ों में कूपिकीय मेक्रोफेजेज (alveolar macrophages) के रूप में भी पायी जाती है। कुछ कोशिकाएँ वृक्क के ग्लोमेरूलस में मीजेन्जियल कोशिकाएँ (meseangial cells) व अस्थिमज्जा में ऑस्टिओक्लाइट (osteoclast) कोशिकाओं के रूप में पायी जाती है। ये सभी मिलकर मोनोन्यूक्लिअर फेगोसाइट सिस्टम (mononuclear phagocytea system) MPS बनाती है। इनका जीवनकाल काफी लम्बा होता है। ये जीवाणु, विषाणु व प्रोटोजोआ जैसे बाह्य तत्वों से देह को मुक्त कराने का कार्य करते हैं।

मेक्रोफेजेज इन बाह्य तत्वों को निगल कर इन्हें नष्ट करने के साथ-साथ एक अन्य कार्य भी करते हैं। जब बाह्य कण पर पूरक या प्रतिरक्षीकाय संलग्न हो जाती है तो इसे पहचान कर इसका शोधन (processing) किया जाता है। इस प्रतिजन को T-कोशिका को विशिष्ट प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया हेतु प्रेषित किया जाता है।

लसीकाणु (Lymphocytes)

श्वेत रक्ताणुओं में इनकी मात्रा 20-30% होती है। ये अकणिकीय (agranular) कोशिकाद्रव्य रखती है। इनका आमाप 5-15 um होता है। आमाप में भिन्नता के आधार पर इन्हें BIT कोशिकाओं में विभक्त करते हैं। इनका उद्गम भी भिन्न होता है। सामान्य रक्त में कुल रक्त की लगभग 85% T लसीकाणु होती है।

B लसीकाणु (B- Lymphocytes)

B कोशिकाएँ या B लसीकाणु अस्थि मज्जा में पूर्ववर्ती कोशिकाओं से बनती है। पक्षियों में ये फ्रैब्रिसियश के आशय (busra of fabricius) में बनती है मनुष्य के भ्रूण में ये यकृत व पीतल थैले में बनती है। अस्थि मज्जा, आन्त्र के अपेन्डिक्स भाग व टॉन्सिल्स में भी इनका निर्माण होता है।

इनका विभेदन होने के उपरान्त ये प्रतिजन के प्रति अभिक्रिया करती हैं प्रतिरक्षी बनाती हैं। ये विशिष्ट प्लाज्मा कोशिकाओं में विभेदित होकर भारी मात्रा में प्रतिरक्षी बनाती हैं।

प्रतिजन असंख्य प्रकार के होते हैं अतः प्रत्येक के लिये प्रतिरक्षी का विशिष्ट बनाया जाना आवश्यक होता है। इसलिए इन लसिकाणुओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है । B लसीकाणु प्रतिरक्षीग्लोबुलिन (immunoglobin) का निर्माण करती हैं। ये अणु इनकी सतह पर व्यवस्थित हो जाते हैं। एक B कोशिका की सतह पर लगभग 1.5 x 10 प्रतिरक्षी अणु हो सकते हैं।

B लिम्फोसाइट्स की कोशिका कला पर प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन्स समाकल प्रोटीन्स के रूप में विद्यमान रहते हैं। ये एन्टीजन को ग्रहण करने हेतु ग्राही स्थल रखते हैं। ये प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन्स कार्बोक्सी अन्तः द्वारा कोशिका कला में गढ़े रहते हैं। एमीनों या एन्टीजन बन्धकारी शीर्ष कोशिका से बाहर की ओर दिष्ट होता है यह वह स्थल होता है जहां प्रतिजन ग्रहण किया जाता है। अपरिपक्व B कोशिकाओं की सतह पर आरम्भिक तौर पर IgM एकलक उपस्थित रहते हैं किन्तु IgD अणु अनुपस्थित होते हैं। B कोशिकाओं के परिपक्व होने पर इन पर IgD अणु के साथ-साथ IgM अणु भी पाये जाते हैं। अपरिपक्व B कोशिकाओं पर अनेक ग्राही स्थल होते हैं। सक्रियत B कोशिकाएँ इन्टरल्युकिन – 2 हेतु ग्राही स्थल रखती हैं। एन्टीजन उद्दीप्त होने के उपरान्त ये एक से दो पथ पर क्रियाशील होते हैं।

प्रतिजन्स का कुछ मामलों में मेक्रोफेजेज में संसाधित होना आवश्यक होता है। मेक्रोफेजेज प्रतिजन को अपनी सतह पर लाकर लिम्फोसाइट्स को प्रस्तुत करते हैं। अनेक एन्टीजेन्स T- कोशिकाओं की सहायता से दी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दशाते हैं। T- कोशिकाएं अणु का वाहक भाग या क्षेत्र पहचान लेती है इसी प्रकार B- कोशिकाएं हप्टेन वाला सिरा पहचान लेती है। T- कोशिकाएं क्रिया कर B-कोशिकाओं को सीधे विमोचित कर देती है। इस क्रिया में मेक्रोफेजेज, T- कोशिका व B- कोशिकाएं परस्पर सहयोग करती है।

ये प्लाज्मा कोशिकाओं में विभेदित होकर अत्यधिक मात्रा में प्रतिरक्षीग्लोबुलिन का स्त्रावण आरम्भ करते हैं या विभाजित होकर विश्राम अवस्था में प्रवेश कर जाते हैं। ये कोशिकाएँ अब स्मृति कोशिकाएँ (memory cells) कहलाती है एवं शीघ्रता से प्लाज्मा कोशिकओं में विभेदित होती है। ऐसा उस समय होता है जब वही एन्टीजन दो बार इनके सम्पर्क में आता है। प्लाज्मा कोशिकाएँ (plasma cells) B कोशिकाओं की अन्ततः विभेदित अवस्था होती है। इस समय ये प्रति सैकण्ड  हजारों की संख्या में प्रतिरक्षी अणुओं को मुक्त करती है। प्लाज्मा कोशिकाओं से जितने प्रोटीन उत्पन होते हैं इनमे 40% से अधिक प्रतिरक्षीग्लोबुलिन्स होते हैं। प्लाज्मा कोशिकाएँ सामान्यतः विभाजन में भाग नहीं लेती इनकी अनुमानित जीवन अवधि 4 दिन से भी कम ही होती है।

T लिम्फोसाइट्स (T Lymphcytes)

B कोशिकाओं की तरह ये भी अस्थि मज्जा में पूर्ववर्ती कोशिकाओं से बनती है किन्तु इनका परिपक्वन थाइमस ग्रन्थि में होता है अतः T कोशिकाएँ कहलाती हैं। ये दो प्रकार की प्रतिरक्षी क्रियाओं में भूमिका रखती हैं। ये क्रियाएँ कार्यकारी (effector) व नियमनकारी (regulatory) प्रकार की होती हैं। कार्यकारी क्रिया घुलनशीलन पदार्थों जिन्हें लिम्फोकाइनेज (lymphokinase) कहते हैं को स्त्रावित करने तथा एन्टीजेनिक कोशिकाओं को नष्ट करने (cytotoxic) के गुण के द्वारा की जाती है। नियमनकारी क्रिया कोशिका मध्यवर्ती कोशिका आविषालुता (cytotoxicity) के गुण को विकसित कर अन्य T कोशिकाओं के सहयोग से B कोशिकाओं द्वारा प्रतिरक्षीग्लोबुलिन का स्त्र आरम्भ कराती है।

T कोशिकाएँ भी B कोशिकाओं की भाँति गुणन कर अनेक अपने समान क्लोन कोशिकाओं को जन्म देती हैं। कार्य के अनुरूप ये विभिन्न प्रकार की होती हैं-

(i) प्रतिजन के मेक्रोफेजेज कोशिकाओं के पाचन के उपरान्त शेष एन्टीजन से क्रिया करने वाली T कोशिकाएँ सुग्राहित (sensitized) T कोशिकाएँ कहलाता है।

(ii) B कोशिकाओं से जुड़कर इन्हें प्रतिरक्षी काय के निर्माण में सहयोग करने वाली T कोशिकाएँ. T-सहायक कोशिकाएँ (T-helper cells) कहलाती हैं। ये एन्टीजन से उद्दीप्त होकर साइटोकाइस (cytokines) बनाती है।

(iii) कुछ T कोशिकाएँ किन्हीं प्रतिरक्षी अनुक्रियाओं का अवरोध करती हैं, इन्हें T-अवरोधी (T- suppressor) कोशिकाएँ कहते हैं।

(iv) कुछ T कोशिकाएँ· लसीका क्षेत्र से संक्रमण स्थल पर पहुँच कर एन्टीजन से संलग्न हो जाती हैं। ये कोशिकीय विष का स्त्रावण कर संक्रमणकारी तत्वों को नष्ट करती हैं इन्हें T मारक कोशिकाएँ (T-killer cells) या T कोशिका आविषालु (T-cytotoxic) कोशिकाएँ कहते हैं। ये विषाणुओं, जीवाणुओं प्रकार व परजीवियों से रक्षा करती है। अबुर्द्ध बनने से रोकती हैं।

T कोशिकाओं की सतह पर भी B कोशिकाओं की भाँति सतही चिन्हक (surface marker) पाये जाते हैं। इन चिन्हकों में एक को समूहक पद ( cluster designation) CD कहते हैं। ये CD ऐसे सतही संकुल होते हैं जो ग्राही के साथ बन्धन बनाने में सहयोग करते हैं। जैसे-जैसे T कोशिकाएं परिपक्व होती जाती हैं, इन पर CD संकुल बढ़ने लगते हैं। इनसे इनकी उपस्थिति का क्रम CD3, CD4 व CDS होता है। 65% T कोशिकाओं की सतह पर CD2, CD3 व CD4 अणु पाये जाते हैं। जबकि 35% T कोशिकाओं की सतह पर CD2, CD3 व CD8 अणु होते हैं। CD4 + T कोशिकाएँ सहायक T अवरोधी कोशिकाएँ (T supressor cells) कहलाती हैं। ये कोशिकाएँ B कोशिकाओं द्वारा लिम्फोकाइनेज का स्त्रावण तीव्र कराती हैं।

T कोशिका आविषालु कोशिकाएँ (T-cytotoxic cells) विशिष्ट घातक कोशिकाओं (T-killer cells) के रूप में कार्य करती हैं। अवरोधी कोशिकाएँ (supressor cells) प्रतिरक्षी क्रियाओं में अवरोध उत्पन्न करती हैं। T कोशिकाएँ थाइमस में रहकर स्वयं के वृहत हिस्टोकाम्पेटिबिलीटी जटिल (major-histocompatibility complex) MHC जीन उत्पादों को पहचान कर एन्टीजन के विरुद्ध कार्य करती हैं। T कोशिकाओं पर एन्टीजन ग्राही स्थल पाये जाते हैं। T कोशिका ग्राही 2 श्रृंखलाओं से बना होता है ये 40-50,000 डाल्टन अणु भार की होती हैं जो डाइसल्फाइड बन्ध से जुड़ी रहती हैं। ये शृंखलाएँ a व B श्रृंखलाएँ कहलाती हैं। T कोशिकाओं पर एन्टीजन अभिज्ञान स्थल भी पाये जाते हैं। ये विशिष्ट जीन्स द्वारा ∝ व B श्रृंखलाओं द्वारा कोडित होते हैं।